आपणी भासा म आप’रो सुवागत

'आपणी भासा' ई-पत्रिका में मारवाड़ी समाज से जुड़ी जानकारी, सामाजिक बहस व समाज में व्याप्त कुरीतियोँ के प्रति सजग इस पेज पर आप समस्त भारतीय समाज के संदर्भ में लेख प्रकाशित करवा सकतें हैं। हमें सामाजिक लेख, कविता, सामाजिक विषय पर आधारित कहानियाँ या लघुकथाऎं आप मेल भी कर सकतें हैं। सामाजिक कार्यक्रमों की जानकारी भी चित्र सहित यहाँ प्रकाशित करवा सकतें हैं। मारवाड़ी समाज से जुड़ी कोई भी संस्था हमारे इस वेवपेज पर अपनी सामग्री भेज सकतें हैं। आप इस ब्लॉग के नियमित लेखक बनना चाहतें हों तो कृपया अपना पूरा परिचय, फोटो के साथ हमें मेल करें।- शम्भु चौधरी E-Mail: ehindisahitya@gmail.com



शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन का संक्षिप्त इतिहास

(सन् 1935 से 2008 तक) - शम्भु चौधरी


मारवाड़ी सम्मेलन की स्थापना सन् 1935 में हुई थी। यद्यपि समाज के विभिन्न वर्गो के, जैसे-अग्रवाल, माहेश्वरी, ओसवाल, खण्डेवाल, विजयवर्गीय, ब्राह्मण, राजपूत-आदि के अपने बड़े या छोटे संगठन थे, जो प्रधानतः व्यापारिक एवं रुढ़िगत सामाजिक हितों की सुरक्षा के लिए सचेष्ट रहते थे, लेकिन दूसरी ओर समाज में ऐसे युवकों का प्रादुर्भाव होना प्रारम्भ हो गया था जो रुढ़िगत मान्यताओं को समाज के विकास के लिए हानिकारक मानते थे। अतः इनमें से कुछ संस्थाओं में ऐसे दल भी बन गये थे जो सुधारक की संज्ञा से परिचित होने लगे थे जबकि बाकी सबको सनातनी दल का अनुयायी कहा जाता था।

सम्मेलन की पृष्ठ भूमि:
I.D.Jalan


स्व.ईश्वरदास जालान, सम्मेलन के प्राण-पुरुष

बाद में जब देश में प्रगतिशीलता की हवा बहने लगी तो उनमें संघर्ष भी होने लगे, याने सनातनी दल और सुधारक दल दोनों में तीव्र संघर्ष होने लगा था। पर यह मानना होगा कि सनातनी दल का ही सभी सभाओं और संगठनों में अधिक महत्व था। बूढ़े और बुजुर्ग लोग सभी संस्थाओं पर हावी थे और वे हर तरह से जातियों की अग्र गति में बाधक थे। कलकत्ता उस समय भी सारे मारवाड़ी समाज की एक तरह से राजधानी ही था। यहाँ का मारवाड़ी एसोसिएशन मारवाड़ी समाज के हितों की रक्षा करनेवाली बड़ी संस्था थी। किसी जमाने में उसको अंग्रेजी सरकार का सम्भल भी प्राप्त था, जिसका उदाहरण था कि केन्द्रीय विधानसभा में एक प्रतिनिधि भेजने का उसे अधिकार था। जो लोग आज की राजनैतिक इकाइयों- राजस्थान और हरियाणा आदि से यहां आये और व्यापार- उद्योग में उन्नति की वे ही इन एसोसिएशनों आदि के सर्वेसर्वा थे। जो लोग इनसे बहुत वर्षों पहले यहाँ आकर बस गये थे, खास तौर से अजीमगंज और जियागंज में, वे एक प्रकार से न पूरे मारवाड़ी थे और न पूरे बंगाली। उनकी भाषा राजस्थानी होते हुए भी बंगला से बहुत प्रभावित थी।

समाज से बहिष्कृतः
मारवाड़ी समाज में सामाजिक विभेदों की शुरुआत सबसे पहले उस समय हुई, जब समाज के पढ़े-लिखे दो युवक-इन्द्रचन्दजी दुधोड़िया और इन्द्रचन्दजी नाहटा- विलायत यात्रा से 1890 में वापस आये। सनातनी दल ने उन्हें समाज से बहिष्कृत कर दिया और उन्हें वापस विलायत लौटना पड़ा। उस समय से पढ़े-लिखे नवयुवकों में जो खलबली मची उसने धीरे-धीरे समाज सुधार का बीज बोया।
सन् 1901 में श्री विशुद्धानन्द सरस्वती विद्यालय के शिलान्यास के समय श्री कालीप्रसादजी खेतान को विलायत भेजने की घोषणा का स्वागत तो हुआ, लेकिन रसोइयाँ को अपने साथ ले जाने के उपरान्त भी जब वे कलकत्ता आए, तो उन्हें जाति बहिष्कृत कर दिया गया और उन्हें एक प्रकार के प्रायश्चित की पद्धति से गुजरना पड़ा। इस घटना ने भी युवकों की सोचने की प्रक्रिया को अधिक तीव्र किया।
धीरे-धीरे सनातनी और सुधारक दलों का मत-पार्थक्य युवकों के अन्य सुधारवादी कदमों को लेकर उभरता रहा। सन् 1926 में नागरमलजी लिल्हा द्वारा किया गया, विधवा-विवाह एवं रामेश्वरजी बिड़ला द्वारा अपने से नीची खांप में किया गया विवाह, इस विभेद को एक बड़े रुप में उभार कर लाया। परिणाम स्वरुप जमुनालालजी बजाज द्वारा स्थापित की गयी अखिल भारतीय अग्रवाल महासभा का अधिवेशन जब कलकत्ता में सन् 1926 में केशरदेव जी नेवटिया के सभापतित्व में हुआ तो नागरमलजी लिल्हा के विधवा-विवाह को लेकर उस अधिवेशन में भयंकर दल-दल फैला और समाज के 12 व्यक्तियों को समाज से बहिष्कृत किया गया।

वोट का अधिकार:
इसी बीच महात्मा गाँधी के आन्दोलन के फलस्वरुप सन् 1935 का भारत विधेयक आया। उसके सम्बन्ध में ब्रिटिश सरकार ने जो ह्नाइट पेपर प्रकाशित किया था उसमें, जैसा कि स्व0 ईश्वरदास जालान ने लिखा- ‘‘नवीन विधान की रुप-रेखा में ऐसा संकेत किया गया था, जो देशी राज्यों की प्रजा है उसे ब्रिटीश राज्य की प्रजा के नागरिक अधिकार नहीं दिये जायेंगे। जब मैंने उसे पढ़ा तो मुझे यह आशंका हुई कि मारवाड़ी समाज के व्यक्ति जो विभिन्न प्रदेशों में बसे हुए हैं उन्हें देशी राज्यों की प्रजा मानकर यदि नागरिक अधिकार नहीं प्राप्त हुए तो ये देश भर में विदेशियों की तरह समझे जायेंगे। ऐसा होने से न तो उनको वोट का अधिकार होगा और न कोई नागरिक अधिकार। ऐसी अवस्था में मारवाड़ी समाज की अपार क्षति होगी-मन में ऐसी आशंका जागृत हुई कि यदि यह प्रान्तीयता का विष देश में फैल गया तो मारवाड़ी समाज की अवस्था और भी नाजुक हो जायेगी। मैंने इसके सम्बन्ध में स्व0 कालीप्रसाद खेतान से बात की और वे मेरी इस बात से सहमत हुए कि इसका संशोधन आवश्यक है।’’
इसी बीच ब्रिटिश पार्लियामेंण्ट ने एक कमेटी बनाई थी, जिसमें नये संविधान के संबंध में लोगों से विचार-विमर्श किया जा रहा था। हमलोगों ने ऐसा विचार किया कि इस कमेटी के समक्ष अपनी ओर से भी किसी व्यक्ति को भेजना चाहिए। मारवाड़ी एसोसिएशन इस बात के लिए राजी नहीं हुआ, क्योंकि वे लोग विलायत-यात्रा के विरोधी थे। अन्त में हमलोगों ने मारवाड़ी ट्रेड एसोसिएशन की ओर से ब्रिटिश सरकार को पत्र दिया कि वह हम लोगों के प्रतिनिधि को विलायत आने की अनुमति दे और हमलोगों की जो माँग है उसे रखने का मौका दे। ब्रिटिश सरकार ने अनुमति दे दी, परन्तु कोई ऐसा योग्य व्यक्ति नहीं प्राप्त हो सका, जिसे वहाँ भेजा जाये। हम लोग चाहते थे कि स्व0 देवी प्रसाद खेतान इसके लिए उपयुक्त होंगे। परंतु इण्डियन चेम्बर ऑफ कामर्स ने इस कमेटी का बायकाट कर रखा था, इसलिए उनका वहाँ जाना संभव नहीं था। अन्त में मैं और श्री रामदेव जी चोखानी बम्बई गये और सर मन्नू भाई मेहता, जो बीकानेर के दीवान थे, उनसे मिले और उनका ध्यान इस ओर आकृष्ट किया और कहा कि वे इस काम को अपने हाथों में ले परन्तु उनकी बातों से हमलोगों को कोई आशाजनक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। फिर हम लोग पं0 मदनमोहन जी मालवीय से मिले। उन्होंने भी ह्नाइट पेपर को पढ़ कर उचित समझा कि इस दिशा में आवश्यक कार्यवाही की जायें। कलकत्ता वापस जाकर हमलोगों ने सर एन.एम. सरकार, जो उस समय के सुप्रसिद्ध बैरिस्टर थे और जो इस काम के लिए विलायत जाने वाले थे, उनसे मिले और उनसे अनुरोध किया कि वे इस विषय को अपने हाथों में ले और ब्रिटिश सरकार से इसे स्वीकृत कराने का प्रयत्न करें। सौभाग्यवश वे राजी हो गये। उन्होंने विलायत जाकर भारत के सेक्रेटरी आफ स्टेट से बातें की और सेक्रेटरी महोदय इस आवश्यक सुधार के लिये राजी हो गये और संशोधन करने का प्रस्ताव करते समय बोले मारवाड़ी समाज की कठिनाइयों को दूर करने के लिए यह संशोधन किया जा रहा है। परन्तु संशोधन करते समय उन्होंने यह अधिकार प्रान्तीय सरकारों को दे दिया। जब यह कानून बन गया तब तक अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन की स्थापना हो चुकी थी। उसने यह प्रयत्न किया कि भारतवर्ष की जो प्रान्तीय सरकारें हैं वे इस अधिकार को प्रदान करें। केवल एक-दो राज्यों में कुछ असुविधा हुई और उसे सुधारने के लिए सेठ जमुनालाल जी बजाज के मार्फत सम्मेलन ने कांग्रेस द्वारा प्रयत्न किया। कांग्रेस की वर्किंग कमिटी ने इसे स्वीकार किया और अन्त में सभी प्रदेशों को यह अधिकार प्राप्त हो गया।

प्रथम अधिवेशनः
Ramdeo Chokhani
सन् 1935 में अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन का जन्म हुआ। इस सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन का सनातनीदल के प्रमुख नेता स्व. रामदेव जी चोखानी ने सभापतित्व किया। सम्मेलन ने मारवाड़ी शब्द के अन्तर्गत आनेवाली सभी जातियों के व्यक्ति इसमें सम्मिलित होकर काम कर सकें। सम्मेलन का पहला अधिवेशन दिसम्बर सन् 1935 में कलकत्ता के मोहम्मद अली पार्क में सम्पन्न हुआ और सम्मेलन का कार्यालय मारवाड़ी छात्र निवास के भवन, 150, चित्तरंजन एवेन्यू, कलकत्ता-7 में रखा गया। उस सम्मेलन के प्रथम सभापित की हैसियत से स्व0 रायबहादुर रामदेव जी चोखानी ने जो भाषण किया उसके निम्न अंश इस सम्मेलन की भूमिका और मारवाड़ी समाज के बारे में ध्यान देने लायक हैं-
‘‘जिस महान एवं पवित्र उद्देश्य को लेकर हम लोग आज यहाँ उपस्थित हुए हैं वह उद्देश्य है सम्पूर्ण मारवाड़ी समाज का सामूहिक संगठन, ऐसा संगठन जो जाति में नवजीवन का संचार करनेवाला हो, उसके कार्यकर्त्ताओं में उल्लास, संजीवता एवं कर्मोद्यम का भाव भरनेवाला हो और जिसमें समाज की विभिन्न शाखाएँ सम्बद्ध हों, अपने जातीय हित और उससे भी वृहत्तर सम्पूर्ण देश के स्वार्थ सम्बन्ध रखनेवाले समस्त प्रश्नों पर विचार करें और अपना कर्तव्य स्थिर करें। अभी तक समाज की विभिन्न शाखाओं का जो संगठन हुआ है, श्रृंखलित न होने के कारण उसके द्वारा हम देश के सार्वजनिक जीवन पर अपना प्रभाव डालने तथा उसके सभी क्षेत्रों में अन्य समाजों के साथ अपनी सत्ता स्थापित करने में समर्थ नहीं हुए हैं। इस प्रकार के संगठन की आवश्यकता जो हम इस समय विशेष रुप से अनुभव कर रहे हैं इसका कारण है देश की परिस्थिति में परिवर्तन। आज समाज के वृद्ध एवं युवक दल में, सनातनी और सुधारक में जो इतना पार्थक्य दिख पड़ा है और दोनों एक दूसरे को कोसों दूर समझते हैं, उसका कारण भ्रम ही है। यह भ्रम दोनों का ही एक समान शत्रु है।’’
उस समय सम्मेलन के प्रथम सभापति जहाँ रामदेव जी चोखानी थे वहीं प्रधानमंत्री भूरामल जी अग्रवाल थे।
इस सम्मेलन में जो प्रस्ताव पास किये गये उनमें सबसे महत्व का प्रस्ताव यह था-यह सम्मेलन मारवाड़ी भाइयों से अनुरोध करता है कि वे नागरिक एवं राजनीतिक समस्त देशोन्नति के कार्य में दिलचस्पी लें और उनके चुनाव में सम्मिलित होकर तथा उनमें प्रवेश करके देशवासियों की सेवा करने का सुयोग प्राप्त करें और जो दूसरी महत्वपूर्ण बात इस सम्मेलन ने अपने प्रस्ताव में कही थी वह यह कि सम्मेलन भिन्न-भिन्न प्रान्तों में बसनेवाले मारवाड़ी बन्धुओं से अनुरोध करता है कि वे जिस प्रान्त के निवासी हों वहाँ के अन्य समुदायों के साथ मिलकर वहाँ के सार्वजनिक कार्यों में अधिकाधिक भाग लें जिससे उनके पारस्परिक प्रेम और सद्भावना को दृढ़ता प्राप्त हो।
इस प्रथम सम्मेलन में असम, बिहार, बंगाल, राजपूताना, पंजाब, संयुक्त प्रान्त, मध्य प्रान्त और मद्रास सभी स्थानों के प्रतिनिधि थे। इस सम्मेलन की सफलता चारों तरफ गूँज उठी।

सम्मेलन का दूसरा अधिवेशन:
Padampat Singhaniaसम्मेलन का दूसरा अधिवेशन कलकत्ते में ही करने के लिये तय हुआ जिसके सभापति संयुक्त प्रान्त (कानपुर) के प्रसिद्ध उद्योगपति स्व.पद्मपत सिंघानिया हुए और स्वागताध्यक्ष स्व.मंगतूराम जयपुरिया हुए। यह दूसरा अधिवेशन 13-14-15 मई 1938 को कलकत्ते के मोहम्मद अली पार्क में हुआ।
इस सम्मेलन में श्री पद्मपत सिंघानिया ने जो भाषण किया वह कई दृष्टियों से उत्पन्त महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा-‘‘ब्राह्मण, ओसवाल, माहेश्वरी, अग्रवाल, खण्डेलवाल इत्यादि सबको उपस्थित पाकर और उनके चेहरे पर अंकित देश तथा समाज के उद्धार की लगन देखकर मुझे जो प्रसन्नता होती है वह केवल अनुभव की ही वस्तु है। उन्होंने सन् 1938 में एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहीं जो वर्षों तक सम्मेलन के किसी सभापति ने नहीं कही। उन्होंने कहा- यहाँ पर मेरी इच्छा सामाजिक विषय पर विचार करने की थी। समाज की समस्या वर्षों से हमारे सामने है और हम उस पर विचार कर रहे हैं। किन्तु यह विषय इतना विवादास्पद है कि हमने आपस में कहीं तर्क-वितर्क किया भी हो, पर खास ध्यान आकर्षित करना उचित नहीं प्रतीत होता। मैं उसे भविष्य के लिये छोड़ देता हूँ किन्तु यह चेतावनी दे देना भी जरुरी समझता हूँ कि हम चाहें अथवा नहीं, सामाजिक समस्या का निकट भविष्य में सामना करना ही पड़ेगा। आज नहीं तो कल हमको एकत्र होकर अपने समाज के सम्पूर्ण संगठन की योजना और सामाजिक पहेलियों का निदान करना ही पड़ेगा।’’
स्व0 ईश्वरदास जालान ने जो बीज लगाया था वह योग्य विभूतियों की छत्र-छाया में उनकी तत्परता और त्याग से पल्लवित हो बढ़ने लगा और देश के सभी प्रान्तों के मारवाड़ी बन्धुओं का सहयोग पूर्णरुप से इस सम्मेलन को मिलने लगा। जगह-जगह पर प्रचारकों को भेजकर सम्मेलन की आवश्यकता और महत्ता बताने का प्रयत्न किया गया।

