<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888</id><updated>2011-12-31T23:23:08.064-08:00</updated><category term='सत्यनारायण बीजावत'/><category term='डॉ. शांति जैन'/><category term='विनोद रिंगानिया'/><category term='राजस्थान'/><category term='मारवाड़ी समाज की संस्थाएं'/><category term='चम्पालाल मोहता ‘अनोखा’'/><category term='वैश्य समाज'/><category term='महाराजा अग्रसेन'/><category term='मुडिया लिपि'/><category term='राजस्थानी लोकगीत'/><category term='राजस्थानी कहावत'/><category term='शम्भु चौधरी'/><category term='Modiya Script'/><category term='Gulab Khandelwal'/><category term='राजस्थानी भाषा'/><category term='महेश जालान'/><category term='हरीश भादानी'/><category term='यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’'/><category term='कीर्ति राणा'/><category term='Intercast Mariage'/><category term='गीत'/><category term='प्रो. शिवकुमार'/><category term='मारवाड़ी'/><category term='Nandlal Rungta'/><category term='MURIA LIPI'/><category term='मारवाड़ी सम्मेलन'/><category term='Kanhaiyalal Sethia'/><category term='मारवाड़ी समाज के स्वतंत्रता सेनानी'/><category term='Shambhu Choudhary'/><category term='Marwari Samaj'/><category term='Prof.Kalyanmal Lodha'/><category term='Ranchi'/><category term='युवा मंथन 2011'/><category term='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां'/><category term='इन्दिरा चौधरी'/><category term='मोडीया लिपि ‘महाजनी’'/><category term='बखत रै परवाण'/><category term='भुपेन हजारिका'/><category term='रावत सारस्वत'/><category term='राजस्थानी लोकगीतों'/><category term='राजस्थानी रचनाकारों'/><category term='डॉ. दुलाराम सहारण'/><category term='प्रो. रामपाल अग्रवाल ‘नूतन’'/><category term='rajsthani bhasha'/><category 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src="http://2.bp.blogspot.com/-S5VzInTV5Ug/Tfr9YmrT3VI/AAAAAAAAAt0/BI7v5UgK-tU/s200/shambhu_choudhary.jpg" border="0" alt="Shambhu Choudhary"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5619082084239007058" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="red"&gt;&lt;strong&gt;&lt;i&gt; &lt;br /&gt;इस दिशा में जब जैसे-जैसे में गहराई से अध्यन करने लगा मेरा मन किया कि अब सिर्फ भाषा पर या इसके मान्यता से काम नहीं चलेगा क्यों कि राजस्थानी भाषा न सिर्फ एक गहरी साजिश की शिकार हो चुकी है इसके खुद के अन्दर भी कई विवाद जन्म ले चुके हैं। जो इस भाषा की मान्यता के रास्ते में बाधक बनी हुई है। जिसमें जिन तीन कारणों की तरफ मेरा ध्यान जाता है उसमें प्रमुख है। -&lt;br /&gt;1. भारतीय जनगणना का षड़यंत्र&lt;br /&gt;2. मोडिया लिपि का विलुप्त होना&lt;br /&gt;3. राजस्थान की बोलियों में आपसी अंहकार।&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;p style="text-align: justify"&gt;&lt;br /&gt; यह विषय हमें जहाँ चिन्तीत करता है वहीं हमें सचेत भी करता है कि आखिर में हमारा समाज कर क्या रहा है? आये दिन धन की बर्वादी में सबसे आगे रहने वाले मारवाड़ी समाज के पास इतना भी धन और समय नहीं कि हम अपनी धरोहर को, अपनी भाषा को बचा सके। मेरी क्षमता इस कार्य को करने की नहीं है ना ही मैं भाषा का विद्वान ही हूँ कि जो कुछ मैं लिख दूगाँ उसे पूरा समाज स्वीकार कर लेगा। हाँ! यह तो जरूर होगा कि जिस दिशा में मेरे कदम बढ़ने लगे हैं। शायद इसमें मुझे कुछ हद तक सफलता जरूर मिलेगी ताकी आने वाली पीढ़ी को समाज की कुछ सामाग्री प्राप्त हो सके जो एकदम से समाप्त के कगार पर आ चुकी है। आज हम जिस कड़ी में यह बात लिख रहा हैं उनमें मोडिया भाषा के जानकारी रखने वाली पीढ़ी प्रायः समाप्त हो चुकी है। पिछले दिनों जब मैं कोलकाता से प्रकाशित एक हिन्दी मासिक पत्रिका ‘समाज विकास’ जो कि आखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन का मुखपत्र है का संपादन कार्य को देख रहा था उस कार्यकाल के दौरान सम्मेलन के तत्कालिन राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नन्दलाल रुंगटा जी ने एक सादा पन्ना मेरे हाथ में थमा दिया जिसपर कुछ अक्षर लिखे हुए थे। उस वक्त मुझे लगा कि यह पन्ना मेरे क्या काम आयेगा, परन्तु पिछले माह राजस्थान से लौटकर मैं अपने सारे कागजात में उस सादे कागज को खोजने लगा। श्री रुंगटाजी, श्री सीताराम शर्माजी, श्री रतन शाहजी, श्री आत्माराम सोंथलिया जी, श्री जुगलकिशोर जैथलियाजी, श्री विजय गुजरवासिया जी और मेरे कई पारिवारिक मित्रों से यह अनुरोध किया कि वे मुझे मोडिया लिपि के कुछ पुराने दस्तावेज जिसमें खाते-बही, जमीन के पुराने पट्टे या चिट्ठी-पत्री आदि जो भी मिल सके देने की कृपा करें। श्री नन्दलालजी रुंगटा जी ने मुझसे लगातार मेरे कार्य के प्रगति के बारे में फोनकर पुछने भी लगे। इससे मेरे कार्य करने की क्षमता में काफी बृद्धि होने लगी। इससे पूर्व ही कोलकाता में मारवाड़ी युवा मंच की उत्तर मध्य कोलकाता शाखा द्वारा आयोजित ‘अवलोकन-2011’ में असम के श्री विनोद रिंगानिया, भाईजी श्री प्रमोद्ध सराफ और श्री रतन शाह जी के विचारों ने मुझे काफी झकझोर सा दिया था। हांलाकि उस गोष्ठी में श्री विनोद जी का मन मात्र एक वेवसाईट बनाने का था जिसमें राजस्थानी भाषा की कहावतें व समाज का इतिहास आदि को डालने पर कार्य करने का था जबकि श्री प्रमोद्ध सराफ जी चाहते थे कि समाज की तरफ से कोई एक ऐसा केन्द्र की स्थापना पर ध्यान देने की जरूरत है जिसमें समाज के महत्वपूर्ण दस्तावेजों को पुस्तकों व समाज की अन्य साहित्यिक, सांस्कृतिक जानकारियों को एकत्रित करना जिससे विश्वभर से आने वाले शोधार्थि छात्र-छात्राओं को वह समस्त सामाग्री एक ही जगह, एक छत के नीचे उपलब्ध कराया जा सके। वहीं श्री रतनजी शाह ने राजस्थानी भाषा की मान्यता पर किए जा रहे अपने प्रयासों की जानकारी दी। मेरे मन में लगातार एक प्रश्न उठ रहा था कि ऐसी क्या बात है जो राजस्थानी भाषा को भारतीय संविधान की आंठवीं सूची में मान्यता देने से रोकती है। हमें इसके उन पहलुओं को देखना और उसके समाधन के रास्ते निकालने की जरूरत पहले है ना कि भाषा के मान्यता की बात। यदि मान्यता हल्ला करने या आंदोलन से मिल सकती तो पिछले 40-45 सालों में अब तक कई छोटी-छोटी भाषा जिसमें नेपाली भाषा है को जब मान्यता मिल गई तो राजस्थानी भाषा तो मिल ही जानी चाहिए थी। इसके प्रकाश में श्री नन्दलाल रुंगटा जी का एक अध्यक्षीय लेख मुझे पढ़ने को मिला जिसमें भाषा विवाद का हल निकालने के लिए काफी महत्वपूर्ण सूझाव आपने दिये थे। देखें उनका लेख-&lt;strong&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;‘‘राजस्थान विधानसभा द्वारा 25 अगस्त 2003 को, राजस्थानी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने का एक संकल्प रूपी प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसमें कहा गया कि ‘‘राजस्थान विधानसभा के सभी सदस्य सर्व सम्मति से यह संकल्प करते हैं कि राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में  सम्मिलित किया जाए। राजस्थानी भाषा में विभिन्न जिलों में बोली जाने वाली भाषा या बोलियाँ यथा ब्रज, हाड़ौती,  बागड़ी,  ढूँढ़ाड़ी,  मेवाड़ी,  मारवाड़ी,  मालवी, शेखावटी आदि शामिल हैं।’’  &lt;br /&gt;यदि हम इस प्रस्ताव की गम्भीरता पर विचार करें तो, हम पाते हैं कि यह प्रस्ताव खुद में अपूर्ण और विवादित है। ‘‘इसमें कहीं भी स्पष्ट नहीं है कि हम किस भाषा को राजस्थानी भाषा के रूप में मान्यता दिलाना चाहते हैं।’’ एक साथ बहुत सारी बोलियों को मिलाकर विषय को अधिक उलझा दिया गया है। इस प्रस्ताव से ही राजस्थान में पल रहे भाषा विवाद की झलक मिलती है। हम चाहते हैं कि राजस्थान सरकार अपनी बात को तार्किक रूप से स्पष्ट करे कि वो आखिर में केन्द्र सरकार से चाहती क्या है?’&lt;/i&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;small&gt;(संदर्भ अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन का मुखपत्र जून 2009 वर्ष 59 अंक 6)&lt;/small&gt;&lt;br /&gt;इस दिशा में जब जैसे-जैसे में गहराई से अध्यन करने लगा मेरा मन किया कि अब सिर्फ भाषा पर या इसके मान्यता से काम नहीं चलेगा क्यों कि राजस्थानी भाषा न सिर्फ एक गहरी साजिश की शिकार हो चुकी है इसके खुद के अन्दर भी कई विवाद जन्म ले चुके हैं। जो इस भाषा की मान्यता के रास्ते में बाधक बनी हुई है। जिसमें जिन तीन कारणों की तरफ मेरा ध्यान जाता है उसमें प्रमुख है। -&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;1. भारतीय जनगणना का षड़यंत्र&lt;br /&gt;2. मोडिया लिपि का विलुप्त होना&lt;br /&gt;3. राजस्थान की बोलियों में आपसी अंहकार।&lt;/strong&gt;&lt;p style="text-align: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="red"&gt;&lt;strong&gt;&lt;i&gt; &lt;br /&gt;1. भारतीय जनगणना का षड़यंत्र&lt;/i&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;भारत सरकार की ओर से हुई 1861 में जनगणना के आंकड़ों के अनुसार सिंधी बोलने वाले लोग 13,71,932 थे, नेपाली 10,21,102, कोंकणी के 13,52,363 और राजस्थानी के 1,49,33,016 लोग बोलने वाले थे। इसप्रकार सर्वाधिक राजस्थानी बोलने वालों की संख्या 1961 तक हर दस बरसों बाद की गई जनगणना में राजस्थानी भाशा को स्वतंत्र भाशा माना है परंतु इसके बाद हुई जनगणना में 1971, 1981, 1991, 2001 और अब 2011 में राजस्थान को हिन्दी प्रांत मान कर इस जनसंख्या को भी हिन्दी भाषियों के साथ न सिर्फ जोड़ दिया गया वरन प्रवासी राजस्थानियों को तो जनगणना में हिन्दी भाषी ही माना गया है। यदि राजस्थान की जनसंख्या को ही गैर हिन्दीभासी प्रान्त मान लिया जाए तो इसकी जनसंख्या 2001 के जनगणनानुसार आठ करोड़ है। इसमें प्रवासी मारवाड़ियों की संख्या का अनुमान लगया जाए तो शेष भारत में 3 करोड़ से अधिक ही मानी जाएगी। इसी प्रकार वर्ष 2011 के आंकड़े का  अनुमान लगाया जाये तो राजस्थानी बोलने और समझने वालों की जनसंख्या वर्तमान में 13 करोड़ के कुल आंकड़े को पार कर चुकी है। जबकि जनगणना विभाग की माने तो पुरे देश में सन् 2001 तक मारवाड़ी या राजस्थानी बोलने वालों की जनसंख्या मात्र 79,36,183 है जिनमें 62,79,105 राजस्थान में और शेष पूरे भारत में जिसमें महाराष्ट्र-1076739, गुजरात में - 206895, कर्नाटका में - 60731, मध्यप्रदेश में - 50754, पश्चिम बंगाल में -48113, आंध्रप्रदेश में - 43195 एवं झारखण्ड में 40854 इसमें यु.पी., असम, उड़ीसा और बिहार का नाम ही दर्ज नहीं है। देश के अन्य महत्वपूर्ण प्रदेश व वर्ष 2001 के पहले बने प्रान्तों को भी छोड़ दिया गया है। अर्थात मारवाड़ी अथवा राजस्थानी भाषा बोलने वालों की जनसंख्या सन् 1861 की जनगणना  1,49,33,016 से घटकर मात्र 79,36,183 रह गई है। &lt;br /&gt;जारी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-7591041393084700230?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/7591041393084700230/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/12/1.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7591041393084700230'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7591041393084700230'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/12/1.html' title='राजस्थानी भाषा: चिन्ता का विषय  -शम्भु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-S5VzInTV5Ug/Tfr9YmrT3VI/AAAAAAAAAt0/BI7v5UgK-tU/s72-c/shambhu_choudhary.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-7147115972250165675</id><published>2011-12-21T03:26:00.000-08:00</published><updated>2011-12-21T03:37:33.293-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Lalit Garg'/><title type='text'>भविष्य के लिए नये संकल्प बुनें</title><content type='html'>&lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;-ललित गर्ग-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-rpWNPf_KD3I/TvHDM9998JI/AAAAAAAAAyE/Z37yYPHjAVM/s1600/lalit_garg.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 125px; height: 160px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-rpWNPf_KD3I/TvHDM9998JI/AAAAAAAAAyE/Z37yYPHjAVM/s320/lalit_garg.jpg" border="0" alt="Lalit Garg"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5688542431905968274" /&gt;&lt;/a&gt;एक वर्ष का विदा होना सिर्फ कैलेन्डर का बदल जाना भर नहीं है। छोटा ही सही लेकिन यह हमारे जीवन का एक अहम पड़ाव तो होता ही है, जो हमें थोड़ा ठहरकर अपने बीते दिनों के आकलन और आने वाले दिनों की तैयारी का अवसर देता है। एक व्यक्ति की तरह एक समाज, एक राष्ट्र के जीवन में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान है। नये वर्ष की दस्तक जहां आह्वान कर रही है, वहीं बीते वर्ष की अलविदा हमें समीक्षा के लिए तत्पर कर रही है।&lt;br /&gt;अलविदा और अगवानी के इस संगम के अवसर पर हम जहां अतीत को खंगालें वहीं भविष्य के लिए नये संकल्प बुनें। हमें यह देखना है कि बीता हुआ वर्ष हमें क्या संदेश देकर जा रहा है और उस संदेश का क्या सबब है। जो अच्छी घटनाएं बीते वर्ष में हुई हैं उनमें एक महत्वपूर्ण बात यह कही जा सकती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागृति का माहौल बना- &lt;br /&gt;एक अन्ना क्रांति का सूत्रपात हुआ। लेकिन जाते हुए वर्ष ने अनेक घाव दिये हैं, महंगाई एक ऐसी ऊंचाई पर पहुंची, जहां आम आदमी का जीना दुश्वार हो गया है। राजनीतिक स्तर पर केन्द्रीय मंत्रियों एवं अन्य बड़ी हस्तियों के घोटालों की त्रासदी को उजागर किया और उन्हें तिहाड़ पहुंचा दिया वहीं लोकपाल बिल के लिये सकारात्मक वातावरण का निर्माण होना एक क्रांतिकारी कदम कहा जा सकता है। ऐसा भी प्रतीत हुआ कि बीते साल में राजनीति और सत्ता गरीब विरोधी दिशा में अधिक गतिशील बनी। गरीब अधिक गरीब और अमीर अधिक अमीर बने हैं। समतामूलक समाज का सपना धुंधलाया है।&lt;br /&gt;पुराना कैलेंडर बदलते वक्त हमेशा उस पर वक्त के कई निशान दिखाई देते हैं- लाल, काले और अनेक रंगों के। इस बार लगा जैसे वक्त ने ज्यादा निशान छोड़े हैं। देश-विदेश में बहुत घटित हुआ है। अनेक राष्ट्र आर्थिक कर्ज में बिखर गये तो अनेक बिखरने की तैयारी में हैं। अच्छा कम, बुरा ज्यादा। यह अनुपात हर वर्ष बढ़ता जा रहा है। शांति और भलाई के भी बहुत प्रयास हुए है। पर लगता है, अशांति, कष्ट, विपत्तियां, हिंसा, भ्रष्टाचार, आतंकवाद और अन्याय महामारी के रूप में बढ़ रहे हैं। सब घटनाओं का जिक्र इस लेख के कलेवर में समा ही नहीं सकता। बीते साल की आर्थिक घटनाओं के संकेत हैं कि हम न सिर्फ तेजी से आगे बढ़ रहे हैं बल्कि किसी भी तरह का झटका झेलने में सक्षम है। इस साल सेंसेक्स ने लगातार ज्वारभाटा की स्थिति बनाए रखी हालांकि पेट्रोल की कीमतों एवं बैंक की बढ़ी ब्याज दरों ने काफी परेशान किया। जब दुनिया की बड़ी आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ताएं धराशायी हुई तब भी भारत ने स्वयं को संभाले रखा। &lt;br /&gt;सबसे बड़ी बात उभरकर आई है कि झांेपड़ी और फुटपाथ के आदमी से लेकर सुपर पावर का नेतृत्व भी आज भ्रष्ट है। भ्रष्टाचार के आतंक से पूरा विश्व त्रस्त है। शीर्ष नेतृत्व एवं प्रशासन में पारदर्शी व्यक्तित्व रहे ही नहीं। सबने राजनीति, कूटनीति के मुखौटे लगा रखे हैं। सही और गलत ही परिभाषा सब अपनी अलग-अलग करते हैं। अपनी बात गिरगिट के रंग की तरह बदलते रहते हैं। कोई देश किसी देश का सच्चा मित्र होने का भरोसा केवल औपचारिक समारोह तक दर्शाता है। &lt;br /&gt;खेल के मैदान से लेकर पार्लियामेंट तक सब जगह अनियमितता एवं भ्रष्टाचार  है। गरीब आदमी की जेब से लेकर बैंक के खजानों तक लूट मची हुई है।  छोटी से छोटी संस्था से लेकर यू.एन.ओ. तक सभी जगह लाबीवाद फैला हुआ है। साधारण कार्यकर्ता से लेकर बड़े से बडे़ धार्मिक महंतों तक में राजनीति आ गई है। पंच-पुलिस से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक निर्दाेष की कहीं कोई सुनवाई नहीं है। भगवान की साक्षी से सेवा स्वीकारने वाला डाक्टर भी रोगी से व्यापार करता है। जिस मातृभूमि के आंगन में छोटे से बड़े हुए हैं, उसका भी हित कुछ रुपयांे के लालच में बेच देते हैं। पवित्र संविधान की शपथ खाकर कुर्सी पर बैठने वाला करोड़ों देशवासियों के हित से पहले अपने परिवार का हित समझता है। नैतिक मूल्यों की गिरावट की सीमा लांघते ऐसे दृश्य रोज दिखाई देते हैं। इन सब स्थितियों के बावजूद हमें बदलती तारीखों के साथ अपना नजरिया बदलना होगा। जो खोया है उस पर आंसू बहाकर प्राप्त उपलब्धियों से विकास के नये रास्ते खोलने हैं। इस बात को अच्छी तरह समझ लेना है कि अच्छाइयां किसी व्यक्ति विशेष की बपौती नहीं होतीं। उसे जीने का सबको समान अधिकार है। जरूरत उस संकल्प की है जो अच्छाई को जीने के लिये लिया जाये। भला सूरज के प्रकाश को कौन अपने घर में कैद कर पाया है?&lt;br /&gt; बीते वर्ष में न केवल देश की अस्मिता एवं अस्तित्व पर ग्रहण लगा बल्कि चन्द्रमा पर भी जाते-जाते वर्ष में ग्रहण लगा, वह भी पूर्णिमा की रोशनीभरी रात में अंधकार की ओट में आ गया। यह चन्द्र ग्रहण भी मनुष्य जीवन के घोर अंधेरों की ही निष्पत्ति कही जा सकती है। यहां मतलब है मनुष्य की विडम्बनापूर्ण और यातनापूर्ण स्थिति से। दुःख-दर्द भोगती और अभावों-चिन्ताओं में रीतती उसकी हताश-निराश जिन्दगी से। आज किसी भी स्तर पर उसे कुछ नहीं मिल रहा। उसकी उत्कट आस्था और अदम्य विश्वास को राजनीतिक विसंगतियों, सरकारी दुष्ट नीतियों, सामाजिक तनावों, आर्थिक दबावों, प्रशासनिक दोगलेपन और व्यावसायिक स्वार्थपरता ने लील लिया है। लोकतन्त्र भीड़तन्त्र में बदल गया है। दिशाहीनता और मूल्यहीनता बढ़ रही है, प्रशासन चरमरा रहा है। भ्रष्टाचार के जबड़े खुले हैं, साम्प्रदायिकता की जीभ लपलपा रही है और दलाली करती हुई कुर्सियां भ्रष्ट व्यवस्था की आरतियां गा रही हैं। उजाले की एक किरण के लिए आदमी की आंख तरस रही है और हर तरफ से केवल आश्वासन बरस रहे हैं। सच्चाई, ईमानदारी, भरोसा और भाईचारा जैसे शब्द शब्दकोषों में जाकर दुबक गये हैं। व्यावहारिक जीवन में उनका कोई अस्तित्व नहीं रह गया है।&lt;br /&gt;आशा की ओर बढ़ना है तो पहले निराशा को रोकना होगा। इस छोटे-से दर्शन वाक्य में मेरी अभिव्यक्ति का आधार छुपा है। मोजार्ट और बीथोवेन का संगीत हो, अजंता के चित्र हों, वाल्ट व्हिटमैन की कविता हो, कालिदास की भव्य कल्पनाएं हों, प्रसाद का उदात्त भाव-जगत हो... सबमें एक आशावादिता घटित हो रही है। एक पल को कल्पना करिए कि ये सब न होते, रंगों-रेखाओं, शब्दों-ध्वनियों का समय और सभ्यता के विस्तार में फैला इतना विशाल चंदोवा न होता, तो हम किस तरह के लोग होते! कितने मशीनी, थके और ऊबे हुए लोग! अपने खोए हुए विश्वास को तलाशने की प्रक्रिया में मानव-जाति ने जो कुछ रचा है, उसी में उसका भविष्य है। यह विश्वास किसी एक देश और समाज का नहीं है। यह समूची मानव-नस्ल की सामूहिक विरासत है। एक व्यक्ति किसी सुंदर पथ पर एक स्वप्न देखता है और वह स्वप्न अपने डैने फैलाता, समय और देशों के पार असंख्य लोगों की जीवनी-शक्ति बन जाता है। मनुष्य में जो कुछ उदात्त है, सुंदर है, सार्थक और रचनामय है, वह सब जीवन दर्शन है और इसी जीवन दर्शन में भविष्य के सपनें बुनें जा सकते हैं।&lt;br /&gt;नये वर्ष की ओर कदम बढ़ाते हुए हमें सकारात्मक होना होगा। तमाम तरह की तकलीफों एवं परेशानियों के बावजूद लोगों की आमदनी कई गुना बढ़ी है। वे बेहतर खा-पहन रहे हैं, बेहतर तालीम पा रहे हैं, गरीबी की मार कम हुई है, गांवों में भी कुछ तो रोशनी दिखाई देती है। अब भी आप कहते हो कि ये सब तो ठीक, लेकिन भाई, अमीर-गरीब का पफासला तो बढ़ा है, पल्यूशन कितना बढ़ चुका है, जिंदगी का मतलब टेंशन हो गया है और अब तो पूरी दुनिया खतरे में आ गई है... तो कोफ्त होना लाजिमी है। लेकिन कब तक हम-आप तरक्की को सराहने से बचने के लिए खामियां तलाशते रहेंगे? मैं समझता हूं, तारीफ से बचने और खामियां खोजने का यह बेमिसाल जज्बा इस मुल्क का कोई निराला गुण है। आखिर हम ऐसे क्यों है?&lt;br /&gt;सदियों की गुलामी और स्वयं की विस्मृति का काला पानी हमारी नसों में अब भी बह रहा है। भारत ने पता नहीं कितनी सदियों से खुद को आगे बढ़ता नहीं देखा। यह लंबा इतिहास, जो हमारी परम्पराओं में पैठ चुका है, हमें भविष्य को लेकर ज्यादा आशावादी होने से बचना सिखाता है। यह जंगल का सरवाइकल मंत्र है कि डर कर रहो, हर आहट पर संदेह करो, हर चमकती चीज को दुश्मन समझो और नाराजगी कायम रखो। इसलिए अगर आमदनी बढ़ रही है, तो उसमें जरूर कोई दमघोंटू फंदा छिपा होगा। तरक्की जरूर बर्बादी की आहट होगी, आजादी में गुलामी के बीज जरूर मौजूद होंगे। इन मानसिकताओं से उबरे बिना हम वास्तविक तरक्की की ओर अग्रसर नहीं हो सकते । जीवन की तेजस्विता के लिये हमारे पास तीन मानक हैं- अनुभूति के लिये हृदय, चिन्तन और कल्पना के लिये मस्तिष्क और कार्य के लिये मजबूत हाथ। यदि हमारे पास हृदय है पर पवित्रता नहीं, मस्तिष्क है पर सही समय पर सही निर्णय लेने का विवेकबोध नहीं, मजबूत हाथ हैं पर क्रियाशीलता नहीं तो जिन्दगी की सार्थक तलाश अधूरी है।&lt;br /&gt;आज देश के जो जटिल हालात बने हुए है, उनमें निम्न प्रसंग हमारे लिये प्रेरणा बन सकता है। बहुत पुरानी बात है। एक राजा ने एक पत्थर को बीच सड़क पर रख दिया और खुद एक बड़े पत्थर के पीछे जाकर छिप गया। उस रास्ते से कई राहगीर गुजरे। किन्तु वे पत्थर को रास्ते से हटाने की जगह राजा की लापरवाहियों की जोर-जोर से बुराइयां करते और आगे बढ़ जाते। कुछ दरबारी वहां आए और सैनिकों को पत्थर हटाने का आदेश देकर चले गए। सैनिकों ने उस बात को सुना-अनसुना कर दिया, लेकिन पत्थर को किसी ने नहीं हटाया।&lt;br /&gt;उसी रास्ते से एक किसान जा रहा था। उसने सड़क पर रखे पत्थर को देखा। रुककर अपना सामान उतारा और उस पत्थर को सड़क के किनारे लगाने की कोशिश करने लगा। बहुत कोशिशों के बाद अंत में उसे सफलता मिल गई। पत्थर को हटाने के बाद जब वह अपना सामान वापस उठाने लगा तो उसने देखा कि जहां पत्थर रखा हुआ था वहां एक पोटली पड़ी है। उसने पोटली को खोलकर देखा। उसमें उसे हजार मोहरें और राजा का एक पत्र मिला। जिसमें लिखा था- यह मोहरें उसके लिए हैं, जिसने मार्ग की बाधा को दूर किया।  यह प्रसंग हर बाधा में हमें अपनी स्थिति को सुधारने की प्रेरणा देती है।&lt;br /&gt;समय के इस विषम दौर में आज आवश्यकता है आदमी और आदमी के बीच सम्पूर्ण अन्तर्दृष्टि और संवेदना के सहारे सह-अनुभूति की भूमि पर पारस्परिक संवाद की, मानवीय मूल्यों के पुर्नस्थापना की, धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक और चारित्रिक क्रांति की। आवश्यकता है कि राष्ट्रीय अस्मिता के चारों ओर लिपटे अंधकार के विषधर पर आदमी अपनी पूरी ऊर्जा और संकल्पशक्ति के साथ प्रहार करे तथा वर्तमान की हताशा में से नये विहान और आस्था के उजालों का आविष्कार करे। &lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;प्रेषकः &lt;br /&gt;ललित गर्ग&lt;br /&gt;संपादक&lt;br /&gt;समृद्ध सुखी परिवार&lt;br /&gt;ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट&lt;br /&gt;25 आई पी एक्सटेंसन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092&lt;br /&gt;फोनः-22727486, मोबाईल:- 9811051133&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-7147115972250165675?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/7147115972250165675/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/12/blog-post_21.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7147115972250165675'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7147115972250165675'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/12/blog-post_21.html' title='भविष्य के लिए नये संकल्प बुनें'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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कार्’य जारी है। आपां संगळा’णै यो पैळो दर्शन को अवसर मिळो है।&lt;br /&gt;[script: मोड़िया फॉन्ट, मोड़ीया फॉन्ट, मोडीया फॉन्ट, Modiya Font, Modia, Rajasthani Font]&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-7866336910115011846?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/7866336910115011846/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/12/blog-post_10.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7866336910115011846'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7866336910115011846'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/12/blog-post_10.html' title='राजस्थानी-मोड़िया फॉन्ट'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-YXIc5Y9CKLs/TuRJ0YtuRJI/AAAAAAAAAxs/3u8cLQJdwd0/s72-c/modialipi%2B%2528edited%2529.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-9022634656780399335</id><published>2011-12-02T05:27:00.000-08:00</published><updated>2011-12-12T21:10:30.755-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='MURIA LIPI'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्थानी भाषा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मुडिया लिपि'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्थानी लिपि'/><title type='text'>राजस्थानी’री लिपि-</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-KVsld8ELKus/Ttn3BIE67bI/AAAAAAAAAwk/Hhgj6tJA57g/s1600/Rajasthani%2BBhasha.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 105px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-KVsld8ELKus/Ttn3BIE67bI/AAAAAAAAAwk/Hhgj6tJA57g/s400/Rajasthani%2BBhasha.jpg" border="2" alt="Rajasthani Bhasha"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5681844003624644018" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;घणा दिनां सूं राजस्थानी लिपि बनाणै’री चेष्टा जारी ही। मोडिया लिपि (MURIA LIPI) खोजी, अभ्यास कियो। अब जा’र कुछ रूपक त्यार कर पाऊं हूँ। संतोष तो घणो कोणी होयो। पर एक छोटो सो प्रयास कियो है, जो आप सबां’रे सामणै है। कि-बोर्ड’री फान्ट भी बनाने’री घणी चेष्टा करी। सफल कोणी हो पायो। आपां सैं मिल’र फान्ट निर्माण रो प्रयास कर सकां हां। यदि कोई जानकार मित्र मिल जावै तो यो काम आसान हो जासी। -आपणी भासा णै समर्पित।&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-bFFW277a8OA/TtjR090ybkI/AAAAAAAAAwY/VOjOWIOeVnk/s1600/rajasthani%2Bscript.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 304px; height: 400px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-bFFW277a8OA/TtjR090ybkI/AAAAAAAAAwY/VOjOWIOeVnk/s400/rajasthani%2Bscript.jpg" border="0" alt="Rajasthani Script"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5681521637807255106" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;i&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;राजस्थानी अक्षरों का संयुक्त प्रयोग&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; ‘र’ अक्षर का संयुक्त प्रयोग में ‘कृ’ को ‘क्री’ लिखा जाता रहा है। परन्तु इन दिनों इसका दोनों प्रयोग स्वीकार है। उदाहरण के तौर पर ‘पृथ्वी’ को प्रिथ्वी या ‘परथवी’ भी लिखा जाता रहा है।  ‘र’ अक्षर को तीन प्रकार से जोड़ा जाता है। देखें- &lt;strong&gt;   &lt;br /&gt;कारय - कार्य,  [ यहाँ ‘र’ के साथ ‘य’ को संयुक्त किया गया है। ]      &lt;br /&gt;करम - क्रम  [ यहाँ ‘क’ के साथ ‘र’ को संयुक्त किया गया है।]&lt;br /&gt;किरति - कृति [ यहाँ ‘कि’ के साथ ‘र’ को संयुक्त किया गया है।]&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;राजस्थानी भासा में अक्षरों का संयुक्त प्रयोग आधुनिक राजस्थानी भासा के जनक ‘शिवचंद्र भरतिया’ जो कि 19वीं शताब्दी के प्रथम उपन्यासकार लेखक माने जाते हैं से माना जा सकता है। आपने अपने राजस्थानी नाटकों में संयुक्त अक्षरों का प्रयोग खुलकर किया है।&lt;br /&gt;यहाँ हम राजस्थानी भासा में  संयुक्त अक्षरों के प्रयोग को देखेगें।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ज्ञ को ग्य, जैसे   ज्ञान - ग्यान&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;‘ज्ञ’ के बदले ग्य का प्रयोग राजस्थान की लिपि में अक्षरों के कमी के चलते था। चुकि अब देवनागरी के ‘ज्ञ’ को राजस्थानी लिपि में ग्रहित कर चुकी है इसलिए इसके दोनो विकल्प सही माने जाते है, फिर अभी भी बहुत सारे साहित्यकार ‘ग्य’ अक्षर को ही सही मानते हैं। उनका मानना है कि ‘ग्य’ अर ‘ज्ञ’ दोनों के उच्चारण करने में कोई अंतर नहीं रहते हुए भी आधुनिक साहित्यकारों ने अभी तक का जो साहित्य रचा है उसमें ‘ग्य’ अक्षर का ही प्रयोग जारी रखा है। &lt;br /&gt;इसी प्रकार देवनागरी या हिन्दी में ‘र् यो’ शब्द को राजस्थानी में ‘र् अर य’ को ‘र्य’ की तरह न दिखाकर  ‘‘र् अर य ’’ को जुड़ा दिखया जाता है। इनमें पधार्+योड़ा, पड़्यो, पढ़्या आदि शब्दों की तरफ सहज ही आपका ध्यान चला जायेगा। ‘ऋतु’ को ‘रितु’ और ‘ऋषि’ को ‘रिसी’ का प्रयोग राजस्थानी भाषा में आम प्रचलन है। इसीप्रकार ‘संस्कृति’ शब्द को ‘संस्क्रति’ , ‘प्रगट’ को ‘परगट’ और ‘सर्वसम्मति’ को ‘सरबसम्मति’ किया जाता है।&lt;br /&gt;इस विषय में राजस्थानी में प्रयोग को हम नीचे दिये गये चित्र में देखेगें। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-ENZrcZM88c8/TtsVs7EA-jI/AAAAAAAAAw8/sc0z94PMARs/s1600/Joint%2BLatter.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 74px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-ENZrcZM88c8/TtsVs7EA-jI/AAAAAAAAAw8/sc0z94PMARs/s400/Joint%2BLatter.jpg" border="0" alt="Rajasthani Joint Latter"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5682159216370973234" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यहाँ मोडीया में ‘क’ अक्षर के बदलते स्वरूप को नीचे दिये गये चित्र में देखेगें।&lt;/i&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-4mYs7Cl8Hio/TtriUJc7ajI/AAAAAAAAAww/IuwBGiLHnuY/s1600/k-Latter%2Bin%2BModia.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 222px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-4mYs7Cl8Hio/TtriUJc7ajI/AAAAAAAAAww/IuwBGiLHnuY/s400/k-Latter%2Bin%2BModia.jpg" border="0" alt="Changing in Modia 'K' Latter"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5682102715643816498" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तुलनात्मक अध्यनः&lt;br&gt;गुजराती, पंजाबी और बंगाल की लिपि में अंतर -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;गुजराती, पंजाबी और बंगाल की लिपि में अंतर -&lt;br /&gt;राजस्थानी लिपि पर काम करते वक्त इस बात पर भी ध्यान दिया कि राजस्थान प्रान्त से लगे दो प्रान्त और बंगाल प्रान्त जो राजस्थान की भासा व संस्कृति से काफी प्रभावित रहा है उनकी लिपि में व राजस्थान की लिपि, देखने में कैसे नजर आतें हैं। देखें चित्र-&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-NxBNeipxetQ/Tt2Rnqb8PUI/AAAAAAAAAxI/RJg-IjhFEXg/s1600/RajasthaniWithOthersLipi.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 382px; height: 400px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-NxBNeipxetQ/Tt2Rnqb8PUI/AAAAAAAAAxI/RJg-IjhFEXg/s400/RajasthaniWithOthersLipi.jpg" border="0" alt="Difrences With Other Scrpit"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5682858415403842882" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संशोधन सूझाव प्राप्त:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मोड़ीया / मुडिया लिपि (MURIA LIPI)लिपि के कुछ अक्षरों का हुबहु नकल नीचे बनाये गये हैं। राजस्थानी लिपि बनाते समय ये दानों अक्षरों को ध्यान में रखा जाना है। जैसे-जैसे सूचना सार्वजनिक होती जा रही है मेरे पास कुछ सूचनाऐं विभिन्न स्त्रोंतो से आनी शुरू हो गई है। यदि आप इसमें कोई सूझाव देना चाहें अथवा कोई जानकारी भेजना चाहें तो मेरे ईमेल पते पर आप भी संपर्क कर सकते हैं।&lt;br /&gt;ehindisahitya(@)gmail.com&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-HkkegTd9xHQ/Tt4BxusWlmI/AAAAAAAAAxU/TCC6sQDgZF4/s1600/Modiya_lipi1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 393px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-HkkegTd9xHQ/Tt4BxusWlmI/AAAAAAAAAxU/TCC6sQDgZF4/s400/Modiya_lipi1.jpg" border="0" alt="Modia Lipi"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5682981733647423074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Marathi "Modi" Script Vs Rajasthani "Modiya" Script:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-ogqj49UTS1c/Tubdxddc_EI/AAAAAAAAAx4/-oBmzW6OpXE/s1600/Modi-vs-Modiya.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 308px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-ogqj49UTS1c/Tubdxddc_EI/AAAAAAAAAx4/-oBmzW6OpXE/s400/Modi-vs-Modiya.jpg" border="0" alt="Modi-vs-Modiya"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5685475421393321026" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-9022634656780399335?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/9022634656780399335/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/12/blog-post_02.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/9022634656780399335'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/9022634656780399335'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/12/blog-post_02.html' title='राजस्थानी’री लिपि-'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-KVsld8ELKus/Ttn3BIE67bI/AAAAAAAAAwk/Hhgj6tJA57g/s72-c/Rajasthani%2BBhasha.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-2100727642624895978</id><published>2011-12-01T02:32:00.000-08:00</published><updated>2011-12-01T02:45:18.232-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Gulab Khandelwal'/><title type='text'>श्री गुलाब खंडेलवालजी का संक्षिप्त परिचयः</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-EjFS5GTr1U4/TtdYxIObuwI/AAAAAAAAAv0/HGVu13nLztc/s1600/gulab-khandelwal_shambhu-choudhary.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-EjFS5GTr1U4/TtdYxIObuwI/AAAAAAAAAv0/HGVu13nLztc/s320/gulab-khandelwal_shambhu-choudhary.jpg" border="0" alt="Sri Jugal Kishore Jaithelia, Gulab Khandelwal and Shambhu-Choudhary"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5681107055996025602" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;श्री गुलाब खंडेलवाल का जन्म अपने ननिहाल राजस्थान के शेखावाटी प्रदेश के नवलगढ़ नगर में २१ फरवरी सन्‌ १९२४ ई. को हुआ था। उनके पिता का नाम शीतलप्रसाद तथा माता का नाम वसन्ती देवी था। उनके पिता के अग्रज रायसाहब सुरजूलालजी ने उन्हें गोद ले लिया था। उनके पूर्वज राजस्थान के मंडावा से बिहार के गया में आकर बस गये थे। कालान्तर में गुलाबजी प्रतापगढ़, उ.प्र. में कुछ वर्ष बिताने के पश्‍चात अब अमेरिका के ओहियो प्रदेश में रहते हैं तथा प्रतिवर्ष भारत आते रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;[चित्र में बांयें श्री जुगलकिशोर जैथलिया बीच में श्री गुलाब खंडेलवालजी एवं दायें लेखक शंभु चौधरी, &lt;br /&gt;दिनांक 01.12.2011 कोलकाता।]