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शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

राजस्थानी वर्णमाला- शम्भु चौधरी

श्री राजेन्द्र बारा रे’नुसार राजस्थानी भासा री वर्णमाला में 49 वर्ण ध्वनियां है जिणा मांय 11 स्वर अर 38 व्यंजन होवो है। जबकि श्री केसरी कान्त शर्मा‘केसरी’ जी राजस्थानी वर्णमाला कुल 47 वर्ण ध्वनियां ही माने है। अपरो लिखनो है कि 13 स्वर अर 34 व्यंजन ही होवो है।
श्री केसरी जी तीन श,ष,स ण एक ‘स’ ही माने है कारण भी स्पष्ट है कि राजस्थानी भासा में ‘श’ अर ‘ष’ रो प्रयाग कानी होया करै।
यदि श्री राजेन्द्र जी बारा ण ही सही माना तो 38 व्यंजना में 2 व्यंजन कम कियां भी 36 व्यंजन रह जाय है। सो अबार भी 2व्यंजना को फर्क साफ कोनी होयै।
क वर्ग - क ख ग घ ङ
च वर्ग - च छ ज झ ञ
ट वर्ग - ट ठ ड ढ ण
त वर्ग - त थ द ध न
प वर्ग - प फ ब भ म
य वर्ग - य र ल व स ह ग्य ड़ ळ - 34 व्यंजन ही होया।

जबकि श्री राजेन्द्र जी’रो माननो ईं प्रकार है।
राजस्थानी भासा री वर्णमाला में 49 वर्ण ध्वनियां है जिणा मांय 11 स्वर अर 38 व्यंजन है।
व्यंजन:
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण
त थ द ध न
प फ ब भ म
य र ल व व्
श ष स ह
ळ ड़
(.) अनुसाव अर (ः) विसर्ग - 38
श्री राजेन्द्र जी’रे अनुसार स्वर: अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ ऋ - 11 स्वर एवं

श्री केसरी जी’रे अनुसार स्वर: अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ आ औ अं अः ऋ - 13 स्वर
अठै जो फरक सामने आयो है वो है -
(.) अनुसाव अर (ः) विसर्ग को है श्री राजेन्द्रजी ईं दोणु ण व्यंजन माना है जबकि श्री केसरी जी ईंणै स्वर माना है।

श्री केसरी जी’री पोथी ‘ सहज राजस्थानी व्याकरण माथै आप अर स्पष्ट करां है कि राजस्थानी प्रयोग में

1.‘ऋ’ की जगह ‘रि’ को प्रयोग सही होसी।
2.‘ढ’ कै नीचै नुक्ता नहीं लगानो चाइज्यै।
3.‘श’ अर ‘ष’ की जगह ‘स’ को ही प्रयोग सही होसी।
4.मूर्धन्य ‘ल’ की जगह ‘ल’/ जठै जोर पड़ता हो बठै ‘ळ’ को प्रयोग होनो चाईज्ये।
5.‘न’ की जगह ‘ण’ रो प्रयोग विशेष ध्वनि माथै कियो जानो चाईज्यै।


श्र, श, ष, ऋ, क्ष, त्र, ज्ञ शब्दां रे संबंध में कुछ स्पष्टीकरण री जरूरत होनी चाईज्यै।

जबकि श्र, श, ष, ऋ, क्ष, त्र, ज्ञ देवनागरी में होते हुए भी राजस्थानी भासा में ईं व्यंजना रो प्रयोग णै कई राजस्थानी रा विद्वान सही कोनी माने। जबकि उणारी पोथी सूं आपने कई उदाहरण देने रो प्रय्रास कर रह्यों हूँ।
क्ष - भिक्षु - भिक्सु
श - दर्शन, कोशिश - दरसन, कोसिस
नोटः इन दिनों कई लेखकों ने धड़ल्ले से ‘श’ और ‘ष’ का प्रयोग शुरू कर दिया है। नीचे देखें -
संदर्भ - पाळ-पोष, नशैड़ी, नशैबाज, वर्ष, प्रदूषण, कृष्ण ‘बिणजारो’ पेज 170, 171, 85 अंक 2008, संदर्भ - ‘‘नैणसी’’ अङ्क जुलाई 2010 पेज 8, 9 में ‘ष’ व ‘श’ का प्रयोग सरलता के साथ किया गया है। देखें ‘‘नैणसी’’ पृष्ठ - 8 ‘‘ अनेक परीक्षावाँ रा प्रश्न-पत्र चुणता। शोध-विद्यार्थिया रा ग्रन्थ जाँचता, उणरी मौखिक परीक्षा लेता।’’
इस वाक्य में ‘क्ष’, ‘त्र’, ‘श’ का प्रयोग साफ दिखता है।
ऋ - संस्कृति - संस्क्रति
नोट- इन दिनों दोनों ही तरह से प्रयोग को स्वीकार कर लिया गया है। देखें ‘बिनजारो’ पेज 128 अंक 2008
ज्ञ - ज्ञान - ग्यान
नोटः स्वयं श्री केसरीकांत जी ने खुद’री हाइकू कविता म ज्ञान/ विज्ञान शब्दा रो प्रयोग कियो है।
त्र - कूं-कूं पत्री - कूं-कूं पतरी, निमंत्रण - निमंतरण
नोटः इन दिनों ‘त्र’ कां प्रयोग भी सामान्य रूप से होने लगा है देखें - बिणजारो पेज 50 अंक - 2008 अर्थत निमंत्रण और पत्री जैसे शब्दों का प्रयोग देवनागरी की तरह ही राजस्थानी में भी जस का तस ही होने लगा है।

1 टिप्पणी:

  1. .



    आदरजोग शंभू चौधरी जी
    घणैमान रामराम !

    राजस्थानी भाषा री अबखायां रा केई रूप मिलै

    साहितकार कदै एकमत कोनीं हो सकै …
    सब री आप आप री क्षेत्रीय जिद अर आग्रह है ।
    सबनैं सागै लेय'र चालणो भी सोरो कोनीं अर कींनैं ई छोड्यां भी पार कोनीं पड़ सकै ।

    घणी दुर्भाग री बात तो आ कै केंद्रीय साहित अकादमी सूं पुरस्कृत रचनाकार तक खुद आपरी रचनावां में ई शबदां बाबत एकरूपता राख कोनीं पा रैया …
    एक ही शबद नैं कठै किंयां ई लिखै , दो पांच लाइणां पछै उणी शबद री वर्तनी किंयां ई लिख देवै ।
    कोई कांई प्रेरणा लेवै बां'सूं !!

    कारण औ ई है कै राजस्थानी रै प्रति समर्पण कम अर पुरस्कार खींचण री ताक बेसी रैवै ।

    ब्होत लंबी रामायण है आ :)

    बखत मिलै तो म्हारै ब्लॉगां पर भी पधारजो सा…
    ऐ रैया लिंक

    ओळ्यूं मरुधर देश री…


    शस्वरं

    आपरी उडीक रैसी सा…


    मोकळी मंगळकामनावां …
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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