सम्मेलन का तीसरा अधिवेशन:
Badri Prasad Goyenkaसम्मेलन का तीसरा अधिवेशन संयुक्त प्रान्त की मुख्य व्यापारिक नगरी कानपुर में हुआ जिसके स्वागताध्यक्ष स्व0 पद्मपत सिंघानिया के छोटे भाई स्व0 लक्ष्मीपत सिंघानिया बने और उस महाधिवेशन के सभापति बद्रीदासजी गोयनका हुए। 15, 16, और 17 मार्च 1940 को सर बद्रीदासजी गोयनका के सभापतित्व में यह तीसरा अधिवेशन हुआ। उसके बारे में सम्मेलन की स्वागत समिति के कार्य विवरण में लिखा है कि कानपुर के मारवाड़ी भाइयों का उत्साह अपने को कार्यरुप में परिणित कर चुका था......। तोरण पताका वाद्य-यन्त्र नगर के मार्गो की शोभा बढ़ा रहे थे....। जब सर बद्रीदास जी गोयनका कानपुर स्टेशन पर पहुँचे तो कानपुर का स्टेशन मारवाड़ी बन्धुओं से भरा हुआ था। केसरिया पगड़ियाँ बाँधे सबके मुँह दमक रहे थे। अपूर्व उत्साह लहर ले रहा था। एक बड़े जुलूस में, जो आधा मील लम्बा होगा, सभापतिजी को फूलबाग ले जाय गया जहां अधिवेशन का पण्डाल था। उसकी रुपरेखा एक बड़े दुर्ग के सदृश दिखाई देती थी।
अधिवेशन दिन के तीन बजे होनेवाला था, लेकिन उसी वक्त दुर्भाग्य से पण्डाल में आग लग गई और सारा पण्डाल राख का ढेर हो गया था। सबके मुँह पर हवाइयां उड़ रही थीं पर उसी समय स्व0 पद्मपत के इस कथन ने कि सम्मेलन इसी जगह फौरन होगा, सबकी नसों में जोश भर दिया। परीक्षा की वह घड़ी थी, पर सिंघानिया बन्धुओं ने जिस उद्यम और तत्परता से काम किया उसी का परिणाम था कि सम्मेलन का अधिवेशन उसी स्थान पर 7 बजे शाम से प्रारम्भ हो गया।
सर बद्रीदासजी गोयनका ने अपने अध्यक्षीय भाषण में और बातों के साथ यह भी कहा-‘‘एक खास विषय की ओर आपका ध्यान आकर्षित किये बिना में नहीं रह सकता और वह विषय है फिजूल-खर्ची जो आए दिन सामाजिक त्यौहारों और उत्सवों पर देखने में आती है। मैं समाज के सभी लोगों से यह अनुरोध करता हूँ कि ऐसे सामाजिक अवसर पर वे अपने खर्च को उचित सीमा के बाहर न जाने दें। मेरा यह अनुरोध केवल उन्हीं से नहीं है जिनके पास धन का अभाव है वरन में उन लोगों से भी अनुरोध करता हूँ जिनके पास प्रचुर धन है, क्योंकि यह मानव स्वभाव है कि दूसरी श्रेणी की देखादेखी पहली श्रेणी के लोग अपनी सीमित आर्थिक अवस्था के बावजूद दिखावे और आडम्बर में उनकी नकल करने को आतुर दिखाई देते है।’’

सम्मेलन का चतुर्थ अधिवेशन:
Ramdeo poddarइसके बाद सन् 1941 में बम्बई के प्रसिद्ध उद्योगपति सेठ रामदेव जी पोद्दार के सभापतित्व में बिहार के एक प्रमुख व्यवसायी नगर भागलपुर में सम्मेलन का चतुर्थ अधिवेशन हुआ। भागलपुर (बिहार) में कलकत्ते को छोड़कर जो अधिवेशन हुआ जिसका बिहार मारवाड़ी सम्मेलन के इतिहास में विशेष स्थान है।
स्व0 रायबहादूर बंशीधर ढांढनिया भागलपुर में चतुर्थ महाधिवेशन के स्वागताध्यक्ष बने और उनके संरक्षण में सारे कार्य हुए। इस सम्मेलन के सभापति होकर बम्बई से सेठ रामदेवजी आनन्दीलाल जी पोद्दार आए थे। उन्होंने बहुत कारगर भाषण दिया। उन्होंने अपने भाषण में राष्ट्रीयता पर जोर देते हुए कहा-‘‘हमारा राजनैतिक स्वार्थ और भारत का राजनैतिक स्वार्थ एक है। मैं जातियता का पक्षपाती नहीं हूँ इसलिए अपनी जाति के लिए विशेष अधिकार प्राप्त करने की अभिलाषा नहीं रखता। जिस कार्य में भारत का हित है उसी कार्य में भारत की प्रत्येक जाति का हित है। मेंरे कहने का मतलब यह है अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन का आदर्श राष्ट्रीय है।’’ उन्होंने यह भी कहा कि जिन देशी रियासतों के हम निवासी या प्रवासी है उनकी शासन प्रणाली में परिवर्तन करना तथा प्रतिनिधित्व प्राप्त करना और उस प्रणाली को विधानयुक्त बनाना हमारा प्रथम कर्त्तव्य है। उन्होंने जोर देकर कहा-हमारे समाज में गमी, विवाह और छोटे-छोटे प्रसंगों में धन का अपव्यय करने की प्रक्रिया है इससे सभी भाइयों को कष्ट तथा धन राशि और समय नष्ट होता है। अब युग परिवर्तन का आ गया है.... इसलिये इन अवसरों पर फिजूल खर्च नहीं करना चाहिए। जनता का ध्यान इधर जा रहा है। आशा है यह प्रक्रिया भी शीघ्र ही बन्द हो जायेगी।
इसी समय गाँधी जी के नेतृत्व में स्वतन्त्रता आन्दोलन की आखिरी लड़ाई- करो या मरो आन्दोलन अपने शिखर पर पहुँच गया था। उस आन्दोलन के बारे में 9 अगस्त 1942 को कांग्रेस की अखिल भारतीय समिति ने जो प्रस्ताव पारित किया उससे उत्साहित होकर देश के विभिन्न भागों में हजारों-लाखों लोग गिरफ्तार होकर जेल चले गये, उसमें मारवाड़ी सम्मेलन के भी सैकड़ों कार्यकर्त्ता विभिन्न प्रान्तों में जगह-जगह गिरफ्तार हो गये और समाज को बड़ा गौरव मिला। गिरफ्तार होने वालों में स्व.राम मनोहर लोहिया, स्व.बृजलाल बियाणी, स्व.सेठ गोविन्ददास, स्व. बसन्तलाल मुरारका, स्व.सीताराम सेकसरिया, स्व. मूलचन्द अग्रवाल, स्व. भागीरथ कानोड़िया, स्व. विजय सिंह नाहर, स्व. भँवरमल सिंघी और श्री सिद्धराज ढड्ढ़ा आदि थे।

सम्मेलन का पांचवां अधिवेशन:
Ramgopal Mohataजब ये कार्यकर्त्ता आन्दोलन में लगे हुए थे और जेल यातना सह रहे थे उस समय मई 1943 में दिल्ली में सम्मेलन का पांचवां अधिवेशन हुआ जिसके सभापति बीकानेर के लब्धप्रपिष्ठ स्व0 राम गोपाल मोहता हुए।
इस अधिवेशन के सभापति स्व0 रामगोपाल मोहता ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा-‘‘अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के मंच पर हम लोग सभी जाति, उपजाति एवम् फिरकों के राजस्थान निवासी मारवाड़ी कहलाने वाले लोग बिना किसी भेदभाव के एकत्र होकर सामूहिक रुप से अपना संगठन करके, अपनी सर्वागीण उन्नति करते हुए, अपने उचित स्वत्वों और अधिकारों की रक्षा करने के लिए कटिबद्ध हो रहे है। पृथक-पृथक फिरकों के जातीय समाजों के सम्मेलनों का जमाना अब खत्म हो चुका हैं। उन्होंने आगे कहा कि देश में प्रान्तीयता के भावों का संघर्ष बहुत ही सोचनीय रुप धारण कर रहा हैं।’’

सम्मेलन का छठवां अधिवेशन:
Brijlal Biyaniसम्मेलन का छठवां अधिवेशन बड़े समारोहपूर्वक बम्बई में सुप्रसिद्ध राजनेता स्व0 बृजलाल बियाणी के सभापतित्व में हुआ। इस अधिवेशन में पहले पहल सम्मेलन ने अपने उद्देश्यों में संशोधन किया और समाज सुधार के प्रस्ताव भी लिये। उन समाज सुधारों के प्रस्तावों में पर्दा प्रथा, निवारक प्रस्ताव सर्वाधिक महत्वपूर्ण था।
इस अधिवेशन की स्वागत समिति के स्वागताध्यक्ष स्व.गजाधर सोमानी हुए।
30 अप्रैल सन् 1947 को नागपुर मेल से सम्मेलन के छठें अधिवेशन के सभापति स्व0 बृजलाल बियाणी बम्बई के बोरी बन्दर स्टेशन पधारे। उनके आते ही सारा वायुमण्डल राष्ट्रीय जय जयकारों से गूँज उठा। स्व0 बियाणी के सभापतित्व में जो अधिवेशन हुआ उसका उद्घाटन करते हुये बम्बई के तत्कालीन प्रधानमंत्री खेर साहब ने कहा-
‘‘देश में कोई ऐसा स्थान नहीं जहाँ मारवाड़ी समाज के लोग न रहते हो। अब तक हमें मारवाड़ी शब्द से केवल व्यापार करने वाली जाति का ही बोध होता था, किन्तु आपने जो विस्तृत एवं स्थायी अर्थ लगाया है वह प्रशासनीय है। अब आपलोग महिलाओं की उन्नति और अछूतोद्धार सम्बन्धी कार्यों को अपनाएँ।’’
बियाणीजी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में जोर देकर कहा-‘‘मारवाड़ी भाई जहाँ रहते है वहाँ की जनता से समरस हो जायँ, वहीं अपनी जन्म-भूमि राजस्थान को सम्पूर्ण विस्मरण न करें।
उन्होंने आह्नान किया-समाज की प्रगति और विकास पर भी हमें ध्यान देना चाहिए। हमारा समाज प्राचीनता के बोझ से अभी तक दबा हुआ है....। मारवाड़ी सम्मेलन आज तक सामाजिक सुधार के क्षेत्र में कुछ अंश तक अलिप्त रहता आया है, पर अब समय आ गया है कि हमारा यह सम्मेलन अपनी इस अलिप्तता या उपेक्षा को त्याग कर सामाजिक सुधार के काम में तत्परता से लग जाय।’’

वर्तमान समय में सारे सुधारों में पर्दा निवारण को में प्रथम स्थान देता हूँ। पर्दे के कारण समाज की स्त्रियों का स्थान हीन है, उनकी प्रगति हो नहीं सकती और स्त्रियों की प्रगति के अभाव में सारे समाज की प्रगति कुण्ठित है।
स्त्रियों के लिए पर्दा हटाना बहुत आवश्यक है। मारवाड़ी समाज के सारे सुधारकों को इस कार्य में सम्पूर्ण शक्ति लगा देनी चाहिये। मारवाड़ी समाज के हर व्यक्ति का यह नैतिक कर्तव्य है कि वह अपने यहाँ की स्त्रियों के पर्दा निर्वारण कार्य में इसी क्षण जुट जाये। समाज के युवकों पर इस समय बहुत बड़ा दायित्व है। समाज के स्वरुप को बदलने का भार उस पर है और भावी समाज का उनको निर्माण करना है। इस अधिवेशन में स्व0 रामेश्वरजी केजड़ीवाल प्रधानमंत्री चुने गये, लेकिन उनका आकस्मिक निधन हो गया। अतः सन् 1950 में श्री नन्दकिशोर जालान को सम्मेलन का प्रधान मंत्री चुना गया।

सम्मेलन का सप्तम अधिवेशन:
Seth Govind Dasसम्मेलन का सप्तम महाधिवेशन भी कलकत्ता के मोहम्मद अली पार्क में 31 दिसम्बर 1953 से 2 जनवरी 1954 तक हुआ। इसके स्वागताध्यक्ष सम्मेलन के महाप्राण स्व0 ईश्वरदास जालान थे। जब स्व0 सेठ गोविन्द दास, एम0पी0 30 दिसम्बर 1953 को हावड़ा स्टेशन पर आये तो उनके स्वागतार्थ कलकत्ते की कई सार्वजनिक संस्थाओं के प्रतिनिधि, सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्त्ता और कलकत्ते के अन्य विशिष्ट और प्रभावशाली व्यक्ति उपस्थित थे।
सामाजिक क्रान्ति जिन्दाबाद
इस अवसर पर जो मारवाड़ी महिला सम्मेलन हुआ उसकी सभानेतृत्व स्व0 इन्दुमती गोयनका ने कहा हमें खुशी है कि हमारे समाज में भी अब जागृति के चिन्ह उत्पन्न हो रहे हैं। आज घोर से घोर अशिक्षित माताएँ भी अपनी बच्चियों को पढ़ाना आवश्यक मानने लगी हैं।
अपने भाषण के अन्त में स्व0 इन्दुमती गोयनका (जो मारवाडी़ समाज की कलकत्ता में सत्याग्रह करके गिरफ्तार होनेवाली पहली महिला थीं।) ने कहा-सामाजिक क्रान्ति जिन्दाबाद।

सम्मेलन का अष्टम रजत जयन्ती महाधिवेशन:
Gajjadhar Somaniसन् 1961 के दिसम्बर में जब सम्मेलन का रजत जयन्ती महाधिवेशन कलकत्ता के मोहम्मद अली पार्क के पण्डाल में हुआ और उसमें पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्य मंत्री स्व.विधानचन्द्र राय सम्मेलन का उद्घाटन करने आये तो सारा पण्डाल एक करतल ध्वनि से गूँज उठा। उस सम्मेलन के मुख्य अतिथि बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. विनोदानन्द झा थे और महाधिवेशन के स्वागताध्यक्ष थे स्व. सेठ साहू शान्ति प्रसाद जैन।
अधिवेशन के प्रधान अतिथि बिहार के मुख्य मंत्री स्व0 विनोदानन्द झा ने अपने भाषण में कहा-मैंने देखा है मारवाड़ी समाज समय और स्थिति के अनुसार अपने जीवन में सुधार और परिवर्तन करने में किसी से पीछे नहीं हैं।
इस महाअधिवेशन के स्वागताध्यक्ष स्व0 साहू शान्तिप्रसाद जैन के भाषण के कुछ महत्वपूर्ण अंश अद्भुत कर रहे हैं-‘‘मारवाड़ी सम्मेलन समाज के सभी क्षेत्रों में व्यक्ति की चेतना को प्रबुद्ध और जागृत करता हैं, हमेशा करता रहेगा। सम्मेलन ने समय-समय पर विभिन्न क्षेत्रों में अनेक कार्यक्रम अपनाये हैं। सम्मेलन ने विलायत यात्रा को प्रोत्साहित करना अपने कार्यक्रम का अंग मान था। वृद्ध विवाह, बाल विवाह, अनमेल विवाह, छुआछूत आदि प्रश्नों को लेकर सम्मेलन ने संघर्ष किया। इनमें से अधिकांश प्रश्न अब नहीं रहे हैं। कई वर्षों से सम्मेलन पर्दा प्रथा के विरुद्ध भारतव्यापी आन्दोलन कर रहा है और इसमें पर्याप्त सफलता भी पाई है। दहेज प्रथा के विरुद्ध में भी सम्मेलन ने समाज की चेतना जागृत की है, किन्तु इस दिशा में अभी बहुत कुछ करना बाकी हैं। देश में शिक्षा की द्रुत गति से उन्नति हो रही है, परन्तु बहुत से ऐसे विद्यार्थी हंै जो क्षमता रहते हुए भी धनाभाव के कारण पढ़ नहीं सकते। सम्मेलन इस दिशा में भी सचेष्ट है। ऐसी प्रवृत्तियां अधिकाधिक बढ़ें, इसका प्रयास होना चाहिए।’’
इस अधिवेशन के अध्यक्ष स्व0 गजाधर सोमानी ने कहा-विवाहों में अपव्यय की भत्र्सना करते हुए उन्होंने कहा कि विवाहों में आज भी हम अपने वैभव का इतना प्रदर्शन करते हैं कि दूसरों की दृष्टि में हम खटकने लगते हैं। हमें उतना ही प्रदर्शन करना उचित है जो दूसरों के लिए सिरदर्द न बने।
रजत जयन्ती अधिवेशन में छात्रावास बनाने की जो योजना स्वीकृत की गयी थी और जिसके लिए चंदा लिया गया था, उस योजना के अनुरुप 16 कट्ठा जमीन सन् 1964 में खरीदी गई। लेकिन उसके बाद काम कुछ ढीला पड़ गया और सन् 1965 से सन् 1973 के बीच अगले अधिवेशन को छोड़कर कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं हो सका।