&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-D8MZgTubJ4Q/TtdZlIxbVqI/AAAAAAAAAwM/pHha5dUEasc/s1600/gulab_khandelwal_1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 174px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-D8MZgTubJ4Q/TtdZlIxbVqI/AAAAAAAAAwM/pHha5dUEasc/s200/gulab_khandelwal_1.jpg" border="0" alt="Gulab Khandelwal"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5681107949495998114" /&gt;&lt;/a&gt;श्री गुलाब खंडेलवाल की प्रारम्भिक शिक्षा गया (बिहार) में हुई तथा उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से १९४३ में बी. ए. किया। काशी विद्या, काव्य और कला का गढ़ रहा है। अपने काशीवास के दौरान गुलाबजी बेढब बनारसी के सम्पर्क में आये तथा उस समय के साहित्य महारथियों के निकट आने लगे। वे वय में कम होने पर भी उस समय के साहित्यकारों की एकमात्र संस्था प्रसाद-परिषद के सदस्य बना लिये गये जिससे उनमें कविता के संस्कार पल्लवित हुए। महाकवि गुलाब खंडेलवाल, साहित्य की अजस्र मंदाकिनी प्रवाहित करनेवाले प्रथम कोटि के साहित्यकारों की पंक्ति में अग्रणी हैं। पिछले छः-सात दशकों से प्रयाग, दिल्ली, बंबई, कोलकाता, मद्रास, भारत, अमेरिका और कनाडा आदि देशों के साहित्यिक-सांस्कृतिक जीवन को गुलाबजी अपनी सारस्वत-साधना से गौरव-मंडित कर रहे हैं। उनका ’सौ गुलाब खिले’ हिन्दी की अपनी कही जाने योग्य स्तरीय ग़ज़लों का पहला संकलन है। इसके बाद उन्होंने ’पंखुरियाँ गुलाब की’, ’कुछ और गुलाब’, ’हर सुबह एक ताजा गुलाब’ जैसी अन्य कृतियों में ३६५ ग़ज़लें लिखकर इस प्रयोग को पूर्णता तक पहुँचा दिया।  उत्तरप्रदेश-सरकार ने उनकी छः रचनाओं - उषा, रूप की धूप, सौ गुलाब खिले, कुछ और गुलाब, हर सुबह एक ताज़ा गुलाब और अहल्या को पुरस्कृत करके कवि के साथ-साथ साहित्य-साधना को भी सम्मानित किया है। पिछले दो दशकों में उन्होंने न केवल छन्दमुक्त रचना के विविध प्रयोग ही किये हैं, तुलसी, सूर, मीरा की भक्तिगीतों की धारा में प्रायः एक सहस्र गीतों का सृजन करके साहित्य से संगीत को पुनः जोड़ने का महान कार्य भी संपादित किया है। इसके अतिरिक्त गुलाबजी ने ’गीत-वृन्दावन’, ’सीता-वनवास’ तथा ’गीत-रत्नावली’ जैसे गीति-काव्यों की रचना करके राधा, सीता और रत्नावली के जीवन की त्रासदी को भी नये परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है। इधर की ही लिखी हुई उर्दू मसनवी की शैली में उनकी नवीन रचना, ’प्रीत न करियो कोय’, हिन्दी के काव्य-साहित्य में एक नया आयाम जोड़ती है। जहाँ इस रचना द्वारा वे उर्दू के प्रमुख मसनवी-लेखक, मीर हसन और दयाशंकर ’नसीम’ की श्रेणी में आ गये हैं वहीं अपने भक्तिगीतों की सुदीर्घ श्रृंखला द्वारा उन्होंने कबीर, सूर, तुलसी और मीरा की परंपरा में अपना स्थान सुरक्षित करा लिया है। &lt;br /&gt;1941 ई. में उनके गीतों और कविताओं का संग्रह ‘कविता’ नाम से प्रकाशित हुआ जिसकी भूमिका महाकवि निराला जी ने लिखी और तब से अब तक उनके 46 काव्यग्रंथ और 2 गद्य-नाटक प्रकाशित हो चुके है। उन्होंने हिन्दी में गीत, दोहा, सॉनेट, रुबाई, गज़ल, नया शैली की कविता और मुक्तक, काव्य नाटक, प्रबंधकाव्य, महाकाव्य आदि के सफल प्रयोग किये हैं। गुलाबजी पिछले 10 वर्षों ‘अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के सभापति हैं।&lt;br /&gt;अपनी कविताओं से लोकमानस को अपनी ओर आकर्षित करते हुये उनकी साहित्यिक मित्रमंडली तथा शुभचिन्तकों का दायरा बढने लगा। सर्वश्री हरिवंश राय बच्चन, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, डॉ॰ रामकुमार वर्मा, आचार्य सीताराम चतुर्वेदी, न्यायमूर्ति महेश नारायण शुक्ल, प्राचार्य विश्वनाथ सिंह, माननीय गंगाशरण सिंह, शंकरदयाल सिंह, कामता सिंह 'काम' आदि इनके दायरे में आते गये। &lt;br /&gt;मित्र मंडली में कश्मीर के पूर्व युवराज डॉ॰ कर्ण सिंह, डॉ॰शम्भुनाथ सिंह, आचार्य विश्वनाथ सिंह, डॉ॰ हंसराज त्रिपाठी, डॉ॰ कुमार विमल, प्रो॰ जगदीश पाण्डेय, प्रो॰ देवेन्द्र शर्मा, श्री विश्वम्भर ’मानव’, श्री त्रिलोचन शास्त्री, केदारनाथ मिश्र ’प्रभात’, भवानी प्रसाद मिश्र, नथमल केड़िया, शेषेन्द्र शर्मा एवं इन्दिरा धनराज गिरि, डॉ॰ राजेश्वरसहाय त्रिपाठी, पं॰ श्रीधर शास्त्री, विद्यानिवास मिश्र, अर्जुन चौबे काश्यप आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है। आजकल कवि गुलाब अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के अध्यक्ष है। &lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-pxuwazGO360/TtdZR8sZxkI/AAAAAAAAAwA/RiDZ_shOELM/s1600/gulab_khandelwal_2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 227px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-pxuwazGO360/TtdZR8sZxkI/AAAAAAAAAwA/RiDZ_shOELM/s320/gulab_khandelwal_2.jpg" border="0" alt="Gulab Khandelwal"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5681107619836184130" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;किस सुर में मैं गाऊँ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;किस सुर में मैं गाऊँ?&lt;br /&gt;भाँति-भाँति के राग छिड़े हैं, किससे तान मिलाऊँ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाऊँ मिल मोरों के गुट में&lt;br /&gt;चिड़ियों की टी, वी, टुट, टुट में? &lt;br /&gt;या गाते सरसिज सम्पुट में &lt;br /&gt;मधुकर-सा सो जाऊँ!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मान यहाँ हर ध्वनि का होता&lt;br /&gt;किसके बस न हुए हैं श्रोता!&lt;br /&gt;यदि मैं गहरे में लूँ गोता&lt;br /&gt;मोती कहाँ न पाऊँ!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर जो छवि बैठी इस मन में &lt;br /&gt;नव-नव धुन रचती क्षण-क्षण में &lt;br /&gt;क्यों न उसीका करूँ वरण मैं&lt;br /&gt;जग से दृष्टि फिराऊँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस सुर में मैं गाऊँ?&lt;br /&gt;भाँति-भाँति के राग छिड़े हैं, किससे तान मिलाऊँ?&lt;br /&gt;[तिलक करें रघुवीर]&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;नाम लेते जिनका दुख भागे&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाम लेते जिनका दुख भागे&lt;br /&gt;मिला उन्हें तो जीवन-भर दुख ही दुख आगे-आगे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छूटा अवध साथ प्रिय-जन का&lt;br /&gt;शोक असह था पिता-मरण का &lt;br /&gt;देख कष्ट मुनियों के मन का &lt;br /&gt;वन के सुख भी त्यागे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वन-वन प्रिया-विरह में फिरना &lt;br /&gt;'कैसे हो सागर का तिरना?'&lt;br /&gt;भ्राता का मूर्छित हो गिरना &lt;br /&gt;नित नव-नव दुख जागे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गूँजी ध्वनि जब कीर्ति-गान की &lt;br /&gt;फिर चिर-दुख दे गयी जानकी&lt;br /&gt;माँग उन्हीं-सी शक्ति प्राण की &lt;br /&gt;मन! तू सुख क्या माँगे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाम लेते जिनका दुख भागे&lt;br /&gt;मिला उन्हें तो जीवन-भर दुख ही दुख आगे-आगे &lt;br /&gt;[सीता वनवास से]&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तुम खेल रहे...... &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;तुम खेल सरल मन के सुख से, अब छोड़ मुझे यों दीन-हीन&lt;br /&gt;मलयानिल-से जा रहे, निठुर! कलिका की सौरभ-राशि छीन!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढ़ विजन-कुमारी के उर की गोपन भाषा सहृदय स्वर से&lt;br /&gt;अब व्यंग्य हँसी लिखते हो तुम पंखुरियों पर निर्दय कर से &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपकारों का प्रतिकार यही! आभार यही आभारी का!&lt;br /&gt;तुम खेल रहे अंगार-सदृश ले हृदय हाथ में नारी का &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंचल लावण्य-प्रभा जिसकी पाती हो प्रात न स्नेह-स्फूर्ति &lt;br /&gt;निष्प्रभ थी दीपशिखा-सी ही नारी निशि की श्रृंगार-मूर्ति &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंचल फैलाये सरिता की तट लाँघ सिसकती लहरी-सी &lt;br /&gt;उड़ायाद्रि-क्षितिज पर ज्यों कोई तारिका विनत-मुख ठहरी-सी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करुणा, दुख, ईर्ष्या, रोष-विभा परिवर्तित जिसके क्षण-क्षण की&lt;br /&gt;भावों के अभिनय में चित्रित नैराश्य-व्यथा-सी जीवन की &lt;br /&gt;[कच-देवयानी से]&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ग़ज़ल&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उन्हें बाँहों में बढ़कर थाम लेंगे &lt;br /&gt;कभी दीवानेपन से काम लेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़ज़ल में दिल तड़पता है किसीका&lt;br /&gt;उन्हें कह दो, कलेजा थाम लेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये माना ज़िन्दगी फिर भी मिलेगी&lt;br /&gt;नहीँ हम ज़िन्दगी का नाम लेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अँधेरे ही अँधेरे होंगे आगे&lt;br /&gt;पड़ाव अगला जहां कल शाम लेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिला दुनिया से क्या, मत पूछ हमसे&lt;br /&gt;तुझीमें, मौत! अब आराम लेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुलाब! इस बाग़ की रंगत थी तुमसे&lt;br /&gt;वे किस मुँह से मगर यह नाम लेंगे!&lt;br /&gt;[ सौ गुलाब खिले से]&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;small&gt;संपर्क: 56, जय अपार्टमेन्ट, आई.पी.एक्सटेंशन-102, पडपडगंज, नई दिल्ली - 110092 दूरभाषः 011 2726934/2450525&lt;/small&gt;&lt;br /&gt;[script code-Gulab Khandelwal]&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-2100727642624895978?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/2100727642624895978/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/12/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/2100727642624895978'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/2100727642624895978'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='श्री गुलाब खंडेलवालजी का संक्षिप्त परिचयः'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-EjFS5GTr1U4/TtdYxIObuwI/AAAAAAAAAv0/HGVu13nLztc/s72-c/gulab-khandelwal_shambhu-choudhary.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-8344602754363192158</id><published>2011-11-29T03:54:00.000-08:00</published><updated>2011-11-29T03:59:51.797-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्थानी भाषा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्थानी कहावत'/><title type='text'>राजस्थानी कहावतां- 2</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;खाट पड़े ले लीजिये, पीछे देवै न खील।&lt;br /&gt;आं तीन्यां रा एक गुण, बेस्या बैद उकील।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;बैस्या, बैद्यराज अर्थात डाक्टर, वकील इन तीनों की एक ही समानता है कि जब आदमी को जरूरत होती है तभी उनको याद करता है। काम हो जाने के बाद वह पलटकर भी इनको नहीं देखने आता।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कहावत का तात्पर्य है -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; जब आदमी को काम पड़े उसी वक्त उससे अपना लेन-देन कर लेना चाहिए। -आपणी भासा&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;गरबै मतना गूजरी, देख मटूकी छाछ।&lt;br /&gt;नव सै हाथी झूंमता, राजा नळ रै द्वार।।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;राजा नळ के दरवाजे पर 900 हाथियों का झूंड खड़ा रहता था वह भी समाप्त हो गया। पर तुम अपनी एक हांडी छाछ पर इतराता है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कहावत का तात्पर्य है -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अपनी संपत्ति पर इतना मत घमंड करो। एक दिन सब समाप्त हो जाता है।  -आपणी भासा&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ग्यानी सूं ग्यानी मिलै, करै ग्यान री बात।&lt;br /&gt;मूरख सूं मूरख मिलै, कै जूता कै लात।।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;इस कहावत का भावार्थ बहुत सरल है। संगत जैसी वैसी करनी। -आपणी भासा&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चोदू जात मजूर री, मत करजे करतार।&lt;br /&gt;दांतण करै नै हर भजै, करै उंवार-उंवार।।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;मजदूरी करने वाला आदमी न तो कभी ठीक से भजन-किर्तन करता है ना ही ठीक से नहाता-खाता है बस जब उससे बात करो तो बोलता है कि बहुत समय हो गया।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कहावत का तात्पर्य है -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जो अस्त-व्यस्त रहता है उसी के पास समय नहीं रहता।  -आपणी भासा&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जायो नांव जलम को रैणौ किस विध होय?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;जन्म लेने वाले बच्चे को 'जायो' कहा जाता है तो वह अमर कैसे हुआ?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कहावत का तात्पर्य है -&lt;/strong&gt; एक दिन सबको जाना तय है। जन्म लेने के साथ ही मौत तय निष्चित हो जाती है। -आपणी भासा&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ज्यूं-ज्यूं  भीजै कामळी, त्यूं-त्यूं भारी होय।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;कपास, रुई या कम्बल जैसे-जैसे पानी में भींगती है वह किसी काम के लायक नहीं रह जाती।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कहावत का तात्पर्य है -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; जैसे-जैसे आदमी में किसी भी बात का घमंड बढ़ने लगता है वह समाज से कट जाता है।&lt;br /&gt;इस कहावत को कुछ लोग यह अर्थ भी लगाते हैं- जैसे-जैसे धन आने लगता है उस आदमी की कर्द समाज में होने लगती है। -आपणी भासा&lt;/i&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-8344602754363192158?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/8344602754363192158/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/2.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/8344602754363192158'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/8344602754363192158'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/2.html' title='राजस्थानी कहावतां- 2'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-8825154262586764473</id><published>2011-11-27T02:36:00.000-08:00</published><updated>2011-11-27T02:37:48.848-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्थानी भाषा'/><title type='text'>आपणी भासा राजस्थानी - शम्भु चौधरी</title><content type='html'>&lt;i&gt;&lt;br /&gt;म्हारी दो दिनां’री राजस्थानी यात्रा में&lt;br /&gt;मिलगी म्हाणै एक कहानी,&lt;br /&gt;कमरा में पड़ी-पड़ी सड़गी &lt;br /&gt;आपणी भासा राजस्थानी।&lt;br /&gt;समाचारपतरां म कोणी दिखी &lt;br /&gt;दिवाळा में कोणी दिखी&lt;br /&gt;बातां में भी खोती दिखी&lt;br /&gt;नेता’रे फोटूआं म भी कोणी दिखी&lt;br /&gt;टी.वी चैनला म भी खोगी &lt;br /&gt;आपणी भासा राजस्थानी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर &lt;br /&gt;एक छोटी सी कोठरी में &lt;br /&gt;दम तौड़ती, खांसती&lt;br /&gt;हिम्मतां हारती&lt;br /&gt;फाटड़ा गाबां म&lt;br /&gt;ईलाज रे अभाव म&lt;br /&gt;अन्तिम सांसां लेती&lt;br /&gt;दिखगी मणै&lt;br /&gt;आपणी भासा राजस्थानी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताना कसी&lt;br /&gt;थे अब आया हो?&lt;br /&gt;अब कै लैणै आया हो?&lt;br /&gt;म तो अब मरण’हाळी हूँ।&lt;br /&gt;मणै आपरी छाती से चिपका’र&lt;br /&gt;फैंरुं बोली-&lt;br /&gt;देख आ मेरी वसीयत है&lt;br /&gt;जिकी तेरे नाम कर दी है।&lt;br /&gt;अब तो बस मेरी सांस बची है&lt;br /&gt;जिकी मेरे सागै ही अब जासी।&lt;br /&gt;लालसाजी अर सेठीया जी चळग्या,&lt;br /&gt;रावतजी भी छोड़ चळग्या।&lt;br /&gt;तेरे बस’रीं बात कोणी&lt;br /&gt;अब कि’रीं मणै आस कोणी।&lt;br /&gt;हाँ! &lt;br /&gt;बा छिपा (बर्तन) में कुछ रोटी बचगी&lt;br /&gt;भाया म सै बांट’रे खालै&lt;br /&gt;ब्रज, हाड़ौती, बागड़ी, णै देदे आधी&lt;br /&gt;ढूँढ़ाड़ी, मेवाड़ी, णै देदे म्हारी लोटी &lt;br /&gt;(बचा-कुचा समान)&lt;br /&gt;मारवाड़ी, मालवी, देदे आ खटिआ (मचान)&lt;br /&gt;शेखावटी देदे सारी बकिया(कर्ज)&lt;br /&gt;अन्तिम सांसां लेती बोळी&lt;br /&gt;आपणी भासा राजस्थानी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंखां म आंसू झलकाया&lt;br /&gt;सर पर मेरे हाथ फिराया&lt;br /&gt;मणै पूछी&lt;br /&gt;तेरा डाबर कंईयां है?&lt;br /&gt;मेरी आस तो कोणी बची&lt;br /&gt;औळ्यां सैं’री आवै है।&lt;br /&gt;देख आ माटी पर &lt;br /&gt;कुछ पड़ी किताबां&lt;br /&gt;पाणी में भींगी जावै है।&lt;br /&gt;किड़ा खाग्या,&lt;br /&gt;ढीळ लाग्गी, &lt;br /&gt;किनारे से पूरी फाटगी,&lt;br /&gt;बाबूसा बोल्यां करता था&lt;br /&gt;अन्तिम सांसां लेती बोळी&lt;br /&gt;आपणी भासा राजस्थानी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;म तो अब चालन लागी हूँ&lt;br /&gt;अंतिम सांसां गिण रही हूँ&lt;br /&gt;सैं’णै मेरो राम-राम कहियो।&lt;br /&gt;घणी डिक(इंतजार) लगाई सैं’रीं&lt;br /&gt;काफी आस जगाई सैं’रीं&lt;br /&gt;सैंका सैं नालायक निकला&lt;br /&gt;लायक भी नालायक निकला&lt;br /&gt;बोबा’रो दूध पिलायो सैंणै&lt;br /&gt;मांचा म खुब खिलायो सैं’णै&lt;br /&gt;बाबू’री फाट’री धोती&lt;br /&gt;पोतड़ा में सुलांयो सैं’णै&lt;br /&gt;आज मेरी साड़ी भी अब&lt;br /&gt;गई सग्ळी फाट...&lt;br /&gt;रुक’रे बोली...&lt;br /&gt;सुण मेरी इक बात!&lt;br /&gt;अन्तिम सांसां लेती बोळी&lt;br /&gt;आपणी भासा राजस्थानी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे एक काम करोगो तू!&lt;br /&gt;बी कोणा में जा&lt;br /&gt;देख बठै है मेरी पोथी&lt;br /&gt;‘मायड़ भासा राजस्थानी’&lt;br /&gt;राख संभाल काम जद आसी&lt;br /&gt;कोई काम न आसी।&lt;br /&gt;अन्तिम सांसां लेती बोळी&lt;br /&gt;आपणी भासा राजस्थानी।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;small&gt;&lt;br /&gt;(आपणी भासा राजस्थानी - शम्भु चैधरी, &lt;br /&gt;स्वतंत्र प्रकाशन अधिकार के साथ, &lt;br /&gt;रचना निर्माण दिनांक 27 नवंबर 2011)&lt;br /&gt;&lt;/small&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-8825154262586764473?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/8825154262586764473/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_27.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/8825154262586764473'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/8825154262586764473'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_27.html' title='आपणी भासा राजस्थानी - शम्भु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-5955649489188343706</id><published>2011-11-26T08:59:00.000-08:00</published><updated>2011-11-26T19:17:01.291-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बखत रै परवाण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रावत सारस्वत'/><title type='text'>राजपूत रा डावड़ो - स्व॰ रावत सारस्वत</title><content type='html'>मा, मैं रणखेतां जास्यूं&lt;br /&gt;बाबोसा रो बख्तर ल्याद्यो&lt;br /&gt;बो खूनी खांडो मंगवाद्यो&lt;br /&gt;म्हारै घुड़ळै जीन कसाद्यो&lt;br /&gt;रजपूती रा ठाठ सजाद्यो।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;अब लड़बा मरबा जास्यूं मा,&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;खूनां रा समंद बहास्यूं मा&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;मैं रणखेतां जास्यूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बखतर यो बादळ बण ज्यासी&lt;br /&gt;यो खांडो बीजळ चमकासी&lt;br /&gt;पून वेग म्हारो घुड़लो जासी&lt;br /&gt;या रजपूती प्रळै मचासी।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;बैर्यां रा सीस झुकास्यूं मा,&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;जीवण रो फळ जद पास्यूं मा&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;मैं रणखेतां जास्यूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहनड़ अकनकंवार उतारो&lt;br /&gt;आरतड़ो रजवंती म्हारो&lt;br /&gt;ओ रोळी टीको म्थारो&lt;br /&gt;लोही मांगैलो लाखां रो।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;टीकै री लाज रखास्यूं मा,&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;बहनड़ रो प्यार चुकास्यूं मा&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;मैं रणखेतां जास्यूं।&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;स्व॰ श्री रावत सारस्वतजी का संक्षिप्त परिचय:&lt;/strong&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;स्व॰ श्री रावत सारस्वतजी का जन्म राजस्थान के चूरू गांव में 22 जनवरी, 1922ई. में श्री हनुमानप्रसाद सारस्वत के यहां हुआ। आपकी प्राथमिक पढ़ाई बागला स्कूल, चूरू और ग्रेज्यूएट तक की शिक्षा डूंगर कॉलेज, बीकानेर से की आगे चलकर आपने एम.ए. एलएल.बी. की परिक्षाएं भी दी।&lt;br /&gt;डूंगर कॉलेज, बीकानेर में पढ़ाई करते वक्त राजस्थानी भाषा के विद्वान के संपर्क में रहने के चलते आपमें भी राजस्थानी भाषा की सेवा का भाव जग उठा। सन् 1947-48 आपने बीकानेर से जयपुर आकर रेडक्रॉस सोसायटी में सेक्रेट्री पद पर कार्य करने लगे, आप सेवानिवृत्त तक इसी संस्था में ही कार्य करते रहे। इस संस्था में रहते-रहते ही आपने राजस्थानी भासा पर अपना कार्य जारी रखा। इस दौरान आपने ‘मरुवाणी’ मासिक का प्रकाशन भी करने लगे जो 1953 से लगभग 20 सालों तक लगातार प्रकाशित होती रही। इस पत्रिका के प्रकाशन के साथ-साथ आपने ‘राजस्थान भासा प्रचार सभा’ की भी स्थापना कर इस संस्था के माध्यम से कई महत्वपूर्ण ग्रंथों का प्रकाशन किया। श्री सारस्वत सभा की तरफ से वर्ष में चार बार राजस्थानी भाषा की परिक्षाएं लेते जिसमें हर वर्ष हजारों छात्र भाग लेते रहे। आपके द्वारा राजस्थान के सैकडों साहित्यकारों को सामने आने का अवसर मिला औ उनको प्रसिद्धि भी मिली।&lt;br /&gt;आप में राजस्थानी भाषा के प्रति गजब का प्रेम था, कई बार आप अपनी मासिक तनखाह से पुस्तकें खरीद लाते और बच्चों का भूखा ही पालते रहते। आप कवि, नाटककार, निबंधकार, समीक्षक, संपादन, अनुवादक, कोषकार एवं शोधकार की प्रतिभा से पूर्ण थे। राजस्थानी भासा मान्यता के प्रबल समर्थक आपको कई सम्मानों से भी नवाजा जा चुका है। 16 दिसम्बर, सन् 1988ई. को आप इस संसार से भावपूर्ण विदाई लेकर खुद को ईश्वर के प्रति समर्पित कर दिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपकी उपरोक्त कविता में वीर राजपुत युवा अपनी मां से आर्शीवाद मांग रहा है और कह रहा है कि मां मुझे अब युद्ध में जाने दो मेरे माथे पर बहन से कहो कि वो रोळी के लहू जैसे चंदन से टीका करे और मुझे खांडो अर्थात तलवार से सजा दे। राजस्थान के कण-कण में इस तरह की गाथाएं छुपी पड़ी है। मरूभूमि का शायद ही ऐसा कोई कवि होगा जिसने इन वीर गाथाओं से अपनी रचनाओं का श्रृंगार न किया हो।  उपरोक्त कविता राजस्थान के महान भासा प्रेमी स्व॰ श्री रावत सारस्वतजी की &lt;strong&gt;‘‘बखत रै परवाण ’’&lt;/strong&gt; से ली गई है। -संपादक &lt;/i&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-5955649489188343706?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/5955649489188343706/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_26.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/5955649489188343706'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/5955649489188343706'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_26.html' title='राजपूत रा डावड़ो - स्व॰ रावत सारस्वत'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-5277324518656166401</id><published>2011-11-10T22:45:00.000-08:00</published><updated>2011-11-27T17:54:33.084-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Marwari Yuva Manch'/><title type='text'>अ.भ. मारवाड़ी युवा मंच : दशम राष्ट्रीय अधिवेशन</title><content type='html'>&lt;strong&gt;अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच का &lt;br /&gt;राष्ट्रीय अधिवेशन &lt;br /&gt;भव्य आडम्बर युक्त पंडाल में शुरू हुआ। &lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कोलकातः  16 नवम्बर 2011- रिर्पोट मंच सदस्यों द्वाराः &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अखिल भारतीय मारवाड़ी युवामंच का दशम् राष्ट्रीय अधिवेशन भव्य आडम्बर युक्त पंडाल में अव्यवस्था और हंगामे के साथ संपन्न हुआ। नासिक में संपन्न हुए इस चार दिवसीय दशम राष्ट्रीय अधिवेशन के आयोजन पर जहाँ आयोजकों ने समाज के धन को पानी की तरह बहाया, वहीं मंच के सदस्यों को ठहरने के लिए सही व्यवस्था भी नहीं कर पाये, सारी व्यवस्था पैसे के जोर पर या &lt;strong&gt;‘‘इभेन्ट मेनेजमेंट’’&lt;/strong&gt; के जिम्में सौंप कर आयोजकों ने देश भर से आये मंच के हजारों सदस्यों को रात भर ठहरने की जगह खोजने में ही लगावा दिया। भूखे-प्यासे सदस्य शहर में बच्चों व समान को लेकर भटकते रहे।&lt;br /&gt;जैसे-जैसे मंच के सदस्य नासिक स्टेशन पंहुचते गये उनकी व्यवस्था चरमराने लगी, मानो सब कुछ हवा में चल रहा था। रात को ग्यारह बजे पंहुचे कुछ सदस्यों ने बताया कि उसे घंटों शहर के चक्कर लगाने के बाद भी ठहरने की जगह नहीं मिल पाई। छः छः घंटे मंच के सदस्य अपनी ठहरने की जगह तलाशते रहे। होटल में जो व्यवस्था थी वह भी बड़ी अजिबों-गरीब स्थिति का बयान कर रही थी। एक रूम में 5-6 सदस्यों को ठहराया गया दो-तीन को पलंग पर और तीन को जमीन पर सोने को मजबूर होना पड़ा। दो करोड़ रुपिये के बजट के इस आडम्बर में मंच सदस्यों को सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। आयोजक प्रान्त की तरफ से सभी सदस्यों को होटल में ठहराने की बात शुरू से प्रचारित की गई थी। रहने, ठहराने व स्थानिय यातायात के नाम पर प्रति सदस्य 1500/- रुपया बतौर शुल्क भी चार्ज किया गया था।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दशम् राष्ट्रीय अधिवेशन की झलकः&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. अव्यवस्था को आलम यह था कि अधिकतर मंच सदस्यों अपने आवास को लेकर परेशान दिखे। कईयों को जगह नहीं मिली तो, वे आपा खो बैठे और राष्ट्रीय सभा के दौरान जम के हंगामा किए। जिसके चलते राष्ट्रीय सभा भी कुछ देर के लिए स्थगित करनी पड़ी व पुनः 10-15 मिनट में ही सभा को समाप्त कर दी गई।&lt;br /&gt;2. अधिवेशन स्थल के मंच पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं था। जिसे जो मन में आया आकर माईक से कुछ घोषणा कर जाता था एक महोदय तो उद्घाटनकर्ता की सीट खाली देख जाकर मंच पर ही बैठ गये। &lt;br /&gt;3. पुर्व राष्ट्रीय अध्यक्षों को किनारे एक कोने में धकेल दिया गया। &lt;br /&gt;4. मंच के एक सदस्य को &lt;strong&gt;‘‘मंच के संस्थापक’’&lt;/strong&gt; बताया जाता रहा जबकि मंच के इतिहास में इस महान पुरुष का कोई अता-पता नहीं है। उस व्यक्ति का नाम बार-बार मंच के संस्थापक के रूप में प्रचारित किया जाता रहा।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;6. उद्घाटन सत्र दो बार हुआ&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;1) श्री जगन्नाथ पाहड़िया जी माननीय राज्यपाल जी, हरियाणा द्वारा 2) श्री नितिन गडकरी जी द्वारा। &lt;br /&gt;7. ‘राष्ट्रीय सभा’ जो कि मंच का प्राण सभा मानी जाती है इसे 15 मिनट में समाप्त कर दिया गया। &lt;br /&gt;8. &lt;strong&gt;ट्रेडफेयर:&lt;/strong&gt; जमीन के व्यापारियों से ही सिर्फ अटा-पटा है। &lt;br /&gt;9. &lt;strong&gt;विश्व मारवाड़ी सम्मेलन:&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;विश्व मारवाड़ी सम्मेलन के नाम से जो प्रचार किया गया इसका कोई भी स्वरूप देखने को नहीं मिला।&lt;br /&gt;10. मंच के सदस्यों ने आपा खोयाः&lt;br /&gt;रजिस्ट्रेशन के दौरान आयोजकों के व्यवहार से खफा होकर मंच के कुछ सदस्यों ने आयोजकों की तरफ की एक सदस्य के साथ हाथा-पाई तक कर डाली।&lt;br /&gt;11. ‘शौच’ की पूरी व्यवस्था अधिवेशन स्थल पर नहीं थी। सदस्यों को सड़कों पर शौच करने जाना पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;टिप्पणीः&lt;br /&gt;पाणी-पाणी  हो ग्यो, भींग ग्यो सैं ळाज।&lt;br /&gt;पाणी सां’रो सूं ग्यो, तिंस ग्या म्हें आज।। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जैसे-जैसे मंच के सदस्य जिस आशा और उत्साह से इस अधिवेशन में भाग लेने के लिए नासिक पहुचने लगे। वैसे-वैसे ही फोन पर सदस्यों की पीड़ा और चीख सुनाई देने लगी। मानो मंच का यह दशम् अधिवेशन, अधिवेशन ना हो कर कोई राजनैतिक मंच हो गया हो। जहाँ गांव से भैंड़-बकरियों को बुलाकर खुद का प्रोजेक्सन करना मात्र इस अधिवेशन का मुख्य उद्देश्य रह गया हो। जिस प्रकार धन की बर्वादी इस अधिवेशन में की गई इससे यह बात तो स्पष्ट हो जाती है कि व्यवस्थापक समूह केवल लिफाफेबाजी कर चकाचौंध तामझाम को ही अधिवेशन मान बैठे हैं।&lt;br /&gt;राष्ट्रीय सभा को 15-20 मिनट में समाप्त कर देना, खुलेसत्र में किसी को बोलने न देना, आवास की अव्यवस्था, पीने के पानी की कमी, प्रभात रैली तीन-चार घंटा सिर्फ नेता ना आने के करण विलम्ब कर देना इस बीच  चाय-नास्ते की व्यवस्था का न होना, बाथरूम का पानी पीने के जार में डाल कर देना। अधिवेशन स्थल तक आने-जाने का कोई साधन आयोजकों द्वार उपलब्ध ना करा सकना। ठंठा भोजन, अधिनेशन स्थल पर चाय-पानी की कोई व्यवस्था का ना होना। आखिर यह चंदा जो जमा किया गया वह खर्च हुआ तो हुआ किधर?&lt;br /&gt;मंच के सदस्यों के लिए अलग खाने की व्यवस्था और खुद के मेहमानों लिए अलग व्यवस्था। यह भांत किस बात के लिए?&lt;br /&gt;विश्व मारवाड़ी सम्मेलन के नाम पर जितना हल्ला हुआ, वैसा कुछ भी तो नहीं दिखा इस अधिवेशन में। &lt;br /&gt;नासिक शाखा के साथ हमारी पूरी सहानुभूती है। मंच के सदस्य इन तकलिफों के बाबजूद उनको भरपूर सहयोग देते रहे, परन्तु आयोजकों ने अपनी अभर्दता दिखाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जगजीत सिंह की एक गजल है-&lt;br /&gt;मुहं की बात कहे हर कोई, &lt;br /&gt;दिल का दर्द ना जाने कौन&lt;br /&gt;आवाजों के बाजारों में,&lt;br /&gt;खामोशी पहचाने कौन? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हमें राजनेताओं के भाषण से जो गर्व होता है वह एक चिन्ता का विषय भी है कि क्या अब समाज के कार्यों का प्रमाण-पत्र इन भ्रष्ट राजनेताओं से लेना होगा? इससे तो बेहतर होता मराठी भाषा के साहित्यकारों, कुछ सामाजिक हस्थियों को भी इनके साथ-साथ इस अधिवेशन का हिस्सा बनाते और उनके श्रीमुख निकले हुए संदेश देश भर में हमें गर्व का अहसास तो कराते ही साथ ही अमर हो जाते वे शब्द, परन्तु अफसोस इस बात रहा है कि ‘‘घर फूंक तमाशा देखें’’ वाली कहावत चिरथार्त लगती है। इतनी बड़ी धनराशि खर्च होने के बाद भी हम सिर्फ बदनामी ही ले पाये। समाज के लोग जब धन का अवव्यय करते हैं तो हम उन पर दोषारोपन करते नहीं थकते। आज मंच के सदस्य इस प्रवृति को ही सही ठहरा देगें तो समाज के बीच कौन सा मुंह लेकर जाएंगें ये लोग अब? अपरोक्ष रूप से मुझे धमकी मिल चुकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;समीक्षाः मंचिका अधिवेशन विशेषांक -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मंच के अन्दर अब नई जेनेरेशन को नेतृत्व कैसे मिले इस विषय पा चर्चा करनी जरूरी है। पुराने लोगों की दादागीरी तभी समाप्त होगी जब हम उनके विचारों को हम मानने से इन्कार कर देगें। नासिक अधिवेशन की 'मंचिका' तो भाई उनके विचारों का आईना है। मंच शाखाओं की कोई सामग्री इनको मिली ही नही। मंच-दर्शन, मंच का इतिहास, पूर्व अध्यक्षों के सूझाव व लेख कुछ भी तो नहीं है इस स्मारिका में। फिर यह स्मारिका किस रूप से हुई। स्मारिका के शाब्दीक अर्थ का भी ज्ञान संपादक जी को नहीं है। उन्हें पता ही नहीं कि युवा मंच क्या है। इसका क्या इतिहास रहा है। लगता है कोई जोड़-तोड़ लेखक है जिसने समाज की बहुत सारी सामग्री एकत्रित कर छाप दी हो। हां! संपादक जी ने अपने संपादकीय में यह जरूर ईमानदारी बरती है कि उनको किसने यह भार दिया है।&lt;br /&gt;राजस्थानी व मराठी भासा के महान नाटक/निबंधकार स्व॰ शिवचंद्र भरतिया को तो शायद इनका समाज जानता तक नहीं होगा। मंचिका के संपादक को या  दैनिक लोकमत, नासिक के संपादक श्री हेमंत कुलकर्णीजी को तो पता होना ही चाहिए था। संभतः इनको मेरी बात बुरी लगे, परन्तु जब मारवाड़ी समाज के ‘रेफरेंस बुक’ की बात करते हैं तो इस बात का ज्ञान तो रहना ही चाहिए कि ‘रेफरेन्स बुक’ का अर्थ क्या होता है। केवल रंगीन पृष्ठ छाप देने से स्मारिका या जोड़-तोड़ से कोई किताब ‘रेफ्रन्स बुक' जैसा की इन्होंने दावा किया है, नहीं बन जाती है। इस प्रवृति पर कैसे रोक लगे पर विचार करना होगा। इस बार मंचिका का मूल्य भी अंकित किया गया है 200/- यदि किसी को डाक से मंगवानी हो तो 50/- पोस्टेज चार्य अतिरिक्त देय होगा।&lt;strong&gt; - शंभु चौधरी&lt;/strong&gt;&lt;/i&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-5277324518656166401?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/5277324518656166401/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_10.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/5277324518656166401'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/5277324518656166401'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_10.html' title='अ.भ. मारवाड़ी युवा मंच : दशम राष्ट्रीय अधिवेशन'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-4160170736431676486</id><published>2011-11-10T05:12:00.000-08:00</published><updated>2011-11-10T05:18:50.450-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Shambhu Choudhary'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Modiya Script'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मोडीया लिपि ‘महाजनी’'/><title type='text'>मोडीया लिपि ‘महाजनी’ / Modiya Script</title><content type='html'>एक समय में राजस्थान अंचल में ‘मोडीया लिपि’ का प्रचलन था। इसको देश भर में ‘महाजनी’  के नाम से भी इसे जाना जाता था। इन दिनों इसका प्रचलन समाप्त को चुका है। देश भर के मारवाड़ी व्यापारी इसका प्रयोग खाता-बही लिखने व हुण्डी काटने आदि में प्रयोग करते थे। महाजनी में अंक को ‘पहाडा’ कहा जाता है। जिसमें एक आणा, दो आणा या एक, दो, तीन, चार बोला जाता था। इसके विषय में अगले लेख में जानकारी दूंगा। आज आपको यहाँ पर मोडभ्या लिपि देखने में कैसी होती थी इसका नमूना नीचे चित्र में दे रहा हूँ। - शंभु चौधरी&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;font size="5" color="red"&gt;Modiya Script "Mahajani"&lt;/font&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-mijK4IVwtDY/TrvOowhLI7I/AAAAAAAAAVk/URhYHqJycZ0/s1600/modialipi.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 335px; height: 400px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-mijK4IVwtDY/TrvOowhLI7I/AAAAAAAAAVk/URhYHqJycZ0/s400/modialipi.jpg" border="0" alt="Modiya Script"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5673355355217404850" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/br&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-4160170736431676486?