सम्मेलन का नौवाँ अधिवेशन:
Rameshwarlal Tantiaअक्टूबर 1966, महाराष्ट्र के पूना में हुआ, जिसके अध्यक्ष स्व0 रामेश्वर टाँटिया थे और स्वागताध्यक्ष श्री नन्दलाल पित्ती।

सम्मेलन का दसवां अधिवेशन:
Bhanwarmal Singhi30 दिसम्बर 1973 को रांची नगर में सम्मेलन का दसवां अधिवेशन प्रारम्भ हुआ, जिसके सभापति थे स्व. भंवरमल सिंघी। सम्मेलन का यह दसवां महाधिवेशन एक और दृष्टि से सम्मेलन के इतिहास में अद्वितीय था- वह यह कि मारवाड़ी सम्मेलन के महाधिवेशन के साथ ही बिहार प्रान्तीय मारवाड़ी सम्मेलन का भी अधिवेशन हुआ था।
इस सत्र में विभागीय उप-समितियाँ बनी। उनमें समाज सुधार समिति के श्री नंदलाल सुरेका, शिक्षा के श्री इन्द्रचन्द संचेती, राजस्थानी संस्कृति-साहित्य-कला के श्री रतन शाह, संगोष्ठी के श्री नरनारायण हरलालका, अर्थ के श्री दीपचन्द नाहटा, गो-सम्बर्धन के श्री बजरंगलाल लाठ, व्यापार आचारसंहिता के श्री विजय सिंह कोठारी, कानून एवं आयकर के श्री रमेश चन्द्र गुप्ता, सदस्यता अभियान के श्री मोहनलाल चोखानी एवं श्री नारायण प्रसाद बुधिया एवं पूर्वांचल के श्री जगन्नाथ प्रसाद जालान मंत्री चुने गये एवं समाज विकास के संपादन का भार श्री नन्दकिशोर जालान को दिया गया।
विवाहों में आशीर्वाद के समय नाश्ता कराना पिछले एक-दो वर्षों से आरम्भ हुआ था एवं पंडाल आदि में फिजूलखर्ची बढ़ रही थी। इसलिए इनके विरुद्ध अभियान चलाने का कार्यक्रम लिया गया। लगातार जनसभायें की गई और 24 जून 1974 से जनवरी 1975 तक बीसियों स्थानों पर विवाह-शादियों सम्बन्धी नियमावली हजारों की संख्या में वितरित की गई। इस आन्दोलन एवं प्रदर्शन का तत्काल असर हुआ और आशीर्वाद के समय 95 प्रतिशत शादियों में केवल पेय पदार्थ ही रखा जाने लगा और पंडाल एवं अन्य फिजूलखर्ची में भी काफी कमी आई। कलकत्ते में चलाये गये इस आन्दोलन की प्रतिक्रिया अखबारों में भी प्रभावोत्पादक तरीके से प्रकाशित हूई। अन्य प्रान्तों में भी सम्मेलन के प्रान्तीय अधिकारियों द्वारा दहेज, दिखावा एवं फिजूलखर्ची तथा पर्दा के विरुद्ध सभायें, प्रदर्शन आदि किये गये।

सम्मेलन का 11वाँ अधिवेशन:
सम्मेलन का 11वाँ अधिवेशन हैदराबाद में सन् 1976 में सम्पन्न हुआ। सिंघीजी के कार्यकाल की उपलब्धियों को ध्यान में रखकर लोगों ने श्री भंवरमल सिंघी से पुनः सभापति का पद स्वीकार करने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

सम्मेलन का द्वादश अधिवेशन:
Major Ram Prasad Poddarउद्योग नगरी बम्बई में मार्च 1979 में हुआ जो तीन दिन तक चला। इसके अध्यक्ष संस्कृति और साहित्य के विकास में संलग्न स्व. रामप्रसाद जी पोद्दार को चुना गया। इस अधिवेशन की यह भी विशेषता थी कि खुले अधिवेशन में राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री भैरो सिंह शेखावत और महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री श्री शरद पवार उपस्थित थे।

सम्मेलन का त्रयोदश अधिवेशन:
अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन का त्रयोदश महाधिवेशन भारतवर्ष की सुप्रसिद्ध नगरी बिहार प्रदेश के जमशेदपुर में मार्च 1982 में सम्पन्न हुआ। इस महाधिवेशन के सभापति पद के लिये ऐसे व्यक्ति का चयन हुआ जो पिछले दो सत्रों में प्रधानमंत्री थे और निवर्तमान सभापति के काल में उपाध्यक्ष थे और सन् 1950 से सन् 1961 सत्र के रजत जयन्ती अधिवेशन तक प्रधानमन्त्री रह चुके थे यानी श्री नन्दकिशोर जालान।

अ. भा. मारवाड़ी महिला सम्मेलन:
23 दिसम्बर सन् 1983 को बिहार प्रदेश की राजधानी पटना नगर में गाँधी मैदान के पार्श्व में एशिया के वृहत्तम सभा कक्षों में से एक कृष्ण मेमोरियल हाल में महिला अधिवेशन प्रारम्भ हुआ जिसमें हमारे समाज की 70 वर्ष की प्रौढ़ महिलाओं से लेकर 15 वर्ष तक की किशोरियों तक ने सम्मिलित होकर नारी-जागरण की उद्घोषणा की। इस अधिवेशन की अध्यक्षा थीं सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्त्ता और लेखिका श्री मती सुशीला सिंघी। स्वागताध्यक्षा थी श्रीमती सुशीला मोहनका, स्वागतमंत्री श्रीमती पुष्पा चोपड़ा एवं श्रीमती सरोज गुटगुटिया।

अ. भा. मारवाड़ी युवा मंच:
अ0भा0मारवाड़ी सम्मेलन के तत्वावधान में अखिल भारतीय मारवाड़ी सम्मेलन युवा मंच का प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन असम प्रदेश की राजधानी गुवाहटी में 18-20 जनवरी 1985 को सम्पन्न हुआ, जिसका उद्घाटन जोधपुर के महाराजा गजराज सिंह ने किया। इस अधिवेशन के आयोजक थे पूर्वोत्तर प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन, युवा मंच के अध्यक्ष श्री सुरेश कुमार बेड़िया। इस अधिवेशन में गुवाहाटी के श्री प्रमोद्ध सर्राफ राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं श्री अनिल जैना महामंत्री बनाये गये। अधिवेशन के तत्काल बाद ही इसका नाम अ.भा.मारवाड़ी युवा मंच कर दिया गया।

सम्मेलन का चौदहवां अधिवेशन:
Hari Shankar Singhaniaचौदहवां अधिवेशन, कानपुर, 15 मार्च 1986, सम्मेलन का 14वां अधिवेशन 15 मार्च 1986 को कानपुर में हुआ। इसके अध्यक्ष बनाये गये श्री हरिशंकर सिंघानिया एवं श्री रतन शाह महामंत्री बने।

सम्मेलन का पंद्रहवां अधिवेशन:
पंद्रहवां अधिवेशन, रांची, 18 फरवरी 1989, 15वां अधिवेशन 18 फरवरी 1989 को रांची में हुआ। स्व. रामकृष्ण सरावगी को इसका अध्यक्ष मनोनीत किया गया एवं स्व. दुलीचंद अग्रवाल महामंत्री बने।

सम्मेलन का सोहलवां अधिवेशन:
सोहलवां अधिवेशन, दिल्ली, 20 जून 1993, 16वां अधिवेशन 20 जून 1993 को दिल्ली में हुआ। जिसका
अध्यक्ष पुनः श्री नन्दकिशोर जालान को बनाया गया एवं श्री दीपचंद नाहटा मंत्री चुने गये।

सम्मेलन का 17वां अधिवेशन:
सम्मेलन का 17वां राष्ट्रीय अधिवेशन 7-8 जून 1997 को हैदराबाद में सम्पन्न हुआ, जहां श्री नन्दकिशोर जालान पुनः सभापति चुने गए। श्री सीताराम शर्मा महामंत्री निर्वाचित हुए। इस अधिवेशन का उद्घाटन आंध्र प्रदेश के राज्यपाल श्री कृष्णकांत ने किया।

सम्मेलन का 18वां अधिवेशन:
अठारहवां अधिवेशन, कानपुर, 1-2 जून 2001, श्री मोहनलाल तुलस्यान सम्मेलन के आगामी अध्यक्ष निर्वाचित हुए एवं कानपुर में 1-2 जून 2001 को आयोजित 18वें अधिवेशन में पदभार ग्रहण किया एवं श्री सीताराम शर्मा पुनः महामंत्री निर्वाचित हुए। कानपुर शहर का सम्मेलन से पुराना रिश्ता है। सम्मेलन के 1938 में निर्वाचित द्वितीय अध्यक्ष सेठ पद्मपत सिंघानिया कानपुर से थे। सम्मेलन का तीसरा अधिवेशन 1940 में कानपुर में ही सम्पन्न हुआ। 1986 में पुनः सम्मेलन का 14वां अधिवेशन कानपुर में हुआ। जहां सुप्रसिद्ध उद्योगपति श्री हरिशंकर सिंघानिया अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 2001 ने एक बार फिर कानपुर में सम्मेलन को राष्ट्रीय अधिवेशन के लिये आमंत्रित किया है। इनके ही कार्यकाल में कोलकाता शहर में सम्मेलन का भवन खरीदा गया।

सम्मेलन का 19वां अधिवेशन:
उन्नीसवां अधिवेशन, मुम्बई, 9-11 जनवरी 2004 को मुम्बई में सम्मेलन का 19वां राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ जिसे राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने सुशोभित किया। इस आयोजन में श्री तुलस्यान अध्यक्ष पुनर्निर्वाचित हुए तथा श्री भानीराम सुरेका महामंत्री निर्वाचित किये गये।

सम्मेलन का 20वां अधिवेशन:
20वां राष्ट्रीय अधिवेशन, 5-6 अगस्त 2006, भुवनेश्वर-अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन का 20वां राष्ट्रीय अधिवेशन भुवनेश्वर के जयदेव भवन में एक सादे समारोह के बीच सम्पन्न हुआ क्योंकि उद्घाटन दिवस की पूर्व संध्या को उड़ीसा की पूर्व मुख्यमंत्री नंदिनी सत्पथी के देहावसान के कारण राज्य में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया गया था।
5 अगस्त को सायं 5.30 बजे उद्घाटन सत्र का शुभारंभ हुआ जिसमें सबसे पहले उड़ीसा की पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं उड़िसा की विशिष्ट लेखिका नन्दिनी सत्पथी की स्मृति में दो मिनट का मौन पालन कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी। इस अवसर पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता स्व.रामनिवास मिर्धा मुख्य अतिथि तथा राज्य के कृषि मंत्री श्री देवी प्रसाद मिश्र मुख्य वक्ता के रुप में उपस्थित थे।
तदुपरान्त नव- निर्वाचित सभापति श्री सीताराम शर्मा को तुमुल हर्षध्वनि एवं तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सम्मेलन के आगामी सत्र के लिए निवर्तमान अध्यक्ष श्री मोहनलाल तुलस्यान ने अध्यक्ष पदभार समर्पित किया।
पद्भार ग्रहणोपरान्त अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के 16वें सभापति श्री सीताराम शर्मा ने श्री तुलस्यान के प्रति आभार व्यक्त करते हुए एवं एक सक्रिय कार्यकर्त्ता के रुप में उनके सहयोग देने की भावना को अपने लिए प्रेरणाप्रद बताते हुए अपने अध्यक्षीय अभिभाषण में कहा-
‘‘मारवाड़ी सम्मेलन की स्थापना के उपरांत के सात दशकों में, एक नयी राजनैतिक एवं आर्थिक विश्व-व्यवस्था स्थापित हुई हैं। खुली अर्थव्यवस्था एवं वैश्वीकरण ने तमाम मूल्यों, आस्थाओं एवं संकल्पों में आमूल परिवर्तन किया है। आने वाला समय आर्थिक क्षेत्र में और अधिक संघर्षपूर्ण एवं ज्यादा जागरुकता को विवश करेगा।’’
20वें राष्ट्रीय अधिवेशन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता श्री रामनिवास मिर्धा ने अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए कहा कि अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के इस 20वें राष्ट्रीय अधिवेशन में उपस्थित होकर में गौरवान्वित हूँ।

सम्मेलन का 21वां अधिवेशन:
अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के 21वें राष्ट्रीय अधिवेशन एवं 74वें स्थापना दिवस समारोह का आयोजन तैरापंथ भवन, अध्यात्म साधना केंन्द्र, छत्तरपुर, महरौली, नयी दिल्ली में 20-21 दिसंबर 2008 को हुआ। अधिवेशन का उद्घाटन भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति श्री भैरों सिंह शेखावत के कर-कमलों द्वारा संपन्न हुआ। मुख्य अतिथि के रुप में पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री राम निवास मिर्धा उपस्थित थे। इस अवसर पर श्री नन्दलाल रुँगटा राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद सौंपा गया।
श्री रामअवतार पोद्दार को महामंत्री, श्री अत्माराम सोंथलिया को कोषाध्यक्ष एवं समाज विकास के कार्यकारी संपादन का भार श्री शम्भु चौधरी को दिया गया।
नव-निर्वाचित अध्यक्ष श्री नन्दलाल रुँगटा ने अध्यक्ष श्री सीताराम शर्मा से पद्भार ग्रहण किया एवं अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में श्री रूँगटा ने कहा कि इस सफर में जहाँ हमने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की वहीं समाजिक कुरीतियों के विरूद्ध सम्मेलन सदा से कार्य करता रहा है और आज भी इस दिशा में अग्रसर है। आपने आगे कहा कि समाज के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों के प्रमुख कारणों में समाज में व्यापक आडम्बर एवं दिखावेपन की प्रवृत्ति है। इस प्रवृति को दूर करने के प्रयास होने चाहिए।’’

शनिवार, 3 जुलाई 2010

परिचय: लोक-इतिहास के प्रेरणा पुरुष: गोविंद अग्रवाल

- डॉ. दुलाराम सहारण


इतिहास एक ऐसा विषय है जो लोकयात्रा को सत्य-अक्षरों में लिखते हुए खुद को तारीखों में पिरोता चलता है। इस मार्ग के अनेक पड़ाव हैं। सम्पूर्ण पड़ावों से होते हुए जब मार्ग तय होता है तो एक सुनहरा अतीत बनता है। और तो और, इस मार्ग पर चलने वाले स्वयं एक इतिहास बन जाता है। परंतु, वह क्या बन सकता है जो इतिहास को संजोता है तथा कलम के चमत्कार से संपूर्ण विश्व के सामने उसे रखता है?
इतिहासकारों के इतिहास की बात आती है तो राजस्थान के चूरू शहर के श्री गोविंद अग्रवाल का स्मरण हो आना स्वाभाविक है। श्री गोविंद अग्रवाल पहले ऐसे विद्वान हैं जो लोक-इतिहास के बूते पर अपनी सशक्त पहचान रखते हैं। नब्बे साल के लगभग की अपनी इस जीवनयात्रा में श्री गोविंद अग्रवाल ने अपनी ज्ञान भरी तीक्ष्ण दृष्टि का प्रसार इस भांति किया है कि हर एक पारखी भी उनसे रू-ब-रू होते हुए संकुचाता है।
लोक-इतिहास में ‘चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास’ एक ऐसा कीर्ति-स्तम्भ है जो अकेला श्री अग्रवाल को अमर रखेगा।
श्री गोविंद अग्रवाल का जन्म राजस्थान के चूरू शहर में भाद्रपद कृष्णा 1, वृहस्पतिवार, विक्रम संवत् 1979 तद्-अनुसार 17 अगस्त, 1922 ई. को श्री दुर्गादत्त केजड़ीवाल के यहां हुआ। गोविंदजी का यह सौभाग्य रहा कि उनके पिताश्री दुर्गादत्तजी एवं बड़े भाई श्री सुबोधकुमारजी अग्रवाल साहित्यिक संस्कारों वाले थे। गोविंदजी को उनका सहयोग मिला।
1942 ई. का समय देश में राजनीतिक उठा-पटक का समय था। ठीक इसी वक्त में गोविंदजी की कलम ने आंदोलन छेड़ा और ललित गद्य-काव्य और अतुकांत कविताओं का सृजन रूपी परिणाम सामने आया। सन् 1944-45 में साप्ताहिक ‘अर्जुन’ में कई गद्य-काव्यमयी रचनाओं का प्रकाशन हुआ। पहली अतुकांत कविता ‘हल’ शीर्षक से सन् 1947 में अलवर से प्रकाशित होने वाले मासिक ‘राजस्थान क्षितिज’ में छपी। सन् 1947 में ही मासिक ‘तरुण’, इलाहाबाद में गोविंदजी का एक आलेख छपा।
सन् 1957 के आसपास भोज प्रकाशन, धार (मध्य प्रदेश) से छपने वाली मासिक ‘उषा’ गोविंदजी की रचनाओं की चहेती पत्रिका बनी। इस पत्रिका में गोविंदजी ने चतुरसेन शास्त्री के प्रसिद्ध उपन्यास ‘गोली’, ‘सोना और खून’ तथा ‘वयं रक्षामः’ की समीक्षा की। जो काफी लोकप्रिय हुईं।
शोध दृष्टि के हुए विकास का सांगोपांग दर्शन सन् 1960 में ‘बिड़ला एज्युकेशन ट्रस्ट’ के राजस्थानी विभाग की मुख पत्रिका ‘मरु भारती’ में हुआ। सन् 1985 तक गोविंदजी इस पत्रिका में निरंतर लिखते रहे। अगर इस पत्रिका में छपे उनके आलेखों को देखना हो तो कोई 1500 पृष्ठ खंगालने पड़ेंगे। इन 1500 पृष्ठों की सामग्री में गोविंदजी ने राजस्थानी लोककथाएं, लोकगीत, लोक इतिहास के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला है। राजस्थानी लोककथाओं का काम सन् 1964 में भारती भण्डार, इलाहाबाद से पुस्तक रूप में दो भागों में छपा। प्रथम भाग की भूमिका प्रसिद्ध विद्वान डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल तथा दूसरे भाग की भूमिका उपन्यासकार वृंदावनलाल वर्मा ने लिखी। काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, मोरारजी देसाई, यूजीसी के अध्यक्ष डॉ. दौलतसिंह कोठारी आदि विद्वानों ने इसकी जमकर तारीफ की।
गोविंद अग्रवाल राजस्थानी कहावतों पर श्री भागीरथ कानोड़िया के साथ मिलकर सन् 1979 में पुस्तक रूप में भी आए। इसमें 3209 कहावतें भावार्थ के साथ तथा 350 कहावतें संदर्भ कथा के साथ दी गईं। लोक मर्मज्ञ डॉ. सत्येंद्र ने इस पुस्तक की भूमिका लिखी। इस पुस्तक के संदर्भ मेँ डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी ने लिखा- ‘‘राजस्थानी कहावत कोश के संपादक ने स्मृतिकार की भूमिका निभाई है। ये लोकोक्तियां मील का पत्थर हैं और यह कोश एक संदर्भ ग्रंथ है।’’
गोविंदजी की रुचि लोक तथा लोक-इतिहास में रही। इसको परवान चढ़ाने हेतु चूरू में अपने तीन साथियों- श्री सुबोधकुमार अग्रवाल, कुंजबिहारी शर्मा तथा श्रीनिवास दिनोदिया के सहयोग से ‘लोक संस्कृति शोध संस्थान, नगरश्री’ की सन् 1964 में स्थापना की। आगे चलकर इसका खुद का भवन भी स्थापित हुआ।
नगरश्री से ‘मरुश्री’ नाम से शोध पत्रिका सन् 1971 में प्रारम्भ हुई। चूरू अंचल एवं दूसरी जगहों से शोध संग्रहालय में पुरानी मूर्तियां, पुरातात्विक सामग्री, हस्तलिखित पाण्डुलिपियां, ताड़पत्री प्रतियां, पुराने अभिलेख तथा बहियां आदि इक्कट्ठी की गईं। इस संग्रहालय में भाड़ंग, कालीबंगा, रंगमहल, करोती, सोथी तथा पल्लू के थेहड़ों से संग्रहित पुरातात्विक सामग्री मौजूद है, जो काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। नगरश्री ने स्वयं के पुस्तकालय की स्थापना की। नगरश्री सभागार में नगर के महापुरुषों, ऐतिहासिक स्थलों आदि के 1200 से ज्यादा चित्रों की शृंखला संयोजित की गई। प्रकाशन विभाग से पुस्तकों का प्रकाशन किया गया। ऐतिहासिक- साहित्यिक- सांस्कृतिक आयोजनों का सिलसिला शुरू हुआ। विद्वानों का सम्मान एक परम्परा के तहत किया जाने लगा।
सन् 1966 में श्री गोविंद अग्रवाल की पुस्तक ‘जैन धर्म को चूरू जिले की देन’ छपी। इस पुस्तक के माध्यम से इस क्षेत्र का एक हजार वर्षों का जैन-इतिहास पहली दफा सामने आया।
चूरू नगर के मंदिर-देवलों के भित्तिचित्र, शिलालेख तथा उनसे जुड़े हुए विभिन्न तथ्यों के संगम से पुस्तक ‘चूरू के मुख्य मंदिर’ प्रकाश में आई। दूसरी पुस्तक ‘हमारी सांस्कृतिक परम्पराएं’ नाम से संपादित की गई। ‘चूरू चंद्रिका’ नाम से छपे संग्रह में चूरू के सम्पूर्ण पक्षों को सहेजा गया।
चूरू के लोकप्रिय समाजसेवी स्वामी गोपालदास के संघर्ष को ‘स्वामी गोपालदासजी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ पुस्तकों में प्रस्तुत किया गया। यह पुस्तक सन् 1968 में छपी।
‘मरुश्री’ पत्रिका नगरश्री की मुख्य पत्रिका थी। इसमें सन् 1974 से 1977 तक गोंिवंद अग्रवाल का राजस्थानी गद्यकाव्य ‘नुक्तीदाणा’ छपा। सन् 1978 में ये 101 नुक्ती दाणा पुस्तक रूप में आए। पुस्तक की यह खास बात थी कि राजस्थानी, हिंदी तथा अंग्रेजी तीनों भाषाओं में ये नुक्तीदाणा दिए गए।
‘मरुश्री’ पत्रिका सन् 1971 में प्रारम्भ हुई थी। इसमें ‘ग्राम दर्शन’, ‘खोज की पगडंडियां’, ‘बस्तों-बुगचों से’ जैसे स्थायी स्तम्भ थे। इस पत्रिका के माध्यम से लोक-इतिहास पर अनोखा काम हुआ।
गोविंदजी की अगुवाई में सन् 1964 में एक योजना बनी थी कि चूरू मण्डल का प्रामाणिक इतिहास लिखा जाए। चूरू के इतिहास पर यह एक भांति पहला ही काम था, इस कारण काफी मेहनत एवं परिश्रम वाला था। परंतु, जब 542 पृष्ठ, 21 अध्याय, 44 परिशिष्ट और 101 चित्र, मानचित्र, अभिलेख, शिलालेख, ताम्रपत्र और हस्तलिखित ग्रंथों के चित्राम लेकर यह ग्रंथ सार्वजनिक हुआ तो सभी ने दांतों तले अंगुली दबा ली। इस ग्रंथ का नाम ‘चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास’ रखा गया। चूरू अंचल के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को इसमें भली-भांति समायोजित किया गया। ग्रंथ की भूमिका प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रघुवीरसिंह सीतामऊ ने लिखी। ग्रंथ का 25 अप्रैल, 1974 को चूरू शहर में बड़ा समारोह आयोजित कर विमोचन किया गया। इस समारोह में देश के नामी इतिहासकारों ने शिरकत की।
यह ग्रंथ आज आंचलिक इतिहास के मार्ग पर मील का पत्थर माना जाता है। मुड़िया लिपि के गोविंदजी ख्यातनाम जानकार हैं। इस लिपि को पढ़ने के लिए आज काफी यत्न किए जाते हैं। गोविंदजी मुड़िया लिपि को पढ़ने वाले ही नहीं अपितु गहरे जानकार भी हैं। इस लिपि में लिखी व्यापारिक घरानों की बहियों को ढूंढ़कर संग्रहित करते हुए उन पर महत्त्वपूर्ण काम किया। चूरू के पोतदार संग्रह में संग्रहित 200 वर्ष पुराने अभिलेख और 15-20 कीलो की बहियों को गोविंदजी ने खंगाला तथा उनके ऐतिहासिक महत्त्व को प्रगट किया। यह काम सन् 1976 में ‘पोतदार संग्रह के अप्रकाशित कागजात’ के नाम से पुस्तक रूप में आया।
व्यापारिक घरानों में मुनीम-गुमाश्तों का जबरदस्त योगदान होता है। परंतु, किसी ने इस पर काम नहीं किया। गोविंद अग्रवाल ने इसको चुनौती माना और सन् 1983 में ‘वाणिज्य व्यापार में मुनीम-गुमाश्तों की भूमिका’ पुस्तक छपकर पहचान बनाने में कामयाब रही।
चूरू के पोतदार (पोद्दार) संग्रह में महाराजा रणजीतसिंह और नाभा, पटियाला, जिंद, कपूरथला आदि के शासकों के साथ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के पदाधिकारियों आदि के फारसी परवाने थे। गोविंद अग्रवाल ने इनकी खोज की और डॉ. रघुवीरसिंह सीतामऊ ने 250 अभिलेखों का फारसी अनुवादक मुंशी काजी करामतुल्लाह से अनुवाद करवाया। यह काम ‘पोतदार संग्रह के फारसी कागजात’ नाम से पुस्तक रूप में आया।
‘उन्नीसवीं शती पूर्वार्द्ध में समृद्ध भारतीय बीमा पद्धति’ पुस्तक श्री गोविंद अग्रवाल 1987 ई. में प्रकाशित करवाते हैं, जो कि बीमा इतिहास प्रकट करती है। यह पुस्तक राजस्थान के शिक्षा पाठ्यक्रम में भी सम्मिलित रही।
गोविंदजी विद्वता के बलबूते पर इतिहास अनुसंधान परिषद, दिल्ली की ओर से 2 वर्ष हेतु सीनियर फैलोशिप प्राप्त करने में सफल भी हुए। दूसरी अनेक संस्थाओं ने भी उनका काफी मान-सम्मान किया। परंतु खास बात यह रही कि गोविंदजी पुरस्कार लेने से शर्माते रहे। उनमें यह प्रवृत्ति अब भी जिंदा है। वे फोटो खिंचवाते हैं तो आज भी लजा या शर्मा जाते हैं।
अग्रवालजी की दृष्टि तीक्ष्ण है। उनकी आदत है कि वे किसी पुस्तक का अध्ययन करते हैं तो लाल पेंसिल हाथ में रखते हैं। जहां-जहां वे गलती देखते हैं वहां-वहां लाल घेरा कर देते हैं। तथ्य की परख और भाषा का ज्ञान उनका गजब है। उन्होंने राजस्थान शिक्षा विभाग की पाठ्य-पुस्तकों में अनेक बार संशोधन करवाए। राजस्थान गजेटियर विभाग की तरफ से निकाले गए चूरू गजेटियर में संशोधन करवाया। जनसंपर्क विभाग, चूरू की तरफ से निकाली गई ‘चूरू दर्शन’ पुस्तक पर तो गोविंदजी की निकाली गई गलतियों के कारण रोक भी लगा दी गई।
आचार्य चतुरसेन शास्त्री के उपन्यास ‘गोली’ में गोविंदजी ने अनेक गलतियां निकालीं। जो अगले संस्करण में सुधारी गईं। उपेन्द्रनाथ अश्क के ‘गिरती दीवारें’ उपन्यास का द्वितीय संस्करण 1951 में प्रकाशित हुआ। गोविंदजी ने इसको लाल घेरों से सज्जित करके अश्कजी के पास भिजवाया। तीसरा संस्करण जब 1957 में छपा तो अश्कजी ने दो शब्द लिखते हुए उपन्यास में सुधार हेतु जिनका आभार प्रकट किया उनमें गोविंद अग्रवाल, चूरू एवं प्रो. बोस्क्रेनी, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, लेनिग्राड विश्वविद्यालय के नाम थे।
श्री गोविंद अग्रवाल आज अपने लड़कों के पास कर्नाटक के कुमारपट्टनम् नगर में रहते हैं। परंतु, उनके पास जो पुस्तक, पत्रादि पहुँचते हैं उन पर सटीक टिप्पणी और पुस्तक लाल घेरों के साथ वापिस जरूर आती है।
अग्रवालजी का इतिहास तथा साहित्य में जो योगदान है वह शब्दातीत है। गोविंदजी एक ऐसे तपस्वी हैं जो मां सरस्वती से मुंहमांगा वरदान लेकर धरती पर आए और अथक रूप से आजतक सरस्वती-भण्डार को भरने में लगे हैं।
यहां यह बात लिखनी भी जरूरी हो जाती है कि श्री गोविंद अग्रवाल के बड़े भाई श्री सुबोधकुमार अग्रवाल आयोजनधर्मी एवं यात्राशील मनुष्य थे। उनकी यात्राएं एवं आयोजन नगरश्री संस्थान तथा नगरश्री संग्रहालय को गति देते। इससे गोविंदजी को सहायक सामग्री तथा बल मिलता।
लोक संस्कृति शोध संस्थान, नगरश्री की यात्रा निरंतर जारी है। श्री रामगोपाल बहड़, डॉ. शेरसिंह बीदावत, श्री श्यामसुंदर शर्मा, श्री रामचंद्र शर्मा आदि विद्वान अग्रवाल बंधुओं की धरोहर को अच्छे ढंग से संभाले हुए हैं एवं नित्यप्रति उसमें वृद्धि कर रहे हैं। मूल रूप से यह आलेख उन्हीं की देन हैं।
उम्मीद की जा सकती है कि गोविंदजी के काम को इसी भांति गति मिलती रहेगी। गोविंदजी का लेखन अमर रहेगा तथा उनकी साधना को नमन् करते हुए विद्वान वर्ग आगे बढ़ता रहेगा।


- 105, गांधीनगर, चूरू-331001 राजस्थान
E-mail : drsaharan09@gmail.com

शनिवार, 12 जून 2010

भोपाल तीन काल - शम्भु चौधरी

-1-
चलती ट्रेनों में,
जिन्दा लाशों को ढोनेवाला,
ऐ कब्रगाह- भोपाल!
तुम्हारी आवाज कहाँ खो गई?
जगो और बता दो,
इतिहास को |
तुमने हमें चैन से सुलाया है,
हम तुम्हें चैन से न सोने देगें।
रात के अंधेरे में जलने वाले,
ऐ श्मशान भो-पा-ल....
जगो और जला दो
उस नापाक इरादों को
जिसने तुम्हें न सोने दिया,
उसे चैन से सुला दो।
[प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र, कोलकाता 28 दिसम्बर1987]


-2-


वह भीड़ नहीं - भेड़ें थी ।
कुछ जमीन पर सोये सांसे गिन रही थी।
दोस्तों का रोना भी नसीब न था।
चांडाल नृत्य करता शहर,
ऐ दुनिया के लोग;
अपना कब्रगाह या श्मशान यहाँ बना लो।
अगर कुछ न समझ में न आये तो,
एक गैसयंत्र ओर यहाँ बना लो।
मुझे कोई अफसोस नहीं,
हम तो पहले से ही आदी थे इस जहर के,
फर्क सिर्फ इतना था,
कल तक हम चलते थे, आज दौड़ने लगे।
कफ़न तो मिला था,
पर ये क्या पता था?
एक ही कफ़न से दस मुर्दे जलेगें,
जलने से पहले बुझा दिये जायेगें,
और फिर
दफ़ना दिये जायेगें।
[प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र, कोलकाता 02 दिसम्बर1987]


-3-


भागती - दौड़ती - चिल्लाती आवाज...
कुछ हवाओं में, कुछ पावों तले,
कुछ दब गयी,
दीवारों के बीच।
कुछ नींद की गहराइयों में,
कुछ मौत की तन्हाइयों में खो गई।
कुछ माँ के पेट में,
कुछ कागजों में,
कुछ अदालतों में गूँगी हो गयी।
गुजारिश तुमसे है दानव,
तुम न खो देना मुझको,
जहाँ रहते हैं मानव।
[प्रकाशित- दैनिक विश्वमित्र, कोलकाता 5 नवम्बर 1988]

-शम्भु चौधरी, एफ.डी. - 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता - 700106