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/4160170736431676486/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/modiya-script.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/4160170736431676486'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/4160170736431676486'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/modiya-script.html' title='मोडीया लिपि ‘महाजनी’ / Modiya Script'/><author><name>नया समाज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06688353327748761500</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='30' src='http://2.bp.blogspot.com/_QCW7cMC71qY/SSeyU2UpwOI/AAAAAAAAAPM/TIuq1TCrO90/S220/dipawali.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-mijK4IVwtDY/TrvOowhLI7I/AAAAAAAAAVk/URhYHqJycZ0/s72-c/modialipi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-1397927051362477850</id><published>2011-11-09T20:22:00.000-08:00</published><updated>2011-11-09T20:31:38.782-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्थानी भाषा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rajsthani bhasha'/><title type='text'>राजस्थानी भासा साथै धोखो?</title><content type='html'>राजस्थान विधानसभा रे माथै 25 अगस्त 2003 णै एक प्रस्ताव ‘राजस्थानी भाषा’री मान्यता खातिर भारत रे संविधान’रि आठवीं अनुसूची में सामिळ करै ताणी एक प्रस्ताव पारित कियो ग्यो थो। जिमें कह्यौ ग्यौ कि &lt;br /&gt;‘‘राजस्थान विधानसभा के सभी सदस्य सर्व सम्मति से यो संकल्प ळैवै है कि राजस्थानी भाषा णै संविधान रि आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कियो जावै। राजस्थानी भाषा में विभिन्न जिलों में बोली जाने वाली भाषा या बोलियाँ यथा ब्रज, हाड़ौती, बागड़ी, ढूँढ़ाड़ी, मेवाड़ी, मारवाड़ी, मालवी, शेखावटी आद सामिल है।’’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अठै आपं ईं प्रस्ताव रि गम्भीरता पर विचार करैगां कि राजस्थानी भासा साथै धोखो कियो ग्यो है कै? जिं टैम यौ प्ररसताव विधानसभा में लियो ग्यो थो विं टैम भी असोकजी’रि सरकार थी। बिणासै पुछो जावै कि ये प्रस्ताव थो कि जैर?&lt;br /&gt;http://samajvikas.blogspot.com/2009/06/blog-post_844.html&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-1397927051362477850?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/1397927051362477850/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_09.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/1397927051362477850'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/1397927051362477850'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_09.html' title='राजस्थानी भासा साथै धोखो?'/><author><name>नया समाज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06688353327748761500</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='30' src='http://2.bp.blogspot.com/_QCW7cMC71qY/SSeyU2UpwOI/AAAAAAAAAPM/TIuq1TCrO90/S220/dipawali.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-7777631608744836940</id><published>2011-11-08T19:33:00.000-08:00</published><updated>2011-11-09T05:58:00.404-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Kanhaiyalal Sethia'/><title type='text'>धरती धौरां री... से मुलाकात - शम्भु चौधरी</title><content type='html'>&lt;storng&gt;&lt;br /&gt;स्व॰ श्री कन्हैयालाल सेठियाजी की पुण्य तिथि 11 नवम्बर पर विशेष लेख&lt;/storng&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-KCEDZLOOoCs/Trn17Qu8nvI/AAAAAAAAAvU/XMwRG3T32VQ/s1600/Kanhaiyalal%2BSethia.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 267px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-KCEDZLOOoCs/Trn17Qu8nvI/AAAAAAAAAvU/XMwRG3T32VQ/s400/Kanhaiyalal%2BSethia.jpg" border="0" alt="Kanhaiyallal setia"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5672835604102815474" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कोलकात्ता सन् 2008 की बात है उन दिनों मैं ‘समाज विकास’ पत्रिका का संपादन देख रहा था। अचानक मेरे एक मित्र ने फोन पर मुझे बताया कि श्री सेठिया जी काफी अस्वस्थ्य चल रहे हैं उसी दिन मैंने उनके निवास पर जाने का मन बना लिया। मई का महिना था कोलकाता में वैसे भी काफी गर्मी पड़ती थी सो शाम पाँच बजे श्री कन्हैयालाल सेठिया जी के निवास स्थल 6, आशुतोष मखर्जी रोड पंहुच गया। &lt;storng&gt;‘समाज विकास’&lt;/storng&gt; का अगला अंक श्री सेठिया जी पर देने का मन बना लिया था, सारी तैयारी चल रही थी,  मैं ठीक समय पर उनके निवास स्थल पहुँच गया। उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री जयप्रकाश सेठिया जी से मुलाकत हुई। थोड़ी देर उनसे बातचीत होने के पश्चात वे, मुझे श्री सेठिया जी के विश्रामकक्ष में ले गये । बिस्तर पर लेटे श्री सेठिया जी का शरीर काफी कमजोर हो चुका था, उम्र के साथ-साथ शरीर थक सा गया था, परन्तु बात करने से लगा कि श्री सेठिया जी में कोई थकान नहीं । उनके जेष्ठ पुत्र भाई जयप्रकाश जी बीच-बीच में बोलते रहे -  &lt;i&gt;‘‘ थे थक जाओसा.... कमती बोलो ! ’’&lt;/i&gt;  परन्तु श्री सेठिया जी कहाँ थकने वाले, कहीं कोई थकान उनको नहीं महसूस हो रही थी, बिल्कुल स्वस्थ दिख रहे थे। बहुत सी पुरानी बातें याद करने लगे। स्कूल-कॉलेज, आजादी की लड़ाई, अपनी पुस्तक ‘‘अग्निवीणा’’ पर किस प्रकार का देशद्रोह का मुकदमा चला । जयप्रकाश जी को बोले कि- वा किताब दिखा जो सरकार निलाम करी थी, मैंने तत्काल दीपज्योति (फोटोग्राफर) से कहा कि उसकी फोटो ले लेवे । जयप्रकाश जी ने ‘‘अग्निवीणा’’  की वह मूल प्रति दिखाई जिस पर मुकद्दमा चला था । किताब के बहुत से हिस्से पर सरकारी दाग लगे हुऐ थे, जो इस बात का गवाह बन कर सामने खड़ा था । सेठिया जी सोते-सोते बताते हैं  - &lt;i&gt;‘‘हाँ! या वाई किताब है जीं पे मुकद्दमो चालो थो...देश आजाद होने’रे बाद सरकार वो मुकदमो वापस ले लियो।’’&lt;/i&gt;  थोड़ा रुक कर फिर बताने लगे कि आपने करांची में भी जन अन्दोलन में भाग लिया था। स्वतंत्राता संग्राम में आपने जिस सक्रियता के साथ भाग लिया, उसकी सारी बातें बताने लगे, कहने लगे &lt;storng&gt;‘‘भारत छोड़ो आन्दोलन’’&lt;/storng&gt; के समय आपने कराची में स्व.जयरामदास दौलतराम व डॉ० चौइथराम गिडवानी जो कि सिंध में उन जमाने में कांग्रेस के बड़े नेताओं में जाने जाते थे, उनके साथ कराची के खलीकुज्जमा हाल में हुई जनसभा में भाग लिया था, उस दिन सबने मिलकर स्व.जयरामदास दौलतराम व डॉ० चौइथराम गिडवानी के नेतृत्व में एक जुलूस निकाला था, जिसे वहाँ की गोरी सरकार ने कुचलने के लिये लाठियां बरसायी,  घोड़े छोड़ दिये, हमलोगों को कोई चोट तो नहीं आयी, पर अंग्रेजी सरकार के व्यवहार से मन में गोरी सरकार के प्रति नफरत पैदा हो गई। आपका कवि हृदय काफी विचलित हो उठा, इससे पूर्व आप &lt;storng&gt;‘‘अग्निवीणा’’&lt;/storng&gt; लिख चुके थे। उनके चेहरे पर कोई शिथिलता नहीं, कोई विश्राम नहीं, बस मन की बात करते थकते ही नहीं।  &lt;br /&gt;श्री सेठिया जी का परिवार 100 वर्शों से ज्यादा समय से बंगाल में है। आप बताते हैं कि आप 11 वर्श की आयु में सुजानगढ़ कस्बे से कलकत्ता में शिक्षा  ग्रहन हेतु आ गये थे। उन्होंने जैन स्वेताम्बर तेरापंथी स्कूल एवं माहेश्वरी विद्यालय में प्रारम्भिक शिक्षा ली, बाद में रिपन कॉलेज एवं विद्यासागर कॉलेज में शिक्षा ली थी। &lt;br /&gt; &lt;storng&gt;‘धरती धौरां री..’ एवं अमर लोक गीत  ‘पातल और पीथल’ &lt;/storng&gt; की रचना करने वाले अमर व्यक्तित्व के सामने मुझे तो ऐसा लग रहा था कि मैं अपने पिता के पास हूँ। सारी बातें राजस्थानी में हो रही थी सो अपनापन का ऐहसास तो हो ही रहा था मुझे। उनके अपनत्व से भी मैं प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। मुझे ऐसा लग रहा था मानो सरस्वती मां उनके मुख से स्वयं बोल रही हो। शब्दों में वह स्नेह, इस पडाव पर भी इतनी बातें याद रखना, आश्चर्य सा लग रहा था मुझे ये सब। फिर अपनी बात बताने लगे- &lt;i&gt;‘‘ ‘आकाश गंगा’  तो सुबह 6 बजे लिखण लाग्यो जो दिन का बारह बजे समाप्त कर दी।’’&lt;/i&gt; मैं तो बस उनसे सुनते रहना चाहते था, वाणी में मां सरस्वती का विराजना साक्षात देखा जा सकता था। मुझे बार-बार एहसास हो रहा था कि मैं किसी मंदिर में हूँ जहां ईश्वर से साक्षात दर्शन हो रहे हैं। यह तो मेरे लिये सुलभ सुयोग ही था कि मैं उनके शहर में ही रहता था।&lt;br /&gt; इस ऐतिहासिक मुलाकात के बाद ही श्री सेठिया जी चन्द दिनों बाद ही 11 नवम्बर 2008 को अनन्त में लील हो गये। यह एक महज संयोग ही था।&lt;br /&gt;करोड़ों राजस्थानियों की धड़कनों का प्रतिनिधि गीत&lt;storng&gt; ‘धरती धोरां री’ &lt;/storng&gt;एवं अमर लोकगीत ‘पातल और पीथल’ के रचयिता, राजस्थानी अकादमी, उदयपुर द्वारा ‘साहित्य- मनीषी’ की उपाधि से विभूषित पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया का जन्म राजस्थान के सुजानगढ़ शहर में 11 सितम्बर, 1919 ई0 को हुआ और इनकी मृत्यु 11 नवम्बर 2008 को कोलकाता में हुई। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा सुजानगढ़  में एवं स्नातकीय शिक्षा कलकत्ता में हुई। साहित्यसेवा एवं सहृदयता आपको अपने पिता छगनमलजी एवं माता मनोहरी देवी से विरासत में प्राप्त हुई। आपकी प्रथम हिन्दी काव्य पुस्तक ‘वनफूल’ 1940 में प्रकाशित हुई एवं शीध्र ही क्रान्तिकारी विचारों का प्रस्फुटन करती हुई दूसरी पुस्तक ‘अग्निवीणा’ लोगों के सामने आई। यह पुस्तक जमींदारी उत्पीड़न के विरुद्ध एक सशक्त स्वर की बुलन्दी थीं, अतः आप पर मुकद्दमा, चला एवं भारत स्वाधीन होने के बाद ही उससे राहत मिली। 1976 ई0 में आपकी राजस्थानी काव्यकृति ‘लीलटांस’ साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा उस वर्श की सर्वश्रेष्ठ राजस्थानी कृति के नाते पुरस्कृत की गई। 1981 ई0 में आपको राजस्थानी में उत्कृष्ट रचनाओं के हेतु लोक संस्कृति शोध संस्थान, चुरू द्वारा प्रवर्तित ‘डॉ० तेस्सीतोरी स्मृति स्वर्णपदक’  प्रदान किया गया। सेठियाजी को मूर्तिदेवी साहित्य पुरस्कार उनके काव्य ग्रन्थ ‘निर्ग्रन्थ’ पर दिया गया है। ‘निर्ग्रन्थ’ में कवि की 82 कविताएं संकलित हैं। प्रत्येक कविता के साथ दर्शन जुड़ा है।&lt;br /&gt;राजस्थानी में 14 एवं  उर्दू में दो पुस्तक प्रकाशित है। इनमें से कुछ पुस्तकें अन्य भाषाओं में अनूदित भी हुई हैं। यद्यपि समय की आवश्यकता एवं पुकार पर उन्होंने कई पुस्तकें क्रान्तिधर्मा स्वर की लिखी यथा ‘अग्नि वीणा’ एवं ‘आज हिमालय बोला’ पर उनके अधिकांश साहित्य का या ठीक कहें तो उत्तरकाल के साहित्य का मूल स्वर आध्यात्मिक चिन्तन पर आधारित सनातन सत्य का प्राकट्य ही है। दर्शन पर आधारित उनकी रचनाओं में ‘प्रणाम’, ‘मर्म’, ‘अनाम’, ‘निर्ग्रन्थ’, ‘देह-विदेह’ एवं ‘निष्पत्ति’ (हिन्दी में) तथा ‘कूंकूं’, ‘लीलटांस’, ‘दीठ’ एवं ‘कक्को कोड रो’ ‘लीक लकोळिया’ (राजस्थानी) रचनाएँ हैं। इनमें से प्रत्येक पर एक-एक स्वतन्त्र समालोचनात्मक ग्रन्थ लिखा जा सकता है । ‘दीपकिरण’ (हिन्दी) में भी उनके 160 एक-से-एक उत्तम गीत हैं। &lt;br /&gt;हिन्दी में आपकी 15 ग्रन्थ - बनफूल, अग्निवीणा, मेरा युग, दीपकिरण, प्रतिबिम्ब, आज हिमालय बोला, खुली खिड़कियां चौड़े रास्ते, प्रणाम, मर्म, अनाम, निर्ग्रन्थ, स्वगत, देह-विदेह और आकाश गंगा, राजस्थानी में- मींझर, गळगचिया, कूंकूं, धर कूंचा धर मजलां, लीलटांस एवं रमणिये रा सोरठा सहित 10 ग्रन्थ, उर्दू में ‘ताजमहल’ एवं अंग्रेजी में ‘रिफलेक्शन्स इन ए मिरर’  (अनुवाद) प्रकाशित हुए हैं। ‘निर्ग्रन्थ’ का बांग्ला में एवं ‘खुली खिड़कियाँ चौड़े रास्ते, का मराठी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। आपके साहित्य में भारतीय जीवन-दर्शन का गहन तत्त्व जिस सहजता से प्रकट हुआ है, आधुनिक युग में उसकी मिसाल मिलना कठिन है। &lt;br /&gt;आपकी मान्यता था कि राजस्थानी जैसी समृद्ध भाषा की, जिसके कोश में सर्वाधिक शब्द हैं, उपेक्षा घातक है। राजस्थानी के व्यवहार के पक्ष में आपकी लिखित पुस्तक ‘मायड रो हेलो’ एक सशक्त दस्तावेज है।&lt;br /&gt;‘प्रतिबिम्ब’ भी उनके गीतों की एक और भावपूर्ण पुस्तक है जिसमें विविधता भरी है। ‘लीलटांस’ को 1976 में साहित्य अकादमी द्वारा राजस्थानी भाषा की उस वर्श की सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में पुरस्कृत किया गया एवं ‘निर्ग्रन्थ’ पर भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा ज्ञानपीठ का ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’ मिला। 1987 में आपकी राजस्थानी कृति ‘सबद’ पर राजस्थानी अकादमी का सर्वोच्च ‘सूर्यमल्ल मिश्रण शिखर पुरस्कार’ प्राप्त हुआ। 2004 में आपको ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया है। नोटः आपके समस्त साहित्य को ‘राजस्थान परिषद’ कोलकाता ने ने चार खंडों में ‘समग्र’ के रूप में प्रकाशित किया है । एक खंड में राजस्थानी की 14 पुस्तकें, दो खंडो में हिन्दी एवं उर्दू की 20 पुस्तकें समाहित हैं। चौथा खंड इनके 9 ग्रन्थों का विभिन्न भाषाओं में हुए अनुवाद का है। 8&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-7777631608744836940?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/7777631608744836940/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_08.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7777631608744836940'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7777631608744836940'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_08.html' title='धरती धौरां री... से मुलाकात - शम्भु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-KCEDZLOOoCs/Trn17Qu8nvI/AAAAAAAAAvU/XMwRG3T32VQ/s72-c/Kanhaiyalal%2BSethia.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-8709107369392221846</id><published>2011-11-07T21:12:00.000-08:00</published><updated>2011-11-07T21:13:59.884-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रो. शिवकुमार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्थान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बंगला साहित्य'/><title type='text'>बंगला साहित्य में राजस्थान - प्रो. शिवकुमार</title><content type='html'>&lt;strong&gt;चारण कवि रंगलाल की कविता पर आधारित&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बंगाला साहित्य &lt;strong&gt;‘राजस्थान के इतिहास’&lt;/strong&gt; से पटा पड़ा है। आज हम इसी संदर्भ में बंगला साहित्य के कुछ पन्नों को पलटते है।&lt;br /&gt;रानी पद्मिनी के रूप-सौन्दर्य की प्रशंसा सुनकर उसे प्राप्त करने के लिए सम्राट अलाउद्दीन चित्तौड़ पर आक्रमण करता है। युद्ध में असफलता होने के पश्चात वह राजा भीम सिंह के पास एक प्रस्ताव भेजता है- ‘‘कि यदि एक बार उसे रानी पद्मिनी का दर्शन हो जाय तो वह दिल्ली लौट जायेगा।’’&lt;br /&gt;बंगला साहित्य में इस घटना का वर्णन देखें -&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;एई रूप कत दिन होइलो समर।&lt;br /&gt;दिवा विभावरी रणे नाहि अवसर।।&lt;br /&gt;तथापिउ यवनेर ना होइलो जय।&lt;br /&gt;अभेद्य दुर्गम दुर्ग, कार साध्य लय?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एकबार देखा चाई से रूप ताहार।।&lt;br /&gt;आसार आशाय फल लाभ होले बांचि।&lt;br /&gt;इहार अधिक मिछे मने मने आंचि।।&lt;br /&gt;नाहि चाहि रत्नभार, चित्तौरे देश।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखिबो से मोहिनीरे, एई धार्य शेष।।&lt;br /&gt;एतो भावि पत्र लिखि दूत पाठाइलो।&lt;br /&gt;संधिर पताका शुभ्र, शून्ये उडाइलो।।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;small&gt;(संदर्भ: रंगलाल रचनावली, पद्मिनी उपाख्यान पृ.147)&lt;/small&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्राट अलाउद्दीन चित्तौड़ पर जय नहीं होने के बाद जब इस तरह का अपमान जनक सन्धि प्रस्ताव पा कर राजा राणा भीम सिहं क्रूद हो उठता है परन्तु तब तक वह युद्ध के कारण काफी कमजोर हो चुका था। तब रानी पद्मिनी ने सूझाव दिया कि आप उसे दर्पण छाया देखने का प्रस्ताव दे कर कुल को नष्ट होने से वचाव करें। अगर वह सिर्फ मेरी छाया देख कर दिल्ली लौट जाता है तो इससे हमारे वीरों की प्राण रक्षा हो सकेगी।&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;दुर्जन दलन, सुजन पालन,&lt;br /&gt;एई तो राजार नीति।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निरखि आभाय, शत्रु यदि जाय,&lt;br /&gt;सब दिक रक्षा पाय।&lt;br /&gt;तबे हे आमारे, देखाउ ताहारे,&lt;br /&gt;निरुपाये सदुपाये।।&lt;br /&gt;साक्षत् आभाय, यदि देखे राय&lt;br /&gt;होबे तबे कुले कालि।&lt;br /&gt;देखुक अर्पाणे, छाया दरशने&lt;br /&gt;वंशेते ना रबे गालि।।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;small&gt;(संदर्भ: रंगलाल रचनावली, पद्मिनी उपाख्यान पृ.149)&lt;/small&gt;&lt;br /&gt;पद्मिनी महारानी ने राजा को जनता के प्रति अपना धर्म याद दिला कर संन्धि प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने को कहा। इस बीच में बंगाला कवि देश की जनता को याद दिलाता है कि अंग्रेजों से भी हमें हार नहीं माननी चाहिए। धीरे धीरे कवि रानी के जौहर की तरफ बढ़ता चला जाता है।&lt;br /&gt;अंत मे कवि हुंकार भर उठता है-&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;ओई शनु ! ओई शुनो ! &lt;br /&gt;भेरहर आवाज हे, भेरीर आवाज।&lt;br /&gt;साज साज साज बोले, साज साज साज हे,&lt;br /&gt;साज साज साज।।&lt;br /&gt;चलो चलो  चलो सबे, समर-समाज हे,&lt;br /&gt;समर समाज।&lt;br /&gt;राखोहो पैतृक धर्म, क्षत्रियेर काज हे,&lt;br /&gt;क्षत्रियेर काज।&lt;br /&gt;आमादेर मातृभूमि राजपूतानानार हे&lt;br /&gt;राजपूतानार।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;जौहर की कथा का गुनगान करते हुए कवि देशवसियों को हुंकार भरता है कि- कि वे भी उठो जगो और अंग्रेजों से लोहा लेने की कसम खा लो।&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;भारतेर भाग्य जोर, दुःख विभावरी भेर&lt;br /&gt;घूम-घोर थाकिवे कि आर?&lt;br /&gt;इंगराजेर कृपाबले, मानस उदयाचले&lt;br /&gt;ज्ञानभनु प्रभाय प्रचार।।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;small&gt;(संदर्भ: रंगलाल रचनावली, पद्मिनी उपाख्यान पृ.172)&lt;/small&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-8709107369392221846?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/8709107369392221846/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_07.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/8709107369392221846'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/8709107369392221846'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_07.html' title='बंगला साहित्य में राजस्थान - प्रो. शिवकुमार'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-2375242804172119824</id><published>2011-11-06T18:10:00.000-08:00</published><updated>2011-11-06T18:19:21.560-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शम्भू चौधरी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>व्यंग्य: लोकतंत्र’रा स्तम्भ</title><content type='html'>बेईमान व्यक्ति के हाथ में कलम हो या तलवार उसकी बेईमानी छुपती नहीं है। इन दिनों देश में पत्रकारिता में भी बेईमानी झलकने लगी है। देश के कई पत्रों के संपादक करोड़ों में बिकने लगे। ईनाम की रकम इतनी मंहगी हो चुकि है कि एक लाख का ईनाम लेने के लिए हर शख्स अपना ईमान बेचने में लगा है। कल तक देश में नेता लोग व्यापारियों को जी भर के गालियां देते रहे। पत्रकार भी जम कर उनको लताड़ते थे। जनता उसके मजे ले-ले पेट भरती रही। आज देश में इन नेताओं की जब बारी आई तो पत्रकारों की एक जमात बगलें झांकती नजर आती है। इस संदर्भ में व्यंग्य को देखें -&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;एक पत्रकार दूसरे पत्रकार से&lt;br /&gt;मित्र- सोहनजी थारी तलवार निचे पड़गी ! &lt;br /&gt;ना’रे आ तो म्हारी कलम है ! &lt;br /&gt;मित्र- नेता’रे गलै तो आई रोजना फिरै !&lt;br /&gt;अब कठै काल ही म्हारे बॉस ने ‘वो’ खरिद लियो !&lt;br /&gt;मित्र- अब तू कै लिखसी ?&lt;br /&gt;आ अब उलटी चालसी&lt;br /&gt;मित्र- कियां?&lt;br /&gt;अब देश’री जनता को सर कलम करसी।&lt;br /&gt;मित्र- पर या तो गद्दारी होसी?&lt;br /&gt;मेरो पेट कुण भरसी तू कि या जनता?&lt;br /&gt;मित्र- पर फैर भी आपां देश का चौथा लोकतंत्र’रा स्तम्भ हां।&lt;br /&gt;जद तीनों पाया लड़खड़ायरा है तो चौथे खड़ो रह भी कै कर लेसी?&lt;/i&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;व्यंग्यकार: शंभु चौधरी, कोलकाता&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-2375242804172119824?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/2375242804172119824/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_7518.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/2375242804172119824'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/2375242804172119824'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_7518.html' title='व्यंग्य: लोकतंत्र’रा स्तम्भ'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-2044232890684542892</id><published>2011-11-06T01:30:00.000-07:00</published><updated>2011-11-06T02:43:14.822-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गीत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्थानी लोकगीत'/><title type='text'>तुलसी जी का ब्याह-</title><content type='html'>&lt;strong&gt;तुलसाँजी औड़ै कुंवारा हो राम!&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;आसाढ़ सुदी ग्यारस णै देव सोज्यावै ईं लिए उनणै &lt;strong&gt;‘‘देव सयाणी ग्यारस’’&lt;/strong&gt; कह्यो जावै तथा कातक सुदी ग्यारस णै &lt;strong&gt;‘‘देव उठणी या जागरणी ग्यारस’’&lt;/strong&gt; कह्यो जावै। ईं बीच में आपणा घरां में कोई बड़ो शुभ काम कोणी कियो जावै। अर देव उठणी ग्यारस णै सैं सूँ पैला तुलसाँजी रो ब्याव कियो जाय। ई अवसर पर आपणै घरां में लुगाईयां एक लोक गीत भी गाया करै जिको बोहत ही लोकप्रिय गीत है।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तुलसाँजी रो ब्याव के अवसर पर गावै जावै वालो लोकगीत -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;सांतू सहेल्यां ळ-मिल चाळी,&lt;br /&gt;तो सांतू ईं इक उणियारै हो राम!&lt;br /&gt;भरने गई जळ जमना रो पाणी,&lt;br /&gt;सांतु री सांतु यूँ उठ बोळी-&lt;br /&gt;तुलसाँजी औड़ै कुवांरा हो राम!&lt;br /&gt;साथनियां रो ओ ताणो&lt;br /&gt;तुलसाँजी’रे कालजे खुभगो अर वै....&lt;/i&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;(सात सहेलियां एक साथ जमना तट पर पानी भरने जाती है। और सातूं सहेलियां आपस में मिलकर तुलसाँ नाम की लड़की को ताना मारने लगी। ‘‘अरै या तो अभी भी कुंवारी है’’ बस यह बात तुलसाँजी को चुभ जाती है।) &lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;रोवत ठिणकत आई बाई तुलसॉ&lt;br /&gt;तो बाबोजी गोद विठाई हो राम!&lt;br /&gt;कै बाई तन्नै भाउजी मारी?&lt;br /&gt;तो कै मायड़ दुतकारी हो राम!&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;(इस तरह उसके दादाजी तुलसाँ को अपने गोद में बैठाकर उसका लाड़-प्यार करते हुए पुचकारते हुए एक-एक का नाम ले-ले कर उससे पुछते हैं कि तुमको किसने छेड़ा, तब तुलसाँ बोलती है।)&lt;/strong&gt;&lt;p&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;ना बाबोजी कोई म्हानै मारी&lt;br /&gt;नो कोई दुतकारी हे राम!&lt;br /&gt;म्हारी सहेल्यां यूं मैणै बोली-&lt;br /&gt;‘‘तुलसाँजी औड़ै कुवांरा हो राम!’’&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;(इस तरह तुलसाँ रो-रो कर अपना दुखड़ा दादाजी को बताती है। तब दादाजी उसको भ्रह्माजी, चांद, सूरज के साथ विवाह की बात कहते है। तो तुलसाँ  जबाब में कहती है कि ना-ना आपणै घरै जो सालगराम जी है वही मुझे पसंद है आप उसी से मेरा ब्याह रचा दो।)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;बाबोजी -&lt;br /&gt;तो कै विरमाजी परणावां हो राम!&lt;br /&gt;के बाई चांदो वर हे राम!&lt;br /&gt;तो कै सूरज परबाबां हो राम!&lt;br /&gt;तुलसाँजी -&lt;br /&gt;म्हारै तो बाबोजी सालगराम बर हेरो&lt;br /&gt;वे म्हारै मन भाया हो राम&lt;br /&gt;वो री म्हारी जोड़ी हो राम!&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;(इस प्रकार जब तुलसीजी नै अपनी इच्छा बता दी तो पिताजी उके ब्याह की तैयारी करने में जूट गये।)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;आळा-गीळा बांस कटाया, तो तोरण-थांम रुपाया हो राम!&lt;br /&gt;पाटा सूतां ताणियां खिंचाई, मांडेळा मांड़ा छबाया हो राम!&lt;br /&gt;लाडू-पेड़ा सरस जलेबी, तुलसा री जान जिमाई रो राम!&lt;br /&gt;पीली हळ्दी पीला ही चावल, तुलसा रो गांठ जुडायो हो राम!&lt;br /&gt;पान-सुपारी रोक रुप्यो तुलसा री गांठ जुड़ायी हो राम!&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;(इस प्रकार जब सभी तैयारी हो जाती है और बाई तुलसाँ का हाथ पीळा कर ब्याह की सभी रश्में विधि पूर्वक पूरी की जाती है बाई तुलसाँ की बिदाई कर दी जाती है।)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;पैळो फेरो लियो बाई तुलसॉ,&lt;br /&gt;तुलसाँ बाबोजी णै प्यारा हो राम!&lt;br /&gt;दूजो फेरो लियो बाई तुलसॉ,&lt;br /&gt;तुलसाँ दादीजी रा दुलारा हो राम!&lt;br /&gt;तीजो फेरो लियो बाई तुलसॉ,&lt;br /&gt;तुलसाँ भाऊजी णै प्यारा हो राम!&lt;br /&gt;चौथे फेरो लियो बाई तुलसॉ,&lt;br /&gt;तुलसाँ मायड़ री लाडल हो राम!&lt;br /&gt;तुलसाँ हुई रै पराई हो राम!&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी शब्दों का हिन्दी मायने-&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;ताणो - ताना, खुभगो - चुभना, भाउजी - भाभीजी, मायड़ - मां ने, बाबोजी - पिताजी या दादाजी, सालगराम - शालीग्राम, काला पत्थर जिसे कृष्ण भगवान का स्परूप माना गया है। , तोरण-थांम रुपाया - विवाह के अवसर पर बांस का एक खंभा घर क आंगन में गाड़ना, ताणियां - पीले रंग से रंगा हुए चौकोर कपड़े को उस बांस से बांध देना जो आंगन में लगाया गया है, मांडेळा मांड़ा छबाया - धर के अंदर और बाहर तंबू लगवाना।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-2044232890684542892?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/2044232890684542892/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_06.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/2044232890684542892'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/2044232890684542892'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_06.html' title='तुलसी जी का ब्याह-'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-8041707615211926075</id><published>2011-11-05T22:15:00.000-07:00</published><updated>2011-11-05T22:18:10.905-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भुपेन हजारिका'/><title type='text'>भुपेन हजारिका कोणी रया</title><content type='html'>&lt;font size="4" color="red"&gt;&lt;strong&gt;भुपेन हजारिका&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;(8 सितंबर, 1926 - ५ नवम्बर २०११)&lt;br /&gt;आपां सैं मिल’र उणाणै आपणी श्रद्धांजलि अर्पित करां हां।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-wmQi72Fc1Rk/TrYDRw8bLLI/AAAAAAAAAvI/xdXBsU589cM/s1600/Bhupen-Hazarika.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-wmQi72Fc1Rk/TrYDRw8bLLI/AAAAAAAAAvI/xdXBsU589cM/s400/Bhupen-Hazarika.jpg" border="0" alt="Bhupen Hazarika"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5671724384450718898" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मानीज्ता भुपेन हाजारिका रो काल शनिवार 5 नवंबर 2011 णै मुंमबई में आपको सवरगवास होग्यो। आपको जन्म 8 सितंबर 1926 को हो। 86 वरीसीय हाजारिका जी को जनम असम रे सादिया गांव में होयो थे। आप दस बरस री उमर से ही गीत लिखण अर गाणणा लाग्या था। &lt;strong&gt;‘‘दिल हूम-हूम करे’’  और ‘‘ओ गंगा बहती हो क्यूं’’&lt;/strong&gt;गीत सूं आपणै देशभर में आपरो बड़ो नाम होग्यो।  आपको एक गीत ‘‘ओ गंगा बहती हो क्यूं’’ रो राजस्थानी अनुवाद असम का राजू खेमका ने कियो है जिको आपां उणणै आपणी श्रद्धांजलि स्वरूप अठै प्रस्तुत करां हैं। आपको राजस्थान से काभी ळगाव भी रयो है। मानीज्ता गजानन वर्मा आपका नजदिक का मितरां में हा। आपकी गीत के प्रति लगण देख असम का युग पुरुष स्व.ज्योति परसाद अगरवाल जी, आपणै मंच पर गाणै री प्ररेणा दी थी। तब सूं आप असम के गीत संगीत पर राज करतां आया ।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;font size="4" color="#330000"&gt;&lt;b&gt;ओ गंगा बहती हो क्यूं?&lt;/FONT&gt;&lt;/b&gt;&lt;br&gt;&lt;font size="3" color="#330000"&gt;&lt;b&gt;&amp;copy - डॉ.भूपेन हजारिका -&lt;/FONT&gt;&lt;/b&gt;&lt;HR COLOR="RED"&gt;&lt;br /&gt;&lt;font size="2" color="#330000"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;[मूल असमिया भाषा से हिन्दी में रूपान्तर]&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार&lt;br /&gt;निःशब्द सदा, ओ गंगा तुम&lt;br /&gt;ओ गंगा बहती हो क्यों ?&lt;br /&gt;नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुआ&lt;br /&gt;निर्लज्य भाव से बहती हो क्यों ?&lt;br /&gt;अनपढ़ जन खाध्य विहीन,&lt;br /&gt;नेत्र विहीन देख मौन हो क्यों ?&lt;br /&gt;इतिहास की पुकार, करें हँकार&lt;br /&gt;ओ गंगा की धार, निर्वल जन को सकल संग्रामी&lt;br /&gt;समग्रगामी बनाती नहीं हो क्यों ?&lt;br /&gt;व्यक्ति रहे व्यक्ति केन्द्रित, सकल समाज व्यक्तित्व रहित&lt;br /&gt;निष्प्राण समाज नहीं तोड़ती हो क्यों ?&lt;br /&gt;स्त्रोतस्विनी तुम न रही, तुम निश्चय चेतना नहीं&lt;br /&gt;प्राणों से प्रेरणा बनती न क्यों ?&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;font size="2" color="#330000"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;[मूल असमिया भाषा से राजस्थानी में रूपान्तर]&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लांबी है अथाग, प्रजा दोन्यू पार &lt;br /&gt;करे त्राय-त्राय, अणबोली सदा ओ गंगा तू&lt;br /&gt;ओ गंगा बैवे है क्यूं ?&lt;br /&gt;नेकपाणो नष्ट हुयो, मिनख पणो भ्रष्ट हुयो,&lt;br /&gt;निरलज्जा बण बैवे है क्यूं&lt;br /&gt;अणभणिया आखरहीन, अणगिण जन रोटी स्यूं त्रीण&lt;br /&gt;नैत्रहीन लख चुप है क्यूं&lt;br /&gt;इतिहास की पुकार, करें हुंकार-&lt;br /&gt;हे गंगा की धार निवले मानव ने जुद्ध वणी,&lt;br /&gt;सब ठौरजयी वणावै नहीं है क्यूं ?&lt;br /&gt;मिनक रहवै मिनखांचारी, सगळा समाज निभ्हे स्वैच्छाचारी&lt;br /&gt;प्राणहीन समाज नै तोड़े नहीं हैं क्यूं ?&lt;br /&gt;सुरसरी तू ना रै वै, तू निश्चय चेतना हीन&lt;br /&gt;प्राणों में प्रेरणा बणै नहीं है क्यूं ?&lt;br /&gt;ओ गंगा बैवे है क्यूं &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Translated In Rajsthani by : Raju Khemka, Assam&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-8041707615211926075?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/8041707615211926075/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_6723.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/8041707615211926075'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/8041707615211926075'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_6723.html' title='भुपेन हजारिका कोणी रया'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-wmQi72Fc1Rk/TrYDRw8bLLI/AAAAAAAAAvI/xdXBsU589cM/s72-c/Bhupen-Hazarika.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-2542357053164012032</id><published>2011-11-05T08:21:00.000-07:00</published><updated>2011-11-05T08:24:26.251-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चम्पालाल मोहता ‘अनोखा’'/><title type='text'>परिचय: श्री चम्पालाल मोहता ‘अनोखा’</title><content type='html'>&lt;p align="center"&gt;&lt;font size="4" color="red"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;अय जरा आवाज कम करो! - शंभु चौधरी&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;15 अक्टूबर 2011 शनिवार, कोलकाता। &lt;br /&gt;कहीं ईंट-पत्थर तौड़ने की आवाज आती हो तो हमें समझ लेना चाहिए कि कोई निर्माण कार्य चल रहा है जो हमारे सपने को साकार करने में लगा होगा। हमारी मजबूरी यह है कि हम उन्हें मजदूर समझ बैठे। जिस कड़वाहट भरी आवाज से हमारी नींद में खलल पैदा हो जाती है और अनायास ही हम उन पर चिल्ला पड़ते हैं -&lt;strong&gt;&lt;br /&gt; ‘‘अय जरा आवाज कम करो!’’ &lt;/strong&gt;शायद हम यह समझने में भूल कर देते हैं कि यही ठक-ठक की आवाज हमारे भविष्य का निर्माण कर रही है। इस भागदौड़ भरे जीवन के बीच कल में कोलकाता शहर की एक छोटी सी गली से गुजरता हुआ मारवाड़ी समाज के सुपरिचित कवि, शायर एवं गीतकार &lt;strong&gt;श्री चम्पालाल मोहता ‘अनोखा’&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; जी के घर जा पँहुचा। दोपहर के लगभग तीन बज चुके थे आपके निवास स्थल 49/2ए, बीडन रो, कोलकाता-700006 में उनसे एक संक्षिप्त मुलाकात हुई। इस दौरान आपसे जो बातें हुई इसे आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।&lt;br /&gt;श्री चम्पालाल जी का परिचय आपकी ही इन पंक्तियों के साथ शुरू करना चाहूँगा-&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-2MUzs5zJXHM/TrVUz_ybSBI/AAAAAAAAAvA/i-sBICivyFE/s1600/clmohota.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-2MUzs5zJXHM/TrVUz_ybSBI/AAAAAAAAAvA/i-sBICivyFE/s320/clmohota.jpg" border="0" alt="Champa Lal Mohata 'Anokha'"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5671532558016006162" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जीवन देने वाले मुझको जीने के अधिकार तो देते&lt;br /&gt;झोली भर कर दर्द दिए हैं, मुट्ठी भर कर प्यार तो देते&lt;br /&gt;होने को वीरान हमारी बगिया तो ये हो जाएगी&lt;br /&gt;वीराने से पहले लेकिन थोड़ी बहुत बहार तो देते। -‘‘अनोखा कवि से’’&lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;मारवाड़ी समाज के विख्यात गीतकार श्री चम्पालाल मोहता ‘अनोखा’ (77 वर्ष) मूल रूप से कोलकाता के बड़ाबाजार अंचल के राजस्थानी गणगौर गीतों के रूप में जाने जाते रहें हैं।  राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी बीकानेर में सन् 1934-35 में श्री चंपा लाल मोहता स्व. मानक लाल मोहता एवं श्रीमती इमारती देवी मोहता के पुत्र रूप में जन्में। जन्म के ठीक 19 दिन पहले ही आपके पिताश्री का स्वर्गवास हो गया। 9 वर्ष के होते होते ममतामई माँ भी चल बसी।  बड़े भाई मोहनलाल एवं भाभी रतनी देवी ने माता-पिता की भूमिका निभाई प्राथमिक शिक्षा बीकानेर में ही हुई। सन् 1942 के आस-पास द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आपका कोलकाता आना हुआ परन्तु उस समय भगदड़ के चलते वापिस बीकानेर लौट गए। इसी दौरान माँ की मृत्यु हुई सन् 1945-46 में वापिस कोलकाता आये और तब से यहीं के होकर रह गए सन् 1946 में श्री महेश्वरी विद्यालय में प्रवेश लिया भाई साहब जितना कमाते थे उसमें स्कूल की फीस देना संभव नहीं था। चम्पालाल जी पढ़ना चाहते थे विद्यालय व्यवस्थापकों से फीस माफ करवा कर, किसी तरह दसवीं कक्षा तक आपने अपनी पढाई पूरी की।