मंगलवार, 11 मई 2010

आचार्य महाप्रज्ञ का निधन अपूरणीय क्षति


9 मई 2010 ... बीदासर : श्वेताम्बर तेरापंथ के दसवें संत आचार्य महाप्रज्ञ का रविवार को निर्वाण हो गया। महाप्रज्ञ दोपहर करीब 2.50 बजे देवलोकगमन कर गए। वे 89 वर्ष के थे। अणुव्रत आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले महाप्रज्ञ जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय के अध्यक्ष थे। महाप्रज्ञ के निर्वाण से तेरापंथ समाज में शोक की लहर है। महाप्रज्ञ का जन्म 17 जून 1920 में झुंझनुं जिले के छोटे से गांव तमकोर में हुआ। महाप्रज्ञ को अपने परिवार में नथमल के नाम से जाना जाता था। 1931 में मात्र दस वर्ष की आयु में उन्होंने सन्यास ले लिया था। अहिंसा व विश्वशांति के अग्रदूत आचार्य महाप्रज्ञ का स्वर्गवास जैन समाज के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश व दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति है। धर्म, अध्यात्म, शांति व अमन के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान को शब्दों में बयां करना कठिन है। उनके निधन का समाचार मिलने के बाद से ही जैन समुदाय में शोक लहर दौड़ गई। डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम ने चुरू जिले के सरदार शहर पहुंचकर आचार्य महाप्रज्ञ को श्रद्धांजलि दी । पिछले दिनों मेरे मित्र श्री प्रकाश चंडालिया ने उनसे मिलकर एक साक्षात्कार लिया था। जिसे हम यहाँ पाठकों के लिये जारी कर रहें हैं। हम देश की इस अपूरणीय क्षत्ति को पुरा तो नहीं कर सकते, हाँ! श्रद्धांजलि स्वरूप हम उनके विचारों से प्रेरणा ग्रहण कर सकतें हैं।- संपादक



साक्षात्कार आचार्य महाप्रज्ञ से

- प्रकाश चंडालिया -


अपने चिन्तन और विचारों से ऐसे ही करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाले श्री महात्मा यूं तो तेरापंथ धर्म संघ के आचार्य हैं, लेकिन अपने चिन्तन के माध्यम से उन्होंने यह स्थापित कर दिया है कि वह केवल तेरापंथ संघ के आचार्य ही नहीं, भारत के महान दार्शनिकों में उनका नाम सुमार है। उम्र के आठ दशक पार करने के बाद भी अहिंसा की महान यात्रा लेकर पूरे भारत भ्रमण पर निकले आचार्य श्री ने महाप्रदीय देश के कई प्रान्तों का सफर कर लिया है। राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा जैसे प्रान्तों में उन्होंने अहिंसा यात्रा का परचम लहराया है और अब तक 7.5 हजार किलोमीटर से अधिक की यात्रा संपन्न कर चुके हैं। आचार्य महाप्रज्ञ की इस यात्रा में 100 करोड़ की आबादी वाले इस देश में
एक प्रतिशत ही कहें तो एक करोड़ से ज्यादा लोग इनके संपर्क में आए हैं। आचार्य श्री का प्रभाव अहिंसा यात्रा का कितना है यह इसी से समझा जा सकता है कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम आठ बार गुरुदेव का दर्शन करने आ चुके हैं।
उनसे किए गये प्रश्नोत्तर:-
प्रश्न: गुरुवर, आप अहिंसा यात्रा पर निकले हुए हैं और अब तक आपने 7.5 हजार किलोमीटर की यात्रा कर ली है। अहिंसा यात्रा का चिंतन आपके दिमाग में कैसे आया और जो आपकी आंखों में एक सपना था अहिंसा यात्रा का उसे साकार करने में आप कहां तक बढ़ पाए।
उत्तर: भगवान महावीर के 26वें जन्मदिन को भारत सरकार ने अहिंसा वर्ष घोषित किया था। काफी समय बीत गया-कुछ भी नहीं हो रहा था, तब एक चिन्तन आया कि अहिंसा वर्ष की घोषणा सरकारी घोषणा तो है ही किन्तु हमारा भी कर्तव्य है कि कुछ करना चाहिए। एक निमित बना और अहिंसा यात्रा की भावना, कल्पना सामने आई। फिर उस पर चिन्तन किया, उद्देश्य बनाया कि जनता में अहिंसा की चेतना जागृत हो। सुजानगढ़ से सफर शुरू हुआ और पांच वर्ष पूरे हो गए, छठा वर्ष अभी चल रहा है। व्यापक जन संपर्क रहा और हमने केवल बात में ही हिंसा-अहिंसा की बात में ध्यान नहीं दिया वह तो चल ही रहा था, किन्तु अहिंसा के कारणों पर विचार किया, चिन्तन किया, अनुसंधान किया तो सामने जो कारण आये तो मान लिया एक साधन है कि अहिंसा ज्यादा हो।
प्रश्न: देश में बढ़ती हिंसा का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: जातिवाद और सम्प्रदायवाद हिंसा का कारण बन रहा है। अनैतिकता भी हिंसा का कारण है। आदमी में आवेश इतना बढ़ रहा है कि आज सहन करने की शक्ति कम हो गई है। साथ-साथ में गरीबी तो है ही, किन्तु रोटी का अभाव भी हिंसा का बड़ा कारण बन रहा है। भूखा आदमी हिंसा में बह जाता है। इन सब कारणों को सामने रख कर हमने काम शुरू किया कि हमारा एक लक्ष्य रहे स्वस्थ व्यक्ति, स्वस्थ समाज और स्वस्थ अर्थ व्यवस्था, इन तीनों के समन्वयन के बिना अहिंसा की बात आगे नहीं बढ़ सकती। इन सब के चिंतन के साथ हमने यात्रा शुरू की और संयोग की बात है कि सबसे पहले राजस्थान से गुजरात में हिंसा के वातावरण में ही हमें प्रवेश करना पड़ा।
प्रश्न: आप अंहिसा के विभिन्न प्रयोग करते रहे हैं। क्या यह संभव है कि हम अंहिसा का पूर्ण दौर देख सकेंगे क्या सभी धर्मों के एकीकरण की कल्पना की जा सकती है?
उत्तर: पूर्ण अहिंसा कभी संभव नहीं है। सभी धर्मों के एकीकरण की कल्पना करनी नहीं चाहिए। संभव भी नहीं है। हमें तो इतना ही करना चाहिए कि धार्मिक लोगों में सामंजस्य रहे, समन्वय की भावना रहे और धर्म के नाम पर लड़ाई झगड़ा न हो। इतना हो जाए तब इससे आगे जाना भी नहीं है। संभव भी नहीं है। पूर्ण अहिंसा की कल्पना ही डींग है। क्यों कि मनुष्यों के मस्तिष्क समान नहीं होते हैं। मस्तिष्क की रचनाएं भिन्न चिन्तन-मनन करती है। राष्ट्रीयता भी भिन्न-भिन्न होती है। इतना ही कर सकते हैं कि कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर अपना बाजार और व्यावसायिक प्राधित्व स्थापित न करें इतना हो तो कार्य अच्छा है।
प्रश्न: आंतकवाद की मूल जड़ क्या है?
उत्तर: आतंकवाद की मूल वजह राजनीति और वे करततें हैं जो कुछ कारणों से कुछ लोगों के द्वारा होती हैं। आतंकवाद है, भिन्न वाद है, इसके पीछे अनेक कारण हंै-राजनीतिक कारण भी हंै, और कुछ राष्ट्रों पर अपना अधिकार व प्रभुत्व जमाने की भावना भी है। इन कारणों में एक मूल कारण ये लगता है कि भूखे आदमी को
धनी आदमी जहां लगाना चाहें लगा सकते हैं। अतंकवाद में यही हो रहा है।
प्रश्न: धर्म के नाम पर जेहाद क्या आतंकवाद का ही एक हिस्सा है?
उत्तर: आतंकवाद एक जाल है। कोई भी अतंकवादी अपने पुत्र को आतंकवादी नहीं बनाता। जेहाद और आतंकवाद अलग-अलग और एक दूसरे के विपरीत बिन्दु हैं।
प्रश्न: भारत में हिंसा रुकने का नाम ही नहीं लेती। आरोप है कि पड़ोसी देश भारत में आतंकवाद को शह दे रहा है।
उत्तर: पहले ही कहा है कि राजनीति आतंकवाद का मुख्य कारक है।
प्रश्न: विभिन्न धर्मों के अनेक साधु-संत काफी वैभवशाली जीवन यापन करते हैं।
उत्तर: यह एक संवेदनशील विषय है, जिसके बारे में अधूरी बात कहना नहीं चाहता और पूर्ण बात कह नहीं सकता।
प्रश्न: संथारा को गलत संदर्भ में परिभाषित किया जाता है।
उत्तर: यह भ्रांति है। आत्महत्या आवेश में की जाती है जबकि संथारा साधना या समाधिकरण का एक प्रयोग है। अधूरे ज्ञान के कारण लोग संथारा को आत्महत्या परिभाषित कर देते हैं।
प्रश्न: युनेस्को के शान्ति विश्वाविद्यालय के पदाधिकारी एवं संयुक्तराष्ट्र संघ के शान्ति मिशन के लोग आपसे मिलते रहे हैं। इस संबंध में अब तक क्या काम हुआ है?
उत्तर: चर्चाएं होती हैं। हिंसा के दमन के लिए वे लोग सामंजस्य स्थापित करना चाहते हैं, प्रयास जारी है।
प्रश्न: पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के साथ आप पुस्तक लिख रहे हैं। कैसी होगी यह पुस्तक क्या विज्ञान और अध्यात्म में सामंजस्य संभव है?
उत्तर: पूर्व राष्ट्रपति के साथ पुस्तक से संबंधित चर्चाएं होती रही हैं। पुस्तक कैसी होगी इसका आंकलन तो पाठक ही करेंगे। विज्ञान और अध्यात्म का योग समाज व राष्ट्र को बेहतर स्थिति में ला सकता है।
प्रश्न: राष्ट्रकवि दिनकर ने आपकी तुलना स्वामी विवेकानन्द से की है जबकि कुछ लोग आप में गाँधी की छवि देखते हैं।
उत्तर: आचार्य तुलसी ने एक बार कहा था कि महाप्रज्ञ को महाप्रज्ञ ही रहने दो। मैं भी यही सोचता हूँ।
प्रश्न: आप अपने लक्ष्य में कितने सफल हुए हैं?
उत्तर: पहले पहल तो लक्ष्य नहीं जानता था, कितना बढ़ पाया उसको मापना कठिन है। हिमखण्ड का सिरा दिखाई देता है, सम्पूर्ण हिमखण्ड तो सागर में ही समाहित है।
प्रश्न: तेरापंथ का भविष्य.........?
उत्तर: आचार्य तुलसी के शब्दों में शुभ ही शुभ है।

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

क्रेडिट कार्ड से नहीं चलती हमारी अर्थव्यवस्था


एक बात तो साफ हो गई कि भारत की अर्थव्यवस्था भारतीय किसानों के भाग्य पर निर्भर नहीं करती। पिछले दो सालों से माननीय कृषि मंत्री श्री शरद पवारजी ने देश में अनाज की भारी कमी का रोना रो-रोकर खाद्य प्रदार्थों के दाम दुगने से भी अधिक कर दिये। चीनी- 40 से 45 रुपया किलो बिकने लगी, गेहूँ- 18 से 20 रुपये किलो, दाल- 120 रूपये किलो मानो खाद्य प्रदार्थ नहीं कोई सोना-चाँदी हो गया है।
देश के प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री तक अर्थशास्त्री हैं और मुझे यह लिखने में जरा भी संकोच नहीं कि ‘‘ये अर्थशास्त्री नहीं कुछ और ही हैं’’। माननीय कृषिमंत्री को जब यह पता चला कि पंजाब में गत दो सालों से लाखों टन गेहूँ सरकारी गोदाम के खुले आसमान के नीचे पड़ा-पड़ा सड़ चुका तो बोलने लगे कि हम पता करंेगे। सफाई में कहते हैं कि आप कोई अर्थशास्त्री नहीं हैं, परन्तु अनाजों की दामों में बेहताशा वृद्धि के लिए जिम्मेदार शास्त्री तो जरूर हैं हमारे कृषि मंत्री जी।
जब तक देश की अर्थव्यवस्था दिल्ली के संसद भवन से गुजरती हुई भारतीय रिजर्व बैंक के लॉकरों की ठंडी हवा तक बहती रहेगी यह देश कभी शक्तिशाली नहीं हो सकता। इस देश को आत्मनिर्भर करने के लिए यहाँ की गर्म हवा में देश की अर्थव्यवस्था का नया अध्याय लिखना होगा। अर्थशास्त्री बनने के लिए उन्हें विदेशों की डिग्री नहीं गाँवों में किसानों की समस्याओं का अध्ययन करना होगा। भारतीय अर्थशास्त्रियों को समझना होगा कि आखिर क्या कारण है कि जो किसान सोना पैदा करता है वह आत्महत्या क्यों करता है। भारतीय अर्थशास्त्रियों को यह समझना होगा कि भारत अखिर गरीब कैसे है? जबकि इस देश में आबादी से कई गुणा अधिक उपजाऊ और खनिज सम्पदा से परिपूर्ण भूमि है। इन्फोसीस के साफ्टवेयर से देश की अर्थव्यवस्था बदलने की जगह किसानों की अर्थव्यवस्था को हमें पहले बदलना होगा। चन्द लोगों को समृद्ध बनाने की जगह देश को खुशहाल बनाने की बात हमें सोचनी होगी।
भारतीय अर्थशास्त्री इस बात को समझने का प्रयास करें कि जब किसान दो रुपये प्रति किलो में अपना सारा आलू बेच देता है तो कोल्डस्टोरेज में जाकर वह बीस रुपया किलो कैसे हो जाता है? क्या माँग एवं सप्लाई का अन्तर यहाँ भी लागू होता है। भारतीय अर्थशास्त्रियों को समझना होगा कि पंजाब में जब लाखों टन गेहूँ गत दो साल से खुले आसमान के नीचे सड़ रहा था तो देश में अनाज की कमी का रोना क्यों रोया गया। सात रुपये किलो खरीदा हुआ अनाज कैसे 20 रुपया किलो बिकने लगा? भारतीय अर्थशास्त्रियों को यह भी समझना होगा कि यह अनाज किसी अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा तेल व्यापार की तरह ट्रेड नहीं होता फिर इसके दाम कौन और किस तरह बढा रहा है?
हमारी अर्थव्यवस्था क्रेडिट कार्ड से नहीं चलती। हमारी अर्थव्यवस्था किसान के खलिहान में भरे अनाज से चलती है। देश की अर्थव्यवस्था को टैक्स लादकर सुधारा नही जा सकता देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए व्यवस्था में सुधार लाने की जरूरत पर बल देना होगा। परन्तु लगता हैं कि सत्ता की मजबूरी ने माननीय कृषि मंत्री जी के बयानों से समझौता कर लिया है। अन्यथा दामों पर नियंत्रण आसानी से किया जा सकता है। -शम्भु चौधरी

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

देश रंगीला

अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मलेन
के कौस्तुभ जयंती वर्ष पर


श्री संजय बिन्नाणी, कोलकाता द्वारा


Sanjay Binani


हम भारतवासी, भारतवासी हम ...

खटने-खाने को निकले, मरुधर-हरियाणा से हम
हर कोने (तक) पहुँचे हम ... भारतवासी हम ...


सदियों से फिरते-फिरते, जो कुछ है हमने देखा
जीवन संस्कृति का दर्शन - भारत सा कहीं ना देखा
बोली है अनगिन अपनी, संगीत अनोखा अपना
हैं नृत्य-गीत अलबेले, त्योहार खिलाते सपना
हम करते सबका पूजन, जड़ हो या फिर हो चेतन
अभिनन्दन (शुभ) अभिनन्दन ... भारतवासी हम ....

मणिपुर
भारत की मणि कहलाए, मुंदरी सा मणिपुर भाए
तैंतीस कबीले इसके, मणियों से चमकत जाए
यह अर्जुन की ससुराला, यहाँ नाचत हर एक बाला
भाषा भी विष्णुप्रिया है, बाजत मिरदंग निराला
महारास हैं पाँच तरह की, तांडव संग पंग-परेंगी
बाँशी पर है सरगम ... भारतवासी हम ...

सोनार बांग्ला
है शस्य-श्यामला प्यारी, यह बंगभूमि सोनारी
यहाँ शंखनाद करते हैं - हर घर-घर में नर-नारी
हरे कृष्ण-हरे रामा का - चैतन्य कीरतन होता
माँ काली के आँचल में, हर कोई चैन से सोता
बंकिम का वन्देमातरम, रवि ठाकुर का जन-गण-मन
गाते (हैं) हिलमिल कर हम ... भारतवासी हम ...

तमिलनाडु
यहाँ सेतुबंध, रामेशं, तप रता कुमारी कन्या है
मदुरई, मीनाक्षी, काँची की यह धरती धन्या है
यहाँ विवेकानंद - शिला पर 'ठाकुर' के दर्शन पाए
द्रविड़ों का तमिलनाडु यह, यहाँ तमिळ है बोली जाये
धर त्रिपुंड नटराज-महेश्वर निरत करत हैं भरतनाटियम
(देखो नटराज-महेश्वर, नर्तनरत शिव सुंदरतम)
डिमि-डिमि-डिमि-(डिमि)-डडम-डम्म .... भारतवासी हम ...

गुर्जरी
हर गाँव-शहर निखरा है, ले नयी चमक उभरा है
लक्ष्मी संग नारायण का ज्यों गरुड़ यहाँ उतरा है
हर सोमनाथ जय-जय-जय, द्वारिकाधीश की जय-जय
है अक्षरधाम निराला, स्वामीनारायण की जय
तमे केम छो बोलो भाई, जय पावागढ़ नी माई
(है) ढोल बजा लो ढम-ढम ... भारतवासी हम ...

रजवण
नीरस है मगर रसीली, सोनाली - घणी रंगीली
मरुधर री माटी माँ है - बलिदानी, सती, हठीली
धोरे हैं परम तपस्वी, और मोर हैं गहन मनस्वी
गो-वंश, ऊँट, घोड़े भी - जग भर में हुए यशस्वी
शूरों - संतों - भक्तों की, सेठों की, अलमस्तों की
(हैं) बातें अदभुत - अनुपम ... भारतवासी हम ...

पंचनद प्रदेश
अमरित सरवर लहराए, बल्ले-बल्ले हो जाये
यहाँ सोने सी फसलों पर, भंगड़ा पा - गिद्धा पायें
सरदार कहाए काका, मितरां नूं कहंदे पाप्पा
जट यमला पगला दीवाना, पगड़ी सम्हालते जाना
नानक, हर, तेगबहादुर, अर्जुन, गुरु गोबिंद के गुन
आओ गायें हम-तुम ... भारतवासी हम ...

उत्तर प्रदेश
बाबा की नगरी काशी, श्री राम अवधपुर वासी
संगम पर आकर देखा - यहाँ घट-घट है अविनाशी
तुलसी और सूर, कबीरा की वाणी (है) भजन सुनाती
माँ विन्ध्य-वासिनी ज्वाला है जीवन ज्योत जगाती
ब्रज राधे-राधे जपता, कान्हा गोकुल में रमता
मन-मधुवन (ही) वृन्दावन ... भारतवासी हम ...

संजय बिन्नाणी

१४.१२.२००९

शनिवार, 21 नवंबर 2009

अपनों से नहीं, अपनों के लिए लड़े!

लेखक:- ओमप्रकाश अग्रवाल


Agrasen Maharaj bavadiकॉमनवेल्थ खेलों के समय विदेश से आने वाले मेहमानों को दिखाने के लिए अनेक स्थान निश्चित किये हैं। केवल बौ( धर्म के अनुयायियों को दिखाने के लिए दो दर्जन से अधिक स्थान चिन्हित किये है। इन स्थानों में अग्रवाल समाज का कोई भी स्थान नहीं है, क्योंकि हमने कभी अपने इतिहास की तरफ अग्रवाल समाज ने कोई चेष्टा ही नहीं की! मेरा मानना है कि अग्रवाल समाज के इतिहास अन्य समुदायों से कम नहीं है।
क्नॉट प्लेस के निकट हेली रोड पर स्थित अग्रसेन बावड़ी और महरौली के निकट सारबन ग्राम में प्राप्त एक शिलालेख अग्रवाल समाज की धरोहर है। महाराजा अग्रसेन बावड़ी और शिलालेख हमारे जनहितैशी कार्यों की हजारों वर्ष पुरानी परम्परा के साक्ष्य हैं। शिलालेख में लिखा है कि अग्रोदक; अग्रोहा का प्राचीन नामद्ध के वणिकों द्वारा जनहित में किये गये कार्यों के लिए यह प्रशस्ति लेख है।
Agrasen maharaj sheelalekh1911 में नई दिल्ली के निर्माण के समय अग्रवाल समाज बहुत ही समृद्ध था! 1857 की क्रांति में अकेले लाला रामदास गुड़वाले ने बहादुरशाह जफ़्फर को 2 करोड़ रूपये भेंट में दिये थे और परिणाम में उन्हें फाँसी पर लटकना पड़ा।
मेरा लिखने का अर्थ यह है कि आज जहाँ नई दिल्ली बसी हुई है, अग्रवाल समाज की बहुत सम्पदा थी। उदाहरण के लिए शहीद भगतसिंह मार्ग; गोल मार्किट को जाने वाला रास्ता पर अग्रवाल दिगम्बर जैन मंदिर है। इसका अर्थ यह है कि अग्रसेन बावड़ी के समीप अग्रवाल समाज के बहुत परिवार थे। चाणक्यपुरी के मालचा गांव में अग्रवालों के 15 परिवार थे। इन परिवारों को ब्रिटिश सरकार ने बिना कोई मुआवजा दिये यहां से बेघर कर दिया था। भारत साधु समाज का कार्यालय उस समय के अग्रवाल पंचायती घर पर ही बना हुआ है। मौर्य शेरेटन होटल के सामने अग्रवाल प्याउ के अवशेष आज भी देखने को मिल जायेंगे।
अग्रवाल समाज द्वारा दिल्ली में आज 50 से अध्कि सार्वजनिक ;भवन व धर्मशालाएँ बनाई हुई हैं। 12 कॉलेज, 2 दर्जन से अधिक विद्यालय अनेक अस्पताल संचालित है।
साथ ही यह भी कटुसत्य है कि अग्रवाल समाज हमेशा अपनों से लड़ा है, अपनों के लिए नहीं! हिन्दी साहित्य के शलाका पुरूष विष्णु प्रभाकर बीमार होते हैं तो दिल्ली सरकार उनका खर्च वहन करती है और इसी तरह अग्रशिरोमणी बनारसी दास गुप्ता बीमार होते हैं तो हरियाणा सरकार उनका खर्च उठाती है। करोड़ों रूपये दान करने वाला समाज का एक चेहरा यह भी है। क्योंकि समाज के पास अपनों के लिए अन्यथा है ही नहीं।
अग्रसेन बावड़ी समीप जब बहुमंजिलें भवन का निर्माण हो रहा था, उस समय कमला नगर वाले स्व. लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, एडवोकेट ने हाईकोर्ट में एक मुकदमा दायर कर उसे रोकने का प्रयास किया था। लेकिन यह भी सत्य है कि अग्रवाल समाज के किसी बड़े नेता ने उनका साथ नहीं दिया।
यह सर्वविदित है कि दिल्ली से फाजिल्का जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग का नाम महाराजा अग्रसेन राष्ट्रीय राजमार्ग किया हुआ है। लेकिन इस मार्ग पर बन रहे पहला मैट्रो स्टेशन का नाम महाराजा अग्रसेन पर नहीं है। क्योंकि गौरव और रत्न की उपाधी से विभूषित और शिलालेखों पर अपने नाम लिखवाने वाले समाज के मठाधीशों के पास समय का अभाव है।
समाज के शुभचिंतकों से मेरा इस लेख के माध्यम से यही आग्रह है कि हम अपने उज्जवल इतिहास को जानने व उसे प्रकाशित करने के लिए सार्थक कदम उठायें।


सम्पर्क: युवा अग्रवाल, 8233 रानी झाँसी मार्ग, दिल्ली-6
मो.: 9310814014

हिंदी के लब्ध प्रस्थित साहित्यकार प्रोफ़ेसर कल्याण मल लोढ़ा नहीं रहे..

साहित्य जगत में शोक की लहर
लेखक: प्रकाश चंडालिया
लेखक कलकत्ता से प्रकाशित दैनिक राष्ट्रीय महानगर के संपादक हैं।



Prof.Kalyanmal Lodhaहिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार व जोधपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफ़ेसर कल्याण मल लोढ़ा का २१ नवम्बर की रात लगभग २.३० बजे जयपुर में निधन हो गया. वे ८९ वर्ष के थे। प्रोफ़ेसर लोढ़ा पिछले कुछ वर्षों से अस्वस्थ चल रहे थे।
प्रोफ़ेसर लोढ़ा ने १९४३ में इलाहबाद विश्वविद्यालय, प्रयाग से हिंदी में एम ए किया। सन १९४५ में आप पश्चिम बंगाल की राजधानी कलकत्ता आकर बस गए। कलकत्ता के जयपुरिया कॉलेज में आप हिंदी के विभाध्यक्ष नियुक्त हुए। १९४८ में कलकत्ता विश्वविद्यालय में अंशकालिक प्राध्यापक के रूप में काम शुरू किया, फिर १९५३ में पूर्णकालिक प्राध्यापक नियुक्त हुए। १९६० में आप रीडर बने और १९७४ में प्रोफ़ेसर। १९६० से ८० तक आप कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे। इस लम्बे कार्यकाल में आपने हिंदी की विकास यात्रा में नए आयाम स्थापित किये। हिंदी के सुविख्यात विद्वान तथा उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल आचार्य विष्णुकांत शास्त्री कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर लोढ़ा के शिष्य रहे। सन १९७९ से ८० तक आप राजस्थान के जोधपुर विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त किये गए। एक वर्ष के पश्चात आप पुनः कलकत्ता आ गए फिर सन १९८६ में आपने कलकत्ता विश्वविद्याला से अवकाश ग्रहण किया।
प्रोफ़ेसर लोढ़ा ने ५० से अधिक शोध निबंध लिखे।
आपने दर्जनों पुस्तकों की रचना की, जिनमे प्रमुख हैं- वाग्मिता, वाग्पथ, इतस्ततः, प्रसाद- सृष्टी व दृष्टी , वागविभा, वाग्द्वार, वाक्सिद्धि, वाकतत्व आदि। इनमे वाक्द्वार वह पुस्तक है, जिसमे हिंदी के स्वनामधन्य आठ साहित्यकारों - तुलसी, सूरदास, कबीर, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्यिक अवदानों का सुचिंतित तरीके से मूल्याङ्कन किया गया है। प्रोफ़ेसर लोढ़ा ने प्रज्ञा चक्षु सूरदास , बालमुकुन्द गुप्त-पुनर्मूल्यांकन, भक्ति तत्त्व, मैथिलीशरण गुप्त अभिनन्दन ग्रन्थ का संपादन भी किया।
प्रोफ़ेसर लोढ़ा को उनके साहित्यिक अवदानों के लिए मूर्ति देवी पुरस्कार, केंद्रीय हिंदी संसथान-आगरा से राष्ट्रपति द्वारा सुब्रमण्यम सम्मान, अमेरिकन बायोग्राफिकल सोसाइटी अदि ने सम्मानित किया। आप अपनी ओजपूर्ण वाक्शैली के लिए देश भर जाने जाते थे। विविध सम्मेलनों में आपने अपना ओजश्वी वक्तव्य देकर हिंदी का मान बढाया। आप के के बिरला फाउन्डेसन, भारतीय विद्या भवन, भारतीय भाषा परिषद्, भारतीय संस्कृति संसद सरीखी देश की सुप्रसिद्ध संस्थावों से जुड़े हुए थे।
प्रोफ़ेसर लोढ़ा के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है। उनका अंतिम संस्कार रविवार २२ नवम्बर को जयपुर में किया जा रहा है।

परिचय: प्रो.कल्याणमल लोढ़ा जी का


आज यहाँ हम एक ऐसे युगपुरुश के विषय में बात करेगें जिन्होंने न सिर्फ धर्मयुग तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में अनेक निबंध लिखे, बाद में वे पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी हुए। वग्मिता, इतस्ततः तथा काकपथ - ये तीन संग्रह तो प्रसिद्ध हैं। अन्य भी चर्चित हैं। जी हाँ! इनका नाम है - प्रो.कल्याणमल जी लोढ़ा। इनके निबंधों में वैविध्य है, साथ ही कलकत्ता पर लिखे गए इनके निबंध नई जानकारियों से भरे हुए हैं।लोढ़ाजी कलकत्ता और बंगभूमि के प्रेमी है। अतः जब वे उसके इतिहास या उसकी र्दुगति को दिखाते हैं नगर प्रदूषण वगैरह, तो उनमें एक कसक, एक दर्द उभरता है। जब ये कलकत्ता के गौरव का वर्णन करते हैं, महिमा बखानते हैं, हिन्दी के विकास और पत्रकारिता के अभ्युदय की चर्चा करते हैं, तो उन्हें गौरव सा अनुभव होता है। वास्तव में इनके लेखों में कोलकाता महानगर का चित्र तात्विक हो उठता हैं। बंगला साहित्य में भी कोलकाता का इतना सुन्दर वर्णन देखने को नहीं मिलता।


विद्यार्थी जीवनः अपने विद्यार्थी जीवन में प्रो. लोढ़ाजी एक प्रतिभाशाली छात्र रहे। यद्यपि उनके ज्येष्ठ और कनिष्ठ भ्राताओं ने अपने लिए वकालत व न्याय का क्षेत्र चुना और उन दोनों ने इन क्षेत्रों में अपूर्व सफलता और यश अर्जित किया, तथापि प्रो. लोढ़ा ने अपने लिये शिक्षा और साहित्य की सास्वत अराधना का जीवन चुना, कोलकाता के विश्वविद्यालय में उच्चतम पद प्राप्त किया एवं राजस्थान विश्वविद्यालय के भी कुलपति मनोनीत हुए। व्यवसाय के क्षेत्र में कोलकाता में प्रवासी राजस्थानियों का वर्चस्व तो सर्वविदित है, किन्तु शिक्षा साहित्य और शोध के क्षेत्र में प्रो. लोढ़ा ने स्वयं जो कीर्तिमान बनाया है वह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। प्रो. लोढ़ा अपने लेखों में संस्कृत, हिन्दी, प्राकृत, बंगला, अंग्रेजी सभी के विमर्शात्मक वाङ्मय से उद्वरण देकर अपने कथ्य को पुष्ट करते हैं। उनका कोई भी ग्रन्थ लें, वह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। वाक् को प्रथम पद बनाकर जिनका शीर्षक दिया गया है, ऐसे उनकेग्रन्थों की लम्बी श्रृंखला हैं- वाक्पथ, वाक्तत्व, वाग्विभव, वाग्दोह, वाक्सिद्धि- उन्हें देख लें। वाक् के उल्लेख से ग्रन्थों को अभिधान देकर उन्होंने अपनी पहचान को ही सार्थकता दी हैं। यह बात सभी जानते हैं कि वे स्फीत और प्रखर वग्मिता के, वाकशक्ति के, अभिव्यक्ति कौशल के, संप्रेषण रक्षता के धनी हैं। किन्तु समाज और संस्कृति के बड़े केनवस पर हिन्दी के आचार्य, विभागाध्यक्षा और कुलपति होने के साथ-साथ बल्कि उससे भी अधिक सुर्खियों में प्रो. लोढ़ा की छवि एक सुधी समीक्षक और पहचान एक साहित्य चिन्तक, और सहृदय सास्वत साधक के रूप में है। यह बात किसी भी प्रकार से अतिशयोक्ति नहीं लगती कि प्रो. लोढ़ा विश्वविद्यालीय हिन्दी जगत के गिने-चुने हुए प्रपितामह कोटि के वयोवृद्ध और वरिष्ठ आचार्यों में अग्रगण्य हैं तथा साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में प्रतीक पुरुष के तुल्य बन चुके हैं। बंगाल में हिन्दी के पण्डित और भाषिक महत्व का सिक्का जमाना आसान नहीं। यह भूमि विद्वानों और बड़ी-बड़ी प्रतिभाओं की भूमि रही है। यह बात भी उल्लेखनीय है कि मारवाड़ी समाज ने इस भूमि पर मेहनत की, संघर्ष किया, परन्तु जो सम्मान इन्हें, बंगाल की धरती में मिलना चाहिए था वह आज तक नहीं मिला। इस शहर में समाज के जितने उद्योगपति हैं यदि उसके अनुपात में एक प्रतिशत भी इनका साहित्य के क्षेत्र में योगदान रहा होता, तो समय-समय पर इनको जो हीन भावना से ग्रसित होना पड़ता है वह शायद नहीं होता। समाज द्वारा जितना सेवाकार्य इस शहर में किया गया है उतना कार्य देश के किसी भी शहर में दिखाई नहीं पड़ता। इसी दौर में इस अंधकार भरे वातावरण के बीच एक आशा की किरण के रूप में प्रो. कल्याणमलजी लोढ़ा का पदार्पण एवं कोलकाता विश्वविद्यालय में इनकी सेवा ने आशा की एक ज्योत जला दी।
आपका जन्म 28 सितम्बर 1921 को जोधपुर में हुआ। आपके पिता श्री चन्दमलजी लोढ़ा तत्कालीन जोधपुर राज्य में उच्च अधिकारी थे। इनकी माता का नाम सूरज कंवर था जो एक मध्यवित्त परिवार की गृहिणी महिला थी। आपका परिवार जैन धर्म का अनुयायी रहा है। साथ ही हिन्दू धार्मिक पर्व जैसे नवरात्री, जन्माष्टमी, शिवरात्री का भी पालन करतें हैं।
उच्च मध्यवित्त परिवार में आपका पालन-पोषण बड़े ही सम्मानपूर्वक हुआ। नैतिक मूल्यों में आस्था थी। परिवार में प्रातःकाल उठकर सभी को प्रणाम करना पड़ता, पूजा करनी पड़ती थी।
आप जसवन्त कॉलेज के विद्यार्थी थे। आचार्य सोमनाथ गुप्त एवं अन्य अध्यापकों का उन्हें काफी स्नेह प्राप्त रहा। कॉलेज के समय से ही आपके आलेख प्रकाशित होने लगे।
22 जुलाई 1945 को आप कलकत्ता आ गए। आप तीन भाई है। इनके बड़े भाई उच्च न्यायालय मे उच्च न्यायाधीश एवं विचारपति रह चुक हैं एवं इनके अनुज भी न्यायालय में न्यायपति रह चुके हैं। इनका परिवार राजकीय सेवा में रहते हुए इनका ध्यान शिक्षा जगत की ओर ही रहा।
आप बताते हैं कि जोधपुर से मेरा बहुत लगाव हैं क्योंकि वह मेरी जन्मभूमि है। बंगाल मेरी कर्म भूमि है, प्रयाग मेरी मानसभूमि है तो जन्मभूमि, कर्मभूमि और मानस भूमि - यही इनके जीवन का त्रिकोण रहा। 1945 में आप कोलकाता स्थित सेठ आनन्दराम जयपुरिया कॉलेज में प्राध्यापक के रूप मे जुड़े, 1948 में आपको कलकत्ता विश्वविद्यालय में अल्पकालिक अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली। सन् 1953 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग को मान्यता मिली। एक प्रकार से धीरे-धीरे कोलकाता महानगर के प्रायः सभी कॉलेजों में हिन्दी विभाग की व्यवस्था कराने में आपका सक्रिय योगदान रहा।