&lt;br /&gt;विद्यार्थी जीवन में ही उनकी रचनाएँ महेश्वरी विद्यालय की पत्रिका ‘भारती’ में प्रकाशित होने लगी विद्यालय के उप प्रधानाध्यापक श्री वी.एन.टी. ने चम्पालाल जी की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें ‘अनोखा’ कहा तो उसे ही उन्होंने अपने उपनाम के रूप में अपना लिया।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;सन् 1952-54 के मध्य कवि सम्मेलनों-मुशायरों में शिरकत करते हुए, एक उभरते हुए सितारे के रूप में स्थापित हुआ युवा शायर चम्पालाल मोहता ‘अनोखा’ हिन्दुस्तान के तमाम बड़े और मशहूर कवियों, शायरों के साथ ‘अनोखा’ ने अपने अनोखे रंग-ढंग में काव्य-पाठ किया। उस समय कोलकाता और आस-पास के अंचलों में प्रायः सभी कवि सम्मेलनों में उनकी उपस्थिति दर्ज होती मूनलाईट थियेटर के लिए भी ‘अनोखा’ गीत लिखते रहे कोलकाता बाल परिषद के प्रकाशन नई-किरण, खिलते कमल में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हुई।&lt;br /&gt;अनिरुद्ध कर्मशील के संपादन में, साप्ताहिक विश्वमित्र में सर्वप्रथम रचनाएँ प्रकाशित हुई लगातार सिलसिला चला देश भर में कई पत्र पत्रिकाओं ने ‘अनोखा’ को प्रकाशीत किया सन् 1955 में पुरूलिया निवासी ‘कशी’ से विवाह के बाद, नौकरी के सिलसिले में वे राऊरकेला चले गए 18 मार्च सन 1957 को एक हृदय विदारक अगलगी की घटना ने जीवन साथी छीन लिया उस घटना में ‘अनोखा’ भी इतने गंभीर रूप से जख्मी हुए की छः महीने अस्पताल में रहे। संकटमय जीवन यापन करते हुए आपने अपना दूसरा विवाह श्रीमती पुतली देवी जो आगरा शहर की, से अन्तर्जातीय-अंतरवर्णीय विवाह कर पुनः अपना संसार बसा लिया। आपको तीन बेटे क्रमशः रवीन्द्र (52), मनोज  (49) एवं विनोद (41) हुए। वर्तमान में आप सबसे छोटे बेटे श्री विनोद मोहता के साथ रह रहे है। &lt;strong&gt;&lt;br /&gt;दुविधाओं के एक दौर से जीवन गुज़र रहा है&lt;br /&gt;बसे-बसाए घर का तिनका-तिनका बिखर रहा है&lt;br /&gt;पग-पग पसरी है। पीड़ायें, पल-पल है चिन्तायें&lt;br /&gt;सच तो ये है-अब साँसे लेना भी अखर रहा है। -‘‘अनोखा कवि से’’&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;उनके भाई साहब को अब यह चिंता सताने लगी कि कहीं यह लड़का भटक न जाए रोजी रोटी के जुगाड में कोलकाता आये साहसी युवक कविताई के चक्कर में भूखों न मरे इसलिए एक उपन्यास, ‘मधुशाला’ के प्रत्युत्तर में 125 छंदों में रचित ‘रणशाला’ सहित ढेरों गीत-गजलों की पांडुलिपियाँ तथा पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं का रजिस्टर भाई साहब ने चार-आने किलो के भाव कबाड़ी को दे दिया अस्पताल से लौटे ‘अनोखा’ पर यह भीषण वज्रपात साबित हुआ वह विद्रोही हो गये।&lt;br /&gt;मारवाड़ी समाज की दशा पर आपने अपने दर्द का इजहार कुछ इस प्रकार बयान किया - ‘‘इस आकाश को हिस्सों में मत बांटों। कोई अग्रवाल, माहेश्वरी, ओसवाल, जैन  क्यों नहीं सभी अपने को मारवाड़ी कहते अब समय आ गया है कि इन जातियता के भेद को हमें समाप्त कर देना चाहिए’’.... बोलते-बोलते कुछ सोचने लगे फिर बोले &lt;strong&gt;दुष्यन्त कुमार&lt;/strong&gt; जी एक गज़ल समाज के लिए आपको सुनाता हूँ - &lt;strong&gt;&lt;br /&gt;‘‘तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नहीं। &lt;br /&gt;कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं।।’’ &lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;आपने समाज में साहित्य के प्रति आई उदासीनता पर अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि एक समय था जब स्व. भंवरमल सिंघी, सीताराम सेक्सरिया, राम निवास ढंढारिया, रमणलाल बिन्नाणी, भागीरथजी कानोड़िया, राम निवास जाजू, बुधमल श्यामसुखा ने इस दिशा में बहुत ही सराहनीय प्रयास किये थे उनको बहुत हद तक सफलता भी मिली परन्तु धन की चकाचौंध में हम सब कुछ खोते जा रहे हैं मनी ओरियेन्टेट समाज होता जा रहा है अब। अच्छी बात है परन्तु सिर्फ पैसा...पैसा...पैसा... इससे समाज की छवि खराब भी होती जा रही है...थोड़ा रुके... बड़ाबाजार पुस्तकालय, कुमारसभा पुस्तकालय के कार्यक्रमों में समाज के लोगों की कमी इस स्थिति का जीता जागता उदाहरण हमारे सामने है। श्री प्रमोद शाह का नाम लेते हुए आगे कहने लगे गोपाल कलवानी, केशव भट्ठड़, संजय बिन्नाणी अभी भी समाज में इस अलख को जगाये हुए परन्तु इनको समाज का सहयोग नहीं के बराबर है।’’&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;‘अनोखा’ के नाम से जाने व पहचाने जाने वाले कवि इन दिनों गले के केंसर से ग्रसित है। डाक्टरों ने उनको कम बोलने की सलाह दी है। मुझे पास पाकर वे कहाँ रूकते पास में उनकी पत्नी श्रीमती पुतली देवी मोहता जी ने उनके स्वभाव के बारे में मुझे कुछ बताने लगी, इलाज में कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ा था पर उनको यह सब कहाँ सुनना पसंद बीच में ही टोक दिए ....शंभुजी आएं हैं चाय तो पिलाओ! भाभीजी उठकर किंचन चाय बनाने चली गई। तब तलक श्री संजय विन्नानी जी भी आ गए थे और हमारी बातों का नया दौर शुरू हो गया। &lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;आपने अपनी पहली रचना माहेश्वरी विद्यालय के तुलसी जयन्ती के कार्यक्रम में सन् 1950 में सुनाई थी उसके बाद तो आपको जो उत्साह मिला तब से आजतक आप लगातार लिखतें और कुछ नये सृजन में लगे रहते है। आप कोलकाता में मूनलाइट थियेटर के लिए भी कई राजस्थानी गीत लिखे थे। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सन् 1961-62 में आपकी लिखी एक राजस्थानी गीत-&lt;br /&gt;‘‘चम-चम चमकै चाँद, चाँदनी रस बरसावै रे।&lt;br /&gt;थारे बिना ओ बालम म्हारे जी घबरावै रै’’&lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;शे’र, गज़ल, रुबाई, कत्आत, होली गीत, गणगौर गीतों आदि में प्रायः सभी जगह आपने कई जगह राजस्थानी शब्दों का मिश्रण इनकी रचनाओं की पहचान बन चुकी है। अनोखा जी का सिर्फ नाम ही नहीं इनकी पहचान भी ‘अनोखा’ है। एक गज़ल को देखें -&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;‘‘आने को सब आये लेकिन वो नहीं आये&lt;br /&gt;मुद्दत से दिल जिनकी बाट उडीक रहा है।’’ &lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यहाँ ‘‘बाट उडीक’’  राजस्थानी शब्द है जिसका अर्थ है बैचेनी से किसी का इंतजार करना। आपकी इस अलग पहचान ने प्रायः सभी कवि मंचों पर आपकी एक विशिष्ठ पहचान हो जाती थी। श्री गजानन वर्मा, विश्वनाथ शर्मा ‘‘विमलेश जी’’, डाॅ॰ शम्भुनाथ सिंह, भारत भूषण, गोपाल सिंह ‘‘नेपाली’’, जानकी वल्लभजी शास्त्री, नागार्जुन, अनवर मिर्जापुरी, सोज सिकन्दरपुरी, हकीम झुनझुनवी, वसीम बरेलवी, कैफ़ी आजमी, अली सरदार जाफ़री कई महान हस्तियों के साथ आपने कवि सम्मेलनों, मुशायरों, महफिलों की शान बढ़ाई है। डा॰ कृष्ण बिहारी मिश्र जी लिखते है। ‘‘ शेरो-शायरी की महफिल से जुड़े ‘अनोखा’ जी’ मेरे मन इतने करीब कैसे पहुँच गये? सोचता हूँ तो उनका प्रेम-पागल रूप मेरी आँखों के सामने खड़ा हो जाता है।’’ श्री मृत्युंजय उपाध्याय जी एक जगह आपके संस्मरण का जिक्र करते हुए लिखा कि ‘‘ आपकी एक कविता बम्बई से प्रकाशित ‘गौरी’ को छपने भेजी जो सधन्यवाद वापस लौट आयी थीं पुनः आपने इसी कविता को ‘चम्पा मोहता’ के नाम से भेज दी संपादक ने किसी लड़की का नाम समझा और अगले ही अंक में कोभर पृष्ठ के अंदर वाले पृश्ठ पर छाप दी, इस संपादकीय आईने ने संपादक की कलाई तो खोलकर रख ही दी, संपादक महोदय को इसके लिए जब उन्हें यह पता चला कि उन्होंने इसी रचना को पहले अस्वीकृत कर दिया था माफी भी मांगनी पड़ी’’&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;आप अपने बारे में लगातार कुछ न कुछ सुनाते जा रहे थे चाय आ चुकी थी हम तीनों चाय पीने लगे तभी आपने सुनाना शुरू किया-&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;‘‘कोई बुलंदियों में तो कोई अभाव में&lt;br /&gt;हर शख़्स जी रहा है यहाँ पर तनाव में&lt;br /&gt;कल तक जो उठाते थे ज़माने पे उंगलियाँ&lt;br /&gt;वो आज कठघरे में हैं अपने बचाव में।’’&lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रकाशन: &lt;/strong&gt; कोलकाता शहर की एक जानी पहचानी संस्था ‘अकृत’ ने इनकी बिखरी हुई प्रायः सभी रचनाओं (वर्ष 2010 तक की) को एकत्रित कर एक काव्य ग्रंथ ‘‘अनोख कवि’’ के रूप में प्रकाशित किया है जिसका मूल्य: रु0 500 मात्र, जिसका संपादन श्री केशव भट्ठड़ एवं श्री संजय बिन्नाणी ने किया है।  &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रकाशक:&lt;/strong&gt;  अकृत, 4, तनसुख लेन, कोलकाता- 700007.&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चम्पालाल मोहता की कुछ रचनाएं -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;font size="3" color="red"&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी गीत &lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;चम-चम चमकै चाँद,  चाँदनी रस बरसावै रे।&lt;br /&gt;थारै बिना ओ बालम म्हारो जी घबरावै रे।।&lt;br /&gt;खिली म्हारी जोबन री फुलवारी&lt;br /&gt;पिया मैं सुध-बुध भूला सारी&lt;br /&gt;रहे नहीं मन अब मेरो इस में&lt;br /&gt;जवानी नाच रही नस-नस में&lt;br /&gt;सारी-सारी रात सजनवा नींद न आवै रै! थारै बिना.....&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;जुल्फ लहरावै काळी-काळी&lt;br /&gt;आँख म्हारी हिरणी सी मतवाली&lt;br /&gt;गाल म्हारा गोरा, होठ गुलाबी&lt;br /&gt;कमर पतली लचके ज्यूँ डाली&lt;br /&gt;घड़ी-घड़ी म्हारी छाती स्यूँ आँचल उड़ जावै रे!  थारै बिना.....&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;पिया घर जल्दी वापस आणा&lt;br /&gt;नहीं पल भर भी देर लगाणा&lt;br /&gt;लग्या सै म्हारै लै’र जमाणा&lt;br /&gt;कठै लुट जावै ना म्हारा खजाणा&lt;br /&gt;पाड़ोसी को छोरो म्हाँसू आँ लड़ावै रे!  थारै बिना.....&lt;br /&gt;&lt;small&gt;(मूनलाइट थियेटर के लिए सन् 1961-62 में रचित)&lt;/small&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;font size="3" color="red"&gt;&lt;strong&gt;अपना मुकद्दर है तू.....&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अंधेरों में बन रोशनी की किरन&lt;br /&gt;हक जो ना मिले, कर शिकवे ना गिले&lt;br /&gt;राहें नई, खुद ही बना&lt;br /&gt;अपना मुकद्दर है तू&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;तेरी हिम्मत के सदके, तेरी मेहनत के सदके&lt;br /&gt;तेरी फितरत के सदके, तेरी गैरत के सदके&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;परेशानियों से तू झुकना नहीं&lt;br /&gt;घबरा के ख़तरों से रुकना नहीं&lt;br /&gt;आसाँ हो जाएगी मुश्किल तेरी&lt;br /&gt;कदमों को चुमेगी मंजिल तेरी&lt;br /&gt;उठ हर बुलन्दी को छू - अपना मुकद्दर है तू.....&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दिलों से दिलों की कड़ी जोड़ तू&lt;br /&gt;आँधी-ओ-तूफाँ का रूख मोड़ तू&lt;br /&gt;ज़मीं है तेरी आस्माँ है तेरा&lt;br /&gt;सारा का सारा जहाँ है तेरा&lt;br /&gt;सितारों से कर गुफ्तगू - अपना मुकद्दर है तू.....&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हिम्मत के लिख तू फसाने नये&lt;br /&gt;उल्फ़त के गा तू तराने नये&lt;br /&gt;दिन भी तेरे हों रातें तेरी&lt;br /&gt;सब की जुबाँ पे हो बातें तेरी&lt;br /&gt;हर दिल का बन तू सुकूँ - अपना मुकद्दर है तू.....&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ख़्वाबों को अपने हक़ीक़त बना&lt;br /&gt;बेहतर से बेहतर जहाँ तू बना&lt;br /&gt;अंधेरों में बन रोशनी की किरन&lt;br /&gt;ज़माना भी देखे जऱा तेरा फ़न&lt;br /&gt;नया इक सफ़र कर शुरू - अपना मुकद्दर है तू.....&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;font size="3" color="red"&gt;&lt;strong&gt;शे’र&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;कांटों की हो चुभन या अंगार का दहकना&lt;br /&gt;मिल-जुल के आओ बाँटे, हम दर्द अपना-अपना&lt;br /&gt;जीने का हक जहाँ में सबको मिले बराबर&lt;br /&gt;उजड़े न कोई बगिया, टूटे न कोई सपना। -‘‘अनोखा कवि से’’&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;तूँ ढूँढ़ता फिरे है जिस दर-ब-दर अय दोस्त&lt;br /&gt;तुझको ख़बर नहीं वो तेरे आस-पास है&lt;br /&gt;हमको ये तेरी व़ज्म का अंदाज ‘‘अनोखा’’&lt;br /&gt;भाया न एक पल, न कभी आया रास है। -‘‘अनोखा कवि से’’&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दुविधाओं के एक दौर से जीवन गुज़र रहा है&lt;br /&gt;बसे-बसाए घर का तिनका-तिनका बिखर रहा है&lt;br /&gt;पग-पग पसरी है। पीड़ायें, पल-पल है चिन्तायें&lt;br /&gt;सच तो ये है-अब साँसे लेना भी अखर रहा है। -‘‘अनोखा कवि से’’&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;font size="3" color="red"&gt;&lt;strong&gt;गृहलक्ष्मी आओ स्वागत है-&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गृहलक्ष्मी आओ स्वागत है-&lt;br /&gt;महका-महका सा आज हमारा आँगन है।&lt;br /&gt;गृहलक्ष्मी आओ, स्वागत है अभिनन्दन है।।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;बाबुल के घर छोड़ पिया के घर आई।&lt;br /&gt;डोली में खुशियाँ ही खुशियाँ भरकर लाई&lt;br /&gt;सुख सबको पहुँचाने की अनुपम अभिलाषा&lt;br /&gt;सजनी के नैनों में है साजन की भाषा&lt;br /&gt;पग-पग पर बिखरा कुंकुम्, केसर, चंदन है।&lt;br /&gt;गृहलक्ष्मी आओ स्वागत है....&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;मन से मन का यह सुखद सुहाना मधुर मिलन&lt;br /&gt;धरती से मानो आज मिला हो नील गगन,&lt;br /&gt;कल तक जो अनजाने थे आज हुए अपने&lt;br /&gt;साकार हो गए जीवन के सुन्दर सपने&lt;br /&gt;जग में सबसे पावन परिणय का बंधन है।&lt;br /&gt;गृहलक्ष्मी आओ स्वागत है....&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;उर में चिंतन की, सागर सी गहराई हो&lt;br /&gt;मासूम विचारों में नभ की ऊँचाई हो&lt;br /&gt;कर्तव्य-परायणता ही मानस का दर्पण&lt;br /&gt;श्रद्धा में अन्तर्निहित ही मथुरा-वृन्दावन है।&lt;br /&gt;गृहलक्ष्मी आओ स्वागत है....&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;font size="3" color="red"&gt;&lt;strong&gt;गजल&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;सन्नाटे का शोर हवा में चीख रहा है&lt;br /&gt;तनहाई में भीड़ का मंज़र दीख रहा है।&lt;br /&gt;रंजो-अलभ से अब तो अपना है याराना&lt;br /&gt;रफ़्ता रफ़्ता ग़म सहना दिल सीख रहा है।&lt;br /&gt;नहीं कोई गुंजाइस अब कहने सुनने की&lt;br /&gt;उसका कहना इक पत्थर की लीक रहा है।&lt;br /&gt;अच्छे बुरे दिनों की चर्चा है बेमानी&lt;br /&gt;मेरे लिए हर लम्हा इक तौफ़ीक़ रहा है।&lt;br /&gt;उसका दिल अच्छा, उसकी बातें भी अच्छी&lt;br /&gt;साफ बयानी में बस थोड़ा तीख रहा है।&lt;br /&gt;वो बदनाम गली-कूचे का रहनेवाला&lt;br /&gt;दोज़ख़ में रहकर भी बिलकुल ठीक रहा है।&lt;br /&gt;दूर भले ही रहा नज़र से मेरी लेकिन&lt;br /&gt;वो मेरे दिल के हरदम नज़दीक रहा है।&lt;br /&gt;उन दोनों का साथ था जैसे चोली दामन&lt;br /&gt;एक काफ़िया था तो एक रदीफ़ रहा है।&lt;br /&gt;मार दिया बेमौत उसे अपने लोगों ने&lt;br /&gt;जो उनके सुख दुःख में सदा शरीक रहा है।&lt;br /&gt;गिरगिट जैसा रंग बदलता उसका चेहरा&lt;br /&gt;कभी रक़ीबों सा है कभी रफ़ीक़ रहा है।&lt;br /&gt;आने को सब आये लेकिन वो नहीं आये&lt;br /&gt;मुद्दत से दिल जिनकी बाट उडीक रहा है।&lt;br /&gt;खुद ही मुज़रिम, खुद फ़रियादी, खुद ही हाकिम&lt;br /&gt;खुद ही अपने जुर्म का  वो तस्दीक़ रहा है।&lt;br /&gt;धुंध-धुंए से परे एक झुरमुट के पीछे&lt;br /&gt;दूर खड़ा वो अलग ‘‘अनोखा’’ दीख रहा है।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-2542357053164012032?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/2542357053164012032/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_05.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/2542357053164012032'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/2542357053164012032'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post_05.html' title='परिचय: श्री चम्पालाल मोहता ‘अनोखा’'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-2MUzs5zJXHM/TrVUz_ybSBI/AAAAAAAAAvA/i-sBICivyFE/s72-c/clmohota.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-7583492965897945048</id><published>2011-11-04T20:41:00.000-07:00</published><updated>2011-11-04T20:45:35.056-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शम्भु चौधरी'/><title type='text'>राजस्थानी वर्णमाला- शम्भु चौधरी</title><content type='html'>श्री राजेन्द्र बारा रे’नुसार राजस्थानी भासा री वर्णमाला में 49 वर्ण ध्वनियां है जिणा मांय 11 स्वर अर 38 व्यंजन होवो है। जबकि श्री केसरी कान्त शर्मा‘केसरी’ जी राजस्थानी वर्णमाला कुल 47 वर्ण ध्वनियां ही माने है। अपरो लिखनो है कि 13 स्वर अर 34 व्यंजन ही होवो है।&lt;br /&gt;श्री केसरी जी तीन श,ष,स ण एक ‘स’ ही माने है कारण भी स्पष्ट है कि राजस्थानी भासा में ‘श’ अर ‘ष’ रो प्रयाग कानी होया करै।&lt;br /&gt;यदि श्री राजेन्द्र जी बारा ण ही सही माना तो 38 व्यंजना में 2 व्यंजन कम कियां भी 36 व्यंजन रह जाय है। सो अबार भी 2व्यंजना को फर्क साफ कोनी होयै।&lt;br /&gt;क वर्ग - क ख ग घ ङ &lt;br /&gt;च वर्ग - च छ ज झ ञ &lt;br /&gt;ट वर्ग - ट ठ ड ढ ण &lt;br /&gt;त वर्ग - त थ द ध न &lt;br /&gt;प वर्ग - प फ ब भ म  &lt;br /&gt;य वर्ग - य र ल व स ह ग्य ड़ ळ - 34 व्यंजन ही होया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि श्री राजेन्द्र जी’रो माननो ईं प्रकार है।&lt;br /&gt;राजस्थानी भासा री वर्णमाला में 49 वर्ण ध्वनियां है जिणा मांय 11 स्वर अर 38 व्यंजन है। &lt;br /&gt;व्यंजन: &lt;br /&gt;क ख ग घ ङ &lt;br /&gt;च छ ज झ ञ &lt;br /&gt;ट ठ ड ढ ण &lt;br /&gt;त थ द ध न &lt;br /&gt;प फ ब भ म &lt;br /&gt;य र ल व व्   &lt;br /&gt;श ष स ह &lt;br /&gt; ळ ड़ &lt;br /&gt;(.) अनुसाव अर (ः) विसर्ग - 38&lt;br /&gt;श्री राजेन्द्र जी’रे अनुसार स्वर: अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ ऋ - 11 स्वर एवं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री केसरी जी’रे अनुसार स्वर: अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ आ औ  अं अः ऋ - 13 स्वर&lt;br /&gt;अठै जो फरक सामने आयो है वो है -&lt;br /&gt;(.) अनुसाव अर (ः) विसर्ग को है श्री राजेन्द्रजी ईं दोणु ण व्यंजन माना है जबकि श्री केसरी जी ईंणै स्वर माना है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;श्री केसरी जी’री पोथी ‘ सहज राजस्थानी व्याकरण माथै आप अर स्पष्ट करां है कि राजस्थानी प्रयोग में &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1.‘ऋ’ की जगह ‘रि’ को प्रयोग सही होसी।&lt;br /&gt;2.‘ढ’ कै नीचै नुक्ता नहीं लगानो चाइज्यै।&lt;br /&gt;3.‘श’ अर ‘ष’ की जगह ‘स’ को ही प्रयोग सही होसी।&lt;br /&gt;4.मूर्धन्य ‘ल’ की जगह ‘ल’/ जठै जोर पड़ता हो बठै  ‘ळ’ को प्रयोग होनो चाईज्ये। &lt;br /&gt;5.‘न’ की जगह ‘ण’ रो प्रयोग विशेष ध्वनि माथै कियो जानो चाईज्यै।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;श्र, श, ष, ऋ, क्ष, त्र, ज्ञ  शब्दां रे संबंध में कुछ स्पष्टीकरण री जरूरत होनी चाईज्यै। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जबकि श्र, श, ष, ऋ, क्ष, त्र, ज्ञ  देवनागरी में होते हुए भी राजस्थानी भासा में ईं व्यंजना रो प्रयोग णै कई राजस्थानी रा विद्वान सही कोनी माने। जबकि उणारी पोथी सूं आपने कई उदाहरण देने रो प्रय्रास कर रह्यों हूँ।&lt;br /&gt;क्ष - भिक्षु - भिक्सु &lt;br /&gt;श - दर्शन, कोशिश - दरसन, कोसिस&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नोटः &lt;/strong&gt;इन दिनों कई लेखकों ने धड़ल्ले से ‘श’ और ‘ष’ का प्रयोग शुरू कर दिया है। नीचे देखें -&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संदर्भ -&lt;/strong&gt;  पाळ-पोष, नशैड़ी, नशैबाज, वर्ष, प्रदूषण, कृष्ण &lt;strong&gt;‘बिणजारो’&lt;/strong&gt; पेज 170, 171, 85 अंक 2008,  संदर्भ - &lt;strong&gt;‘‘नैणसी’’&lt;/strong&gt; अङ्क जुलाई 2010 पेज 8, 9 में ‘ष’ व ‘श’ का प्रयोग सरलता के साथ किया गया है। देखें &lt;strong&gt;‘‘नैणसी’’&lt;/strong&gt;  पृष्ठ - 8  ‘‘ अनेक परीक्षावाँ रा प्रश्न-पत्र चुणता। शोध-विद्यार्थिया रा ग्रन्थ जाँचता, उणरी मौखिक परीक्षा लेता।’’ &lt;br /&gt;इस वाक्य में ‘क्ष’, ‘त्र’, ‘श’ का प्रयोग साफ दिखता है।&lt;br /&gt;ऋ - संस्कृति - संस्क्रति&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नोट-&lt;/strong&gt; इन दिनों दोनों ही तरह से प्रयोग को स्वीकार कर लिया गया है। देखें &lt;strong&gt;‘बिनजारो’&lt;/strong&gt; पेज 128  अंक 2008&lt;br /&gt;ज्ञ - ज्ञान - ग्यान&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नोटः&lt;/strong&gt; स्वयं श्री केसरीकांत जी ने खुद’री हाइकू कविता म ज्ञान/ विज्ञान शब्दा रो प्रयोग कियो है।&lt;br /&gt;त्र - कूं-कूं पत्री - कूं-कूं पतरी,  निमंत्रण - निमंतरण &lt;br /&gt;नोटः इन दिनों ‘त्र’ कां प्रयोग भी सामान्य रूप से होने लगा है देखें - &lt;strong&gt;बिणजारो&lt;/strong&gt; पेज 50 अंक - 2008 अर्थत निमंत्रण और पत्री जैसे शब्दों का प्रयोग देवनागरी की तरह ही राजस्थानी में भी जस का तस ही होने लगा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-7583492965897945048?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/7583492965897945048/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7583492965897945048'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7583492965897945048'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='राजस्थानी वर्णमाला- शम्भु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-1904277815624071504</id><published>2011-10-28T20:59:00.000-07:00</published><updated>2011-10-28T21:02:33.280-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां'/><title type='text'>चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां-६  - शंभु चौधरी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;font color="navy"&gt;विवेचनाः&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आधुनिक राजस्थानी भाषा में हिन्दी के प्रायः रोजाना इस्तेमाल में आने वाले बहुत सारे शब्द समाहित हो चुके हैं जिसे समझने में कोई विशेष परेशानी नहीं होती है। नीचे के चन्द शब्दों की तरफ विशेष तौर पर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ। जैसे - &lt;/strong&gt;&lt;i&gt;भ्रस्टाचार(भ्रष्टाचार),  मुगती(मुक्ति), हाल (समाचार), सै’योग (सहयोग), संस्क्रति (संस्कृति), मैनत (मेहनत), वैवस्था (व्यवस्था), विसवास (विश्वास), टेसण(स्टेशन), म्हैं(हम), म्हारी (हमारी), हुयग्यौ(हो गये), सुण’र(सुनकर)।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जबकि राजस्थानी भाषा शब्दों के विशाल भंडार में ऐसे भी शब्द हैं जो हिन्दी सहित अन्य सभी भारतीय भाषाओं से अलग हटकर अपना स्वरूप बनाये हुए है। जैसे -&lt;/strong&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;ओळ्यूं, हिवड़ा, सगळा, कोनी, घणौ, पाछा, कुचां, थारा, घणीं, सुहाली, गफ्फी, बटको, अंवेर, अंगेज’र, ओळखाण आदि-आदि।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी - हिन्दी&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीं रो सै’योग करण री हामळ(हामी) भरी।  &lt;br /&gt;उसको सहयोग करने की स्वीकृति दी।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;अण्णा हजारे रै सागै आखो देस पगां होयग्यो।&lt;br /&gt;अण्णा हजारे के साथ पूरा देश एक हो गया।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;हर हिन्दुस्तानी अण्णा हजारे बणग्यो।&lt;br /&gt;हर हिन्दुस्तानी अण्णा हजारे बन गया।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;आज आखो देस भ्रस्टाचार सूं मुगती चायै।&lt;br /&gt;आज पूरा देश भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहता है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;ओळ्यूं आवै, ओळ्यूं आवै।&lt;br /&gt;हाल सुणां जद जलम भोम रो,&lt;br /&gt;हिवड़ा में खुशियां नीं मावै।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी में &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;तेरी याद आती है, तेरी याद आती है।&lt;br /&gt;जन्म भूमि का समाचार जैसे ही सुनता हूँ,&lt;br /&gt;मेरा में दिल खुशियों से झूम उठता है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी - हिन्दी&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;सै’योग - सहयोग&lt;br /&gt;हामळ, हामी - स्वीकारना &lt;br /&gt;आखो -  पूरा &lt;br /&gt;पगां -  एक होना&lt;br /&gt;भ्रस्टाचार -  भ्रष्टाचार &lt;br /&gt;मुगती -  मुक्ति&lt;br /&gt;ओळ्यूं - याद&lt;br /&gt;आवै  - आना&lt;br /&gt;सुणां  - सुनना&lt;br /&gt;जलम - जन्म&lt;br /&gt;भोम  - भूमि&lt;br /&gt;हिवड़ा  - दिल, घड़कन&lt;br /&gt;नीं मावै - झूमना, नाचना&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-1904277815624071504?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/1904277815624071504/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post_28.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/1904277815624071504'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/1904277815624071504'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post_28.html' title='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां-६  - शंभु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-9134220354292078717</id><published>2011-10-26T21:39:00.000-07:00</published><updated>2011-10-26T21:40:32.924-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां'/><title type='text'>चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां-५  - शंभु चौधरी</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लक्ष्मीनारायण रंगा’र दोहा &lt;br /&gt;लक्ष्मीनारायण रंगा के दोहे&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1.&lt;br /&gt;संस्क्रति में घुळर्यों, किसौ कोढियो अंस&lt;br /&gt;घर-घर रावण जनमिया, गांव-गांव में कंस।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी में -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;संस्कृति में घुल रहा, कैसा कोढ़िया अंस&lt;br /&gt;घर-घर में रावण जन्म लिया, गांव-गांव में कंस।&lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;सदनां मांही चल रया, खुरसी, जूता जंग&lt;br /&gt;जनता पर भी चढरयो, ओ संसदिया रंग।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी में -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सदन के अंदर चल रहा, कुर्सी, जूता की लड़ाई&lt;br /&gt;जनता पर भी चढ़ गया, यही संसद का रंग।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रामजीलाल घेड़ेला ‘भारती’ की कविता -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1.&lt;br /&gt;भारत रै लोकतंत्र में&lt;br /&gt;सगळा मौज मनावै।&lt;br /&gt;जिणनै मिलै मौको&lt;br /&gt;लूट-लूट’र खावै ।।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी में -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;भारतीय लोकतंत्र में&lt;br /&gt;सभी मौज मनाते।&lt;br /&gt;जिनको अवसर मिला&lt;br /&gt;वही लूट-लूट के खाते।।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;इण लाकेतंत्र मांय&lt;br /&gt;केइयां रा सूरज छिपै नीं।&lt;br /&gt;रात दिन करै मैनत&lt;br /&gt;उण रा चुल्हा जगै नीं।।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी में -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इस लोकतंत्र में&lt;br /&gt;कितनों का सूरज डूबता ही नहीं।&lt;br /&gt;रात दिन मेहनत करे&lt;br /&gt;उनके घर चुल्हा जले नहीं।।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दौलतराम टोडासरा की कविता -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;1. दान&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मुनीम जी रो&lt;br /&gt;के लागै पल्लैऊं&lt;br /&gt;दे देवै दान&lt;br /&gt;सेठजी रै गल्लैऊं।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;2. कीं&lt;br /&gt;बीं में कोनी कीं&lt;br /&gt;जको कैवै कीं&lt;br /&gt;करै कीं?&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी में -&lt;br /&gt;1. दान&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मुनीम जी का&lt;br /&gt;क्या जाता पल्ले से&lt;br /&gt;दे देतें हैं दान&lt;br /&gt;सेठजी के गल्ले से&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;2. कुछ&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उनमें कुछ नहीं&lt;br /&gt;कहता है कुछ&lt;br /&gt;करता है कुछ?&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी - हिन्दी &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;संस्क्रति  -  संस्कृति&lt;br /&gt;सगळा  -  सभी &lt;br /&gt;मैनत  -  मेहनत&lt;br /&gt;केइयां  - कितनों  &lt;br /&gt;के लागै - क्या जाता &lt;br /&gt;पल्लैऊं  - पल्ले से&lt;br /&gt;गल्लैऊं  - गल्ले से&lt;br /&gt;बीं में  - उनमें&lt;br /&gt;कोनी  - नहीं&lt;br /&gt;कीं  -  कुछ&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-9134220354292078717?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/9134220354292078717/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post_26.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/9134220354292078717'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/9134220354292078717'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post_26.html' title='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां-५  - शंभु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-2040899762004170813</id><published>2011-10-25T07:02:00.000-07:00</published><updated>2011-10-25T07:07:00.559-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां'/><title type='text'>चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां-४ - शंभु चौधरी</title><content type='html'>राघव अर निधि रौ रिजल्ट निकळ्यौ।&lt;br /&gt;राघव और निधि का रिजल्ट निकल गया।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;निधि फस्ट डिविजन पास होगी।&lt;br /&gt;निधि प्रथम श्रेणी से पास हो गई&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;राघव थर्ड डिविजन होयौ।&lt;br /&gt;राघव तीसरी श्रेणी से पास हुआ।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;राघव फूट-फूट कै रोबो लाग्यौ।&lt;br /&gt;राघव फूट-फूट कर रोने लगा।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;यादां घणी है, बातां घणी है।&lt;br /&gt;यादें बहुत सी है, बातें भी बहुत है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;म्हैं भावां रै अर यादां रै समन्दर मांय हिबोला खावता।&lt;br /&gt;हम विचारों और यादों के समन्दर में डूबकी लगते हुए।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;अखबार छोटो हुवै चायै मोटो।&lt;br /&gt;अखबार छोटा हो या बड़ा।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;बाबूजी आपरै टाबरिये सागै मेळो देखण गया।&lt;br /&gt;पिता जी अपने बच्चों के साथ मेला देखने गये।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;सारा टाबर सबड़ड़-सबड़ड़ खीर सूंतण लागग्या।&lt;br /&gt;सभी बच्चे खीर को गटकने लगे।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;रुपिया री वैवस्था कोनी व्हेइ सकी।&lt;br /&gt;रुपया की व्यवस्था नहीं हो सकी।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;ब्याज माथै रुपियां री वैवस्था करावौ।&lt;br /&gt;ब्याज दे दूंगा पर रुपया की व्यवस्था करवा दो।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;अगाला दिन बुला’र रुपिया दे’र मदद कीदी।&lt;br /&gt;अगले दिन बुलाकर रुपया  देकर मदद किया।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;पापाजी घरै कोनी। औ मोबाइल घरै ई रैवे है।&lt;br /&gt;पापा जी घर पर नहीं हैं। यह मोबाइल घर पर ही रहता है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;घणौ जरूरी काम है।&lt;br /&gt;बहुत जरूरी काम था।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;वां रो विसवास कोनी राख सक्यौ।&lt;br /&gt;उनका विश्वास नहीं रख सके।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी - हिन्दी&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;सबड़ड़-सबड़ड़ - चाट-चाट कर खाना&lt;br /&gt;वैवस्था  -  व्यवस्था&lt;br /&gt;बुला’र  -  बुलाकर&lt;br /&gt;दे’र  -  देकर &lt;br /&gt;कोनी  -  नहीं&lt;br /&gt;घणौ  -  बहुत &lt;br /&gt;विसवास  -  विश्वास&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-2040899762004170813?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/2040899762004170813/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/4.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/2040899762004170813'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/2040899762004170813'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/4.html' title='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां-४ - शंभु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-3033511534910024261</id><published>2011-10-24T20:44:00.001-07:00</published><updated>2011-10-24T20:44:52.895-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां'/><title type='text'>चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां -३  - शंभु चौधरी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;पाठ - 3 &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;रेल मुगलसराय टेसण पर रूकी। - रेलगाड़ी मुगलसराय स्टेशन पर रूकी।&lt;br /&gt;पारवती खड़की सूं झांकी।  - पार्वती खिड़की से झांकने लगी।&lt;br /&gt;घणी भीड़ छी। - बहुत भीड़ थी।&lt;br /&gt;टाबर भूखा छा। - बच्चा भूखा था।&lt;br /&gt;दूध लेबा टेसण पे उतरी। - दूध लेने स्टेशन पर उतरी।&lt;br /&gt;बै दिन तो बे ही दिन हा। - वे दिन तो कुछ ओर दिन थे।&lt;br /&gt;गंगासागर सूं पाछा हावड़ा आवतां म्हानै खासी रात पड़गी।  -  गांगासागर से लौटते वक्त हमें बहुत रात हो गई।&lt;br /&gt;कोलकाता रै बाजार में हर तरै रौ सामान मिलै।  -  कोलकाता के बाजार में हर तरह का सामान मिलता है।&lt;br /&gt;इंया पल्लौ झाड़ियां काम कोनी चालै।  -  इस तरह पल्ला झाड़ने से काम नहीं चलेगा।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;यहाँ एक जगह ‘री’ एवं दूसरी जगह ’र का प्रयोग हुआ है।&lt;br /&gt;यहां इसका प्रयोग इस प्रकार समझें -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;म्हैं म्हारी अम्मी री बात सुण’र चुप हुयग्यौ। &lt;br /&gt;हम हमारी अम्मा की बात सुन कर चुप हो गये।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;यहाँ दो जगह ‘री’ का प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ अलग-अलग निकलता है&lt;br /&gt;यहां इसका प्रयोग इस प्रकार समझें -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आठ-बरसां री उडीक पाछै केस री आखरी तारीख आई।&lt;br /&gt;आठ वर्षों से इंतजार करने के बाद केस की आखिरी तारीख्र आई।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी - हिन्दी  &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;टेसण - स्टेशन&lt;br /&gt;खड़की - खिड़की &lt;br /&gt;घणी - बहुत &lt;br /&gt;छी - थी&lt;br /&gt;लेबा - लेने&lt;br /&gt;म्हैं - हम&lt;br /&gt;म्हारी - हमारी&lt;br /&gt;र, रा, री - क, का, की&lt;br /&gt;बै - वे&lt;br /&gt;बे ही - कुछ ओर &lt;br /&gt;हा - थे&lt;br /&gt;सूं  - से&lt;br /&gt;पाछा - वापस&lt;br /&gt;आवतां - लोटना&lt;br /&gt;म्हानै - हमें&lt;br /&gt;खासी - बहुत&lt;br /&gt;पड़गी - हो गई&lt;br /&gt;रै - के&lt;br /&gt;तरै - तरह&lt;br /&gt;रौ - का&lt;br /&gt;इंया - इस तरह से&lt;br /&gt;पल्लौ - पल्ला, साड़ी का पल्ला&lt;br /&gt;झाड़ियां - झाड़ना&lt;br /&gt;कोनी - नहीं&lt;br /&gt;चालै  - चलेगा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-3033511534910024261?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/3033511534910024261/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post_24.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/3033511534910024261'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/3033511534910024261'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post_24.html' title='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां -३  - शंभु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-7549123240058084507</id><published>2011-10-22T05:21:00.000-07:00</published><updated>2011-10-29T23:59:25.164-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्थानी कहावत'/><title type='text'>राजस्थानी कहावतां-१</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;font color="navy" size="3"&gt;&lt;br /&gt;राजस्थानी कहावतां -&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;ऊपर थाली नीचै थाली मांय परोसी डेढ  सुहाली।&lt;br /&gt;बांटण आली तेरा जणीं, हांते थोड़ी हाले  घणीं।।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दो थाली के बीच  में खाने की बहुत सारी सुहाली (मैदे या आंटा से बना हुआ खाने का सामान जो छोटी रोटी नूमा होती है जिसे घी या तेल में तल कर बनाया जाता है) जिसे 13 औरतें खाने वाले को बांटती (भोजन परोसना) है परन्तु खाने वाला ललचाई आंखों से उनको देखते ही रह जाते हैं तब उनमें से एक जन कहता है कि 13 जनी सुहाली लेकर केवल हिल रही है पर देती नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="red"&gt;&lt;br /&gt;अर्थात केवल दिखावा है। आडम्बर अधिक है।&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;आंधे री गफ्फी बोळै रो बटको।&lt;br /&gt;राम छुटावै तो छुटे, नहीं माथों ई पटको।।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आंघे और बहरे आदमी से पिंड छुड़ाना कठिन कार्य है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;आगम चौमासै लूंकड़ी, जै नहीं खोदे गेह।&lt;br /&gt;तो निहचै ही जांणज्यों, नहीं बरसैलो मेह।।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वर्षाकाल के पूर्व लोमड़ी यदि अपनी ‘घुरी’ नहीं खोदे तो निश्चय जानिये कि इस बार वर्षा नहीं होने वाली है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;इस्या ही थे अर इस्या ही थारा सग्गा।&lt;br /&gt;वां के सर टोपी नै, थाकै झग्गा।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;संबंधी आपस में एक-दूसरे की इज्जत नहीं उझालते। इसी बात को गांव वाले व्यंग्य करते हुए कहतें हैं कि यदि आप उनकी उतारोगे तो वह भी अपकी इज्जत उतार देगें दोनों के पूरे वस्त्र नहीं है - ‘‘ एक के सर पर टोपी नहीं तो दूसरे ने अंगा नहीं पहना हुआ है।’’&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;आज म्हारी मंगणी, काल म्हारो ब्याव।&lt;br /&gt;टूट गयी अंगड़ी, रह गया ब्याव।।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जल्दीबाजी में अति उत्साहित हो कर जो कार्य किया जाता है उसमें कोई न कोई बाधा आनी ही है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;कुचां बिना री कामणी, मूंछां बिना जवान।&lt;br /&gt;ऐ तीनूं फीका लगै, बिना सुपारी पान।।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;स्त्री के स्तनों का उभार न हो, मर्दों को मूंछें और पान में सूपारी न होने से उसकी सौंदर्यता नहीं रहती।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;दियो-लियो आडो आवै।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दिया-लिया या अपना व्यवहार ही समय पर काम आता है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;धण जाय जिण रो ईमान जाए।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जिसका धन चला जाता है उसका ईमान भी चला जाता है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;धन-धन माता राबड़ी जाड़ हालै नै जाबड़ी।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;धन आने के बाद आदमी का शरीर हिलना बन्द कर देता है। इसी बात को व्यंग्य करते हुए लिखा गया है कि राबड़ी खाते वक्त दांत और जबड़ा को को कष्ट नहीं करना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;ठाकर गया’र ठग रह्या, रह्या मुलक रा चोर।&lt;br /&gt;बै ठुकराण्यां मर गई, नहीं जणती ठाकर ओर।।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ठाकुर चले गये ठग रह गये, अब देश में चोरों का वास है।&lt;br /&gt;अब वैसी जननी मर चुकी, जो राजपुतों को जन्म देती थी।।&lt;br /&gt;&lt;i&gt;कहावत का तात्पर्य समाज की वर्तमान व्यवस्था पर व्यंग्य करना है। जिसमें देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करते हुए कहा जा सकता है कि अब देश के लिए कोई कार्य नहीं करता। सब के सब ठग हो चुके हैं जो देश को चारों तरफ को लूटने में लगे हैं।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;टुकरा दे-दे बछड़ा पाळ्या,&lt;br /&gt;सींग हुया जद मारण आया।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मां-बाप बच्चों को बहुत दुलार से पालते हैं परन्तु जब वह बच्चा बड़ा हो जाता है तो मां-बाप को सबसे पहले उसी बच्चे की लात खानी पड़ती है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;जावै तो बरजुं नहीं, रैवै तो आ ठोड़।&lt;br /&gt;हंसां नै सरवर घणा, सरवर हंस करोड़।।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जाने वाले को रोकना नहीं चाहिए, वैसे ही ठहरने वाले को जगह देनी चाहिए। जिस प्रकार हंस को बहुत से सरोवर मिलते हैं वैसे ही सरोवर को भी करोड़ों हंस मिल जाते हैं। अर्थात किसी को भी घमण्ड नहीं करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;जात मनायां पगै पड़ै, कुजात मनायां सिर चढ़ै।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;समझदार व्यक्ति को समझाने से वह अपनी गलती को स्वीकार कर लेता है जबकि मूर्ख व्यक्ति लड़ पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;राजस्थानी शब्दों का हिन्दी अर्थ&lt;/strong&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;आंधे री गफ्फी - अंधे से हाथ, आली - क्रिया स्त्री., आडो - समय पर,  इस्या - ऐसे ही, कामणी - स्त्री, कुचां - स्तन, कुजात - मूर्ख या ना समझ, गेह - घर, घणीं, घणा - अधिक, बहुत,  जाड़ - दांत, जाबड़ी - जबड़ा, जांणज्यों - जानिये, जणीं - स्त्री, जिण रो - जिसका, जात - समझदार, परोसी - बांटना, बोळै रो बटको - बहरे को समझाना, बरजुं - रोकना  मेह - वर्षा, मांय - बीच में, मुलक - देश, डेढ - बहुत सारी, ठोड़ - जगह, तेरा - 13, थे - आप, थारा - आपका, थाकै - आपके, निहचै - निश्चय, लूंकड़ी - लोमड़ी, वां के - उनके, सुहाली - मैदे या आंटा से बना हुआ खाने का सामान जो छोटी रोटी नूमा होती है जिसे घी या तेल में तल कर बनाया जाता है। हांते -देना, हाले - हिलना।&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;आप राजस्थानी कहावतों की पुस्तकें निम्न स्थान से प्राप्त कर सकते हैं।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;प्रकाशकः राजस्थानी साहित्य एवं संस्कृति जनहित प्रन्यास&lt;br /&gt;द्वारा- बैद बोरड एण्ड कम्पनी&lt;br /&gt;गंगाशहर रोड, बीकानेर&lt;br /&gt;पुस्तक चार भाग में उपलब्धए मूल्य 15/- रुपिये मात्र एक का।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-7549123240058084507?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/7549123240058084507/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post_22.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7549123240058084507'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7549123240058084507'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post_22.html' title='राजस्थानी कहावतां-१'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-5274007865967811604</id><published>2011-10-21T18:57:00.000-07:00</published><updated>2011-10-22T05:21:09.295-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां'/><title type='text'>चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां- २  - शंभु चौधरी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;पाठ - 2 &lt;/strong&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लोक साहित्य संसार रा सगळा देसां कै सगळै मानखै री सुभाविक चेतना, जीवन रा बिस्वास अर संस्कृति रौ साचै प्रतीक हुया करै। साहित्य दो भागां मै बांटीज्यो है। पैलो लोक साहित्य अर दूजी सिस्ट साहित्य। लोक साहित्य आतमा सूं जुड़ियोड़ी विद्या है। आ सिस्ट साहित्य सूं जूनी है। समाज री भांत-भंतीली जड़ां अर बिगसाव री डाळ्यां रौ चितराम लोक साहित्य मै मिलै जको आपां रै सिस्ट साहित्य मै मिलणी मुसकल। - उजास ग्रन्थ माला से&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लोक साहित्य संसार के समस्त देशों के समस्त मानव जाति का स्वाभविक चेतना, जीवन का विश्वास और संस्कृति का सच्चा प्रतिनिधित्व करती है। साहित्य को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला लोक साहित्य एवं दूसरा आम साहित्य। लोक साहित्य आत्मा से जूड़ी हुई विद्या है। वहीं आम साहित्य का सृजन किया जाता है। समाज से जूड़ी कई प्रकार की जीवन शैली के विकास की शाखाओं का फैलाव जो लोक साहित्य में देखने को मिलता है वैसा आम साहित्य में देखना असंभव सा है। - उजास ग्रन्थ माला से&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी -  हिन्दी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सगळा, सगळै  -  समस्त&lt;br /&gt;मानखै, मिनख  - मानव&lt;br /&gt;सुभाविक  - स्वाभविक&lt;br /&gt;बिस्वास  - विश्वास&lt;br /&gt;साचै  - सच्चा&lt;br /&gt;बांटीज्यो  - बांटा जा सकता &lt;br /&gt;पैलो  - पहला&lt;br /&gt;दूजी  -  दूसरा &lt;br /&gt;सिस्ट  - आम&lt;br /&gt;आतमा  - आत्मा&lt;br /&gt;जुड़ियोड़ी   - जूड़ी हुई &lt;br /&gt;सूं जूनी  - सृजन किया &lt;br /&gt;भांत-भंतीली  - कई प्रकार की &lt;br /&gt;बिगसाव  - विकास &lt;br /&gt;डाळ्यां  - शाखाओं&lt;br /&gt;चितराम  - फैलाव&lt;br /&gt;मुसकल  - असंभव सा, मुश्किल &lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी -  &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लोक साहित्य संसार रा सगळा देसां कै सगळै मानखै री सुभाविक चेतना, जीवन रा बिस्वास अर संस्कृति रौ साचै प्रतीक हुया करै।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी - &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लोक साहित्य संसार के समस्त देशों के समस्त मानव जाति का स्वाभविक चेतना, जीवन का विश्वास और संस्कृति का सच्चा प्रतिनिधित्व करती है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी -  &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;साहित्य दो भागां मै बांटीज्यो है। पैलो लोक साहित्य अर दूजी सिस्ट साहित्य। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी - &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;साहित्य को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला लोक साहित्य एवं दूसरा आम साहित्य। &lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी - &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लोक साहित्य आतमा सूं जुड़ियोड़ी विद्या है। आ सिस्ट साहित्य सूं जूनी है।  &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी - &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लोक साहित्य आत्मा से जूड़ी हुई विद्या है। वहीं आम साहित्य का सृजन किया जाता है। &lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी -  &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;समाज री भांत-भंतीली जड़ां अर बिगसाव री डाळ्यां रौ चितराम लोक साहित्य मै मिलै जको आपां रै सिस्ट साहित्य मै मिलणी मुसकल। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी - &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;समाज से जूड़ी कई प्रकार की जीवन शैली के विकास की शाखाओं का फैलाव जो लोक साहित्य में देखने को मिलता है वैसा आम साहित्य में देखना असंभव सा है। &lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-5274007865967811604?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/5274007865967811604/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post_6361.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/5274007865967811604'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/5274007865967811604'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post_6361.html' title='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां- २  - शंभु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-4817822432580163580</id><published>2011-10-21T07:01:00.000-07:00</published><updated>2011-10-22T05:20:17.762-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां'/><title type='text'>चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां- १ - शंभु चौधरी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;पाठ - 1 &lt;/strong&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;किणी भी समाज रै जातीय-चरित्र री खरी-खरी ओळखाण उणरै लोक-साहित्य सूं हुय सकै। उण समाज रा मोल अर मानतावां कांई है? उणरी नैतिक अवधारणावां कांई है? वो समाज कुणसा जीवनदर्शां नैं अंगेज’र चालै है। उणरै जीवण री रीत-भांत कांई है? बो कुण-सी जातीय स्मृतियां नैं अंवेर राखणो चावै है, आद-आद मोकळी बातां री जाणकारी उण समाज रै लोक-साहित्य सूं हुय सकै है। जो समाज जितरो परम्परा-समृद्ध, सांस्कृतिक दीठ सूं जितरो सजग अर जीवन-रस सूं जितरो लबालब है उणरो लोक-साहित्य भी उतरो ही सांवठो, रस अर रंग भीनो हुया करै है।&lt;strong&gt; - उजास ग्रन्थ माळा से&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चलैं राजस्थानी पढ़ना सीखतें हैं।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;किसी भी समाज के जातिय-चरित्र की सच्चाई की जानकारी उस समाज के लोक-साहित्य से हो सकती है। उस समाज की हैसियत और मान्यता क्या है? उनकी नैतिक अवधारणा कैसी है? वह समाज किनके जीवन-दर्शनों का अनुशरण करता है। उनके जीवन की रीत-भेष-भूषा कैसी है?  वह कौन सी जातीय स्मृतियों को बचाकर रखना चाहता है, आदि-आदि बहुत सी बातों की जानकारी उनके समाज के लोक-साहित्य से हो सकती है। जो समाज जितना परम्परा-समृद्ध सांस्कृतिक विचारधाराओं से जितना सजग और जीवन-रस से जितना लबालब है उनका लोक-साहित्य भी उतना ही समृद्ध, रस और रंग से भरा हुआ करता है।  &lt;strong&gt;- उजास ग्रन्थ माळा से&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी- हिन्दी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;खरी-खरी - किसी बात को हूबहू बताना&lt;br /&gt;ओळखाण - जानकारी होना&lt;br /&gt;उण, उणरै, उणरी - उन, उनके, उनकी &lt;br /&gt;मानतावां - मान्यता&lt;br /&gt;कांई - क्या&lt;br /&gt;कुणसा - कौन सा&lt;br /&gt;कुण-सी - कौन सी&lt;br /&gt;अंगेज’र - अनुशरण करना&lt;br /&gt;चालै- चलना&lt;br /&gt;रीत-भांत - रीत-रिवाज&lt;br /&gt;अंवेर - बचाना, संभालना &lt;br /&gt;राखणो - रखना&lt;br /&gt;चावै - चाहना&lt;br /&gt;आद-आद - आदि-आदि&lt;br /&gt;मोकळी - बहुत सी&lt;br /&gt;बातां - बातें&lt;br /&gt;दीठ - रूप में&lt;br /&gt;जितरो - जितना&lt;br /&gt;सांवठो - समृद्ध, मजबूत पक्ष&lt;br /&gt;भीनो - भींगा हुआ&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;किणी भी समाज रै जातीय-चरित्र री खरी-खरी ओळखाण उणरै लोक-साहित्य सूं हुय सकै। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;किसी भी समाज के जातीय चरित्र की सच्चाई की जानकारी उस समाज के लोक-साहित्य से हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उण समाज रा मोल अर मानतावां कांई है? उणरी नैतिक अवधारणावां कांई है?  &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उस समाज की क्या हैसियत और मान्यता क्या है? उनकी नैतिक अवधारणा कैसी है?&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वो समाज कुणसा जीवनदर्शां नैं अंगेज’र चालै है।  &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वह समाज किनके जीवन दर्शन का अनुशरण करता है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उणरै जीवण री रीत-भांत कांई है? &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उनके जीवन की रीत-भेष-भूषा कैसी है?&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बो कुण-सी जातीय स्मृतियां नैं अंवेर राखणो चावै है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वह कौन सी जातीय स्मृतियों को बचाकर रखना चाहता है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आद-आद मोकळी बातां री जाणकारी उण समाज रै लोक-साहित्य सूं हुय सकै है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आदि-आदि बहुत सी बातों की जानकारी उनके समाज के लोक-साहित्य से हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जो समाज जितरो परम्परा-समृद्ध, सांस्कृतिक दीठ सूं जितरो सजग अर जीवन-रस सूं जितरो लबालब है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जो समाज जितना परम्परा-समृद्ध सांसकृतिक विचारधाराओं से जितना सजग और जीवन-रस से जितना लबालब है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उणरो लोक साहित्य भी उतरो ही सांवठोए रस अर रंग भीनो हुया करै है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उनका लोक साहित्य भी उतना ही समृद्ध, रस और रंग से भरा हुआ, हुआ करता है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-4817822432580163580?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/4817822432580163580/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post_21.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/4817822432580163580'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/4817822432580163580'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post_21.html' title='चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां- १ - शंभु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-8042446047994311375</id><published>2011-10-14T21:19:00.000-07:00</published><updated>2011-10-14T21:20:37.814-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='केशव भट्टड़'/><title type='text'>कोलकाता में बने राजस्थान भवन –केशव भट्टड़</title><content type='html'>&lt;li&gt; बंगाली समाज के साथ राजस्थानी मध्यमवर्ग का सांस्कृतिक संवाद जरुरी&lt;br /&gt;&lt;li&gt; मारवाड़ी संस्थाएं अपनी कला-संस्कृति का करे बंगाल में प्रदर्शन&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;कोलकाता 23 अप्रेल कोलकाता राजस्थान संस्कृतिक विकास परिषद के तत्वावधान में शनिवार को राजस्थान सूचना केंद्र में “बंगाल के राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन में मध्यम वर्ग की भूमिका – विशेष सन्दर्भ: मारवाड़ी समाज” विषयक संगोष्ठी का आयोजन कथाकार-संपादक दुर्गा डागा की अध्यक्षता में किया गया अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में दुर्गा डागा ने कहा कि यह बहुत ही गंभीर विषय है मारवाड़ी मध्यमवर्ग प्रतिभा और उर्जा से भरा हुआ है उसके पास सपने हैं राजनीतिक और सांस्कृतिक जागरूकता के लिए सामाजिक संस्थाएं पहल करे कार्यक्रम के लिए समाज के लोगों को लेकर परामर्शमंडल बनाये और समाज में जागरूकता लाने का कार्य करे बंगाल के संस्कृतिकर्मियों से मेलजोल और संवाद हो सरकार के काम-काज पर सजगता से ध्यान रखें और संस्थाओं के माध्यम से अपनी आवाज़ उठायें मध्यम वर्ग के लड़के-लड़कियां राजनीति में रुचि लेकर आगे आये साहित्य पढ़ने से व्यक्तित्व का विकास होता है और जड़ों को समझने में आसानी सामजिक कार्यक्रमों में धर्म का विकल्प देने का प्रयास होना चाहिए मुख्य वक्ता पत्रकार विशम्भर नेवर ने कहा कि सारा मारवाड़ी समाज धार्मिक कार्यक्रमों में लगा है-राजनीति कौन करे? राजनीति में गठबंधन बंगाल से शुरू हुआ समाज में जो सांस्कृतिक रिसाव हो रहा है उसे रोकना जरुरी है वाम-सरकार का फायदा मारवाड़ियों ने उठाया अमुक राजनीतिक पार्टी अमुक को टिकट दे या तमुक को , इसका निर्णय वो राजनीतिक पार्टी ही करेगी मारवाड़ियों में सांगठनिक शक्ति होगी, तो पार्टियां उनके पीछे आएँगी पत्रकार राजीव हर्ष ने कहा कि मध्यमवर्ग समाज के आयाम निर्धारित करता है वैल्यू की स्थापना मध्यम वर्ग करता है महंगाई और अप-संस्कृति से यही वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होता है मध्यम वर्ग अपनी नैतिकता के दायरे में बंधा रहता है मध्यम वर्ग की रोज़गार परिस्थितियां उसे अन्य गतिविधयों में शामिल होने की अनुमति नहीं देती विज्ञान, कला संकाय आदि क्षेत्रों में हम कहाँ है? मारवाड़ी को डरपोक और पैसा कमाने वाले की संज्ञा दे दी गयी जागरण, भगवत कथा, धार्मिकता पर जितना ध्यान देते है उसमे से समय निकालकर अन्य चीजों पर भी ध्यान दे- राजस्थानी साहित्य-संस्कृति-कला की प्रदर्शनिया हो कथाकार विजय शर्मा ने कहा कि विश्लेषण न कर कार्य योजना बनाये बंगाली से बात करनी है तो उनके सिनेमा, साहित्य, संस्कृति में उसके समकक्ष खड़ा होना होगा हमारे कार्यों में पारदर्शिता होनी चाहिए मारवाड़ियों की तमाम खूबियां बयां करने वाली कहानियां खत्म हो रही है और हर्षद-हरिदास की कहानियां हावी हो रही है पत्रकार सीताराम अग्रवाल ने कहा कि मध्यम वर्ग समाज के उच्च और निम्न वर्ग के बीच सेतु का कार्य करता है मारवाड़ी मध्यम वर्ग अपनी ताक़त को पहचान ही नहीं पाया संगठन का ककहरा यहाँ के लोगो को मारवाड़ियों ने सिखाया, वे प्रदर्शन और दिखावे से बचे रहे सामाजिक संगठनो में कार्यकर्ताओं को सम्मान देना होगा, तभी एक शक्ति के रूप में यह वर्ग उभरेगा क़ानूनी सलाहकार ध्रुवकुमार जालन ने कहा कि हमने अपनी ताक़त नहीं पहचानी फिजूलखर्ची रोकनी होगी और उर्जा राजनीतिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में लगानी होगी डॉ.कडेल ने कहा कि मारवाड़ी लेखक-पत्रकारों ने मारवाड़ी समाज की समस्याओं पर लिखा ही नहीं नेतृत्व देने वाले खुद सामने आते है या समाज उन्हें ढूंढ निकलता है मारवाड़ी समाज का मध्यम वर्ग आत्मसम्मान विस्मृत कर चूका है तो इसकी क्या भूमिका रह जाति है सञ्चालन करते हुए केशव भट्टड़ ने कहा कि बंगाल में बंगाली मध्यमवर्ग जागरूक और संगठित है उनका नेतृत्व मध्यमवर्ग से आता है बुद्धदेव भट्टाचार्य हो, या ममता बनर्जी, ये सभी निम्न-मध्यवित्त वर्ग से आतें है, लेकिन मारवाड़ियों में इसका अभाव है पहले और वर्तमान में यह बड़ा अंतर आया है कोलकाता-राजस्थान की पृष्ठभूमि पर सत्यजित राय की फिल्म ‘सोनार किल्ला’ को उदाहरण रूप में रखते हुए उन्होंने कहा कि फ़िल्म में राय बताते हैं कि बंगाल के बंगाली और मारवाड़ी मध्यमवर्ग के बीच संवाद नहीं है, जो होना चाहिए कोलकाता में राजस्थान भवन की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि मीरा को सामने रखकर मारवाड़ी मध्यमवर्ग बंगाली मध्यमवर्ग के साथ सांस्कृतिक संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान करें राजस्थानियों ने बंग प्रदेश में अपनी नागरिक पहचान नहीं बनायीं वे राजनीति में सीधे हस्तक्षेप से बचते हैं पर्यटकों के रूप में बंगाली समुदाय राजस्थान को प्राथमिकता देता है, लेकिन राजस्थानियों से उसका परिचय सांस्कृतिक रूप से नहीं हुआ यह विडम्बना है अतिथियों और श्रोताओं का पुष्पों से स्वागत संयुक्त संयोजक गोपाल दास भैया ने और आभार संयुक्त संयोजक बुलाकी दास पुरोहित ने किया&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;केशव भट्टड़&lt;br /&gt;संयोजक, 9330919201&lt;br /&gt;कोलकाता-राजस्थान संस्कृतिक विकास परिषद&lt;br /&gt;10/1 सैयद सालेह लेन, कोलकाता-700073&lt;br /&gt;फैक्स: 033 22707978&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-8042446047994311375?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/8042446047994311375/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/8042446047994311375'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/8042446047994311375'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='कोलकाता में बने राजस्थान भवन –केशव भट्टड़'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-580841936705261645</id><published>2011-09-24T22:50:00.000-07:00</published><updated>2011-09-24T22:59:48.946-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Marwari Samaj'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मारवाड़ी समाज के स्वतंत्रता सेनानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मारवाड़ी'/><title type='text'>मारवाड़ी समाज के स्वतंत्रता सेनानी</title><content type='html'>&lt;center&gt;&lt;strong&gt;प्रस्तुति- शंभु चौधरी&lt;/strong&gt;&lt;/center&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बिहार-&lt;/strong&gt;&lt;br&gt; &lt;br /&gt;स्व.राधूमल मोटानी (बेतिया), स्व. हीरालाल सराफ (दिघवारा), सन्तलाल जैन, स्व. बनारसी लाल झूनझूनवाला, स्व.हरनारायण जैन, शुभकरण चूड़ीवाला, हनुमान प्र.शर्मा (भागलपुर), स्व.प्रभूदयाल हिम्मतसिंहका, बिनायक प्र.हिम्मतसिंहका (दुमका एवं कोलकाता),स्व. मोतीलाल केजड़ीवाल, स्व. गौरीशंकर डालमिया, स्व. नथमल सिघानियां, स्व. रामेश्वरलाल सराफ (देवघर), स्व. हरीराम गुटगुटिया, द्वारका प्र. गुटगुटिया (मधुपुर), स्व.बनारसी लाल सराफ, रामजीवन हिम्मतसिंहका, नारायण प्र.अग्रवाल-जज (जमालपुर), रावतमल अग्रवाल (किशनगंज), रामेश्वर प्र.झूनझूनवाला (पटना सिटी), स्व.नागरमल मोदी (रांची)&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आसाम प्रान्त-&lt;/strong&gt; &lt;br&gt;स्व.रूपकंवर ज्योतिप्रसाद अगरवाला, स्व. गणेश प्रसाद फोगला, स्व. छगनलाल जैन(गुवाहाटी), नन्दराम जैन(गोलाघाट), पद्मसुख अग्रवाल(सोरुपचार), भगवती प्रसाद लड़िया(गोलाघाट)&lt;p align="justify"&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बंगाल प्रान्तः&lt;/strong&gt;&lt;br&gt; स्व.बसंतलाल मुरारका, स्व.सीताराम सेकसरिया, भालचन्द शर्मा, राधकृष्ण नेवटिया, श्रीमती इन्दुमती गोयनका, ज्ञानदेवी लाठ, जमुनादेवी नेवटिया, मेघराज सेवक, कर्नल डा.रामजी लाल काशलीवाल(आजाद हिन्द फौज), सभी कोलकाता से।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उड़ीसा प्रान्त-&lt;/strong&gt; &lt;br&gt;ज्वाला प्रसाद सरावगी(बालासोर), स्व.लक्ष्मी नारायण सरावगी, भोलानाथ साह, सूरजमल साह(पुरी), प्रहलादराय लाठ, शिवचन्द्र अग्रवाल(संबलपुर)।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश प्रान्त - &lt;/strong&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;स्व.जमनालाल बजाज, स्व.जानकी देवी बजाज, स्व.कृष्ण दास जाजू, श्री रामकृष्ण बजाज, दामोदर दास मुंदड़ा, प्रहलाद पोद्दार, नर्मादा देवी भैया (वर्धा), धनवती बाई रांका, छगनलाल भारुका, मगनलाल बागड़ी, सतीदास मुँदड़ा, पन्नालाल देवड़िया(नागपुर), बरार केशरी स्व.बृजलाल बियाणी, राधादेवी गोयनका(आकोला), मानिकलाल सोढ़ानी, सुमनचंद तापड़िया, रघुनाथ मल कोचर, सुदर्शन वकील(अमरावती), स्व.गोविंददास मालपाणी(जबलपुर), ओंकार दत्त(बलडाना), मंगलचंद सिंघवी(नरसिंहपुर), दालचंद जैन(बालाघाट), शहिद उदय चन्द, मन्नूलाल मोदी(मण्डल), मोहनलाल बाकलीवाला(दुर्ग), पं.बंशीधर, सुमन चन्द लुँडावत(सागर), मूलचंद बागड़ी(रायपुर), दीपचंद गोठी(बेतूल), रामकुमार अग्रवाल(यावतमाल)&lt;p align="justify"&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मुम्बई शहर -&lt;/strong&gt;&lt;br&gt;कुन्दनलाल फिरौदिया(अहमदनगर), स्व.रामकृष्ण धूत(हैदराबाद), मदनलाल जालान, श्रीनिवास बगड़का, इन्दरमल मोदी, रतनलाल जोशी, जमुनादास अडूकिया, मदनलाल पित्ती, रामकृष्ण जाजू, मुरलीधर आसावा(माहेश्वरी), मुरलीधर शारदा, शहीद बालकृष्ण शारदा(सोलापुर), लक्ष्मीचन्द आवड़, बंकालाल लाहौटी(नासिक), रमणीक लाल मोदी, पं.बेचरदास न्यायतीर्थ(अहमदाबाद), परमेश्वरी दास न्यायतीर्थ(सूरत)&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उत्तर प्रदेश - &lt;/strong&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;स्व.गजानन्द टिबड़वाल, रामकृष्ण प्रसाद कोट, ऋषिकेश सराफ, बंशीधर गुप्ता(गाजीपुर), स्व. महावीर प्रसाद पोद्दार, स्व.आनन्द शंकर पोद्दार, विट्ठलदास मोदी(गोरखपुर),विष्णुदत्त शर्मा(मिर्जापुर),चितरंजन कुमार(इलाहाबाद), रामचन्द्र मुसद्दी ‘आर्य’ , श्रीदेवी मुसद्दी, हीरालाल शर्मा, जयनारायण गायनका, हनुमान प्रसाद शर्मा, वैद्यराज कन्हैयालाल, आयुर्वेदाचार्य सुन्दारलाल जैन(कानपुर),स्व.चान्दमल जैन, अंगूरी देवी, नेमीचन्द जैन, बसन्त लाल, रतन लाल बंसल, मानिक चन्द जैन(आगरा), निर्मल कुमार जैन, श्याम लाल सत्यार्थी, सरबती देवी, धनपाल सिंह, रामस्वरूप भारतीय, पन्नालाल जैन(सरल), मास्टर मोती लाल(फिरोजाबाद), रामस्वयप जैन, नुणाधरलाल(मैनपुरी), झूमन लाल, श्रीमती लक्ष्मी देवी जैन,शहीद प्रकाश जैन(सहारनपुर), नेमीचन्द जैन, एडवोकेट, शीलावती देवी(बिजनौर), जगदीश प्रसाद नारायण, पं.शीलचन्द शास्त्री(बहराईच), हीरालाल शाह(नैनीताल), सुमीत प्रसाद, मामचन्द, सुख्रबीर सिंह घी वाले(मुजफ्फरपुरनगर), हकीम टीकम चन्द, प्रेमकुमारी ‘विशारद’, गंगा देवी(मुरादाबाद), नरेन्द्र कुमार जैन(देहरादून), मास्टर हरदयाल जैन(अलीगढ़), वैद्यभूषण मथूरा प्रसाद जैन, केशर बाई जैन, मोतीलाल ठेडेया, धन्ना लाल गुड़ा(झांसी)।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दिल्ली-&lt;/strong&gt; स्व.पार्वती देवी डिडवानियां, स्व. केदारनाथ गोयनका, अयोध्या प्रसाद गोयनका, मदनलाल सोढ़ाणी(दिल्ली)।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पंजाब व अन्य प्रान्त - &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नेकीराम शम्बा, फोकचन्द्र शास्त्री(हिसार),मेलाराम वैश्य(भिवानी), पं.रामकृष्ण विशाल, हरदत्त सुगला, रामचन्द्र वैद्य, लाला श्याम लाल, श्रीमती चन्दन बाई(लाहौर), तनसुख राय जैन(रोहतक),कीर्ति प्रसाद, वकील(गुजराना वाला), लेखवती जैन(अम्बाला), रामपाल जैन, स्व. तुलाराम (गुड़गांव) ।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थान-&lt;/strong&gt; स्व. अर्जून लाल सेठी(जयपुर), पं. हरिभऊ उपाध्याय, जीतमल लूणियाँ एवं श्रीमती सरदार बाई लूणियाँ ( अजमेर)।&lt;p align="right"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;साभार - स्वतंत्रता संग्राम व मारवाड़ी समाज , लेखक स्व हरिराम गुटगुटिया&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-580841936705261645?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/580841936705261645/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/09/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/580841936705261645'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/580841936705261645'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='मारवाड़ी समाज के स्वतंत्रता सेनानी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-534149935577073095</id><published>2011-06-16T01:39:00.000-07:00</published><updated>2011-06-16T01:40:26.894-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Shambhu Choudhary'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='marwari'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Marwari Samaj'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Marwari Yuva Manch'/><title type='text'>मारवाड़ी युवा मंच एक अवलोकन - शम्भु चौधरी</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-UA9-NeBnja4/Tfm_rGoA0OI/AAAAAAAAAts/9O6oByNR3Vk/s1600/shambhu_choudhary.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 175px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-UA9-NeBnja4/Tfm_rGoA0OI/AAAAAAAAAts/9O6oByNR3Vk/s320/shambhu_choudhary.jpg" border="0" alt="Shambhu Choudhary"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5618732757355122914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;विगत 75 वर्षों से देश के विभिन्न प्रान्तों में सामाजिक रूप से संगठित मारवाड़ी समाज की अनेक संस्थाएँ अपने-अपने कार्यक्षेत्र में कार्य करते हुए समाज के युवकों को भी संगठित कर उनके मानसिक व शारीरिक विकास को केंद्रीत कर कई योजनाओं को साकार करते रहे हैं। जिनमें प्रमुखतः मुम्मबई मारवाड़ी सम्मेलन, मारवाड़ी युवा सम्मेलन-गुवाहाटी, मारवाड़ी युवक संघ- वाराणसी, रानीगंज एवम् मारवाड़ी व्यायामशाला- कोलकाता, मुजफ्फरपुर व भागलपुर इसके अलावा सैकड़ों जगह* मारवाड़ी समाज ने चिकित्सालय, पुस्तकालाऐं, विद्यालयों, धर्मशालाओं आदि का निर्माण भी किये गये। इन सबके वाबजूद समाज के कुछ चिन्तशील युवकों में एक कमी हमेशा खटकती रहती कि मारवाड़ी समाज के युवकों का एक राष्ट्रीय स्तर का एक संगठन होना चाहिये। इस दिशा में अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन लगातार प्रयासरत रही परन्तु अधिवेशनों में एक सत्र से आगे इनका प्रयास कभी भी सफल नहीं रहा। स्व. भंवारमल सिंघी व इनकी पत्नी स्व. श्रीमती सुशीला सिंघी के विचारों में इस बात की चिन्ता साफ झलकती दिखाई देती रहती कि देश में मारवाड़ी समाज का एक सुदृढ़ संगठन की नींव जल्द से जल्द रखी जानी चाहिये। इसी काल में श्री रतन शाह का नाम बड़ी तेजी के साथ उभर कर सामने आने लगा। देशभर में अयोजित मारवाड़ी सम्मेलन के अधिवेशनों में इनके भाषणों का विशेष प्रभाव समाज के युवकों में साफ प्रलक्षित होने लगा था। परन्तु सफल नेतृव का अभाव तब भी खटकता नजर आ रहा था।&lt;br /&gt;सन् 1977 में असम के गुवाहाटी शहर में समाज के कुछ युवकों ने मिलकर पूर्वोत्तर प्रदेशीय मारवाड़ी सम्मेलन - युवा मंच का गठन कर लिया गया। यहाँ हम एक बात को उल्लेख करना जरूरी समझता हूँ कि यदि हम मंच के स्थापना काल की बात करें तो स्थापनाकाल के युवकों का नाम मंच के किसी भी दस्तावेज में पढ़ने को नहीं मिला। 1985 में आयोजित मायुम के प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन में बतौर स्वागत मंत्री श्री अनिल जैना ने अधिवेशन के अवसर निकाले गये विशेषांक में जिनके नामों का उल्लेख किया वे इस प्रकार हैं ^^अधिवेशन के प्रचारार्थ श्री नन्द किशोर जालान[स्व.], अध्यक्ष-अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन द्वारा दिया गया समयदान एवं किया गया श्रमदान युवामंच के अधिकारियों के लिये अनुकरणीय आदर्श रहेगा। श्री डॉ गिरधारी लाल सराफ[स्व.], महामंत्री-पूर्वोत्तर प्रदेशीय मारवाड़ी सम्मेलन एवं श्री जयदेव खंडेलवाल [स्व.], अध्यक्ष-पूर्वोत्तर प्रदेशीय मारवाड़ी सम्मेलन का अधिवेशन के प्रचारार्थ अवदान न केवल सराहनीय रहा, बल्कि युवा साथियों के लिये प्रेरणा का स्त्रोत भी बना। इस संदर्भ में युवा साथी श्री हरि प्रसाद शर्मा, श्री विनोद मोर, श्री पवन सीकारीया, श्री मुरलीधर तोशनीवाल, श्री सरोज जैन, श्री कमल अगरवाल, श्री निरंजन धीरसरीया, श्री संजीव गोयल, श्री प्रमोद जैन, श्री प्रकाश पंसारी आदि का सहयोग न केवल उल्लेखनीय है बल्कि अधिवेशन की कल्पित सफलता का मूल कारण भी।** &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मारवाड़ी युवा मंच का सांगठनिक ढांचा त्रीस्तरीय प्रणाली है। जिसका संचालन अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच के संविधान में वर्णीत नियमों व मंच दर्शन के अन्र्तगत कार्य करता है। जिसमें 18 साल से 45 वर्ष के युवक व युवतियों को ही सदस्य बनाया जा सकता है। मंच के सक्रिय सदस्य 45 वर्ष की आयु तक रहा जा सकता है जबकि इसमें प्रवेश की आयु सीमा 40 तक ही है। सन् 1984 में पूर्वोत्तर प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन-युवा मंच के प्रान्तीय अध्यक्ष श्री सुरेश बेड़िया के सदप्रयासों के परिणाम स्वरूप 17 जनवरी, 1985 को अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन गुवाहाटी के प्रसिद्ध गौशाला के प्रगंण में हुआ जिसमें मंच संगठन के प्राण सूत्रधार समाज के असम के वरिष्ठ अधिवक्ता व चिन्तक श्री प्रमोद्ध सराफ ने संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष का पदभार ग्रहण किया। प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान असम के बहार जिन जगहों के दौरे किये गए वे निम्न प्रकार है।-&lt;br /&gt;1. 23 नवम्बर से 7 दिसम्बर, 84 तक उत्तर बंगाल व उत्तर-पूर्व बिहार जिनमें सर्वश्री नन्दकिशोर जालान [स्व.], प्रमोद्ध सराफ, हरिप्रसाद शर्मा, पवनकुमार सिकारिया व बिनोद कुमार मोर जिसमें श्री जालान जी कोलकाता से बाकी सभी असम से थे।&lt;br /&gt;2. 16 से 23 दिसम्बर, 84 उत्कल व दक्षिण बिहार जिनमें सर्वश्री गिरधारीलाल सराफ [स्व.], हरिप्रसाद शर्मा, मुरलीधर तोषनीवाल एवं सरोजकुमार शर्मा सभी असम से।&lt;br /&gt;3. 29 दिसम्बर 84 से 8 जनवरी 85 दक्षिण भारत, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटका, आन्ध्र प्रदेश व तामिलनाडु इस यात्रा में सर्वश्री नन्दकिशोर जालान[स्व.]- कोलकाता, निरंजन लाल धिरासारिया-असम, संजिव गोयल-असम, रामनिवास शर्मा [स्व.] व भगतराम गुप्ता- आन्ध्रा।&lt;br /&gt;क्रमवार विगत राष्ट्रीय अधिवेशन की तालिका निम्न प्रकार हैः-&lt;br /&gt;1. 18-20 जनवरी, 1985-88 गुवाहाटी -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री प्रमोद्ध सराफ, &lt;br /&gt;राष्ट्रीय महामंत्री श्री पवन सिकारिया&lt;br /&gt;2. 08-10 अप्रैल, 1988-91 दिल्ली -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री अरुण बजाज, &lt;br /&gt;राष्ट्रीय महामंत्री श्री निर्मल दोषी  &lt;br /&gt;3. 23-25 फरवरी, 1991-94 सिल्लीगुड़ी -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री ओम प्रकाश अग्रवाल, &lt;br /&gt;राष्ट्रीय महामंत्री श्री संतोष कानोडिया&lt;br /&gt;4. 21-23 जनवरी, 1994-96 कोलकाता -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री पवन सिकरीया, &lt;br /&gt;राष्ट्रीय महामंत्री श्री राजकुमार गारोदिया[स्व.]&lt;br /&gt;5. 27-29 दिसम्बर, 1996-2000 धनबाद -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री प्रमोद शाह, &lt;br /&gt;राष्ट्रीय महामंत्री श्री महेश शाह&lt;br /&gt;6. 07-09, जनवरी, 2000-2002** जमशेदपुर -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री अनिल जैना, &lt;br /&gt;राष्ट्रीय महामंत्री श्री प्रमोद जैन&lt;br /&gt;7. 29-31 दिसम्बर, 2002-2006 कटक -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री बलराम सुल्तानिया, &lt;br /&gt;राष्ट्रीय महामंत्री श्री पुरुषोत्तम शर्मा&lt;br /&gt;8. 31दिसम्बर से 2जनवरी 2006-2008 रायपुर -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री अनिल जाजोदिया, &lt;br /&gt;राष्ट्रीय महामंत्री श्री मनमोहन लोहिया&lt;br /&gt;9. 25-28 दिसम्बर, 2008-2011 रांची -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री जितेन्द्र गुप्ता, &lt;br /&gt;राष्ट्रीय महामंत्री श्री संजय अग्रवाल(डॉक्टर एक्यूप्रेशर चिकित्सा)&lt;br /&gt;आज मंच 600 से अधिक सक्रिय शाखाओं व 30 हजार से अधिक सदस्यों के माध्यम से देशभर में अपनी लोकप्रियता प्राप्त कर गत वर्ष ही अपना 25वां सालगिरह मना चुकी है। मंच के प्रमुख उद्देश्य में सबसे प्रथम में हमारी यह योजना रही कि समाज के युवकों को एक सूत्र में पीरो हम किस जनउपयोगी कार्यों में लगाना रहा है। एक समय इस प्रकार का दौर भी सामने आया कि समाज के युवक खुद को मारवाड़ी कहलाने में संकोच करने लगे थे। हम अपने आत्म सम्मान के प्रति काफी चिंतित रहने लगे। जगह-जगह मारवड़ी समाज अभद्र टिप्पणियों का शिकार होने लगा था। गुजराती शब्दकोश, फिल्मी धारावाहिक सीरियल, राजनेताओं के अपमान जनक बयान समाज के युवकों को झकझोर दिया। &lt;br /&gt;उस समय असम में छात्र आन्दोलन काफी जोरों पर था, असमगण परिषद के आन्दोलन से समाज के हजारों युवक जुड़ चुके थे। परन्तु समाज के युवकों को बार-बार एक बात खटकती रही कि समाज के युवक दिशाहीन होने से किस तरह रोका जा सके। जो युवक पढ़ लिख नौकरी करने लगते वे या तो खुद को समाज से अलग समझने लगते या समाज में पैसे की प्रतिष्ठा के आगे उनकी पहचान लुप्त नजर आती। कुछ तो समाज को असभ्य समाज तक कहने में संकोच नहीं करते। स्व. भंवरमल सिंघी जी ने अपनी डायरी में एक बार लिखा कि जब वे वाराणसी विश्वविद्यालय में पढ़ते थे तो बिहार या असम की तरफ से आने वाली ट्रेनों में मारवाड़ियों को देख उन्हें बड़ा सदमा होता कि यह समाज कितना अनपढ़ और रूढ़ीवादी परम्परा से ग्रस्त है। उनके दिमाग में मारवाड़ी समाज की छवि बहुत बिगड़ चुकी थी, सो उन्होंने खुद को राजस्थानी समझना ही बेहतर विकल्प समझा। पर पढ़ाई समाप्त कर उनको कार्य करने के लिए कोलकाता आना हुआ, कोलकाता आने पर उनको लगा कि समाज में सिर्फ पैसेवाले की पूछ होती है। इसी कार्यकाल में स्व. सीताराम सेक्सरिया, स्व.भागीरथ कानोडिया एवं सम्मेलन के श्री ईश्वरदास जालान से उनकी मुलाकात ने उनके विचारों को झकझौर दिया। समाज में बदलाव का दौर शुरू होने लगा। देश के हर कोने से आवाज आने लगी। एक अखबार में छपे लेख से वे इतने विचलित हुए कि उन्होंने जबाब में एक लेख लिखा- &lt;strong&gt;‘‘मैं मारवाड़ी हूँ’’&lt;/strong&gt; इस लेख की सारे देश से प्रतिक्रिया आने लगी। हिन्दी साहित्यवर्ग सिंघी जी इस स्वरूप को देख चकित हो गये। प्रायः सम्मेलनों में उनका मुख्य विषय समाज सुधार जिसमें विधवा विवाह, प्रर्दा प्रथा एवं समाज की राजनीति में सक्रिय भागीदारी के साथ-साथ युवकों को सामने आकर समाज की बागडोर संभालने हेतु मारवाड़ी युवकों को ललकारना शुरू किया। समाज के पढ़े लिखे युवक व संपन्न घराना खुद को लायन्स-लियो मानने लगे। जबकि मारवाड़ी कहलाने में संकोच करते थे। एक तरफ समाज में सांस्कृतिक हमला हो रहा था तो दूसरी तरफ समाज का धन समाज के द्वारा जनसेवा में खर्च होने के वावजूद मारवाड़ियों को गाली सुननी पड़ती। इसी दौरान असम के युवा साथियों ने कसम ले ली कि किसी भी तरह समाज के युवकों को एक सूत्र में पिरोया जाय।&lt;br /&gt;मंच ने समाज और राष्ट्र की प्रमुख समस्याओं को ध्यान में रखते हुए मंच दर्शन का निर्माण श्री प्रमोद्ध सराफ के दिशा निर्देशन में किया गया। मंच दर्शन के निर्माण में जिन बिन्दूओं को समाहित किया गया उनमें प्रमुख हैं- युवकों का व्यक्तित्व निर्माण, दिशाहीन युवा शक्ति को सुसंगठित कर उनका मार्ग दर्शन करना, समाज व राष्ट्र के प्रति उनके उत्तरदायित्व का बोध व समग्रोन्नति हेतु उन्हें उत्साहित व प्ररित करना। इसके अलावा देश और समाज की उन्नति के लिये किसी भी रचनात्मक सहयोग, समाज द्वारा किये अथवा किये जाने वाले कार्यों की समीक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा का सुदृढ़ीकरण, समाज में स्वाभिमान एवं आत्मबल का निर्माण व संचार कर  शैक्षणिक, शारीरिक, चारित्रिक, राजनैतिक के प्रति समाज के युवकों को निरन्तर जागरूक बनाये रखते हुए अपने परिवार व व्यवसाय के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी के साथ निर्वाहन करते हुए समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे दहेज, विवाह शादियों में फिजूलखर्ची व आडम्बर, शादी समारोह के अवसर पर बधू पक्ष पर अनैतिक दबाव, धार्मिक आडम्बर आदि का पुरजोर विरोध करना मंच का  प्रमुख मानते हुए जनसेवा को प्राथमिकता देने का लक्ष्य रखते हुए &lt;strong&gt;‘मंच दर्शन’&lt;/strong&gt; को निम्न पांच सूत्रों में पिरोया गया है। जो निम्न प्रकार है।-&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;(1) मंच आधार :  जनसेवा कार्य&lt;br /&gt;(2) मंच भाव  :  समाज सुधार&lt;br /&gt;(3) मंच शक्ति :  व्यक्ति विकास&lt;br /&gt;(4) मंच चाह  :  सामाजिक सम्मान और आत्म-सुरक्षा&lt;br /&gt;(5) मंच लक्ष्य :  राष्ट्रीय विकास एवं एकता&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आज मारवाड़ी युवा मंच अखिल भारतीय स्तर की एक क्रियाशील संस्था के रूप में पूरे भारत में अपनी पहचान बना चुकी है। जहाँ एक तरफ समाज में मंच के प्रति आस्था जगी है तो दूसरी तरफ समाज के युवकों में पिछले दो दशक में काफी परिर्वतन देखने को मिला है। आज समाज के युवक खुद को मारवाड़ी कहलाने में गार्व की अनुभूति करते हैं। लोगों ने मंच के सदस्यों में विश्वास व्यक्त किया है। इस विश्वास को कायम रखना मंच के प्रत्येक सदस्यों की जिम्मेदारी बनती है। इसके लिए जहाँ एक तरफ पुराने कार्यकर्ताओं का सम्मान वहीं नये युवकों की प्रतिभा का विकास हमें निरन्तर करते रहना होगा। आज हम नासिक शहर में दशम राष्ट्रीय अधिवेशन करने की योजना को मुर्त रूप देने जा रहें हैं अधिवेशन स्थल के उद्घाटन व समापन समारोह को छोड़ कर अधिक समय विभिन्न प्रान्तों से आये प्रतिनिधियों के विकास व संगठन को सुदृढ़ करने की योजनाओं पर हमें केन्द्रित रहना चाहिये। जय समाज! [end] Search: Marwari Yuva Manch, Shambhu Choudhary, Marwari, Marwari Samaj.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;small&gt;* http://samajvikas.blogspot.com/2010/12/blog-post.html&lt;br /&gt;**07-09, जनवरी 2000-2002 जमशेदपुर - राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री अनिल जैना, &lt;br /&gt;राष्ट्रीय महामंत्री श्री डॉ. प्रदीप जैन, गोहाटी (प्रथम डेढ़ वर्षों के लिए) श्री प्रमोद जैन, गोहाटी (बाद के डेढ़ वर्षों के लिए)&lt;/small&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-534149935577073095?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/534149935577073095/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/06/blog-post_16.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/534149935577073095'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/534149935577073095'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/06/blog-post_16.html' title='मारवाड़ी युवा मंच एक अवलोकन - शम्भु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-UA9-NeBnja4/Tfm_rGoA0OI/AAAAAAAAAts/9O6oByNR3Vk/s72-c/shambhu_choudhary.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-4659584890289584025</id><published>2011-06-08T16:02:00.001-07:00</published><updated>2011-06-08T16:02:49.485-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='युवा मंथन 2011'/><title type='text'>विश्व मारवाड़ी सम्मलेन</title><content type='html'>"अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच&lt;br /&gt;"युवा मंथन 2011"&lt;br /&gt;"दशम राष्ट्रीय अधिवेशन"&lt;br /&gt;"प्रथम विश्व मारवाड़ी सम्मलेन"&lt;br /&gt;अंतर्राष्ट्रीय व्यापार - उद्योग परिषद् &lt;br /&gt;आयोजक : महाराष्ट्र प्रादेशिक मारवाडी युवा मंच &lt;br /&gt;संयोजन : मारवाडी युवा मंच - शाखा नासिक सिटी &lt;br /&gt;दिनांक : 11 - 13 नवंबर 2011 &lt;br /&gt;स्थान : छत्रपति शिवाजी महाराज नगरी, डोंगरे वसतिगृह, गंगापुर रोड, नासिक"&lt;br /&gt;FOR REGISTRATION PL LOG ON TO &lt;br /&gt;http://mymnashik.org/registration.php&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-4659584890289584025?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/4659584890289584025/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/06/blog-post_08.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/4659584890289584025'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/4659584890289584025'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/06/blog-post_08.html' title='विश्व मारवाड़ी सम्मलेन'/><author><name>नया समाज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06688353327748761500</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='30' src='http://2.bp.blogspot.com/_QCW7cMC71qY/SSeyU2UpwOI/AAAAAAAAAPM/TIuq1TCrO90/S220/dipawali.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-780225268356806760</id><published>2011-06-08T05:07:00.000-07:00</published><updated>2011-06-09T06:00:23.244-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शम्भु चौधरी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Nand Kishore Jalan'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नन्दकिशोर जालान'/><title type='text'>नन्दकिशोर जालान नहीं रहे</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-_gMddNLqCp0/Te9mVKAAEaI/AAAAAAAAAVU/mQeOjC9whZc/s1600/nkjalan.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 388px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-_gMddNLqCp0/Te9mVKAAEaI/AAAAAAAAAVU/mQeOjC9whZc/s400/nkjalan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5615819774001942946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;कोलकाता महानगर में 1 सितम्बर 1924 में जन्में वरिष्ठ समाजसेवी श्री नन्दकिशोर जालान जी का आज 8 जून 2011 को दोपहर तीन बजे शहर के एक अस्पताल में हृदयाघात के कारण निधन हो गया। कल रात अचानक उनके सीने में दर्द होने के चलते उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आज शाम को 7.30 बजे नीमतल्ला घाट में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए जिनमें प्रमुख रूप से श्री रतन शाह, श्री विशम्भर नैवर, श्री सीताराम शर्मा, श्री शम्भु चौधरी, श्री प्रमोद शाह, श्री आत्माराम सोंथलिया, श्री संजय हरलालका, श्री रामअवतार पोद्दार, श्री रवि लड़िया, एवं श्री ओमप्रकाश पोद्दार आदि प्रमुख थे।  इस घटना का समाचार फैलते ही शहर में शोक की लहर दौड़ गई। अखिल भरतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष श्री सीताराम शर्मा एवमं अखिल भारतीय मारवाड़ी युवामंच के संस्थापक अध्यक्ष श्री प्रमोद्ध सराफ इनके निधन को समाज की अपूरणीय क्षति बताया। श्री रतन शाह ने इस घटना पर अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि श्री जालान जी दो पीढ़ी के एक कड़ी के सामाजिक व्यक्तित्व थे। इनके निधन से समाज सुधार के क्षेत्र मे कार्य करने वाले कार्यकर्ता की पुरानी कड़ी समाप्त हो गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन् 1924 जन्में श्री नन्द किशोर जालान  26 वर्ष की आयु में आप अखिल भरतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन  के महामंत्री बने। उस कालखण्ड में बरार केसरी एवं मध्य प्रदेश के वित्तमंत्री श्री बृजलालजी बियानी सम्मेलन के अध्यक्ष थे। आपने समाज सुधार के कई कार्यक्रम आयोजित कराए जिनमें पर्दा प्रथा का बहिष्कार विधवा विवाह को स्वीकृति और दहेज विरोध आदि प्रमुख थे। आपने स्त्री शिक्षा पर जोर दिया और आग्रह किया कि समाज के लोगों को व्यापार के अतिरिक्त राजनीति में भी प्रवेश करना चाहिए। आपने समाज के लोगों पर होने वाले अत्याचारों का मुश्तैदी से सामना किया। 1974 में जब श्री भंवरमल सिंघी सम्मेलन के अध्यक्ष बने तो श्री नन्दकिशोरजी जालान को पुनः प्रधानमंत्री निर्वाचित किया गया। आप 1979 में सम्मेलन के उपसभापति निर्वाचित हुए और सन् 1982 में जमशेदपुर अधिवेशन में सभी प्रांतों के सदस्यों ने आपको सम्मेलन का अध्यक्ष निर्वाचित किया। आपके नेतृत्व में विवाह योग्य युवक युवतियों का परिचय सम्मेलन व सामूहिक विवाह आदि कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। आपकी चेष्टा से सम्मेलन की पत्रिका समाज विकास का पुनः प्रकाशन 1958 से आरम्भ हुआ। समाज विकास के सम्पादन में आपका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।&lt;br /&gt;&lt;table border=5 bordercolor="black"&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;font size=3 color="red"&gt;समाज गौरव श्री नन्दकिशोर जालान&lt;/font&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_c_npsSaVZTY/SX1Sd3AQi3I/AAAAAAAAAEo/SCRj1sAVtE0/s1600-h/nkjalan.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 500px; height: 335px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_c_npsSaVZTY/SX1Sd3AQi3I/AAAAAAAAAEo/SCRj1sAVtE0/s400/nkjalan.jpg" border="0" alt="Nand Kishore Jalan"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5295479409792289650" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच के नवम राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन समाज गौरव सम्मान का राष्ट्रीय अलंकरण व सम्मान अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष एवं युवा मंच के मार्गदर्शक नन्दकिशोर जालान को दिया गया । अधिवेशन में श्री जालान जी ने अपनी अस्वस्थ्यता के चलते जाने में असमर्थता व्यक्त की थी, इसलिये गत 22 जनवरी 2009 शाम 5.30 बजे अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच के निवर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अनिल के.जाजोदिया, अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नन्दलाल रूँगटा व निवर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सीताराम शर्मा, सम्मेलन के राष्ट्रीय महामंत्री श्री रामावतर पोद्दार, समाज विकास के कार्यकारी संपादक श्री शम्भु चौधरी, श्री कैलाशपति तोदी, श्री दीलीप गोयनका, श्री मुकेश खेतान, व श्रीमती अनुराधा खेतान ने कोलकाता स्थित उनके निवास पर जाकर उक्त सम्मान उन्हें भैंट किया गया था। &lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;1930 में स्थापित कलकत्ता चेम्बर ऑफ कामर्स के आप 1970 में अध्यक्ष निर्वाचित हुए एवं इन्हीं के सभापतित्व में 1980 में चेम्बर की 150वीं स्थापना तिथि मनाई गई थी। श्री विशुद्धानन्द सरस्वती मारवाड़ी अस्पताल के आप 1973 में मंत्री निर्वाचित हुए एवं पुनः 1987 में इन्हें यह भार दिया गया। सुप्रसिद्ध पोद्दार छात्र निवास जिसे 1935 में मारवाड़ी छात्र निवास के नाम से आरम्भ किया गया था से आपका गहरा संबंध रहा। 1978 में मंत्री 1992 से आप अध्यक्ष रहे। श्री नवलगढ़ विद्यालय के विकास एवं विस्तार में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।&lt;br /&gt;सम्मेलन के प्रति पूर्णतया समर्पित एक निष्काम कर्मयोगी भावी पीढ़ी के प्रेरणा स्रोत सतत् संघर्षशील समाज के अग्रदूत के निधन से समाज को अपूरणीय क्षति हुई है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-780225268356806760?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/780225268356806760/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/06/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/780225268356806760'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/780225268356806760'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='नन्दकिशोर जालान नहीं रहे'/><author><name>नया समाज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06688353327748761500</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='30' src='http://2.bp.blogspot.com/_QCW7cMC71qY/SSeyU2UpwOI/AAAAAAAAAPM/TIuq1TCrO90/S220/dipawali.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-_gMddNLqCp0/Te9mVKAAEaI/AAAAAAAAAVU/mQeOjC9whZc/s72-c/nkjalan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-8397680004809198838</id><published>2011-05-29T22:02:00.000-07:00</published><updated>2011-05-30T03:25:49.765-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शम्भु चौधरी'/><title type='text'>राजस्थानी शब्द का प्रयोग - शम्भु चौधरी</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_c_npsSaVZTY/SXMsRb6higI/AAAAAAAAADo/s7JR9Hv95cw/s1600-h/rajsthan_oldmap1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 316px; height: 400px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_c_npsSaVZTY/SXMsRb6higI/AAAAAAAAADo/s7JR9Hv95cw/s400/rajsthan_oldmap1.jpg" border="0" alt="Rajputana Prant Before Independence of India"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5292622665153088002" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;धीरे-धीरे मारवाड़ी शब्द संकुचित और रूढ़ीगत दायरे की चपेट से बाहर आने लगा है। अब यह शब्द देश के विकास का सूचक बनता जा रहा है। एक समय था जब इतर समाज के साथ-साथ समाज के लोग भी इसे घृणा का पर्यावाची सा मानने लगे थे। समाज के जो युवक पढ़-लिख लेते थे वे अपने आपको न सिर्फ समाज से अलग मानते थे, वरण कई ऐसे भी थे जो अपने नाम के आगे जाति सूचक टाइटल को भी हटा दिया करते थे ताकी उनको सरकारी नौकरी करने में सहुलियत हो। इसके प्रायः दो करण थे- पहला  समाज में सरकारी नौकरी करना अच्छा नहीं माना जाता था। दूसरा नौकरी करने वाले बच्चे की शादी समाज के भीतर करना एक टेढ़ी खीर के बराबर थी। आज भी समाज में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जिसमें हम रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर श्री विमल जालान का नाम उदाहरण के तौर पर रखा जा सकता है। जबकी इनके पिता स्व. ईश्वरदास जालान जाति सूचक शब्द &lt;strong&gt;‘मारवाड़ी’&lt;/strong&gt; में पूरी आस्था रखते थे एवं जाति सूचक ‘मारवाड़ी’ शब्द से शुरू की गई संस्था &lt;strong&gt;‘‘मारवाड़ी सम्मेलन’’&lt;/strong&gt; के जन्मदाता के रूप में आपका नाम लिखा जाता है। कई बार हरियाणा के मारवाड़ी राजस्थानी शब्द को लेकर विचलित हो जाते हैं। कई सभाओं में इस बात का विवाद अनजाने में ही शुरु हो जाता है कि सभा में या संविधान में सिर्फ राजस्थानी भाषा और संस्कृति पर ही चर्चा क्यों होती है इस तरह क अनसुलझे प्रश्न सामने आते रहते है। जिसका समाधान भी खोजा जाता है, चुकिं उपयुक्त उत्तर के अभाव में विवाद को टालने के लिए सिर्फ ‘मारवाड़ी’ शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है।&lt;br /&gt; &lt;strong&gt;जहाँ तक मेरा मानना है कि  ‘मारवाड़ी’ - शब्द न कोई जाति, न धर्म और न ही किसी विषेश प्रान्त का ही द्योतक है जैसे- पंजाबी, बंगाली, गुजराती आदि कहने से अहसास होता है। राजस्थान व राजस्थानी सीमावर्ती इलाके जिसमें हरियाणा व पंजाब के कुछ हिस्से जो कालांतर भौगोलिक रेखाओं में परिवर्तन के चलते इन प्रान्तों में राजपुताना रियासतों का विलय कर दिया गया को, के प्रवासी लोगों को भारत के अन्य प्रान्तों या विदेशों में भी  ‘मारवाड़ी’ शब्द से जाना व पहचाना जाता है। जबकि इन सबकी संस्कृति और भाषा राजस्थानी ही है। ( मुसलमानों को छोड़कर )। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यहाँ पंजाब और हरियाणा क्षेत्र के राजस्थानी जो एक समय राजपुताना के क्षेत्र में ही आते थे, अब भूगौलिक परिवर्तन व पंजाब और हरियाणा प्रान्तों के रूप में जाने व पहचाने जाने के चलते इस क्षेत्र का मारवाड़ी समाज अपने आपको पंजाबी या हरियाणवी ही मानने लगे हैं, जबकि इनकी बोलचाल-भाषा, पहनावे, रीति-रिवाज, राजस्थानी भाषा संस्कृति से मिलते ही नहीं राजस्थानी संस्कृति ही है। इसीलिए प्रवासी मारवाड़ी समाज के लिये आमतौर पर राजस्थानी शब्द का ही प्रयोग किया जाता है भले ही वे हरियाणा या पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र से ही क्यों न आतें हो। पिछले दिनों यह प्रश्न उठा कि मारवाड़ी से तात्पर्य जब राजस्थानी भाषा और संस्कृति से ही लगाया जाता है तो हरियाणा की क्या कोई अपनी संस्कृति नहीं है?  यह प्रश्न आज की युवा पीढ़ी का उठाना वाजिब सा लगता है जब हरियाणा एक समय पंजाब के अन्तर्गत आता था तो यह बात पंजाब के साथ भी उठती थी की हरियाणा की अपनी अलग संस्कृति है इसे पंजाब से अलग कर दिया जाय और हुआ भी और केन्द्र ने यह स्वीकार किया कि हरियाणा को एक अलग राज्य का दर्जा देना ही उचित रहेगा। परन्तु इस राज्य के अलग दर्जे को प्राप्त कर लेने से जो क्षेत्र राजस्थानी रियासतों के अधिन आते थे उनकी भाषा, संस्कृति, पहनावे, खान-पान, रीति-रिवाज हो या पर्व-त्यौहार सभी में समानता पाई जाती है जो थोड़ा बहुत अन्तर पाया जाता है वह सिर्फ आंचलिक बोली का ही है। ( देखें दिये गये एक चित्र के तीर निशान को जिसमें हिसार, भिवानी, रोहतक, गुड़गावं, लेहारू, महेन्द्रगढ़, पटियाला और दिल्ली का भी छोटा सा भाग राजपुताने क्षेत्र में दिखाया हुआ है। जो इन दिनों हरियाणा राज्य में आते हैं। ) इसलिए राजस्थानी शब्द की व्यापकाता पर हमें सोचने की जरुरत है न कि प्रान्तीयता के नजरिये से होकर हमें अपने अन्दर संकुचित विचार पैदा करने की।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-8397680004809198838?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/8397680004809198838/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/05/blog-post_29.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/8397680004809198838'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/8397680004809198838'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/05/blog-post_29.html' title='राजस्थानी शब्द का प्रयोग - शम्भु चौधरी'/><author><name>नया समाज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06688353327748761500</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='30' src='http://2.bp.blogspot.com/_QCW7cMC71qY/SSeyU2UpwOI/AAAAAAAAAPM/TIuq1TCrO90/S220/dipawali.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_c_npsSaVZTY/SXMsRb6higI/AAAAAAAAADo/s7JR9Hv95cw/s72-c/rajsthan_oldmap1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-7669813893269557815</id><published>2011-05-26T08:17:00.000-07:00</published><updated>2011-05-26T08:19:55.400-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शम्भु चौधरी'/><title type='text'>लोकतंत्र की भाषा - शम्भु चौधरी</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-9Up1XTQBfNM/Td5vShSp07I/AAAAAAAAAsI/VaKCpwp3hxQ/s1600/shambhu_choudhary.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 144px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-9Up1XTQBfNM/Td5vShSp07I/AAAAAAAAAsI/VaKCpwp3hxQ/s200/shambhu_choudhary.jpg" border="0" alt="Shambhu Choudhary"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5611044549715153842" /&gt;&lt;/a&gt;मारवाड़ी समाज का एक बड़ा घड़ा राजनैतिक विचारधारा को सिर्फ व्यापारी नजरिये से देखने का प्रयास करता रहा है जिसका परिणाम यह हुआ कि एक समय समाज का नेतृत्व करने वाले तपस्वी राजनीति व्यक्तित्व यतः डाॅ.राममनोहर लोहिया, स्व. बृजलाल बियाणी, जमनालाल बजाज, सेठ गोविन्ददास मालपाणी, विजयसिंह नाहर, स्व. श्रीमती इन्दुमती गोयनका, स्व.ईश्वरदास जालान, सीताराम सेक्सरिया, प्रभूदयाल हिम्मतसिंहका की राजनीति जमीन को दरकिनार कर पीछे दरवाजे की राजनीति को समाज ने अपना लिया। ऐसे लोग राज्यसभा के सदस्य बनाये जाने लगे, जिसका समाज से काई सरोकार नहीं रहा। किसी ने खुद के धनबल पर तो किसी ने उद्योग घराने के सहयोग से समाज की छवि को राज्यसभा में नीलाम करते रहे। समाज इस तमाशे को तमाशबीन बन देखता रहा। जिसका परिणाम यह हुआ कि समाज के आम राजनैतिक कार्यकर्ताओं का मनोबल धीरे-धीरे कमजोर होता गया। इसमें से कुछ अपनी स्थिती को बनाये रखने के लिए राजनैतिक दलों के खजांची बन गये, अर्थात समाज से धन उगाहने का कार्य करने लगे। मारवाड़ी समाज को इस सब से काई सरोकार नहीं रहा, चुनाव के समय कुछ नेताओं से दोस्ती बनाना एवं जब वे मंत्री बन जाय तो कुछ लागों को इसका लाभ कैसे मिले इस कार्य के संपादन में खुद की प्रतिष्ठा समझना तो दूसरी तरफ समाज अपने मतदान को महत्वहीन समझने लगा। मतदान के दिन को अवकाश का दिन मानकर ताश या अन्य किसी मनोरंजन को माध्यम अपना कर समय गुजार देते। कुछ तो राजनीति के पण्डित बन जाते, तो कुछ अपनी पंहुच का बखान करने से नहीं चुकते।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;एक समय बंगाल के विधानसभा में मारवाड़ी समाज के प्रतिनिधि का होना आवश्यक माना जाता था, आज 2011 के विधानसभा में समाज की उपस्थिती शून्य हो चुकी है। इस राजनीतिक शून्यता व हमारी राजनीतिक प्रतिवद्धता को राजनैतिक दलों ने न सिर्फ इसका मूल्यांकन नेगेटिभ रखा बल्की साथ ही साथ बन्द कमरे में समाज को दया का पात्र भी समझा। जहाँ एक तरफ इतर समाज के किसी भी संकट पर ये दल जो सजगता दिखाते हैं वहीं समाज के साथ होने वाली घटनाओं का राजनैतिक लाभ लेने में भी नहीं चुकते। कुल मिलाकर मारवाड़ी समाज दया का पात्र बन चुका है। हमारा आत्मसम्मान चन्द राजनैतिज्ञों के लिए दया का पात्र बन चुका है। समाज में सामाजिक व राजनैतिक कार्यकर्ताओं का इस दिशा में लगातार यह&lt;br /&gt;प्रयास रहते हुए भी, कि किस तरह से समाज की इस उदासीनता को बदला जा सके, साकारत्मक पहल के कोई संकेत दूर-दूर तक हमें नहीं दिखाई दे रहा, जिसका परिणाम यह हुआ कि राजनीति में समाज का प्रतिनिधित्व सिमटा जा रहा है।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जब हम अपने खुद के राजनैतिक मूल्यांकन पर सोचते हैं तो हमें बड़ी निराशा हाथ लगती है, भला कोई भी राजनैतिक दल आपकी सुरक्षा क्यों और किसलिए करेगा? समाज के किसी कार्यकर्ता को जब उसके खुद के प्रयास से किसी राजनैतिक दल की टिकट मिलती है तो हम उसके चुनाव प्रचार में सहयोगी होने की बात तो दूर, हम अपना वोट तक देने नहीं जाते। जिससे समाज के राजनैतिक कार्यकर्ताओं का मनोबल काफी कमजोर हुआ है। हमें आज यह बात समझनी होगी कि राजनीति हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। लोकतंत्र में बोलने की भाषा सिर्फ और सिर्फ आपका मतदान है। जो समाज एकजुट होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करेगा, उसी समाज की बात विधानसभा या संसद तक सुनी जायेगी, धन के बल पर की जाने वाली राजनीति भले ही किसी वर्ग विशेष को लाभ पंहुचाती हो परन्तु इससे समाज का कतई भला न तो हुआ है न होगा। जो समाज अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करेगा उसे लोकतंत्र की भाषा में गूंगा समाज समझा जायेगा।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-7669813893269557815?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/7669813893269557815/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/05/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7669813893269557815'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/7669813893269557815'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='लोकतंत्र की भाषा - शम्भु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-9Up1XTQBfNM/Td5vShSp07I/AAAAAAAAAsI/VaKCpwp3hxQ/s72-c/shambhu_choudhary.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3555188914081931888.post-5568547411075773219</id><published>2010-12-18T07:43:00.001-08:00</published><updated>2010-12-18T08:02:39.200-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्थानी रचनाकारों'/><title type='text'>राजस्थानी रचनाकारों की सूची</title><content type='html'>&lt;center&gt;&lt;font size=4 color="red"&gt;&lt;br /&gt;इस सूची को पूर्ण करने हेतु अपना पता हमें भेज सकते हैं- संपादक&lt;/font&gt;&lt;/center&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अ&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अम्बू शर्मा - २०५, एसके देव रोड, लेक टाऊन, कोलकाता-४८/ ०३३-२५२११०५२&lt;br /&gt;अजीतसिंह चारण - द्वारा कल्याणसिंह चारण, लिंक रोड, रतनगढ़ (चूरू)/ ९४१३७२४३२३&lt;br /&gt;अर्जुनदान चारण - मु.पो. करमावास, वाया- समदड़ी, बाड़मेर&lt;br /&gt;डॉ. अर्जुनदेव चारण - राजस्थानी विभाग, ज.ना.व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर/ ९८२९१०७७५१&lt;br /&gt;अर्जुनसिंह शेखावत - २ घ ३६, कमला नेहरू नगर, पाली मारवाड़-३०६४०१/ ०२९३२-२५७०६२, २५७९६६&lt;br /&gt;अतुल कनक - ३ ए ३०, महावीरनगर विस्तार, कोटा/०७४४-२४७०१६०, ९९५०६८८८६६&lt;br /&gt;अन्नाराम सुदामा - पेट्रोल पम्म के सामने, गंगाशहर, बीकानेर/ ०१५१-२२७२९०९&lt;br /&gt;अब्दुल समद राही - मोहल्ला सिलावटान, ढाल की गली, सोजत शहर (पाली)/०२९६०-२२१२०६, ९२१४६७७६७४&lt;br /&gt;अरविंदसिंह आशिया - डी-५, टाइप ।।।, एम.वी. हॉस्पिटल कैम्पस, उदयपुर-३१३ ००१&lt;br /&gt;अरूण कुमार दुबे - डाकघर के सामने, अहोर, जिला- नागौर&lt;br /&gt;अवकाश सैनी - रामजस वैल, अगुणा मोहल्ला, चूरू/ ९८२८४४५१७१&lt;br /&gt;अशोक जोशी क्रांत - हाकमों की प्रोल, बनियापाड़ा, जोधपुर-१/०२९१-२६२५०८०, ९४१४३१९८३८&lt;br /&gt;अस्तअली खां मलकांण - गली नं. ९, कायमनगर, डीडवाना (नागौर)/ ०१५८०-२२३१२४&lt;br /&gt;श्रीमती आंनदकौर व्यास - द्वारा भवानीशंकर व्यास विनोद, १ स ९, पवनपुरी, बीकानेर&lt;br /&gt;आईदानसिंह भाटी - हिन्दी विभाग, राजकीय महाविद्यालय, जैसलमेर/ ९४१४३२५८६७&lt;br /&gt;आर. एस. टेलर - लक्ष्मणगढ़, सीकर&lt;br /&gt;आर.पी.सिंह - ७३, अरविंद नगर, सीबीआई कॉलोनी, जगतपुरा, जयपुर/ ९४१४८२६०२१&lt;br /&gt;इकराम राजस्थानी - डी-३६, संजय नगर हाउसिंग बोर्ड, शास्त्री नगर, जयपुर-१६/ ०१४१-२३०५२४१&lt;br /&gt;डॉ. उदयवीर शर्मा - संपादक-वरदा, पो. बिसाऊ (झुंझुनूं)/ ०१५९५-२६४२२१&lt;br /&gt;डॉ. उपध्यानचंद्र कोचर - मरुधर हेरिटेज, गंगाशहर रोड, बीकानेर-३३४००१&lt;br /&gt;उपेन्द्र अणु - ऋषभदेव, उदयपुर&lt;br /&gt;उम्मेद गोठवाल - ए-२४, अग्रसेन नगर, चूरू/ ९४१४३५०६३५&lt;br /&gt;उम्मेद धानियां - पो. राजपुरा, तारानगर, चूरू/ ०१५६१-२७०६९७, २७०६२७ पीपी&lt;br /&gt;श्रीमती उमा पंवार - द्वारा वैजेन्द्रसिंह पंवार, ७/२१, डीडीपी नगर, मधुबन बासनी, प्रथम चरण, जोधपुर-५&lt;br /&gt;ओंकारश्री - सूर्य सदन, ३ ब १८, सेक्टर-७, गुप्तेश्वर नगर, उदयपुर&lt;br /&gt;ओमदत्त जोशी - साहित्य सदन, वर्धमान कॉलेज के पास, मुणोत कॉलोनी, ब्यावर,अजमेर&lt;br /&gt;ओम पुरोहित कागद - कमला निवास, २४-दुर्गा कॉलोनी, हनुमानगढ़ संगम/ ०१५५२-२६८८६३, ९४१४३८०५७१&lt;br /&gt;ओम नागर अश्क - ८५७, सेक्टर-४, मस्जिद के सामने, केशवपुरा, कोटा-९/०७४४-२४७२९६०, ९४६०६७७६३८&lt;br /&gt;डॉ. ओमप्रकाश भाटिया - मातृछाया, भाटिया पाड़ा, जैसलमेर&lt;br /&gt;ओमप्रकाश सरगरा अंकुद - मु.पो.- सांगरिया (भीलवाड़ा)&lt;br /&gt;क&lt;br /&gt;कंवल उणियार - १७/११५, चौपासनी हाउसिंग बोर्ड, जोधपुर-३४२००८&lt;br /&gt;कन्हैयालाल भाटी - कुनीं निवास, छिम्पों का मोहल्ला, गंगाशहर रोड, बीकानेर&lt;br /&gt;कन्हैयालाल सेठिया - ६, आशुतोष मुखर्जी रोड, कोलकाता-२०/ ०३३-२४५५१२४५&lt;strong&gt;(exp)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कमल रंगा - नालंदा पब्लिक स्कूल, नत्थूसर दरवाजे के बाहर, बीकानेर/ ०१५१-२५२४०५०&lt;br /&gt;कमल शर्मा - डी १२५ अग्रसेन नगर, पो. चूरू/ ९४१४८९४७९४&lt;br /&gt;श्रीमती कमला कमलेश - ५२५, कल्पना कुंज, छावनी, कोटा-७&lt;br /&gt;डॉ. श्रीमती कविता किरण - नेहरू कॉलोनी, फालना-३०६११६ जिला-पाली/ ९४१४५२३७३०&lt;br /&gt;कल्याणसिंह राजावत - ५३, शिल्प कॉलोनी, चितावा हाउस, झोटवाड़ा, जयपुर-१२/ ०१४१-२३४११६०, ९४१४९८४९५१&lt;br /&gt;डॉ. कल्याणसिंह शेखावत - १५, सुभाषचंद्र बोस कॉलोनी, डिफेंस लेब, रातानाड़ा, जोधपुर/ ९३१४७१०७३२&lt;br /&gt;डॉ. किरण नाहटा - ७ ग १५, पवनपुरी, दक्षिण विस्तार, बीकानेर/ ०१५१-२२४१३१९&lt;br /&gt;किशोर कुमार निर्वाण - वार्ड नं. १, तारानगर, जिला-चूरू/ ९२५२२३१६२०&lt;br /&gt;डॉ. कुंदन माली - २८/१६१५, टेकरी, उदयपुर-३१३००२&lt;br /&gt;कुंदन सिंह सजल - उदय निवास, रायपुर (पाटन) सीकर&lt;br /&gt;कुमार अजय - मु.पो.-घांघू, जिला-चूरू/ ९९२९५८२६१०&lt;br /&gt;कुमार गणेश - लक्ष्मी कुंज, विश्वकर्मा गेट, बीकानेर-३३४००४&lt;br /&gt;केशराराम - द्वारा रणजीत टाडा, दूरदर्शन केन्द्र, सेक्टर-१३, हिसार-१२५ ००१/ ९२५२२३१६२०&lt;br /&gt;केसरीकांत शर्मा केसरी - आनंदपुरा, वार्ड नं. १, मण्डावा-३३३७०४, झुंझुनूं/ ०१५९२-२००६२५&lt;br /&gt;श्रीमती कुसुम मेघवाल - राजभाषा अधिकारी, हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड, उदयपुर&lt;br /&gt;कैलाश मण्डेला - नेहदीठ, ३, गांधीपुरी, शाहपुरा (भीलवाड़ा)/ ०१४८४-२२२४२६, ९८२८२३३४३४&lt;br /&gt;कैलाश मनहर - स्वामी मोहल्ला, मनोहरपुरा, जयपुर&lt;br /&gt;कृष्ण कल्पित - उपनिदेशक (कार्यक्रम), दूरदर्शन महानिदेशालय, कोपरनिक्स रोड, नई दिल्ली/ ९९६८२९५३०३&lt;br /&gt;कृष्ण कुमार आशु - अक्षर, १२८, मुंशी प्रेमचंद कॉलोनी, माइक्रोवेव टावर के पास, पुरानी आबादी, श्रीगंगानगर/९४१४६५८२९०&lt;br /&gt;कृष्ण कुमार बांदर - पो. बरवाली, त. नोहर, (हनुमानगढ़)/०१५५५-२४०७५२&lt;br /&gt;डॉ. कृष्णलाल बिश्नोई - बी-१११, समता नगर, कृषि उपज मंडी के सामने, बीकानेर/ ०१५१-२५२७२१&lt;br /&gt;कृष्णा कुमारी - सी-३६८, तलवण्डी, कोटा/ ०७४४-२४०५५००, ९८२९५४९९४७&lt;br /&gt;कृष्णा जांगिड़'कीर्ति` - पुत्री श्री देवीलाल जांगिड़, पो. जसाना, नोहर (हनुमानगढ़) स्वामी खुशालनाथ धीर - कल्याणपुरा मार्ग नं. ४, बाड़मेर-३४४००१&lt;br /&gt;गंगाविष्णु बंशीवाला - शर्मा कॉलोनी, कालूसिंह के डेरे के पास, धोबी धोरा, बीकानेर-१/ ९२१४७४२६२०&lt;br /&gt;गजानन वर्मा - चित्रकला भवन, रतनगढ़ (चूरू) ०१५६७-२२५३०५, २२२५३४&lt;br /&gt;गिरधनदान रतनू दासोड़ी - मु.पो.- दासोड़ी, कोलायत, बीकानेर/ ९९८२०३२६४२&lt;br /&gt;गिरधारीलाल मालव - केशव ज्ञानभारती उ.मा. विद्यालय, अंता, जिला- बारां&lt;br /&gt;डॉ. गिरिजा शंकर शर्मा - अलख सागर, बीकानेर&lt;br /&gt;गोपीचंद प्राणेश वैद्य - मु.पो.- झझू, जिला- बीकानेर&lt;br /&gt;गोविन्द अग्रवाल - पीपी अग्रवाल, सेल्स एण्ड केमिकल डिपार्टमेण्ट, हरिहर पोलिस्टर्स, कुमारपट्टनम, कर्नाटक&lt;br /&gt;डॉ. गोविंद शंकर शर्मा - ए-६, सरस्वती कॉलोनी, टोंक फाटक, जयपुर-३०२ ०१५&lt;br /&gt;गुलाबचंद कोटड़िया - ४६९, मिंट स्ट्रीट, चैन्नई-६०००७९/ ०४४-२५२०३०३६, २५२०९६०९&lt;br /&gt;डॉ. गोरधनसिंह शेखावत - न्यू कॉलोनी, रोडवेज डिपो के सामने, सीकर/ ०१५७२-२४४५८६&lt;br /&gt;गोरस प्रचण्ड - ६५, वीर सावरकर नगर, कोटा/ ०७४४-२४७७०८५, ९८२९५३०३८५&lt;br /&gt;गौरीशंकर निमिवाल - मु.पो. कुलचंद्र, वाया संगरिया (हनुमानगढ़) ३३५०६३&lt;br /&gt;गौरीशंकर प्रजापत - व्याख्याता, राजस्थानी विभाग, श्री नेहरू शारदा पीठ पी.जी.कॉलेज, जस्सूसर गेट, बीकानेर&lt;br /&gt;गौरीशंकर मधुकर - पुरानी जेल रोड, बीकानेर-५/ ०१५१-२५४११८१, ९४१३४८१४४०&lt;br /&gt;घनश्याम अग्रवाल - अलसी प्लाट, अकोला, महाराष्ट्र ४४४००४&lt;br /&gt;घनश्यामनाथ कच्छावा - बागरेचा बास, सुजानगढ़, चूरू/ ०१५६८-२२५१००&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;च&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;डॉ. चंद्रप्रकाश देवल - ७४, बलदेव नगर, माकड़वाली रोड, अजमेर/ ०१४५-२६४०७१७ चंद्रशेखर अरोड़ा - सोजतिया घांचियां का बास, जोधपुर&lt;br /&gt;चंदालाल चकवाला - ५५२, महावीर नगर द्वितीय, कोटा/ ०७४४-२४२९१०६, ९४१४९४६४४९&lt;br /&gt;चतुर कोठारी - बड़ापाड़ा, पो. राजसमंद-३१३३२६/ ०२९५२-२२०८७३&lt;br /&gt;श्रीमती चांदकौर जोशी - १५ ए, चौपासनी रोड नं. ७, सरदारपुरा, जोधपुर/ ०२९१-२६१५२६४, ९४१३८७१९४६&lt;br /&gt;चेतन स्वामी - धानुका मंदिर के पास, फतेहपुर शेखावाटी/ ०१५७१-५१२४७१, ९४६१०३७५६२&lt;br /&gt;चैनसिंह परिहार - १५५ए, शांतिप्रिय नगर, कमला नगर अस्पताल के पीछे, जोधपुर-८/०२९१-२७५२४३२&lt;br /&gt;चौथमल प्रजापति - ८४७, मस्जिद के सामने, पार्क के पास, केशवपुरा, कोटा/ ९९२८२९७८२५&lt;br /&gt;छगनलाल व्यास - खांडप, बाड़मेर/ ०२९००-२३७३४२, ९४६००७३७१९&lt;br /&gt;ज्योतिपुंज - ए-१/१०४, वैशाली अपार्टमेण्ट, सेक्टर-४, हिरणमगरी, उदयपुर/ ९४१३७५२९९६&lt;br /&gt;जगदीश प्रसाद बाणिया - मु.पो. बरवाली, नोहर, हनुमानगढ़&lt;br /&gt;जनकराज पारीक - २९, मंडी ब्लाक, श्रीकरणपुर (श्रीगंगानगर)/ ०१५०१-२२०४१९&lt;br /&gt;जबराराम कंडारा - मु.पो. अेलाना-३४३०२१ वाया-उम्मेदाबाद, जालोर&lt;br /&gt;डॉ. जमनालाल बायती - बी-१८६, राधाकृष्ण नगर, भीलवाड़ा-३११००१&lt;br /&gt;जयंत निर्वाण - कुमकुम प्रकाशन, पो. सरदारशहर, जिला-चूरू&lt;br /&gt;डॉ. जयपालसिंह राठौड़ - गोपालबाड़ी, चौपासनी, जोधपुर&lt;br /&gt;डॉ. जहूर खां मेहर - सिंधियों का बास, सिंवाची गेट के अंदर, जोधपुर-३४२००१&lt;br /&gt;जीवनसिंह - १/१४, अरावली विहार, अलवर/ ०१४४-२३६०२८८, ९८२८६९४३९५&lt;br /&gt;जुगल परिहार - १७/१९५, चौपासनी हाउसिंग बोर्ड, जोधपुर-३४२००८&lt;br /&gt;जुगलकिशोर पुरोहित - कोटगेट के अंदर, जोशीवाड़ा, बीकानेर/ ९४१३२७८८०८&lt;br /&gt;जेठनाथ गोस्वामी - प्रधानाचार्य, रा.उ.मा.विद्यालय, बालोतरा-३४४०२२/ २२०१३६&lt;br /&gt;जेठमल मारु - २ अ २, पवनपुरी, बीकानेर/ ९४६०८९३९७४&lt;br /&gt;श्रीमती जेबा रशीद - १५१, चौपासनी, चुंगी चौकी, जोधपुर -३४२००९/ ०२९१-२७५३६८२&lt;br /&gt;जोगासिंह कैत जोगी - आकाशवाणी, सूरतगढ/ ०१५०९-२२३६२३ घर २२०२३४ कार्यालय&lt;br /&gt;ट, त&lt;br /&gt;ताऊ शेखावाटी - ३३, जवाहरनगर, सवाई माधोपुर/ ९४१४२७०३३६&lt;br /&gt;डॉ. तारादत्त निर्विरोध - २५४, पद्मावती कॉलोनी ए, अजमेर रोड, जयपुर-३०२०१९/ ०१४१-२३९३६५०&lt;br /&gt;श्रीमती तारालक्ष्मण गहलोत - मेडती गेट के अंदर, जोधपुर-३४२००२/ ०२९१-२५४८६३१&lt;br /&gt;तुलसीराम गौड़ माणक - २ बी, वर्द्धमान काम्पलेक्स, कुंभानगर, हिरणमगरी, सेक्टर-४, उदयपुर&lt;br /&gt;तेजसिंह जोधा - सी-८, बांगड़ कॉलेज कॉलोनी, स्टेशन रोड, डीडवाना-३४१३०३&lt;br /&gt;दमयंती जाडावत चंचल - २४६, रावला, पसंद (राजसंमद) ३१३३२४&lt;br /&gt;दलपत परिहार - जलते दीप भवन, जालोरी गेट, जोधपुर/ ९८२९०९९६१०&lt;br /&gt;दिनेश पंचाल - राघव विला, मु.पो. विकास नगर, जिला-डूंगरपुर&lt;br /&gt;दिलीप स्वामी मनु - मनु प्रकाशन, वार्ड नं. ४, रतनगढ़, चूरू/ ०१५६७-२२६९९७&lt;br /&gt;दीनदयाल ओझा - साहित्य साधना सदन, केलापाड़ा, जैसलमेर/ ०२९९२-२५२५७६&lt;br /&gt;दीनदयाल शर्मा - १०/२२, आरएचबी, डी रोड, हनुमानगढ़ जंक्शन-३३५५१२/ ९४१४५१४६६६&lt;br /&gt;दीपचंद सुथार - गांधी बाजार, मंत्रियों का मोहल्ला, मेड़तासिटी, नागौर&lt;br /&gt;दुर्गादानसिंह गौड़ - २२/१३३, मोखापाड़ा, कोटा/ ९४६०००६६१५&lt;br /&gt;दुलाराम सहारण - १०५, गांधीनगर, चूरू-३३१००१/ ९४१४३२७७३४&lt;br /&gt;देवकरण जोशी दीपक - मु.पो. कोहिणा, त. तारानगर, जिला-चूरू/ ०१५६१-२६५२१५&lt;br /&gt;डॉ. देव कोठारी - १३-मालदास स्ट्रीट, मेहताजी की खिड़की, उदयपुर/ ९४१४१६३१९६&lt;br /&gt;देवकिशन राजपुरोहित - सूर्य सदन, पो. चंपाखेड़ी, वाया- रैण, जिला- नागौर/ ९४१३० ३८८६६&lt;br /&gt;देवदास रांकावत - एन.के. फोटोग्राफर, जस्सूसर दरवाजे के अंदर, बीकानेर/ ०१५१-२५२२४६१, ९३५१२६९८०१&lt;br /&gt;दौलतराम डोटासरा - मु.पो.- रोड़ांवाली, जिला- हनुमानगढ़&lt;br /&gt;धनंजय वर्मा - नगर परिषद के सामने, बीकानेर-१/ ०१५१-२५२८१२३&lt;br /&gt;धनराज पंवार - २/१४६, हाउसिंग बोर्ड, पो. बालोतरा-३४४०२२ बाड़मेर&lt;br /&gt;धोंकलसिंह चरला़ - चरला़ भवन, सी-९४, शास्त्रीनगर, जयपुर-३०२०१६/ ०१४१-२२८०४२७&lt;br /&gt;नंद भारद्वाज, - ७१/२४७, मध्यम मार्ग, मानसरोवर, जयपुर-२०/ ०१४१-२७८२३२८, ९४१४०५१२८३&lt;br /&gt;नंदकिशोर चतुर्वेदी - मु.पो. पाछुन्दा (बेगू) चित्तौड़गढ़&lt;br /&gt;नथगिरि भारती - भारती भवन, रानी बाजार, नोहर (हनुमानगढ़)&lt;br /&gt;नथमल केड़िया - केड़िया हाउस, ४ ए, शंभूनाथ पंडित स्ट्रीट, कोलकाता-२०&lt;br /&gt;नमामीशंकर आचार्य - कोटगेट के अंदर, जोशीवाड़ा, बीकानेर&lt;br /&gt;डॉ. नरपतसिंह सोढ़ा - १/२,प्रोफेसर कॉलोनी, सेठ मोतीलाल कॉलेज, झुंझुनूं/९४१४५४१४७६&lt;br /&gt;नरेश मेहन - मेहन हाउस, ढिल्लो कॉलोनी, हनुमानगढ़ संगम/ ९४१४३ २९५०५&lt;br /&gt;नवनीत पाण्डे - प्रतीक्षा, २ डी २, पटेल नगर, बीकानेर&lt;br /&gt;नवल जोशी - नये हौज का रास्ता, चांदपोल चौक, जोधपुर-१/ ०२९१-२९९०८७७, ९४१३८६५१०८&lt;br /&gt;नागराज शर्मा - बिणजारो प्रकासण, पिलानी/ ०१५९६-२४२९३५, ९४६०२७६४२६&lt;br /&gt;नारायणसिंह पीथल - ई-९२०, न्यायपथ, गांधीनगर, जयपुर/ ९८२९२३७६३१&lt;br /&gt;नारायणसिंह राव निरांकार - रेलवे फाटक के सामने, आमेट, राजसंमद/ ०२९०८-२५१२५१, ९४१३४२३५८५&lt;br /&gt;निर्मोही व्यास - १ स २२, पवनपुरी, बीकानेर-३३४००३/ ०१५१-२२०००४०&lt;br /&gt;निशांत - वनविभाग के निकट, पीलीबंगा/ ०१५०८-२३५६१६&lt;br /&gt;नीरज दइया - ३ च १४, पवनपुरी, बीकानेर- ३३४००३&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पन्नालाल कटारिया - मु.पो.- बिठौड़ा कलां, वाया- मारवाड़ जंक्शन, जिला- पाली ३०६००१/०२९३५-२५३३०१&lt;br /&gt;पवन पहाड़िया - पहाड़िया लोर मिल, डेह, जिला- नागौर&lt;br /&gt;पवन शर्मा - श्रीमती भगवानी देवी उ.प्रा. विद्यालय, वार्ड नं. ५, रेलवे लाइन के पास, भादरा (हनुमानगढ़)&lt;br /&gt;डॉ. परमानंद सारस्वत - ५ डी-२११, जयनारायण व्यास कॉलोनी, बीकानेर-३३४००३/ ०१५१-२३१०५६&lt;br /&gt;परमेश्वर प्रजापत - मु.पो.- गोगटिया चारणान, त. तारानगर, जिला-चूरू/ ९९८२५०४१४०&lt;br /&gt;पांचाराम चौधरी - लक्ष्मीनगर, बाड़मेर/ ९४१४५२९३१३&lt;br /&gt;पी.आर. लील - डी-१२, अंत्योदय नगर, गजनेर रोड, बीकानेर&lt;br /&gt;पुष्कर गुप्तेश्वर - १९/३८७, आदर्शनगर, वि.वि. मार्ग, उदयपुर/ ०२९४-५१३१५८६, ९८२९५६२२१५&lt;br /&gt;श्रीमती पुष्पलता कश्यप - पुष्पांजलि, पुराने डाकघर के पीछे, लक्ष्मीनगर, जोधपुर/०२९१-२५३१५८९, ९४६०१०६४०१&lt;br /&gt;डॉ. पुरुषोत्तम आसोपा - १२४, बिन्नाणी बिल्डिंग, अलख सागर रोड, बीकानेर&lt;br /&gt;डॉ. पुरुषोत्तम छंगाणी - पशु चिकित्सालय परिसर, चेतक सर्किल, उदयपुर/ ०२९४-२५२५११५&lt;br /&gt;पुरुषोत्तम पल्लव - १/४२, हाउसिंग बोर्ड, गोवर्धन विलास, उदयपुर/ ०२९४-२४८५८४४&lt;br /&gt;पुरुषोत्तम यकीन - ४-पी-४६, तलवण्डी, कोटा-३२४००५/९४१४९३९५७४&lt;br /&gt;पूर्ण शर्मा पूरण - प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, रामगढ़, नोहर, हनुमानगढ़/ ०१५५५-२४०७०८, ९८२८७६३९५३&lt;br /&gt;पूरन सरमा - १२४/६१-६२, अग्रवाल फार्म, मानसरोवर, जयपुर-२०/ ०१४१-२७८२११०, ९८२८०२४५००&lt;br /&gt;श्रीमती डॉ. प्रकाश अमरावत - व्याख्याता, राजस्थानी, डूंगर कॉलेज, बीकानेर&lt;br /&gt;प्रकाश चाण्डालिया, ३०९,विपिन बिहारी गांगुली स्ट्रीट, २ तल्ला, कोलकाता-७०००१२ फोन: ०३३- २२२५१३९९/९८३००३८३३५&lt;br /&gt;प्रमोद कुमार शर्मा - वरिष्ठ उद्घोषक, आकाशवाणी, बीकानेर/ ०१५१-२५२८०४२, ९४१४५०६७६६&lt;br /&gt;प्रहलाद श्रीमाली - ४२/३१, डॉ. रघुनाथकुल स्ट्रीट, पार्क टाउन, चैन्नई-६०० ००३/ २५३५३८७६, २५२९१९८९&lt;br /&gt;प्रहलादराय पारीक - १८ एसपीडी, बडोपल, सूरतगढ़, ३३५८०४/०१५०८-२८८०८२, ९८२८६६६२१४&lt;br /&gt;प्रहलादसिंह राठौड़ - पलायथा हाउस, मोखापाड़ा, कोटा-३२४००६&lt;br /&gt;प्रेम शास्त्री - १ के २५, महावीरनगर विस्तार योजना, कोटा-९&lt;br /&gt;बजरंगलाल जेठू - चार भुजा चौक, लाडनूं, जिला- नागौर/ ९४१४९६१५९७&lt;br /&gt;डॉ. बद्रीप्रसाद पंचौली - बी-६, दातानगर, रेम्बल रोड, अजमेर-३०५००१/ ०१४५-२४२५६६४&lt;br /&gt;बद्रीलाल मेहरा दिव्य - दिनकर कुटीर, हथाई का चौक, सकतपुरा, कोटा-८/ ९८२९०७८५१८&lt;br /&gt;बनवारी खामोश - २४२, काव्य कुंज, वार्ड नं. ३६, प्रतिभानगर, चूरू/ ९४१३६०५१७०&lt;br /&gt;श्रीमती बसंती पंवार - विष्णु सदन, माहेश्वरी न्याति नोहरे के पास, बाबू राजेन्द्र मार्ग, मसूरिया, जोधपुर&lt;br /&gt;बस्तीमल सोलंकी - भीम, राजसंमद-३०५९२९&lt;br /&gt;बिशनाराम स्वामी - मु.पो.- बरवाली, त. नोहर, हनुमानगढ़/ ९९२८९२५८७४&lt;br /&gt;बिहारीशरण पारीक - ६१, माधवनगर, रेलवे स्टेशन के पीछे, दुर्गापुरा, जयपुर&lt;br /&gt;बीरुराम चांवरिया - आकाशवाणी, सूरतगढ़/ ०१५०९-२२०२३४ कार्यालय&lt;br /&gt;बी.एल. माली अशांत - ३/३४३, मालवीय नगर, जयपुर/०१४१-२५२०८७४, ९४१४३८६६४९&lt;br /&gt;बुद्धिप्रकाश पारीक - २४८६/२०, पुरानी बस्ती, जयपुर-३०२ ००१&lt;br /&gt;बुलाकी शर्मा - सीताराम द्वार के सामने, जस्सूसर गेट के बाहर, बीकानेर-४/ ०१५१-२२०५६८८, ९४१३९३९९००&lt;br /&gt;बैजनाथ पंवार - वार्ड न. १८, चूरू/ ०१५६२-२५३३४२&lt;br /&gt;डॉ. ब्रजनारायण कौशिक - सेवा विकलांग, सेक्टर-६, हनुमानगढ़ जंक्शन&lt;br /&gt;ब्रजराज स्नेही - ३/११८, हाउसिंग बोर्ड, टोंक&lt;br /&gt;बद्रीलाल मेहरा दिव्य - दिनकर कुटीर, हथाई का चौक, सकतपुरा, कोटा-३४२ ००८&lt;br /&gt;बृजरतन जोशी - जोशी मेडिकल एण्ड जनरल स्टोर, हर्षों का चौक, बीकानेर/ ०१५१-२५२२६६२२&lt;br /&gt;डॉ. भंवर कसाना - वत्सला, प्रतापनगर, डीडवाना (नागौर)/ ०१५८०-२२३११९, ९८२८७३५३९५&lt;br /&gt;पं. भंवर व्यास - एडवोकेट, हरसों की ढाल, बीकानेर&lt;br /&gt;भंवरलाल भ्रमर - रामजी री कुटिया, एम.एम. स्कूल ग्राउण्ड के पास, जवाहरनगर, बीकानेर-३३४ ००४&lt;br /&gt;भंवरलाल सुथार - ७१, नेहरू नगर, बीआर बिड़ला स्कूल के सामने, जोधपुर/ ०२९१-२७००५८१&lt;br /&gt;भंवरसिंह सामौर - १३४, गांधीनगर, चूरू/ ०१५६२-२५३८३४, ९४६०५२८८३४&lt;br /&gt;डॉ. भगवतीलाल व्यास - ३५, खारोल कॉलोनी, फतहपुरा, उदयपुर-३१३००१/ ०२९४-२४५०९५६, ९४१३५२८५२९&lt;br /&gt;डॉ. भगवतीलाल शर्मा - शांति निकेतन, ७८, सरदार क्लब योजना, जोधपुर-३४२०११/ ०२९१-२६२३५२७&lt;br /&gt;डॉ. भरत ओला - ३७, सेक्टर-५, नोहर-३३५५२३ हनुमानगढ़/ ९४१४५०३१३०&lt;br /&gt;डॉ. भवानीसिंह पातावत - चौपासनी सी.से.स्कूल, चौपासनी, जोधपुर-३४२००१/ ९४१४२७९१७३&lt;br /&gt;भविष्यदत्त भविष्य - ऋषभ कॉलोनी, ऋषभदेव (उदयपुर)/ ०२९०७-२३०६३४, ९४६०७२८४५८&lt;br /&gt;भागीरथ परिहार - सी ३ ए/८२, फेज-२, रावतभाटा, कोटा&lt;br /&gt;भागीरथ मेघवाल - ३४४, टीचर्स कॉलोनी, अंबा माता मंदिर स्कीम, उदयपुर-१&lt;br /&gt;भागीरथ रेवाड़ - कार्यक्रम अधिकारी, आकाशवाणी, सूरतगढ़/ ०१५०९-२२०२३४ (का.) २२०३८१ (घर)&lt;br /&gt;भागीरथसिंह भाग्य - बगड़, झुंझुनूं/ ९४१४९८३८८२&lt;br /&gt;भूपतिराम साकरिया - सुविज्ञा, १३-१४, रघुवंश सोसायटी, वल्लभविद्यानगर, गुजरात/ ०२६९२-२३७२९३&lt;br /&gt;भूराराम सुथार - ई-६, दुर्गा नर्सरी रोड, विश्वविद्यालय क्वार्टर्स, उदयपुर&lt;br /&gt;भोजराज पेण्टर - कोटगेट, रेलवे फाटक के पास, बीकानेर/ ०१५१-२२१०६३५, २२०४७३६&lt;br /&gt;भोगीलाल पाटीदार - सीमलवाड़ा, जिला-डूंगरपुर&lt;br /&gt;भैंरुलाल गर्ग - नंद भवन, कावांखेड़ा पार्क, भीलवाड़ा-३११००१&lt;br /&gt;भैंरुसिंह राव क्रांति - शारदा सदन, इंद्रपुरी, कानोड़ (उदयपुर)&lt;br /&gt;डॉ. मंगत बादल - शास्त्री कॉलोनी, रायसिंहनगर-३३५०५१/ ०१५०७-२२०७१७, ९४१४९८९७०७&lt;br /&gt;डॉ. मदन केवलिया - प्रतिमा, सी-६८, सादुलगंज, बीकानेर-३३४००३/ ०१५१-२५२५३६३&lt;br /&gt;डॉ. मदन सैनी - विवेकनगर, अनाथालय के पीछे, बीकानेर/०१५१-५१२०८९९&lt;br /&gt;मदनगोपाल लड्ढ़ा - १४४, लड्ढ़ा निवास, महाजन (बीकानेर)/ ९९८२५०२९६९&lt;br /&gt;मदनमोहन परिहार - भाग्य भवन, प्रथम अ रोड, सरदारपुरा, जोधपुर-३४२००३/ ०२९१-२६२०३७८, २६२०३८६&lt;br /&gt;मधुकर गौड़ - ब्ल्यू ओसन-१, ए-३०२, ब्ल्यू एंपायर कांपलेक्स, महावीरनगर, कांदिवली प., मुम्बई-६७&lt;br /&gt;मनोजकुमार स्वामी - अशोक विहार, पुराना बस स्टेण्ड, सूरतगढ़/ ९४१४५८०९६०&lt;br /&gt;डॉ. मनोहर प्रभाकर - सी-११८ ए, मंगल मार्ग, बापूनगर, जयपुर-३०२०१५/ ०१४१-२७०७८७७&lt;br /&gt;डॉ. माधोसिंह इंदा - नेहरू कॉलोनी, फालना, जिला- पाली&lt;br /&gt;मनोहरलाल गोयल - गोयल भवन, बिष्टुपुर, जमशेदपुर-८३१००१/ ०१४८०-२२८१५६, ९३३४८६६४७३&lt;br /&gt;मनोहरसिंह राठौड़ - ई-२८, सिरी कॉलोनी, पिलानी/ ०१५९६-२४३५०१, २५२३५९, ९७८४५९०१०९&lt;br /&gt;मरुधर मृदुल - अधिवक्ता, ७२, नेहरू पार्क, जोधपुर&lt;br /&gt;महावीर जोशी - भैंसावता खुर्द-३३३५१६ झुंझुनूं&lt;br /&gt;डॉ. महावीर दाधीच - १४२, भगवतीनगर-प्रथम, करतारपुरा, जयपुर-६/ ०१४१-२५००५४५&lt;br /&gt;डॉ. महावीर पंवार - कालूबास, श्रीडूंगरगढ़/ ०१५६५-२२४१००&lt;br /&gt;डॉ. महेन्द्र भानावत - ३५२, श्रीकृष्णपुरा, सेंट पाल स्कूल के पास, उदयपुर-१/ ०२९४-२४१२१७४&lt;br /&gt;महेन्द्रसिंह लालस - ९७, लक्ष्मीनगर, पावटा, जोधपुर&lt;br /&gt;डॉ. महेन्द्रसिंह नगर - नगर हाउस, पावटा बी रोड, जोधपुर-३४२००६/०२९१-२५४४९०७, ९४१४१९६९६०&lt;br /&gt;महेन्द्रसिंह मील - मु.पो.- कोलिण्डा, जिला- सीकर, ३३२०४०&lt;br /&gt;माधव नागदा - श्री गोवर्द्धन रा.उ.मा. विद्यालय, नाथद्वारा-३१३३०१/ ०२९५३-२८८४९४&lt;br /&gt;मालचंद तिवाड़ी - प्रहेलिका, सोनगिरी कुआं, बीकानेर/ ९३१४४९८०२४&lt;br /&gt;मीठालाल खत्री - लाल पोल, आसन रोड, जालोर/ ०२९७३-२२२७८८&lt;br /&gt;मीठेश निर्मोही - ब्राह्मणों की गली, उम्मेद चौक, जोधपुर/ ०२९१-३२३२९७८४०, ९३५१२२३२२१&lt;br /&gt;मुकनसिंह सहनाली - मु.पो.- सहनाली बडी, त.व जिला- चूरू&lt;br /&gt;मुकुट मणिराज - वृद्धि, रोडवेज वर्कशॉप कॉलोनी, स्टेडियम के पास, कुन्हाड़ी, कोटा-३/ ९८२९९७१४२१&lt;br /&gt;मुकेश आमेरा - ६२, आनंद विहार-ए, बेनाड़ रोड, झोटवाड़ा, जयपुर/ ०१४१-२३४४६२७&lt;br /&gt;मुरलीधर वैष्णव - गोकुल, ए-७७, रामेश्वर नगर, बासनी-१, जोधपुर/ ९४६०७७६१००&lt;br /&gt;डॉ. मूलचंद सेठिया - डी-५८, अम्बाबाड़ी, गणेश पार्क के सामने, जयपुर-३०२०२३&lt;br /&gt;मेहरचंद धामू - मु.पो.- परलीका, त.- नोहर, जिला- हनुमानगढ़&lt;br /&gt;मोहन आलोक - २०७, फोर्थ ब्लाक, चांदनी चौक, रामनगर, श्रीगंगानगर-३३५००१/ ०१५४-२४५०२३२&lt;br /&gt;मोहनलाल जांगिड़ - व्याख्याता, राजकीय टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, बीकानेर&lt;br /&gt;मोहनलाल शर्मा - विद्या विहार, १ ई २१८, ज.ना. व्यास नगर बीकानेर-३/ ०१५१-२२३४२९७&lt;br /&gt;मोहन सिद्धावत - तिलक नगर, जालोर&lt;br /&gt;मोहनसिंह - श्रीमालों का मोहल्ला, झुंझुनू&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;य&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यादवेन्द्र शर्मा चंद्र - आशालक्ष्मी, नयाशहर, बीकानेर/ ०१५१-२५४७७८८&lt;br /&gt;योगेश कानवा - अभिव्यक्ति, १०५/६७, अहिंसा मार्ग, विजयपथ, मानसरोवर, जयपुर/ ९४१४६६५९३६&lt;br /&gt;रघुराजसिंह हाड़ा - मालसदर मार्ग, झालावाड़-३२६००१/ ०७४३२-२३०१२३&lt;br /&gt;मेजर रतन जांगिड़ - १११/४००, शिप्रा पथ, मानसरोवर, जयपुर-३०२०२०/०१४१-२३९८७२०, ९४१४०४०२८१&lt;br /&gt;रतन राहगीर - सिंधी कॉलोनी, श्रीडूंगरगढ़ (बीकानेर)&lt;br /&gt;रतन शाह - १४, चांदनी चौक स्ट्रीट, कोलकाता-७०००७२ फोन:०-९३३०९४७३७३&lt;br /&gt;डॉ. रमेश मयंक - बी-८, मीरानगर, चित्तौड़गढ़-३१२००१/ ०१४७२-२४६४७९, ९४६११४१४८९&lt;br /&gt;रवि पुरोहित - ३९७, कैलाशपुरी, बीकानेर/ ९४१४४१६२५२&lt;br /&gt;रविकुमार सनाढ़्य - स्वस्ति, बी-२७५, आर.के. कॉलोनी, भीलवाड़ा/ ०१४८२-२४७८४&lt;br /&gt;राज कादरी रियाज - मोहल्ला चूनगरान, बीकानेर&lt;br /&gt;राजकुमार जैन राजन - चित्रा प्रकाशन, आकोला (चित्तौड़गढ़) ३१२२०५/ ०१४७६-२८३२२२, ९८२८२१९९१९&lt;br /&gt;राजाराम भादू - समानांतर, ४३, हिम्मत नगर, टोंक रोड, जयपुर-३०२ ०१८/ ९८२८१६९२७७&lt;br /&gt;राजूराम बिजारणियां - तहसील कार्यालय के सामने, लूणकरणसर, बीकानेर/ ०१५२८-२२३३३४, ९४१४४४९९३६&lt;br /&gt;डॉ. राजेन्द्र बारहठ - ६०, गारियावास, उदयपुर/ ९८२९५६६०८४&lt;br /&gt;राजेन्द्र स्वर्णकार - गिराणी, सुनारों का मोहल्ला, बीकानेर-३३४००५/ ०१५१-२२०३३६९&lt;br /&gt;राजेश अरोड़ा - उपडाकपाल, गजसिंहपुर (श्रीगंगानगर) ३३५०२४/ ०१५०५-२३०९८७, २३०११०&lt;br /&gt;राजेश रंगा - सी-२, जालुपुरा, मेनरोड जालुपुरा, जयपुर&lt;br /&gt;डॉ. राजेशकुमार व्यास - धर्मनगर द्वार के बाहर, ओझा-सारस्वत भवन के पीछे, बीकानेर-३३४००४&lt;br /&gt;राणुसिंह राजपुरोहित - भावण्डा , वाया- खींवसर (नागौर) ३४१०२५&lt;br /&gt;राधेश्याम जोशी - ३ ख १, पवनपुरी, बीकानेर/ ०१५१-२२४०५४९, ९२१४९४९२२२&lt;br /&gt;डॉ. रामकुमार घोटड़ - मुरारका मेडिकल स्टोर, सादुलपुर (चूरू)/ ९४१४०८६८००&lt;br /&gt;रामकुमारसिंह - ७३/३०९ ए, टैगोर लेन, मानसरोवर, जयपुर-३०२०२०/ ९८२९२६६०७४&lt;br /&gt;रामजीलाल घोड़ेला - वार्ड नं. २८, पाबूजी के मंदिर के पास, लूणकरणसर, बीकानेर/ ०१५२८-२२३२२५&lt;br /&gt;रामदयाल मेहरा - राज. साहित्य अकादमी, हिरणमगरी, सेक्टर-४, उदयपुर/ ०२९४-२४६६३७१, ९४१३२७५७६०&lt;br /&gt;रामधन अनुज - द्वारा श्री बहादुरराम निमिवाल, नजदीक सुखवंत पैलेस, पुरानी आबादी, श्रीगंगानगर-१&lt;br /&gt;रामनरेश सोनी - जेल सदर के सामने, बीकानेर-३३४००१&lt;br /&gt;रामनिरंजन शर्मा ठिमाऊ - ठिमाऊ का घर, पो. पिलानी, जिला- झुंझुनूं/ ०१५९६-२४२६४१&lt;br /&gt;रामनिवास बोहरा - पारीक चौक, बीकानेर&lt;br /&gt;रामनिवास शर्मा - वाणी विहार, पारीक चौक, बीकानेर/ ०१५१-२५२२६४५&lt;br /&gt;डॉ. रामप्रसाद दाधीच - नैवेद्य, ९३, नेहरू पार्क, जोधपुर&lt;br /&gt;रामपालसिंह राजपुरोहित - सर्वोदय बस्ती, बीकानेर-३३४००४&lt;br /&gt;रामस्वरूप किसान - मु.पो.- परलीका, त.- नोहर, जिला- हनुमानगढ़/०१५५५-२८२२३३&lt;br /&gt;डॉ. रामस्वरूप परेश - बी-५, पीरामल नगर, बगड़ (झुंझुनूं) ३३३०२३&lt;br /&gt;रामेश्वर गोदारा ग्रामीण - भोपालवाला आर्य सीनियर सेकण्डरी स्कूल, श्रीगंगानगर/ ९४६००९५८०७&lt;br /&gt;रामेश्वरदयाल श्रीमाली - चामुण्डा माता मंदिर मार्ग, जालोर-३४३००१/ ०२८७२-२२४५२१&lt;br /&gt;रामेश्वर राही - मु.पो. पारेवड़ा, वाया- साण्डवा, जिला- चूरू/ ०१५६०-२७२०७१&lt;br /&gt;लक्ष्मणदान कविया - मु. खैण, पो. मूंडवा, जिला- नागौर/ ०१५८४-२८३३११, २८३३९१, २८३३८६&lt;br /&gt;लक्ष्मणसिंह आशिया - मु.पो.- पसूंद, जिला- राजसमंद/ ९४१४४७३३४२&lt;br /&gt;श्रीमती लक्ष्मीकुमारी चूंडावत - लक्ष्मी निवास, डी-१९४, जगदीश मार्ग, बनीपार्क, जयपुर/ ०१४१-२२०५५२१&lt;br /&gt;डॉ. लक्ष्मीकांत व्यास - विजयश्री, १७, नयाघर, राजा कोठी के पास, गुलाबबाड़ी, अजमेर/ ९४१४२७३९५१&lt;br /&gt;लक्ष्मीनारायण रंगा - नत्थूसर गेट, बीकानेर-४/ ०१५१-२२११०५०&lt;br /&gt;लालदास पर्जन्य - ६/१७७, स्वराज्यनगर, पारस सिनेमा के पास, उदयपुर-१/ ०२९४-२४८४८२३&lt;br /&gt;लालदास राकेश - ९०, सरस्वती सदन, हनुमान नगर, जालोर-३४३ ००१&lt;br /&gt;लीटू कल्पनाकांत - कल्पनालोक, रतनगढ़, जिला-चूरू/ ०१५६७-२२२७८४, ९८२८५२४६५५&lt;br /&gt;डॉ. सुश्री लीला मोदी - २९१, मोती स्मृति, टिपटा, कोटा/ ०७४४-२३८५३८०, २३८५६२५, ९३५२६२९५५५&lt;br /&gt;वासु आचार्य - बाहेती चौक, बीकानेर&lt;br /&gt;डॉ. विक्रमसिंह गूंदोज - राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी, जोधपुर-३४२००९&lt;br /&gt;विजय जोशी - २/४८, गणेश तालाब, बसंत विहार, कोटा-३२४००९/ ०७४४-२४०२५९९&lt;br /&gt;विजयदान देथा - रूपायन संस्थान, पो. बोरुंदा, जिला- जोधपुर/ ०२९३०-२४४११२, २४४५४०, ९४१४७०३६५२&lt;br /&gt;डॉ. विद्यासागर शर्मा - ४ एफ १७, जवाहर नगर, श्रीगंगानगर/ ०१५४-२४६०५८१, ९४१४३२९४३४&lt;br /&gt;विनोद कुमार स्वामी - मु.पो.- परलीका (नोहर) हनुमानगढ़/ ९८२९१७६३९१&lt;br /&gt;विनोद नोखवाल - भारी हॉस्पिटल रोड़, पीलीबंगा (हनुमानगढ़)/ ९८२९८२१९९६&lt;br /&gt;विनोद सोमानी हंस - ४२/४३, जीवनविहार कॉलोनी, आनासागर, सरक्यूलर रोड, अजमेर/२६२७४७९&lt;br /&gt;श्रीमती विमला भंडारी - भंडारी सदन, पैलेस रोड, सलूम्बर-३१३०२७/ ०२९०६-२३०६९५, ९४१४७५९३५९&lt;br /&gt;विश्वनाथ भाटी - वार्ड नं. ८, तारानगर (चूरू) ३३१३०४/ ९४१३८८८२०९&lt;br /&gt;विष्णु शर्मा - वार्ड नं. १०, वनविभाग के निकट, सूरतगढ़-३३५८०४&lt;br /&gt;वीरेन्द्र लखावत - राजीव कॉलोनी, हायर सेकण्डरी रोड, सोजत (पाली)/ ०२९६०-२२३०४४&lt;br /&gt;वेदप्रकाश - जवाहर जैन शिक्षक महाविद्यालय, कानोड़ (उदयपुर)&lt;br /&gt;वेदव्यास - ७/१२२, मालवीयनगर, जयपुर/ ०१४१-२५५३६८६, ९४१४०५४४००&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;श&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;श्याम गोइन्का - गो-गो इंटरनेशल, साइट नं. ६, केएचबी औद्योगिक क्षेत्र, द्वितीय क्रास, यहलंका न्यू टाउन, बैंगलोर-५६००६४/ ०८०-२३६१०२८३&lt;br /&gt;श्याम जांगिड़ - काठगोला गोदाम, चिड़ावा, झुंझुनूं&lt;br /&gt;श्याम महर्षि - राजस्थली, श्रीडूंगरगढ़, बीकानेर/ ०१५६५-२२२६७०, ९४१४४१६२७४&lt;br /&gt;डॉ. श्यामसुंदर भारती - ओटेश्वर महादेव मंदिर, फतह सागर, जोधपुर-२/ ९४१४४७४७८९&lt;br /&gt;श्यामसुंदर सुमन - जी.एच.-२२, नया बापूनगर, भीलवाड़ा-३११००१&lt;br /&gt;शंकर झकनाड़िया - ३७/१४६, प्रतिभानगर, चूरू-३३१००१/ ०१५६२-२६१२१५&lt;br /&gt;शम्भु चौधरी -  एफ.डी.-४५३/२, साल्ट लेक सिटी, कोलकाता- ७००१०६ मोबाइल: ०९८३१०८२७३७&lt;br /&gt;डॉ. शंकरलाल स्वामी - नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर/ ०१५१-२२१०११८&lt;br /&gt;शंकरसिंह राजपुरोहित - शोध अधिकारी, आचार्य तुलसी राजस्थानी शोध संस्थान, गंगाशहर,बीकानेर-१/९३५२०९२५५६&lt;br /&gt;शंकुतला सरूपरिया - १०, सिक्ख कॉलोनी, एमबी कॉलेज चौराहा, उदयपुर/ ०२९४-२४२०४४४, ९३५१४१२०९३&lt;br /&gt;डॉ. शक्तिदान कविया - पोलो-२, जोधपुर/ ०२९१-२५४२०५६&lt;br /&gt;शचीन्द्र उपाध्याय - सरस्वती कॉलोनी, खेड़ली फाटक, कोटा-३२४ ००१&lt;br /&gt;शांति भारद्वाज राकेश - गीतांजलि, शहीद भगतसिंह कॉलोनी, कोटा-२/ ०७४४-२४४०५०५&lt;br /&gt;श्रीमती शारदा कृष्ण - आशादीप, पिपराली रोड, सीकर/ ०१५७२-२५०३९६&lt;br /&gt;शालिनीसिंह - श्याम टेलीकॉम सेण्टर, टैगोर चौक, नोहर (हनुमानगढ़)&lt;br /&gt;शिवचरण मंत्री - श्रीनगर (अजमेर) ३०५०२५&lt;br /&gt;डॉ. शिवदयाल पारीक - २ ख ३, शास्त्रीनगर, अजमेर-३०५००६/ ०१४५-२४३२११७&lt;br /&gt;शिवदानसिंह जोलावास - २५१, सेक्टर-११, हिरणमगरी, उदयपुर/ ९४१४७३७९७२&lt;br /&gt;शिव मृदुल - बी-८, मीरानगर, चित्तौड़गढ़-३१२००१&lt;br /&gt;शिव शर्मा विश्वासु - ३८, जगदंबा भवन, भटवाड़ा बास, सोमनाथ मार्ग, पाली मारवाड़-३०६४०१&lt;br /&gt;शिवराज छंगाणी - नत्थूसर गेट के अंदर, बीकानेर&lt;br /&gt;शिवराज भारतीय - मालियों का बास, नोहर-३३५५२३ हनुमानगढ़/ ९४१४८७५२८१&lt;br /&gt;श्रीमती शीला मिश्रा - १२/१३, शांति कॉलोनी, जी.ए. रोड, ओल्डवास मैनपेट, चैन्नई-६०००२१&lt;br /&gt;शिशुपालसिंह - पापुलर ऑफसेट प्रिंटर्स, रोडवेज बस स्टैंड, फतेहपुर शेखावाटी-३३२३०१&lt;br /&gt;संग्रामसिंह सोढ़ा - चक सचियापुरा, पो. बज्जू, त. कोलायत, जिला-बीकानेर&lt;br /&gt;संजय आचार्य वरुण - जीतमल प्रोल, आचार्यों का चौक, बीकानेर-५/ ९८२९८६१५७४&lt;br /&gt;संपत सरल - ८५, मयूर विहार, नांगल जैसा बोहरा, झोटवाड़ा, जयपुर-१२/ ०१४१-२३४२४१८, ९४१४०४४४१८&lt;br /&gt;सत्यदीप - राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति, श्रीडूंगरगढ़, बीकानेर&lt;br /&gt;सत्यदेव संवितेन्द्र - राठौड़ भवन, स्वाधीनता मार्ग, मारवाड़ जंक्शन/ ९४१४१७४८००&lt;br /&gt;सत्यनारायण इंदौरिया - २२, सत्य सदन, पो. रतनगढ़, जिला-चूरू/ ०१५६७-२२४२३४, २२५७८८&lt;br /&gt;सत्यनारायण सोनी - मु.पो.- परलीका, नोहर, हनुमानगढ़/ ०१५५५-२८२०४८, ९४६०१०२५२१&lt;br /&gt;सतीश गोल्याण - मु.पो.- जसाना, नोहर, हनुमानगढ़/ ०१५५२-२६३४२९&lt;br /&gt;सतीश छिम्पा - वार्ड नं. ३, त्रिमूर्ति मंदिर के पीछे, सूरतगढ़-३३५८०४/ ०१५०९-२२४७३९&lt;br /&gt;सरदार अली पड़िहार - बीदासर बारी के बाहर, बीकानेर/ ९४१४२६४७२९&lt;br /&gt;सरल विशारद - द्वारा दैनिक भास्कर, बीकानेर/ ०१५१-२०३९८८&lt;br /&gt;श्रीमती सावित्री चौधरी - २९, सिंधी कॉलोनी, आदर्शनगर, जयपुर-३०२००४&lt;br /&gt;सी.एल. सांखला - शब्दवन, टाकरवाड़ा (कोटा) ३२५२०४&lt;br /&gt;सीताराम महर्षि - कृष्ण कुटीर, रतनगढ़ (चूरू)/ ०१५६७-२२२८५३&lt;br /&gt;श्रीमती सुखदा कछवाहा - १/६, शांति निकेतन, नई दिल्ली-११००२१&lt;br /&gt;श्रीमती सुधा रामपुरिया - ४१ डी.डी.पी. मुखर्जी रोड, कोलकाता&lt;br /&gt;सुधीर राखेचा - राम कुटीर, केसरवाड़ी, जोधपुर&lt;br /&gt;सुबोध कुमार अग्रवाल - नगरश्री, चूरू/ ०१५६२-२५१८२४&lt;br /&gt;श्रीमती डॉ. सुमन बिस्सा - ६, आकाशदीप भवन, तीसरी डी रोड, सरदारपुरा, जोधपुर-३/ ०२९१-२६२६०००&lt;br /&gt;सुरेन्द्र अंचल - २/ १५२, साकेत नगर, ब्यावर (अजमेर)&lt;br /&gt;सुरेन्द्रसिंह शेखावत - ए-१५७, करणीनगर, लालगढ़, बीकानेर/ ९४१३३८८०९६, ९८२९०२१७५६&lt;br /&gt;सुरेन्द्रसिंह राव मृत्युंजय - आसोलियारी मांदड़ी, पो. बोयणा, खेमली, उदयपुर/ ०२९५५-२३८१३१&lt;br /&gt;सूर्यशंकर पारीक - नगर परिषद के पास, स्टेडियम मार्ग, बीकानेर-३३४००१&lt;br /&gt;सूरजसिंह पंवार - रामपुरिया कॉलेज के पीछे, बीकोनर-३३४००५&lt;br /&gt;डॉ. सोनाराम बिश्नोई - अमर मंगल, ४१-बी, ९-ई रोड, सरदारपुरा, जोधपुर/ ९४१४१२७५२२&lt;br /&gt;सोहनलाल प्रजापति - कारगवाल कुटीर, पो. छापर-३३१५०२, जिला-चूरू&lt;br /&gt;हनुमान दीक्षित - रानी बाजार, नोहर-३३५५२३/ ०१५५५-२२०५२९&lt;br /&gt;हरदान हर्ष - ए-३०६, महेश नगर, जयपुर-३०२०१५/ ०१४१-२५०१६५१, ९४२६५४०७५२&lt;br /&gt;हरमन चौहान - ७/३६९०, सेक्टर-१४, अंबेडकर कॉलोनी, लवकुशनगर, गोरधन विलास, उदयपुर-१&lt;br /&gt;हरिमोहन सारस्वत रूंख - ७२, सेक्टर-१२, हनुमानगढ़ संगम/ ९४१४३८०४९२&lt;br /&gt;हरिवल्लभ बोहरा हरि - १०८७, सिंघवी पाड़ा, जैसलमेर&lt;br /&gt;हरीश भादानी - छबीली घाटी, बीकानेर/ ९४१३३१२९३०&lt;strong&gt;(exp)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;डॉ. हुसैनी बोहरा - १ म ३५, सेक्टर-५, हिरणमगरी, गायत्रीनगर, उदयपुर-३१३००२&lt;br /&gt;क्ष&lt;br /&gt;श्रीभगवान सैनी - कालू बास, श्रीडूंगरगढ़, बीकानेर/ ०१५६५-२२३४५३, ९४६०५६४५१४&lt;br /&gt;श्रीलाल जोशी - रतन भवन, बारह गुवाड़ का चौक, नथाणियों की सराय, बीकानेर/ ०१५१-२५२८२०१&lt;br /&gt;श्रीलाल नथमल जोशी - केसर प्रकाशनालय, सोनगिरी चौक, बीकानेर/ ०१५१-२२०५००१ &lt;strong&gt;(exp)&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-5568547411075773219?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/5568547411075773219/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2010/12/blog-post_18.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/5568547411075773219'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/5568547411075773219'/><link rel='alternate' 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style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/THnfr6wvqbI/AAAAAAAAArw/Kl-e3l2aFiI/s400/shambhuchoudhary.jpg" border="0" alt="Shambhu Choudhary"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5510681564665588146" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;यह बात  सही है कि मारवाड़ी समाज के एक वर्ग ने काफी धन अर्जित किया, संग्रहित किया, संचित भी किया, इसका उपयोग किया तो दुरुपयोग भी। सामाजिक कार्यों मेँ जी जान से खर्च किया तो शादी-ब्याहों में इसका आडम्बर करने से भी नहीं चुका। धार्मिक कार्यों या आयोजनों मेँ धन को समर्पित किया तो खुद को पूजवाने भी लगे। समाज सेवा की तो,  सेवा को बदनाम कर समाज सेवक कहलाने की एक मुहिम भी चली। कोई खुद को चाँदी में तुलवाने को सही ठहराता है, तो कोई भागवत कथा के नाम पर लाखों का खर्च को। एक दूसरे को शिक्षा देने में किसी से कोई कम नहीं। एक लाखों का विज्ञापन छपवाकर समाज को शिक्षा दे रहा है, तो दूसरा इस तर्क से कि धन उनका है वे उसको कैसे भी लुटाये। वाह भाई! वाह! कमाल का यह समाज। इस समाज का कोई सानी नहीं। कौन किसकी परवाह करता है। सभी अपने मन के मालिक हैं भला हो भी क्यों नहीं धन जो कमा लिया है बेशुमार दौलत का मालिक जो बन गया है यह समाज। मानो लक्ष्मी से लक्ष्मी की हत्या का अधिकार मिल गया हो इस समाज को। मारवाड़ी समाज की एक सबसे बड़ीं ख़ासियत यह भी है कि इस समाज को किसी भी प्रान्त के साहित्य-संस्कृति-भाषा-कला या उनके रहन-सहन, खान-पान  (यहाँ तक की राजस्थान से भी) आदि से कोई लगाव नहीं सिर्फ और सिर्फ अपनी जीभिया स्वाद और पैसे का अहंकार इनको नीमतल्ला घाट तक पीछा नहीं छोड़ता।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;परन्तु इस नालायकी के लिये सारा समाज न तो दोषी है ना ही हमें समझना ही चाहिये। समाज का समृद्ध परिवार आज भी धन के इस तरह के दुरुपयोग से कोशों दूर है, यह जो भी गंदगी और धन के नंगे प्रदर्शन मे लगे लोग हैं वे या तो नाजायज तरीके से अर्जित धन को खर्च कर अपनी मानसिक विकलांगता को समाज के सामने परोस रहें हैं या फिर गांव का धन है जिसे वे खुले हाथ लूटा रहें हैं। संपन्न वर्ग और समृद्ध परिवार कभी भी अपनी दरिद्रता का प्रदर्शन नहीं करेंगे, इस तरह धन की बर्बादी को जो लोग उचित ठहराते हैं वे न सिर्फ दरिद्र ही हैं ऐसे लोग विकलांग भी हैं। मानो संपन्नता की आड़ में खुद के साथ-साथ समाज की दरिद्रता का प्रदर्शन करता हो, जिससे समाज का हर वर्ग न सिर्फ दुखी है, लाचार भी हो चुका है। कुछ लोग तो आडम्बर को समाज की जरूरत मानते हैं। कहते हैं नहीं तो समाज उसे दिवालिया समझेगा, अब इस दिवालियापन का क्या इलाज?&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;अपने अर्जित धन को खुद के बच्चों के ब्याह-शादियों में खर्च करने का समाज को पूरा अधिकार है, करना भी चाहिये, इसके लिये गली मत बनाई.. शान से खर्च कीजिए पर साथ-साथ कुछ नेक उदाहरण भी देते जाईये जिससे समाज को लगे कि आप सच में धनवान हो। धन से ही नहीं मन से भी धनवान हो। झूठी दलीलों की धरातल पर खुद के दिवालियेपन को समाज पर थोपकर, कोई लड़के वाले का नाम लेता है तो कोई लड़की वाले का। " भाई कै करां आपां तो लड़की वाला ठहरा या भाई लड़की वाला ने कोई दवाब कोनी देवां अब वे अपनी मर्जी से खर्च करे तो आंपा कै कर सकां हाँ!" ये दलीलें खुद की नपुंशकता को छुपाने वाली बात है। आपकी यह दशा खुद के दिवालियेपन को जग जाहिर करती है।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;हमेशा से मैं इस बात का समर्थक रहा हूँ कि उत्सव के अवसर को उत्साह के साथ मनाये इसका यह अर्थ नहीं कि फ़िज़ूलखर्ची करें। जरूरत के अनुसार सजावट करें व परिवार-मित्रों के साथ उत्साह के साथ उत्सव मनायें भीड़ एकठी न करें। इन दिनों ब्याह-शादियों में लोग आडम्बर तो करते ही हैं साथ-साथ इस आडम्बर को दिखाने के लिये वेबजह हजारों लोगों को जमा कर लेते हैं। पता नहीं खाने के नाम पर लोग जमा भी कैसे हो जाते हैं- कहते हैं भाई "चेहरो तो दिखाणो ही पड़सी" जैसे किसी मातम में जाना जरूरी हो। पिछले सालों में इसका प्रचलन तेजी से हुआ है। शहरों में एक-एक आदमी ३-४ ब्याह के कार्ड हाथ में लिये शादीबाडी़ खोजते नजर आ जातें हैं। गाँव में आज भी ऐसी स्थिति नहीं हुई है। गाँवों में शादी-ब्याह के नियम-कायदे लोग मानते हैं। इनमें आज भी  समाज का भय बना रहता है। परन्तु शहरों में खासकर महानगरों में कोई किसी की नहीं सुनने को तैयार।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;इसी प्रकार भागवत भी बंचवाईये, इसके लिये जरूरी धन की व्यवस्था भी करे परन्तु जो भागवत आप क्रूज जहाज़ में सुनने जा रहें हैं वो भागवत कथा को बदनाम ही करता है, जो महंत इस तरह धन के लालच में भागवत कथा को बेचने की दुकान खोल लिये हैं वे हिन्दू धर्म का विनाश करने में लगे हैं, मेरा उनसे आग्रह रहेगा कि धर्म को कभी भी किसी भी रूप में कैद करने वाले ऐसे तत्वों को पनाह न देवें। मारवाड़ी समाज यदि इसके लिये गुणाहगार है तो उसे सम्मानित न होने देवें और अपनी विद्या को धर्म के प्रति समर्पित करे न कि धन के प्रति। &lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;नववर्ष आपका मंगलमय  हो, इसी शुभकामनाओं के साथ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3555188914081931888-317137762805624807?l=samajvikas.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajvikas.blogspot.com/feeds/317137762805624807/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2010/12/blog-post_15.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/317137762805624807'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3555188914081931888/posts/default/317137762805624807'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajvikas.blogspot.com/2010/12/blog-post_15.html' title='यह हमारे दिवालियेपन की निशानी है- शम्भु चौधरी'/><author><name>नया समाज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06688353327748761500</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='30' 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स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 4. माहेश्वरी सदन, 34-बी, रतु सरकार लेन (मित्र परिषद के पीछे), कलकत्ता-7, 5. टिबड़ेवाल भवन (जमनादास), 164, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 6. बाजोरिया भवन, 212, विधान सरणी (वीणा सिनेमा के पास), कलकत्ता-6, 7. ओसवाल भवन, 2-बी, नंदो मल्लिक लेन, कलकत्ता-7, 8. गोविंद भवन, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-7, 9. (मथुरादास) बिनानी धर्मशाला, 31, पथरिया घाट स्ट्रीट, कलकत्ता-6, 10. बांगड़ धर्मशाला, 65-ए, पथरिया घाट स्ट्रीट, कलकत्ता-6, 11. महेश्वरी भवन, 4, शोभाराम वैशाख स्ट्रीट, कलकत्ता-6, 12. श्री दिगंबर जैन भवन, मछुआ, 10-1,मदन मोहन बर्मन स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 13. श्री अग्रसेन स्मृति भवन, पी-30, कलाकार स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 14. हजारीमल दूधवेवाला धर्मशाला (चोर बागान), 19, मुक्ताराम बाबू स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 15. कच्छी जैन भवन, 59, इजरा स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 16. सेठ सागरमल लुहारीवाला स्मृति भवन, 36-1, जितेंद्र मोहन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 17. भारतीय धर्मशाला (सेठ चिमन लाल), 44, जितेंद्र मोहन स्ट्रीट, कलकत्ता-6, 18. राजस्थान ब्राह्मण संघ भवन, 14-2, शोभाराम वैशाख स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 19. श्रीमती केसरी देवी कानोड़िया हॉल, 123, शोभाराम वैशाख स्ट्रीट, कलकत्ता-29, 20. भोतिका धर्मशाला (श्यामदेव गोपीराम), 150, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-7, 21. दौलतराम नोपानी धर्मशाला, 2, नंदो मल्लिक स्ट्रीट, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-7, 22. मित्र परिषद, 115, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 23. श्री जालान स्मृति भवन, 168, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 24. जैन श्वेतांबर तेरापंथी भवन, 3, पोर्तुगीज स्ट्रीट, कलकत्ता-1, 25. ब्राह्मणबाड़ी, सैयद अली लेन, कलकत्ता-7, 26. पोद्दार छात्रावास भवन (छात्रावास), 150. चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 27. हलवासिया छात्रावास भवन (छात्रावास), ब्रजदुलाल स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 28. शार्दुल पुस्करण हाई स्कूल भवन, 1-ए, सिकदर पाड़ा लेन, कलकत्ता-7, 29. बाबू लक्ष्मी नारायण बागला धर्मशाला, 51, सर हरिराम गोयनका स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 30. बाबू लाल अग्रवाल स्टेट, 169, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-7, 31. भगवानदास बलदेव दास धर्मशाला, 9, चोरबागान लेन, कलकत्ता-7, 32. मारवाड़ी पंचायत धर्मशाला, 51, सर हरिराम गोयनका स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 33. नवल किशोर डागा (बीकानेर वाला), धर्मशाला, 41, काली कृष्ण टैगोर स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 34. फूलचंद मुकिम चंद जैन धर्मशाला (श्वेतांबर-जैन), पी-30बी, कालाकार स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 35. रामचंद्र गोयनका धर्मशाला, 361, कालीघाट रोड, कलकत्ता-26, 36. मूँधड़ा धर्मशाला, 20-1, रतन सरकार गार्डन स्ट्रीट, कलकत्ता-7।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हावड़ा:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. गोपाल भवन, 3 गुड़ गोला घाट रोड, बांधाघाट, हावड़ा-6, 2. श्री सत्यनारायण धर्मशाला (सुरेका) 1, सत्यनारायण टेंपल रोड, बांधाघाट, हावड़ा, 3. साधुराम तोलाराम गोयनका धर्मशाला, मटरुमल लोहिया लेन, बांधाघाट, हावड़ा, 4. अग्रसेन भवन, 2, डोबर लेन (लिलुआ स्टेशन रोड), हावड़ा, 5. माधोगढ़ नागरिक परिषद, डबसन रोड (नीयर ए.सी. मार्केट), हावड़ा।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चिकित्सालय-औषधालय:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी, 227, रवींद्र सरणी, कलकत्ता-7, 2. श्री विशुद्धानंद सरस्वती मारवाड़ी हास्पीटल, 118, राजा राम मोहन राय सरणी, कलकत्ता-7, 3. रामरिकदास हरलालका अस्पताल, 104, आषुतोश मुखर्जी रोड, कलकत्ता-7, 4. लोहिया मातृ सेवा सदन, 43, रवींद्र सरणी, कलकत्ता-7, 5. मातृमंगल प्रतिष्ठान, 228, रवींद्र सरणी, कलकत्ता-7, 6. आशाराम भिवानीवाल अस्पताल, 55, काली कृष्ण टैगोर स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 7. बागला अस्पताल, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-7, 8. घासीराम बूबना आंख अस्पताल, 138, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-7, 9. विशुद्धानंद सरस्वती दातव्य औषधालय, 35-37, बड़तल्ला स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 10. दिगंबर जैन दातव्य औषधालय, 25, गोयनका लेन, कलकत्ता-6, 11. अम्बिका आयुर्वेद भवन, 6-1, बाबू लाल लेन, कलकत्ता-6, 12. गोविन्द दातव्य औषधालय, बांसतल्ला लेन, कलकत्ता-7, 13. आनंदलोक, सी.के. 44, साल्टलेक सिटी, कलकत्ता-91, 14.माहेश्वरी दातव्य औषधालय, 23, कालीकृष्ण टैगोर स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 15. रामकृष्ण दातव्य औषधालय, 4, गोयनका लेन, कलकत्ता-7, 16. हनुमान हास्पीटल, घुसड़ी, हावड़ा, 17. मारवाड़ी आरोग्य भवन, जसीडीह&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पुस्तकालय:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय, 1-सी, मदनमोहन बर्मन स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 2. मारवाड़ी सभा पुस्तकालय, बड़ाबाजार, कलकत्ता-7, 3. श्री तरुण संघ पुस्तकालय, 126, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 4. मारवाड़ी छात्र संघ पुस्तकालय, 150, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 5. श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी पुस्तकालय, 3, पोर्तुगीज स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 6. श्री फतेहपुर ब्राह्मण पंचायत पुस्तकालय, तीसी बाड़ी, तुलापट्टी, कलकत्ता-7, 7. श्री हनुमान पुस्तकालय, 76-जे.एम.मुखर्जी रोड, घुसड़ी, हावड़ा, 8. महावीर पुस्तकालय, 10-ए, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 9. सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय, 186, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7, 10. बड़ाबाजार लाइब्रेरी, 10-1-1, सैयद अली लेन, कलकत्ता-73, 11. माहेश्वरी पुस्तकालय, 4, शोभाराम वैशाख स्ट्रीट, कलकत्ता-7, 12. भारतीय भाषा परिषद, 36 ए, शेक्सपीयर सरणी, कलकत्ता-17।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्लब:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. श्री माहेश्वरी क्लब, 2. नीबूतल्ला स्पोर्टिंग क्लब, 3.श्री पुष्टिकर क्लब, 4. नवजीवन क्लब, 5. फ्रेंड्स मुनिमन क्लब, 6. हिंदुस्तान क्लब, 7. बंगाल र्रोइंग क्लब, 8. राजस्थान नवयुवक क्लब, 9. जोधपुर एसोसिएशन, 10. बिड़ला क्लब।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन (मारवाड़ी समाज की प्रतिनिधि संस्था) 152-बी, महात्मा गाँधी रोड, कलकत्ता-700007, 2. अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच (मारवाड़ी युवकों की प्रतिनिधि संस्था) 3432-13, हसन बिल्डिग, निकलसन रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली-110006, 3. मित्र परिषद, 4. अग्रसेन भवन, 5. राणीसती प्रचार समिति, 6. श्री श्याम मित्र मण्डल, 7. नागरिक स्वास्थ्य संघ, 8. झुन्झूंनू प्रगति संघ, 9. माहेश्वरी पंचायत, 10. ओसवाल नवयुवक संघ, 11. सेठ सूरजमल जालान वस्तु भण्डार, 12. राजस्थान जन सम्पर्क समिति, 13. कुम्हारटोली सेवा समिति, 14. ओसवाल भवन, 15. काशी विश्वनाथ सेवा समिति, 16. श्री दिगम्बर जैन मन्दिर , 17. श्री श्याम प्रेम मण्डल, 18. अग्रवाल सेवा संघ, 19. रतनगढ़ नागरिक परिषद, 20. केडिया समाज, 21. बजाज भरतिया सभा, 22. श्री राणीसती भक्त मण्डल, 23. श्री श्याम सत्संग मण्डल, 24. श्री शिव शक्ति सेवा समिति, 25. पुष्टिकर सेवा समिति, 26. हनुमान परिषद, 27. माहेश्वरी नवयुवक सेवा समिति, 28. अहिंसा प्रचारक समिति, 29. मारवाड़ी सेवा समिति, 30. श्री बजरंग परिषद, 31. माहेश्वरी सेवा समिति, 32. माहेश्वरी एजुकेशन बोर्ड, 33. जन सेवा संघ, 34. जैन श्वेताम्बर मित्र मण्डल, 35. माहेश्वरी महिला समिति, 36. मारवाड़ी युवा मंच, 37. कलकत्ता पिंजरापोल सोसाइटी, 38. पश्चिम बंगाल मारवाड़ी सम्मेलन 39.भारतीय भाषा परिषद, 40. भारतीय संस्कृति संसद, 41.परिवार मिलन, 42. विकास, 43. अर्चना (नाट्या मंच), 44. अनामिका (नाट्या मंच), 45. पदातिका (नाट्या मंच), 46. माहेश्वरी संगीतालय, 47. हिंदी नाट्या परिषद, 48. संगीत कला मन्दिर, 49. रामगढ़ महाजन संघ, 50. खण्डेलवाल परिषद, 51. श्री माली ब्राह्मण युवक मण्डल, 52. तरुण संघ, 53. दधीच सभा, 54. राजस्थान परिषद, 55. साल्टलेक संस्कृति संसद, 56. विधान नगर संस्कृति संसद, 57. पूर्वांचल कल्याण आश्रम, 58. माहेश्वरी समाजोत्थान समिति, 59. हावड़ा जिला मारवाड़ी सम्मेलन, 60. कलकत्ता मारवाड़ी सम्मेलन, 61. श्री मैढ़ क्षत्रिय सभा, 62. विद्यालय विकास समिति, 63. शक्ति दल, 64. कलकत्ता नागरिक संघ, 65. मानव सेवा संघ, 66. रिसड़ा जन सेवक संघ, 67. माहेश्वरी भवन (रिसड़ा), 68. मिलनश्री 69.सलकिया सेवा संघ, 70. ब्राह्मण (राजस्थान हरियाणा) संघ, 71. सरदार शहर परिषद, 72. बीदासर नागरिक परिषद, 73. नागौर नागरिक संघ, 74. कौटपुतली नागरिक परिषद, 75. लक्ष्मणगढ़ नागरिक परिषद, 76. विकास परिषद चाडवास, 77. नीमकाथाना अंचल नागरिक संघ, 78. राजगढ़ सादुलपुर नागरिक परिषद, 79. देशनोक युवा मंच, 80. अलसीसर सेवा संघ, 81. राजलदेसर नागरिक परिषद, 82. गंगाशहर नागरिक परिषद, 83. नापासर युवा मंच, 84. रतनगढ़ नागरिक परिषद, 85. श्री भादरा परिषद, 86. लोसल नागरिक परिषद, 87. श्री माधोपुर नागरिक परिषद, 88. मंड्रेला नगर विकास परिषद, 89. चुरु नागरिक परिषद, 90. तारानगर युवक परिषद, 91. रामगढ़ नागरिक परिषद, 92. रतन नगर परिवार (कलकत्ता), 93. स्टार सिटी यूथ फेडरेशन, 94. बीकानेर अंचल नागरिक परिषद, 95. छापर नागरिक परिषद, 96. हरसोर नागरिक परिषद, 97. नोखा नागरिक परिषद, 98. &lt;br /&gt;जोधपुर एसोसिएशन, 99. निम्बीजोधां नागरिक परिषद, 100. छोटीखाटू नागरिक परिषद, 101. श्री माधोपुर विकास परिषद, 102. राजस्थान जनकल्याण समिति, 103. सांभर क्लब, 104.मलसीसर चेरिटी ट्रस्ट, 105. लाडनूं नागरिक परिषद, 106. सीकर परिषद, 107. श्री डूंगरगढ़ नागरिक परिषद, 108. अजमेर एसोसिएशन, 109. मेवाड़ मित्र मण्डल, 110. श्री डीडवाना नागरिक सभा, 111. सुजानगढ़ नागरिक परिषद, 112. मुकुन्दगढ़ नागरिक परिषद, 113. खंडेला नागरिक परिषद, 114. भीनासर नागरिक परिषद कलकत्ता, 115. पूर्वांचल नागरिक समिति, 116. महेन्द्र नागरिक परिषद, 117.श्री जैन सभा, 118. भारत रिलिफ सोसाइटी, 119. अग्रवाल परिणय-सूत्र समिति।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;विद्यालयों की सूची:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;Ashoka Hall, 5A, Sarat Bose Road, Kolkata-20, Daulat Ram Nopany Vidyalaya, 2D, Nando Mullick Lane, Kolkata-6, Birla High School, 1, Moira Street, Kolkata-17, Haryana Vidya Mandir, BA/193, Sector-I, Salt lake City, Kolkata-64, Junior Birla High School, 1, Moira Street, Kolkata-17, Sri Jain Vidyalaya, 25/1, Bon Bihari Bose Road, Howrah, Mahadevi Birla Shishu Vihar, 4, Iron Side Road, Kolkata-19, M.B.Girls High School, 17, Darga Road, Kolkata-17, M.P.Birla Foundation H.S.School, James Long Sarani, Kolkata-34, Modern High School for Girls, 78, Syed Amir Ali Avenue, Kolkata-19, Sri Sikshayatan, 11, Lord Sinha Road, Kolkata-71, South Point School, 87/7A, Ballygunge Place, Kolkata-19, Abhivav Bharati High School, 211, Pritoria Street, Kolkata-71, Balika Siksha Sadan, 87, Vivekananda Road, Kolkata-6, Balika Vidya Bhawan, 41, Brajodulal Street, Kolkata-7, Digambar Jain Vidyalaya, P34/35, Cotton Street, Kolkata-7, Digambar Jain Balika Vidyalaya, 211, M.G.Road, Kolkata-7, Gyan Bharati Vidyapith, 64A, Nimtallaghat Street, Kolkata-6, Gyan Bharati Balika Vidyalay, 64A, Nimtallaghat Street, Kolkata-6, Shree Jain shikshalaya, P-25, Kalakar Street, Kolkata-7, Shree Jain Swetambar Terapanthi Vidyalaya, 3, Portugese Church Street, Kolkata-7, Maheshwari Girls School, 273, Rabindra Sarani, Kolkata-6, Maheshwari Vidyalaya, 4, Sovaram Bysack Street, Kolkata-7, Marwari Balika Vidyalaya, 29, Banstolla Lane, Kolkata-7, Maheshwari Balika Vidyalaya, 4, Sovaram Bysack Street, Kolkata-7, Rajasthan Vidya Mandir, 36, Varanasi Ghosh Lane, Kolkata-7, Saraswat Kshetriya Vidyalaya, 4, Burman Street, Kolkata-7, Set Surajmal Jalan Balika Vidyalaya, 186, Chitaranjan Avenue, Kolkata-7, Tantia High School, 2, Syed sally Lane, Kolkata-73, Visuddanand Saraswati Vidyalaya, 160A, Chittaranjan Avenue, Kolkata-7, Jalan Girls College, College Street, Kolkata-12, Goenka Commerce College, Bow Bazar Street, Kolkata-12.&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बम्बई में मारवाड़ी समाज की संस्थाएं&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. मारवाड़ी सम्मेलन, 227, कालबा देवी रोड, मुम्बई- 400002, (क) श्री मती भागीरथीबाई मानमल रुई महिला महाविद्यालय, (ख) सीताराम पोद्दार बालिका विद्यालय, (ग) श्री शिव कुमार भुवालका हिंदी पुस्तकालय। 2. बम्बई अस्पताल, 12, वी. ठाकरसी मार्ग, मुम्बई- 400020, 3. राजस्थानी महिला मण्डल, 12, क्रा. वसंतराव नाईक क्रॉस लेन, फोर्जेट स्ट्रीट, ग्वालियर टैंक, मुम्बई - 400036, 4. राजस्थानी सम्मेलन, मालाड (सर्वोदय बालिका विद्यालय भवन), एस. विही. रोड, मालाड, मुम्बई-400064 (क) सर्वोदय बालिका विद्यालय, (ख) घनश्यामदास सराफ कालेज आँफ आटर््स एण्ड कामर्स (ग) धूड़मल बजाज भवन, 5. मारवाड़ी विद्यालय हाई स्कूल, सरदार बल्लभ भाई पटेल मार्ग, गिरगांव, मुम्बई - 400004, 6. मारवाड़ी कामर्शियल हाई स्कूल, (संचालित-हिंदुस्तान चेम्बर आँफ कामर्स), गजधर गली, चीरा बाजार, मुम्बई-400002, 7. नवजीवन विद्यालय हाई स्कूल, मालाड (संचालित राजस्थान रिलीफ सोसाइटी), राणीसती मार्ग, मालाड (पूर्व), मुम्बई-400057, 8. राजस्थान विद्यार्थी गृह, अंधेरी, लल्लू भाई पार्क, अंधेरी (प.) मुम्बई-400058, 9.बृजमोहन लक्ष्मीनारायण रुईया, बहुद्देश्य हाई स्कूल, विले पार्ले, महंत रोड, विले पार्ले (पूर्व), मुम्बई-400057, 10. श्रीमती दुर्गाबाई, बृजमोहन लक्ष्मी नारायण रुईया, प्राथमिक म्युनिसिपल शाखा, महंत रोड, विलेपार्ले (पूर्व) मुम्बई-400057, 11. जमनादास अड़किया बालिका विद्यालय, कांदिवली, राम गली, विवेकानंद रोड, मुम्बई-400067, 12.हिंदी हाई स्कूल-घाटकोपर, झुनझुनूवाला कालेज के पीछे, घाटकोपर, मुम्बई-400086, 13. रामनिरंजन झुनझुनवाला आटर््स एण्ड र्साइंस कालेज-घाटकोपर, (संचालित-हिंदी विद्या प्रचार समिति), घाटकोपर, मुम्बई-400086, 14. प्रह्लाद राय डालमिया लायंस कालेज आँफ कामर्स, सुन्दर नगर, एस. व्ही. रोड, मालाड (प.), मुम्बई-400064, 15. श्रीमती कमलादेवी गौरीदत्त मित्तल, पुनर्वसु आयुर्वेद कालेज एवं अस्पताल, (संचालक-आयुर्वेद प्रचार संस्था), नेताजी सुभाष रोड, मुम्बई-400019, 16. रामनारायण रुईया कालेज, माटूंगा रेलवे स्टेशन (म.रेलवे), मुम्बई-400019&lt;br /&gt;17.रामदेव आनन्दोलाल पोद्दार आयुर्वेदिक कालेज, वरली नाका, (महाराष्ट्र सरकार द्वारा संचालित), वरली, मुम्बई-18, 18. किशनलाल जालान धमार्थ आयुर्वेदिक औषधालय,किसन रोड, मालाड (प.) मुम्बई-400064, 19.हरियाणा नागरिक संघ, 212-216, रंगमहल, सेम्युअल स्ट्रीट, मुम्बई-400003, 20. हरियाणा मित्र मण्डल, 337, कालवा देवी रोड, मुम्बई-400002, 21. अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी अग्रवाल जातीय कोष, 227, कालबा देवी रोड, मुम्बई-400002, 22. माहेश्वरी प्रगति मण्डल, 603, जगन्नाथ शेकर सेठ रोड, मुम्बई-400002, 23. राजपूताना शिक्षा मण्डल, 227, कालबा देवी रोड, मुम्बई -400002, 24. राजस्थानी नेशनल ग्रेज्युएट्स एसोसिएशन, 501, निरंजन, 9, मरीन ड्राईव, मुम्बई-400002, 25. राजस्थानी सेवा संघ, जे. बी. नगर, अंधेरी, मुम्बई-400059, 26. श्री घनश्यामदास पोद्दार विद्यालय, जे. बी. नगर, अंधेरी, मुम्बई-400059, 27. श्री गुरुमुखराय सुखानंद दिगम्बर जैन धर्मशाला, सी. पी. टैंक, मुम्बई-400004, 28. मारवाड़ी फतेहपुरिया पंचायती बाड़ी ट्रस्ट, 41-2, पांजारापोल लेन, मुम्बई-400004, 29. सत्यनारायण गोयनका भवन, (पंचायती सेवा ट्रस्ट), जे.बी.नगर, अंधेरी, मुम्बई-400059, 30. नेमानी वाड़ी, 61, ठाकुरद्वार रोड, मुम्बई-400002, 31. नाथूराम पोद्दार बाग ट्रस्ट, 111-119, ठाकुर द्वार रोड, मुम्बई-400002, 32. बिड़ला वाड़ी, आर-6-30, सीताराम पोद्दार मार्ग, मुम्बई-400002, 33. दाखीबाई सिंघानिया धर्मशाला वाड़ी ट्रस्ट, 18, दादीशेठ अग्यारी लेन, मुम्बई-400002, 34. सराफ मातृ मंदिर, मालाड, (मालाड को-आ. हॉ. सोसाइटी के सामने), पोद्दार रोड, मुम्बई-400097, 35. रुईया वाड़ी, मालाड, (मालाड स्टेशन के पास), कस्तूरबा रोड, मालाड, मुम्बई-400064, 36. राजपुरिया बाग (मदनलाल राजपुरिया ट्रस्ट), नवीनभाई ठक्कर मार्ग, विले पार्ले (पूर्व), मुम्बई- 400057, 37. अग्रवाल सेवा समाज, अग्रसेन भवन, 251, ठाकुरदास रोड, मुम्बई-400002, 38. झुंझुनू प्रगति संघ, 227, कालबा देवी रोड, मुम्बई-400002, 39. राजस्थानी सेवा समिति, 1-ए. 22, नालन्दा एवरशाईन नगर, मुम्बई -400064, 40. राणीसती सार्वजनिक औषधालय, 508, मालाड को.आ.हा.सो., मालाड, मुम्बई-400097, 41. राजस्थानी वेल्फेयर एसोसिएशन, 22, बी. देसाई रोड, मुम्बई-400026, 42. नवलगढ़ नागरिक संघ, 307-309, कालबा देवी रोड, मुम्बई-400002, 43. बिड़ला ब्राह्मण वाड़ी, 98, व्ही.पी.रोड, मुम्बई-400004, 44. बिड़ला चैरिटेबल डिस्पेंसरी, 18, व्ही.पी.रोड, मुम्बई-400004, 45. फतेहपुर शेखावटी प्रगति संघ, 212, कालबा देवी रोड (2 माला), मुम्बई-400002, 46. राजस्थान कला केंद्र, नीलम मेंशन, भडकमकर मार्ग, मुम्बई-400004।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;center&gt;&lt;strong&gt;मारवाड़ी समाज द्वारा अन्य प्रांतों में किए गए सेवा कार्यों की एक झलक&lt;/center&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;उड़ीसा प्रांत:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. हिन्दी विद्यालय, जटनी, 2. वैश्य विद्यालय, कटक, 3. हिन्दी बालिका विद्यालय, बरगढ़, 4. हिन्दी एम.ई.स्कूल, सम्बलपुर, 5. हिन्दी स्कूल खेतराजपुर, सम्बलपुर, 6. हिन्दी स्कूल, बरगढ़, 7. हिन्दी विद्यालय, बलांगीर, 8. महाबीर हिन्दी विद्यालय, टीटलागढ़, 9. कौशल हिन्दी विद्यालय, तुसरा पटना स्टेट, 10. वीर प्रताप हिन्दी विद्यालय, तरमा, 11. ओरिएण्ट पेपर मिल हाई स्कूल, वृजराज नगर, 12. मारवाड़ी विद्या मन्दिर, झारसुगड़ा, 13. हिन्दी विद्यालय, जूनागढ़, 14. मारवाड़ी विद्यालय, खड़गप्रसाद, 15. राष्ट्रीय हिन्दी विद्यालय, 16. श्री मुकुन्दीलाल अग्रवाल महिला महाविद्यालय, 17. चमेली देवी महिला महाविद्यालय 1998 में।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पुस्तकालय:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. हिन्दी साहित्य समिति पुस्तकालय, कटक, 2. हिन्दी पुस्तकालय, जटनी, 3. राष्ट्रीय पुस्तकालय, बालेश्वर,  4.श्री कृष्ण पुस्तकालय, सम्बलपुर, 5. हनुमान पुस्तकालय, सम्बलपुर, 6. हिन्दी छात्र संघ पुस्तकालय, बरगढ़, 7. कस्तूरबा पुस्तकालय, खेतराजपुर।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धर्मशालाएं:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. रामचन्द्र गोयनका धर्मशाला, पुरी, 2. देवीदत्त दूधवेवाला धर्मशाला, पुरी, 3. कन्हैयालाल बागला धर्मशाला, पुरी, 4. गनपतराम खेमका धर्मशाला, पुरी, 5. आज्ञाराम मोतीराम कोठारी धर्मशाला, पुरी, 6. चिमनलाल गनेड़ीवाला धर्मशाला, पुरी, 7. सूरजमल नागरमल गेस्ट हाउस, पुरी, 8. हलवासिया धर्मशाला, साखी गोपाल, भुवनेश्वर, 9. दूधवेवाला धर्मशाला, भुवनेश्वर, 10. मारवाड़ी धर्मशाला, सोनपुर, 11. घासीराम जी भोलानाथ धर्मशाला, कटक, 12. इच्छाराम जी बदरी प्रसाद धर्मशाला, कटक, 13. गोपीनाथ जी की धर्मशाला, कटक (दो धर्मशाला), 14. पंचायती मारवाड़ी धर्मशाला, अंगुल, 15. मारवाड़ी धर्मशाला, जाजपुर, 16. बदरीप्रसाद पतंगिया धर्मशाला, भुवनेश्वर, 17. मारवाड़ी धर्मशाला, रायरंगपुर, 18. मारवाड़ी धर्मशाला, सम्बलपुर, 19. पालीराम जी की धर्मशाला, सम्बलपुर, 20. मामचन्द मूलचन्द जी की धर्मशाला, झाड़सुगड़ा, 21. मारवाड़ी धर्मशाला, झारसुगुड़ा, 22. जानकीदास गणपत राम की धर्मशाला, झारसुगुड़ा, 23. मारवाड़ी धर्मशाला, बलांगीर, 24. मारवाड़ी पंचायती धर्मशाला, बरागढ़, 25. मारवाड़ी धर्मशाला, टीटलागढ़, 26. मारवाड़ी धर्मशाला, कांटाबाजी, 27. मारवाड़ी धर्मशाला, तुसरा, 28. मारवाड़ी धर्मशाला, तरभा, 29. हरिभवन (धर्मशाला), 30. श्री गोपाल गोशाल, 31. सेठ बालकिशन दास अग्रवाल (धर्मशाला) 32. श्री अग्रसेन भवन कम्पलेक्स, 33. श्री राम मंदिर, 34. श्री राधाकृष्ण मंदिर, 35. श्री दुर्गा पूजा पंडाल भवन, 36. श्री जैन भवन, 37. श्री ब्राह्मण &lt;br /&gt;धर्मशाला (निर्माणाधीन) है। 38. पुरानी धर्मशाला 1955 में, 39. न्यू धर्मशाला 1975 में, 40. अग्रसेन भवन 2010 में, 41. गायत्री मन्दिर 2000 में, 42. अग्रसेन भवन मारवाड़ी धर्मशाला, 43. गुलाब भवन मारवाड़ी धर्मशाला।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;गौशाला:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सम्बलपुर, बरगढ़, झाड़सुगुड़ा, बालेश्वर, राजगांगपुर, भद्रक, सोरों, कटक।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;डिब्रूगढ़ (असम):&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. सेठ रामेश्वर सहरिया स्मृति भवन, 2. भगवानदास गाड़ोदिया स्मृति भवन, 3. सूरजमल जालान बालिका शिक्षा सदन, 4. श्री मारवाड़ी हिन्दी पुस्तकालय, 5. लाल चन्द कनोई मेमोरियल आँडिटोरियम, 6. श्री गोपाल गोशाला, 7. मनोहर देवी कनोई महिला महाविद्यालय, 8. डिब्रूगढ़ हनुमान बक्स सूरजमल कनोई वाणिज्य महाविद्यालय, 9. श्री राधाकृष्ण देवस्थानम (मन्दिर) जालान नगर, 10. श्री वेंकटेश देवस्थानम (मन्दिर), 11. मारवाड़ी आरोग्य भवन, अस्पताल, 12. श्री विश्वनाथ मारवाड़ी दातव्य औषधालय, 13. डिब्रूगढ़ हनुमान बक्स सूरजमल कनोई महाविद्यालय, 14. डिब्रूगढ़ हनुमान बक्स सूरजमल कनोई, कानून महाविद्यालय, 15. मारवाड़ी हिन्दी हाई स्कूल,  16. मारवाड़ी हिन्दी प्राइमरी स्कूल (जालान नगर) 17. श्री अग्रसेन मिलन मन्दिर, 18. श्री राधाकृष्ण मन्दिर, 19. श्रीदेरगाँव मारवाड़ी पंचायत धर्मशाला (तीन मंजिली), 20. श्रीमारवाड़ी सत्यनारायण ठाकुरबाड़ी, 21. श्रीशिवलाल बाँयवाला बी.एड.कालेज, 22. सार्वजनिक हिंदी पुस्तकालय (दो मंजिल), 23. मारवाड़ी दातव्य औषधालय (होम्योपैथी), 24. शिशुभारती नामक अंग्रेजी बाल विद्यालय हेतु श्री मोहनलाल बाँयवाला द्वारा दो बीघा भूमि दान, 25. देरगाँव के लुकुमोय में उच्च विद्यालय हेतु श्रीजयनारायण काबरा द्वारा दो बीघा भूमि दान, 26. देरगाँव के रांगामाटी में मंदिर हेतु स्व. गणपतलाल काबरा द्वारा एक बीघा भूमि दान, 27. मारवाड़ी युवा मंच संगठन द्वारा समाज सेवा, 28. मारवाड़ी संमेलन की देरगाँव शाखा संचालित, 29. माहेश्वरी सभी की देरगाँव शाखा संचालित।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मणिपुर (इम्फाल):&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. चिकित्सा आवास भवन, 2. भगवानलाल पाटनी चिकित्सा आवास भवन (मणिपुर मेडिकल कालेज के पास), 3. मारवाड़ी धर्मशाला।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कानपुर:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1.राधाकृष्ण मन्दिर, कमला नगर, 2. कमलेश्वर मन्दिर, परमट, 3. द्वारिकाधीश मन्दिर, कमला नगर, 4. लाला लक्ष्मीपत सिंघानिया इन्स्टीट्यूट आँफ कार्डियोलाजी, गुरैया, 5. लाला कैलाशपत सिंघानिया इन्स्टीट्यूट आँफ मेडिसीन, मोतीझील, 6. लाला कमलपत मेमोरियल हास्पिटल, बिरहाना रोड, 7. जुहारी देवी कन्या महाविद्यालय, केनाल रोड, 8. जी.एन.के.इण्टर कालेज, सिविल लाइंस, 9. सर पद्मपत सिंघानिया एजुकेशन सेण्टर, 10. श्री मारवाड़ी पुस्तकालय तथा वाचनालय, बिरहाना रोड, 11. जे.के. इंस्टीट्यूट आँफ कैंसर रिसर्च।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भागलपुर:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. मारवाड़ी महाविद्यालय, 2. यतिन्द्र नारायण आयुर्वेद महाविद्यालय, 3. मारवाड़ी पाठशाला, 4. बाल सुबोधिनी पाठशाला, 5. मारवाड़ी कन्या पाठशाला, 6. भजनाश्रम पाठशाला, 7. सरस्वती विद्या- शिशु मन्दिर, नाथनगर, 8. शारदा देवी झुनझुनवाला महाविद्यालय, 9. सरस्वती विद्या मन्दिर, 10. हनुमान विद्यालय, 11. रावतमल छात्रावास, 12.मोती मातृ सेवा सदन, 13. रुक्मिणी मातृ सेवा सदन, 14. जगदीश बुधिया नेत्र चिकित्सालय, 15. श्रीमती मन्नी बाई पोद्दार नेत्र चिकित्सालय, 16. जैन चिकित्सालय, 17. साह चिकित्सालय, 18. आनन्द चिकित्सालय, 19. महिला धर्म संघ, 20. सत्संग भवन, 21. स्व. देवी प्रसाद ढंढानिया धर्मशाला, 22. दिलसुख राम धर्मशाला, 23. डोकानिया धर्मशाला, 24. कमला कानोड़िया धर्मशाला, 25. टिबड़ेवाल धर्मशाला, 26. राणीसती धर्मशाला, 27. मारवाड़ी मण्डल धर्मशाला, 28. साह चैरिटेबुल ट्रस्ट, 29. जैन धर्मशाला (श्वेताम्बर), 30. जैन धर्मशाला (दिगम्बर), 31. अग्रसेन भवन धर्मशाला, 32. जिलोका धर्मशाला, 33. गोशाला, 34. मारवाड़ी सुधार समिति, 35. मारवाड़ी व्यायामशाला, 36. ज्ञानदीप (शैक्षणिक संस्थान)।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बिहार में मारवाड़ी समाज द्वारा स्थापित महाविद्यालय&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. मारवाड़ी कालेज, किशनगंज, 2. फारबिसगंज कालेज, 3. मोहन लाल जिलोका मेमोरियल कालेज, कटिहार, 4. टाटा कालेज, चाईबासा, 5. महिला कालेज, चाईबासा, 6. राजस्थान बिहार मन्दिर रात्रि कामर्स कालेज, गया, 7. ज्ञान चन्द जैन कामर्स कालेज, चाईबासा, 8. महिला महाविद्यालय, झरिया, 9. मारवाड़ी कालेज, दरभंगा, 10. जे.जे. कालेज, हजारीबाग, 11. चतरा कालेज, 12. झुमरीतलैया कालेज, 13. रामगढ़ कालेज, 14. एस. आर. के. गोयनका कालेज, सीतामढ़ी, 15. भरतिया महिला कालेज, पटना सिटी, 16. राम निरंजन दास संस्कृत महाविद्यालय, पटना सिटी, 17. एस. पी. जैन कालेज, सासाराम, 18. मारवाड़ी संस्कृत महाविद्यालय, मझौलिया, 19.मारवाड़ी संस्कृत महाविद्यालय, छपरा, 20. मझौलिया संस्कृत महाविद्यालय, मझौलिया, 21. गया कालेज (गोपीराम डालमिया), गया, 22. गिरीडीह कालेज (चान्दमल जी राजगढ़िया), गिरीडीह, 23. सहरसा कालेज (शंकर प्रसाद टेकरीवाल परिवार), सहरसा,  24.धरान मोरान नेपाल महाविद्यालय, नेपाल।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आन्ध्र प्रदेश (हैदराबाद):&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. मारवाड़ी हिन्दी पुस्तकालय, हश्मतगंज, 2. मारवाड़ी हिन्दी पुस्तकालय, हश्मतगंज, 3. मारवाड़ी हिन्दी पुस्तकालय, सिकन्दराबाद, 4. मारवाड़ी हिन्दी पुस्तकालय, कसार हट्टा, 5. राजस्थानी विद्यार्थी गृह, हैदराबाद, 6. राजा बहादुर सर बंसीलाल मोतीलाल हॉस्पीटल, हैदराबाद, 7. श्री जैन पुस्तकालय- वाचनालय, सिकन्दराबाद, 8. सुख भवन, चारकमान, 9. राम भवन, घांसी बाजार, 10. हरि भवन, काली कमान, 11. भानमल लूणिया धर्मशाला, हनुमान टेड़ी, 12. श्री महावीर जैन छात्रालय, हनुमान टेड़ी, 13. अग्रवाल सेवा समिति, गांधी नगर, 14. राम प्रताप कन्हैयालाल पित्ती धर्मशाला, 15. जगदीश कन्या पाठशाला, महबूबगंज, 16. राजाबहादुर सर बंसीलाल बालिका विद्यालय, 17. गुरुकुल घटकेश्वर (पुस्तकालय, गोशाला), 18. सनातन धर्मशाला, बेगम बाजार, 19. मारवाड़ी हिन्दी विद्यालय, बेगम बाजार, 20. ज्ञान प्रकाश पुस्तकालय, उर्दू शरीफ, 21. एस.एस.जैन विद्यालय, सिकन्दराबाद, 22. शांतिलाल जैन के. जी. एण्ड प्राइमरी स्कूल, 23. वैदिक वाचनालय, गांधी नगर, 24. मदन भवन, चारकमान, 25. पूनमचन्द गांधी जैन धर्मशाला, काचीमुड़ा स्टेशन, 26. बंसीलाल भवन, आफजलगंज, 27. महावीर जैन पुस्तकालय, हबीरपुरा, 28. बाल विद्या मन्दिर, शमशेर गंज, 29. घासीलाल तोषनीवाल भवन, शमशेरगंज, 30. श्री अम्बा सदन, गोविन्दवाड़ी, 31. शिव भवन, चारकमान, 32. शिवनाथ दरक स्मारक विद्यालय, दारुलशफा, 33. श्री माहेश्वरी भवन, बेगम बाजार, 34. श्री सिखपाल सेवा संघ भवन, फीलखाना, 35. राम गोपाल बाहेती भवन, सिद्धि अम्बर बाजार, 36. लक्ष्मी बाल पुस्तकालय, चारकमान, 37. साधना मन्दिर, बोलाराम, 38. शिवदत्त राय हाई स्कूल, लाड़ बाजार, 39. अग्रवाल सभा भवन, सिद्ध अम्बर बाजार, 40. जगदीश भवन, गांधी नगर, 41. अग्रसेन वाचनालाय, सिद्ध अम्बर बाजार, 42. राजस्थानी नवयुवक मण्डल पुस्तकालय, कबूतरखाना, 43. रुपचन्द मेघाज कोचर भवन, 44. जैन भवन, महाराजगंज, 45. राजस्थान भवन ट्रस्ट, 46. श्री पद्मश्री नैनसी भवन ट्रस्ट, 47. श्री रामनाथ आश्रम ट्रस्ट, 48. हरि प्रसाद स्मारक अस्पताल, पत्थर गट्टी, 49. गोपीकृष्ण मलाणी भवन ट्रस्ट, 50. राजस्थानी हिन्दी पुस्तकालय, बेगम बाजार, 51. बद्रुका वाणिज्य एवं कला महाविद्यालय, 52. अमृत कपाड़िया नवजी वन वीमेन्स कालेज, 53. चाचा नेहरु बाल केन्द्र एवं फिल्म सेन्टर, 54. शिशु सुरक्षा केन्द्र, 55. नवजीवन बालिका विद्यालय, 56. श्री कृष्ण मोरक्षिणी सभा (गोशाला), 57. अग्रवाल शिक्षा समिति भवन, 58. शंकर लाल धनराज सिंगनोदिया महिला कला महाविद्यालय, पत्थरागट्टी 59. श्री सत्यनारायण मन्दिर, गुंटुर, 60. श्री महावीर जैन विद्यालय व स्थानक, गोशाला, 61. अग्रवाल शिक्षा समिति के अन्तर्गत चलने वाले संस्थान, 1. अग्रवाल हाई स्कूल, 2. अग्रवाल जूनियर कालेज, 3. अग्रवाल बालिका विद्यालय हाई स्कूल, 4. अग्रवाल बालिका जूनियर कालेज, 5. नानकराम भगवानदास विज्ञान महाविद्यालय, 6. अग्रवाल विज्ञान एवं वाणिज्य सायंकालीन महाविद्यालय, 62. श्रीराम हिन्दी भवन (हैदराबाद हिन्दी प्रचार सभा), 63. श्री वेंकटेश्वर मन्दिर भवन, चारकमान, 64. हरिचरण मारवाड़ी हिन्दी विद्यालय, निजामाबाद, 65. राजस्थानी भवन, निजामाबाद, 66. श्रीमती अशरफ देवी अग्रवाल जूनियर महाविद्यालय, निजामाबाद, 67. श्री लक्ष्मी नारायण मन्दिर, मंचरियाल, 68. पन्नालाल हीरालाल हिन्दी विद्यालय, बीदर, 69. राजस्थान सेवा भवन, सिरपुर-कागजनगर, 70. राजस्थानी विद्यार्थी गृह, नान्देड़, औरंगाबाद, विजयवाड़ा, 71. मारवाड़ी पंचायत भवन (धर्मशाला), आदिलाबाद, 72. राष्ट्रभाषा हिन्दी विद्यालय, मंचरियाल, &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;73. श्री मारवाड़ी राजस्थान शिक्षण संस्था, लातूर के अन्तर्गत चलने वाले शिक्षण संस्थान:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. श्री मारवाड़ी राजस्थान बहुउद्देशीय विद्यालय, 2. श्री गोदावरी देवी लाहोटी कन्या विद्यालय-दो शाखाएं, 3. श्री सूरजमल लाहोटी पाठशाला, 4. एस.टी.सी. इन्स्टीट्यूट&lt;br /&gt;74. मारवाड़ी युवक वाचनालय, लातूर, &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;75. जालना एजुकेशन सोसायटी, जालना के अन्तर्गत चलने वाली संस्थायें:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. आर.जी. बगड़िया आट्र्स कालेज, 2. एस.वी. लाखोटिया कामर्स कालेज, 3. आर. वंसजी साइन्स कालेज एवं 4. श्रीमती राम प्यारी बाई बंसीलाल जी लाखोटिया डिपार्टमेंट आँफ पोस्ट ग्रेज्युएट टीचिंग संस्थान, 76. राष्ट्रीय हिन्दी विद्यालय, जालना, 77. श्रीमती दान कंवर देवी कन्या विद्यालय हाई स्कूल, जालना, 78. महावीर स्थानक वासी जैन विद्यालय, जालना, 79. हिन्दी प्राथमिक पाठशाला, बारंगल, 80. राजस्थानी सेवा समाज भवन, सिरपुर कागजनगर, 81. हनुमान मन्दिर, आदिलाबाद, जलगांव, पेट्टापल्ली, 82. राजस्थानी रिलीफ सोसायटी, रामावरम।&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;-: सूची में सुधार हेतु लिखें:-&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;शम्भु चौधरी, एफ.डी. 453, साल्टलेक सिटी, कलकत्ता- 700106&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;मारवाड़ी अस्पताल ‘वाराणसी’&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;photo&lt;br /&gt;आज से 90 वर्ष पूर्व सन् 1916 में कोलकाता के कानोड़िया परिवार द्वारा मारवाड़ी अस्पताल का शिलान्यास व उद्घाटन तत्कालीन गर्वनर सर जेम्स वेस्टन ने 12 अगस्त 1916 को किया गया। अस्पताल के लिए स्थान का चयन बड़ी दूरदर्शिता से काशी आने वाले पर्यटक एवं यात्रियों का मुख्य आकर्षण माँ गंगा का दर्शन एवं स्नान तथा बाबा भोलेनाथ का दर्शनपूजन को ध्यान में रख कर किया गया। काशी शहर में व्यस्ततम चैराहे गोदौलिया पर स्थित अस्पताल माँ गंगा व भोलेनाथ से पाँच मिनट की दूरी पर है। संस्थापकों की ऐसी मान्यता थी कि अगर मर्ज है तो उसका इलाज भी है। निदान विधि भिन्न हो सकती है। अतः ऐलोपैथी के साथ-साथ आयुर्वेद विभाग की स्थापना सन् 1921 में की गई तत्पश्चात् 1936 में होम्योपैथी विभाग की स्थापना की गई। मरीजों को शुद्ध एवं प्रमाणिक आयुर्वेदिक दवा प्राप्त हो इसके उद्देश्य से निर्माण शाला की स्थापना की गई। जिसमें योग्य वैद्यों की निगरानी में शत् प्रतिशत शुद्ध दवाओं का निर्माण होता है। अतः यहाँ मर्ज ठीक करने वाली तीनों विधाएँ उपलब्ध हैं।&lt;br /&gt;अस्पताल में प्रातः दूध एवं बिस्कुट तथा दोपहर एवं शाम को पवित्रता से बना हुआ सुपाच्य गरम भोजन ही रोगियों को निःशुल्क दिया जाता है और साथियों को मात्र 10/- रुपये में।&lt;br /&gt;इस चिकित्सा संस्थान ने आजादी के पहले स्वंत्रता संग्राम सेनानियों की निर्भीकता से चिकित्सा सेवा की जबकि उनकी चिकित्सा करना अंग्रेजों की नजर में अपराध माना जाता था।&lt;br /&gt;भारत के प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने 1964 में अस्पताल के महिला एवं बाल चिकित्सा विभाग का उद्घाटन किया एवं विभिन्न अवसरों पर देश के शीर्ष नेतागण डॉ. सम्पूर्णानन्द, डॉ. रघुनाथ सिंह, श्री श्रीप्रकाश जी, श्री मोहन लाल सुखाड़िया, श्री दाऊदयाल खन्न, श्री चन्द्रभान गुप्ता आदि ने अस्पताल में पधार कर इसके विकास में अमूल्य योगदान किया। पं. कमलापति त्रिपाठी जी का उपाध्यक्ष के रूप में अन्तिम सांस तक अस्पताल के उत्थान में पूरा मार्गदर्शन एवं योगदान मिला। सेवा क्षेत्र में नये आयामों को प्राप्त करते हुए अपनी लम्बी सेवा अवधि में अस्पताल काफी उतार-चढ़ाव देखा फलस्वरूप संस्थापकों ने अस्पताल में नया संचार प्रदान करन