कोलकाता महानगर सरस्वती का मंदिरः
आप बताते हैं कि बंगाली समाज में अपनी भाषा के प्रति जो लगाव हैं, लगन है वह या वो महाराष्ट्र में है या दक्षिण में। आपको बंगाल में बंकिमचन्द्र, रवीन्द्र एवं शरदचन्द्र की रचनावलियां मिलेंगी। यहाँ के लोग आपस में इन रचनाओं पर विचारो का आदान-प्रदान करते कहीं भी देखे जा सकते हैं।
वर्ष 2003 में आपको भारतीय ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी पुरस्कार-2003 से सम्मानित किया गया। श्री लोढ़ाजी को गुरुवर आचार्य लोढ़ा जी के नाम से सभी जानते हैं । कोलकाता महानगर में हिन्दी की जितनी सेवा आपने की वह आज एक शोध का विषय बन गया है। जिन लोगों ने आचार्य लोढ़ा के वक्तव्यों को सुना है, जिनको इनकी कक्षा में पढ़ने का सौभाग्य मिला है, वे सभी जानते हैं कि श्री लोढ़ाजी के जीवन में कविताओं का बहुत बड़ा स्थान रहा है।



पतझड़ के अभिशाप, तुम वसन्त के श्रृंगार हो ।
जीवन के सत्य और असत्य दोनों के प्रतिरूप ।
मैं तुम्हारी ही कहानी सुनना चाहता हूँ ।
पतझड़ की झकझोर आँधियों में क्या तुम्हारा हृदय निराश नहीं हुआ ।
एक के बाद एक अपनी लालसाओं को मिटते देख-क्या तुम हताश नहीं हुए ।


- शम्भु चौधरी

[script code: prof.kalyanmal Lodha]

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

श्री हरीश भादानी जी नहीं रहे़......

लेखक: शम्भु चौधरी, कोलकाता



Harish Bhadaniकोलकाता:(दिनांक 2 अक्टूबर 2009): अभी-अभी समाचार मिला है कि राजस्थान के 'बच्चन' कहे जाने वाले प्रख्यात जनकवि हरीश भादानी का आज तड़के चार बजे बीकानेर स्थित आवास पर निधन हो गया। वे 76 वर्ष के थे। हरीश भादानी अपने पीछे तीन पुत्रियां और एक पुत्र छोड़ गए हैं। वे पिछले कुछ दिनों से अस्‍वस्‍थ चल रहे थे। शुक्रवार को उनकी देह अंतिम दर्शन के लिए उनके आवास पर रखी जाएगी। शनिवार को उनकी इच्छा के अनुरूप अंतिम संस्कार के स्थान पर उनके पार्थिव शरीर को सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए सौंपा जाएगा। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे भादानी ने हिन्दी के साथ राजस्थानी भाषा को भी संवारने का कार्य किया। राजस्‍थान के वि‍गत चालीस सालों के प्रत्‍येक जन आंदोलन में उन्‍होंने सक्रि‍य रूप से हि‍स्‍सा लि‍या था। राजस्‍थानी और हिंदी में उनकी हजारों कवि‍ताएं हैं। ये कवि‍ताएं दो दर्जन से ज्‍यादा काव्‍य संकलनों में फैली हुई हैं। मजदूर और कि‍सानों के जीवन से लेकर प्रकृति‍ और वेदों की ऋचाओं पर आधारि‍त आधुनि‍क कवि‍ता की प्रगति‍शील धारा के नि‍र्माण में उनकी महत्‍वपूर्ण भूमि‍का थी। इसके अलावा हरीशजी ने राजस्‍थानी लोकगीतों की धुनों पर आधारि‍त उनके सैंकड़ों जनगीत लि‍खें हैं जो मजदूर आंदोलन का कंठहार बन चुके हैं।


आज जैसे ही राजस्थान से श्री सत्यनारायण सोनी जी का फोन मिला, मैं स्तब्ध रह गया। हाथों-हाथ मैंने श्री अरुण माहेश्वरी से बात की, तो उन्होंने बताया कि आज सुबह ही उनका शरीर शांत हो गया। पिछले सप्ताह ही श्री भादानी जी अपने नाती (अरुण जी के लड़के) के विवाह में शरीक होने के लिये कोलकाता आये थे। उस समय आप स्वस्थ्य से काफी कमजोर दिख रहे थे परन्तु नाती के विवाह की खुशी और सरला के प्रेम ने उसे कोलकाता खिंच लाया था। श्री अरुण जी ने बताया कि पिछले 26 सितम्बर को ही वे राजस्थान लोट गये थे।


श्री हरीश भादानी का जन्म 11 जून 1933 बीकानेर में (राजस्थान) में हुआ। आपने 1960 से 1974 तक वातायन (मासिक) का संपादन भी किया। कोलकात्ता से प्रकाशित मार्कसवादी पत्रिका 'कलम' (त्रैमासिक) से भी आपका गहरा जुड़ाव रहा है। आपकी अनौपचारिक शिक्षा पर 20-25 पुस्तिकायें प्रकाशित हो चुकि है। आपको राजस्थान साहित्य अकादमी से "मीरा" प्रियदर्शिनी अकादमी", परिवार अकादमी, महाराष्ट्र, पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी(कोलकाता) से "राहुल" । के.के.बिड़ला फाउंडेशन से "बिहारी" सम्मान से सम्मानीत किया जा चुका है। इनके व्यक्तित्व ने बीकानेर नगर के होली के हुड़दंग में एक नई दिशा देने का प्रयास किया। खेड़ा की अश्लील गीतों के स्थान पर भादानीजी ने नगाड़े पर ग्रामीण वेशभूषा में सजकर समाज को बदलने वाले गीत गाने की परम्परा कायम की, उससे बीकानेर के समाज में बहुत अच्छा प्रभाव परिलक्षित हुआ था। उनका सरल और निश्चल व्यक्तित्व बीकानेर वासियों को बहुत पसन्द आता है। भादानीजी में अहंकार बिल्कुल नहीं है। इनके व्यक्तित्व में कोई छल छद्म या चतुराई नहीं है।

हरीश भादानी ने अपने परिवारिक जीवन में भी इसी प्रकार की जीवन दृष्टि रखी है और ऐसा लगता है कि उनको यह संस्कार अपने पिता श्री बेवा महाराज से प्राप्त हुए हैं। उनके गले का सुरीलापन भी उनके पिता की ही देन समझी जानी चाहिए। लेकिन उनके पिताश्री के सन्यास लेने से भादानीजी अपने बचपन से ही काफी असन्तुष्ट लगते हैं और इस आक्रोश और असंतोष के फलस्वरूप उनका कोमल हृदय गीतकार कवि बना। छबीली घाटी में उनका भी विशाल भवन था। वह सदैव भक्ति संगीत और हिंदी साहित्य के विद्वानों से अटा रहता था। हरीश भादानी प्रारंभ में रोमांटिक कवि हुआ करते थे। और उनकी कविताओं का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर एकसा पड़ता था। भादानी के प्रारंभिक जीवन में राजनीति का भी दखल रहा है। लेकिन ज्यों-ज्यों समय बीतता गया हरीश भादानीजी एक मूर्धन्य चिंतक और प्रसिद्ध कवि के रूप में प्रकट होते गए। हरीश भादानीजी को अभी तक एक उजली नजर की सुई 1967-68 एवं सन्नाटे के शिलाखण्ड पर 1983-84 पर सुधीन्द्र काव्य पुरस्कार राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार, द्वारा सुधीन्द्र पुरस्कार एक अकेला सूरज खेले पर मीरा पुरस्कार, पितृकल्प पर बिहारी सम्मान महाराष्ट्र, मुम्बई से ही प्रियदर्शन अकादमी से पुरस्कृत, राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर से विशिष्ठ साहित्यकार के रूप में सम्मानित किए जा चुके हैं।


11 जून 1933 बीकानेर में (राजस्थान) में आपका जन्म हुआ। आपकी प्रथमिक शिक्षा हिन्दी-महाजनी-संस्कृत घर में ही हुई। आपका जीवन संघर्षमय रहा । सड़क से जेल तक कि कई यात्राओं में आपको काफी उतार-चढ़ाव नजदीक से देखने को अवसर मिला । रायवादियों-समाजवादियों के बीच आपने सारा जीवन गुजार दिया। आपने कोलकाता में भी काफी समय गुजारा। आपकी पुत्री श्रीमती सरला माहेश्वरी ‘माकपा’ की तरफ से दो बार राज्यसभा की सांसद भी रह चुकी है। आपने 1960 से 1974 तक वातायन (मासिक) का संपादक भी रहे । कोलकाता से प्रकाशित मार्क्सवादी पत्रिका ‘कलम’ (त्रैमासिक) से भी आपका गहरा जुड़ाव रहा है। आपकी प्रोढ़शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा पर 20-25 पुस्तिकायें राजस्थानी में। राजस्थानी भाषा को आठवीं सूची में शामिल करने के लिए आन्दोलन में सक्रिय सहभागिता। ‘सयुजा सखाया’ प्रकाशित। आपको राजस्थान साहित्य अकादमी से ‘मीरा’ प्रियदर्शिनी अकादमी, परिवार अकादमी(महाराष्ट्र), पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी(कोलकाता) से ‘राहुल’, । ‘एक उजली नजर की सुई(उदयपुर), ‘एक अकेला सूरज खेले’(उदयपुर), ‘विशिष्ठ साहित्यकार’(उदयपुर), ‘पितृकल्प’ के.के.बिड़ला फाउंडेशन से ‘बिहारी’ सम्मान से आपको सम्मानीत किया जा चुका है । आपके निधन के समाचार से राजस्थानी-हिन्दी साहित्य जगत को गहरा आघात शायद ही कोई इस महान व्यक्तित्व की जगह ले पाये। हम ई-हिन्दी साहित्य सभा की तरफ से अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं एवं उनकी आत्मा को शांति प्रदान हेतु ईश्वर से प्रथना करते हैं।

हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकें:




अधूरे गीत (हिन्दी-राजस्थानी) 1959 बीकानेर।
सपन की गली (हिन्दी गीत कविताएँ) 1961 कलकत्ता।
हँसिनी याद की (मुक्तक) सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर 1963।
एक उजली नजर की सुई (गीत) वातायान प्रकाशन, बीकानेर 1966 (दूसरा संस्करण-पंचशीलप्रकाशन, जयपुर)
सुलगते पिण्ड (कविताएं) वातायान प्रकाशन, बीकानेर 1966
नश्टो मोह (लम्बी कविता) धरती प्रकाशन बीकानेर 1981
सन्नाटे के शिलाखंड पर (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर1982।
एक अकेला सूरज खेले (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1983 (दूसरा संस्करण-कलासनप्रकाशन, बीकानेर 2005)
रोटी नाम सत है (जनगीत) कलम प्रकाशन, कलकत्ता 1982।
सड़कवासी राम (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1985।
आज की आंख का सिलसिला (कविताएं) कविता प्रकाशन,1985।
विस्मय के अंशी है (ईशोपनिषद व संस्कृत कविताओं का गीत रूपान्तर) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1988ं
साथ चलें हम (काव्यनाटक) गाड़ोदिया प्रकाशन, बीकानेर 1992।
पितृकल्प (लम्बी कविता) वैभव प्रकाशन, दिल्ली 1991 (दूसरा संस्करण-कलासन प्रकाशन, बीकानेर 2005)
सयुजा सखाया (ईशोपनिषद, असवामीय सूत्र, अथर्वद, वनदेवी खंड की कविताओं का गीत रूपान्तर मदनलाल साह एजूकेशन सोसायटी, कलकत्ता 1998।
मैं मेरा अष्टावक्र (लम्बी कविता) कलासान प्रकाशन बीकानेर 1999
क्यों करें प्रार्थना (कविताएं) कवि प्रकाशन, बीकानेर 2006
आड़ी तानें-सीधी तानें (चयनित गीत) कवि प्रकाशन बीकानेर 2006
अखिर जिज्ञासा (गद्य) भारत ग्रन्थ निकेतन, बीकानेर 2007

राजस्थानी में प्रकाशित पुस्तकें:


बाथां में भूगोळ (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1984
खण-खण उकळलया हूणिया (होरठा) जोधपुर ज.ले.स।
खोल किवाड़ा हूणिया, सिरजण हारा हूणिया (होरठा) राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति जयपुर।
तीड़ोराव (नाटक) राजस्थानी भाषा-साहित्य संस्कृति अकादमी, बीकानेर पहला संस्करण 1990 दूसरा 1998।
जिण हाथां आ रेत रचीजै (कविताएं) अंशु प्रकाशन, बीकानेर।

इनकी चार कविताऎं:-


1.
बोलैनीं हेमाणी.....
जिण हाथां सूं
थें आ रेत रची है,
वां हाथां ई
म्हारै ऐड़ै उळझ्योड़ै उजाड़ में
कीं तो बीज देंवती!
थकी न थाकै
मांडै आखर,
ढाय-ढायती ई उगटावै
नूंवा अबोट,
कद सूं म्हारो
साव उघाड़ो औ तन
ईं माथै थूं
अ आ ई तो रेख देवती!
सांभ्या अतरा साज,
बिना साजिंदां
रागोळ्यां रंभावै,
वै गूंजां-अनुगूंजां
सूत्योड़ै अंतस नै जा झणकारै
सातूं नीं तो
एक सुरो
एकतारो ई तो थमा देंवती!
जिकै झरोखै
जा-जा झांकूं
दीखै सांप्रत नीलक
पण चारूं दिस
झलमल-झलमल
एकै सागै सात-सात रंग
इकरंगी कूंची ई
म्हारै मन तो फेर देंवती!
जिंयां घड़यो थेंघड़ीज्यो,
नीं आयो रच-रचणो
पण बूझण जोगो तो
राख्यो ई थें
भलै ई मत टीप
ओळियो म्हारो,
रै अणबोली
पण म्हारी रचणारी!
सैन-सैन में
इतरो ई समझादै-
कुण सै अणदीठै री बणी मारफत
राच्योड़ो राखै थूं
म्हारो जग ऐड़ो? [‘जिण हाथां आ रेत रचीजै’ से ]


2.
मैंने नहीं
कल ने बुलाया है!
खामोशियों की छतें
आबनूसी किवाड़े घरों पर
आदमी आदमी में दीवार है
तुम्हें छैनियां लेकर बुलाया है
सीटियों से सांस भर कर भागते
बाजार, मीलों,
दफ्तरों को रात के मुर्दे,
देखती ठंडी पुतलियां
आदमी अजनबी आदमी के लिए
तुम्हें मन खोलकर मिलने बुलाया है!
बल्ब की रोशनी रोड में बंद है
सिर्फ परछाई उतरती है बड़े फुटपाथ पर
जिन्दगी की जिल्द के
ऐसे सफे तो पढ़ लिये
तुम्हें अगला सफा पढ़ने बुलाया है!
मैंने नहीं
कल ने बुलाया है!


3.
क्षण-क्षण की छैनी से
काटो तो जानूँ!
पसर गया है / घेर शहर को
भरमों का संगमूसा / तीखे-तीखे शब्द सम्हाले
जड़े सुराखो तो जानूँ! / फेंक गया है
बरफ छतों से
कोई मूरख मौसम
पहले अपने ही आंगन से
आग उठाओ तो जानूँ!
चैराहों पर
प्रश्न-चिन्ह सी
खड़ी भीड़ को
अर्थ भरी आवाज लगाकर
दिशा दिखाओ तो जानूँ!
क्षण-क्षण की छैनी से
काटो तो जानूँ!
[‘एक उजली नजर की सुई’ से]


4.
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
ऐरावत पर इंदर बैठे
बांट रहे टोपियां

झोलिया फैलाये लोग
भूग रहे सोटियां
वायदों की चूसणी से
छाले पड़े जीभ पर
रसोई में लाव-लाव भैरवी बजत है

रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
बोले खाली पेट की
करोड़ क्रोड़ कूडियां
खाकी वरदी वाले भोपे
भरे हैं बंदूकियां
पाखंड के राज को
स्वाहा-स्वाहा होमदे
राज के बिधाता सुण तेरे ही निमत्त है

रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
बाजरी के पिंड और
दाल की बैतरणी
थाली में परोसले
हथाली में परोसले

दाता जी के हाथ
मरोड़ कर परोसले
भूख के धरम राज यही तेरा ब्रत है

रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
[रोटी नाम सत है]


संपर्क:
पताः छबीली घाटी, बीकानेर फोनः 09413312930

रविवार, 2 अगस्त 2009

‘‘अन्तर्जातीय विवाह - कुछ अनुभव’’


नई पीढ़ी अपनी बात मनाने से पहले सोचे


- नन्दलाल रुँगटा


[टिप्पणी: पिछले दिनों अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन ने‘अन्तर्जातीय विवाह - कुछ अनुभव’ विषयक एक संगोष्ठी का कोलकाता में आयोजन किया। गोष्ठी के विषय की घोषणा के साथ ही समाज में एक सुगबुगाहट आरम्भ हो गयी। समर्थन के स्वर के साथ-साथ इस तरह के विषयों पर सम्मेलन द्वारा गोष्ठी आयोजित करने पर दबी जुबां में विरोध के स्वर भी सुनने को मिले।
गत साधारण सभा में भी सम्मेलन के कुछ सदस्यों ने इस सेमिनार पर अपना विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि इस तरह के सेमिनार सम्मेलन के वैनर तल्ले करने से अन्तर्जातीय विवाह को बढ़ावा मिलेगा। एक सदस्य ने कहा कि वे 'अन्तर्जातीय विवाह' का समर्थन तो करते हैं परन्तु 'अन्तरधर्मिय विवाह' को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। कुल मिलाकर यह लिखा जा सकता है कि समाज की मानसिकता इस बात को अभी भी खुले तौर पर स्वीकार नहीं कर पाई है। सम्मेलन सभापति 'साधरण सभा' में बचाव की मुद्रा में देखे गये। - संपादक]


Seminar On Intercast Mariage


श्रीमती उमा झुनझुनवाला माइक पर अपने अनुभव रखती हुई, नीचे सभागार में विवाहित जोड़े संदीप बजाज एवं रीता बजाज (यादव)। मंच पर दायें से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हरिप्रसाद कानोड़िया, सम्मेलन सभापति श्री नन्दलाल रुँगटा, पूर्व अध्यक्ष श्री सीताराम शर्मा, कोषाध्यक्ष आत्माराम सोंथलिया।


कोलकाताः दिनांक 11 जुलाई कोलकाता स्थित ‘‘दी कोलकाता ट्रामवेज कम्पनी’’ के सभागार में अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन द्वारा आयोजित एक सेमीनार
‘‘अन्तर्जातीय विवाह कुछ अनुभव’’
विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता सम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नन्दलाल रुँगटा ने की। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि अन्तर्जातीय विवाह एक सामयिक विषय है। सम्मेलन हमेशा से सम-सामयिक विषयों पर ऐसी संगोष्ठियाँ आयोजित करते आया है। जहाँ वक्ता अपने निजी विचार व्यक्त करते हैं और समाज उस पर चिन्तन करता है। आपने आगे कहा कि सम्मेलन अन्तर्जातीय विवाह विषय पर अपनी कोई राय नहीं रखता, यहाँ विचार रखने वालों के विचार उनके खुद के विचार माने जायेंगे। अन्तर्जातीय विवाह के संदर्भ में सम्मेलन की कोई राय अभी तक स्पष्ट रूप से नहीं बन पाई है, परन्तु समाज के युवाओं में इसके बढ़ते प्रचलन के प्रति समाज के बच्चों को इसके दूरगामी परिणाम के प्रति सजग करना भी हमारा कर्तव्य बन जाता है। समाज के अभिभावक नई पीढ़ी के समक्ष अपनी बात किस प्रकार से रखें या नई पीढ़ी अपनी बात मनाने से पहले अभिभावकों के समक्ष किस प्रकार का आचरण करे यह बात समाज को सोचने के लिये मजबूर कर रही है। इस मौके पर श्रीमती उमा झुनझुनवाला ने अपने अनुभव बयान करते हुए युवाओं को संदेश दिया कि उन्हें ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए जिससे उनके परिवारवालों को कोई ठेस पहुँचे। प्रो. अजहर ने इस बात पर खुशी जताई कि मारवाड़ी समाज में ऐसे विषयों पर संगोष्ठी आयोजित की जाती है। एक अन्तर्जातीय विवाहित जोड़े संदीप बजाज एवं रीता बजाज (यादव) ने भी अपने खुशहाल वैवाहिक जीवन का जिक्र करते हुए कहा कि किसी को ठेस पहुँचाकर किया गया कार्य सफल नहीं होता। जो माँ-बाप हमें पाल-पोस कर बड़ा करते हैं वे हमारा भला सोचते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में उनकी रजामंदी काफी अहमियत रखती है। हमें उनको विश्वास में लेकर ही कोई अहम कदम उठाना चाहिए। इस मौके पर श्री जयगोविन्द इन्दौरिया, एडवोकेट तारा व्यास ने अन्तर्जातीय विवाह से उत्पन्न हो रही विभिन्न समस्याओं पर प्रकाश डाला। उपाध्यक्ष हरिप्रसाद कानोड़िया, कोषाध्यक्ष आत्माराम सोंथलिया आदि मंचस्थ थे। धन्यवाद ज्ञापन संयोजक कैलाशपति तोदी तथा संचालन संयुक्त राष्ट्रीय महामंत्री संजय हरलालका ने किया। सह संयोजक दिलीप गोयनका ने आगत अतिथियों का स्वागत किया।
इस अवसर पर सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष श्री सीताराम शर्मा ने बताया कि सम्मेलन का काम सामाजिक बुराईयों पर लोगों की सोच में वैचारिक परिवर्तन लाना है। हम मन परिवर्तन कर सामाजिक बुराइयों पर अंकुश लगाने के पक्षधर हैं। उन्होंने कहा कि सिर्फ मारवाड़ी समाज ही एक ऐसा समाज है जहाँ सम्मेलन जैसी संस्था है जो स्वयं में सुधार का प्रयत्न करती है। मुझे 2002 का वाकया स्मरण हो आया जब हैदराबाद में आन्ध्र प्रदेश मारवाड़ी महिला सम्मेलन द्वारा ‘क्या अन्तर्जातीय विवाह उचित है’ विषयक एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था। सम्मेलन के तत्कालीन महामंत्री के रूप में समापन वक्तव्य के लिये मुझे आमंत्रित किया गया था। करीबन एक घण्टे से अधिक विभिन्न महिला वक्ताओं को, जिनमें बुजुर्ग, वयस्क, युवतियाँ-विवाहित एवं अविवाहित सभी शामिल थी को सुना। विषय की समझ, वैचारिक परिपक्वता एवं स्पष्टवादिता ने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया। जब मेरे बोलने की बारी आयी तो मैंने सिर्फ इतना ही कहा कि ‘‘विषय के पक्ष या विपक्ष पर मैं नहीं बोलना चाहता, मुझे तो इस बात पर सन्तोष एवं गर्व है कि मारवाड़ी समाज की महिलायें जो कुछ दशक पहले तक पर्दे में रहती थी, शिक्षा का अभाव था, वह मारवाड़ी महिला समाज आज मारवाड़ी सम्मेलन के बैनर के तले एकत्रित होकर इन विषयों पर खुलकर चर्चा कर रही हैं।’’
Seminar On Intercast Mariageमारवाड़ी सम्मेलन एक वैचारिक संस्था है जो विचार परिवर्तन के माध्यम से समाज सुधार एवं समरसता का कार्य करती है। समाज के सम्मुख जो भी प्रश्न, समस्याएँ, कुरीतियाँ प्रस्तुत होती हैं उन पर सम्मेलन विचार कर समाज को उनसे आगाह करता है। विभिन्न समय पर विभिन्न सामाजिक प्रश्नों पर सम्मेलन ने कार्य किया है चाहे वह पर्दा प्रथा हो या मृत भोज, विधवा विवाह हो या तलाक, दहेज या दिखावा, समरसता या राजनीति में भागीदारी, टूटते परिवार या बुजुर्गों के प्रति सम्मान में कमी- समय के साथ-साथ प्रश्न बदलते गये हैं।
उक्त गोष्ठी में चार अन्तर्जातीय विवाहित जोड़ों को अपने अनुभव बाँटने के लिए आमंत्रित किया गया था। दो जोड़े पधारे एवं दो जोड़े अंतिम समय पर अनिर्णय की स्थिति में नहीं आ सके। एक जोड़े ने बड़ी अच्छी बात कही कि ‘‘वे बिना अपने माता-पिता के आशीर्वाद के विवाह नहीं करना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने सात वर्ष तक इन्तजार किया। अब वे खुश हैं और उनके परिवार भी।’’
यह एक सच्चाई है कि सभी माता-पिता अपने लड़के-लड़की का विवाह अपनी जाति में ही करना चाहते हैं, यह उनकी प्राथमिकता भी है, एक सामाजिक मान्यता भी। अन्तर्जातीय विवाह अभी भी एक अपवाद के रूप में है। विभिन्न समाजों में पिछले वर्षों में इसमें एक बढ़ोत्तरी हुयी है, अपना मारवाड़ी समाज भी इससे अछूता नहीं है। आज के सामाजिक जीवन में अन्तर्जातीय विवाह एक यथार्थ के रूप में उभर कर आ रहा है। सम्मेलन कभी भी किसी भी विषय पर चर्चा करने से नहीं कतराया है। समाज के समक्ष जो भी परिस्थितियाँ हैं, उनसे आँख मूँद लेना कूपमण्डूकता होगी। सच्चाई का सामना करते हुए उस पर विवेचना कर समाज को सही दिशा प्रदान करना सम्मेलन का कर्तव्य बनता है। किसी विषय पर बातचीत या मुक्त चर्चा करना न तो उसका समर्थन है न ही उसका विरोध।

[Script Code: Marwari Samaj vs Intercast Mariage]

गुरुवार, 30 जुलाई 2009

मारवाड़ी समाज की बदलती तस्वीर -शम्भु चौधरी


मारवाड़ी समाज की बदलती तस्वीर के बारे में आज हम यहाँ चर्चा करेंगे। आप सभी को याद होगा कि जैमनी कौशिक बरुआजी ने कोलकाता में लगभग दो-तीन दशक पूर्व कई सीरिज में एक ग्रन्थ का प्रकाशन किया था-‘‘मैं मारवाड़ी समाज को प्यार करता हूँ’’ इस पुस्तक का कोई अस्तित्व नहीं रहा, कारण कि समाज के कुछ चुने हुए एवं संपन्न परिवारों की स्तुति के अलाव उस पुस्तक में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे समाज अपने पास बचा कर रख पाता। इससे पूर्व उड़ीसा के पं.भैरवलाल नन्दवाना, पत्रकार ने लगभग 60 साल पहले एक पुस्तक लिखी थी- ‘‘उड़ीसा और मारवाड़ी समाज’’ जिसमें समाज के सभी वर्गों को जोड़ने का प्रयास किया गया था। इस पुस्तक में लिखा है ‘‘उड़ीसा में मारवाड़ी समाज के जागृति के आधार - श्री सीताराम सेकसरिया और श्री बसन्तलाल मुरारका’’ एक बार तो मैं भी चौंक गया, समाज के इन मनीषियों का उड़ीसा से क्या लेना-देना, परन्तु जब इतिहास बोलता है तो उसे स्वीकार कर लेना पड़ता है। पिछले दिनों हमने ‘वागर्थ’ में श्रीमती कुसुम खेमानी द्वारा लिखा संस्मरण ‘भागीरथ कानोड़िया’ पर लेख पढ़ा। तो लगता है कि मारवाड़ी समाज ने जो कार्य किये उसमें राष्ट्रीयता की झलक तो देखने को मिलती ही है समाज की तत्काल जरुरतों को भी पूरा करने के लिये कई संस्थाओं का जन्म हुआ था, परन्तु आज समाज सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति में लगा है। युग का यह परिवर्तन डॉ.डी.के.टकनेत की पुस्तक ‘‘मारवाड़ी समाज’’ में भी देखने को मिलता है। जबकि एक समय स्व.राधाकृष्ण नेवटिया के द्वारा लिखी, संकलित पुस्तक ‘‘राजनीतिक क्षेत्र में मारवाड़ी समाज की आहुतियां’’ इस काल के समय लिखी बातों में समाज की सोच दर्शाती हैं। इन पुस्तकों में जो तस्वीर मारवाड़ी समाज की झलकती है उनके द्वारा किये कार्यों के अनुपात में आज के कार्यों में काफी ह्नास देखने को मिल रहा है। कितना गौरवशाली हमारा समाज था जिसकी तस्वीर आज हमें खोजनी पड़ रही है, उनके किये कार्यों के संस्मरणों को पढ़ने से मन रोमांचित हो उठता है और कहाँ आज का समाज है जो अपने धन का प्रदर्शन करने की होड़ में लगा है। लोग खुद के किये कार्यों के प्रचार में लगे हैं। समाज के कुछ अच्छे लोग जो आज भी अपने धन को जनसेवा के कार्य में लगा रहे हैं उसमंे काफी कमी आई है, जबकि पहले की अपेक्षा आज समाज के पास धन की कोई कमी नहीं, समाज के पास कार्य करने के संसाधन भी बढ़े हैं। बल्कि समाजसेवा के नाम पर दुकानदारी करने वाले की भीड़ ने उनके धन का गलत इस्तेमाल कर उनका विश्वास खो दिया है। पिछले दो दशकों में कोई भी ऐसी एक संस्था सामने नहीं आई जो निःस्वार्थ भाव से जनसेवा का कार्य कर रही हो। समाज की कुछ संस्थायें तो पॉकिट संस्था बन कर रह र्गइं, जिनमें सिर्फ धन की ऊपज जारी है, साथ ही समाज में कई ऐसी संस्थाएं भी हैं जो धन के अभाव में अपना दम तोड़ने के कगार पर हैं। समाज में आई इस नैतिक मूल्यों में गिरावट के लिये हम खुद को ही दोषी मानते हैं।
दो दशक पूर्व एक लेख ने मुझे काफी प्रभावित किया था।। ‘समाज विकास’ में प्रकाशित डॉ.कमल किशोर गोयनका का वह लेख - ‘‘एक से अनेक होकर लौटा’’ आज जब हम समाज के कार्यक्रमों में जाते हैं तो खुद को अलग-थलग पाते हैं। आप और हम नित्य नये कार्यक्रम करते हैं परन्तु इन कार्यक्रमों में समाज सेवा या समरसता की कोई झलक देखने को नहीं मिलती, समाचार पत्र वाले हमारे कार्यक्रमों की खिल्ली उड़ाते नजर आते हैं, हम हैं कि खुद की फोटो समाचार पत्रों में देखकर फूले नहीं समाते। रोजाना औसतन पूरे देश में करोड़ रुपये से भी अधिक की राशि समाज के द्वारा विभिन्न मदों (जनसेवा के कार्यों) में खर्च हो रही है। परन्तु इसके संकलित आंकड़ों के अभाव में समाज के कार्यों का सही तरीके से आंकलन नहीं किया जा सका है। सच तो यह है कि मारवाड़ी समाज ने जितना जनसेवा का कार्य किया है, उसे देख कर यदि यह भी लिख दिया जाय, कि इसकी तुलना में एक हिस्सा कार्य भी मदर टरेसा ने नहीं किया तो कोई चूक नहीं होगी, परन्तु समाज को आजतक कोई नोबल पुरस्कार नहींमिल सका। हर व्यक्ति खुद को स्थापित करने की दौड़ में लगा हुआ है और समाज का धन पानी की तरह बहे जा रहा है।
समाज की इस बदलती तस्वीर के लिये हम किसे दोषी ठहरायें-किसे नहीं? इतना जरूर है कि समाज का एक वर्ग मारवाड़ी समाज की दानशीलता के गलत इस्तेमाल में लगा है। समाज की सही तस्वीर को प्रस्तुत करने के लिए जरूरी है कि समाजसेवा के नाम पर नाटक करने वाले ऐसे तत्त्वों को समाज से अलग-थलग किया जाना चाहिये।[end. Script Code- Marwari]

मेरे बारे में कुछ जानें: