

श्री विमल लाठजी को उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी का ‘बी एम शाह पुरस्कार’ और मध्य प्रदेश का ‘राष्ट्रीय कालिदास’ से सम्मानित किया गया ।
सन् 1974 में अनामिका द्वारा आयोजित नाट्योत्सव में जयशंकर प्रसाद के चंद्रगुप्त की प्रस्तुति एक चुनौती थी। पूरे परिश्रम के बावजूद प्रस्तुति को सीमित सफलता मिली। केवल महोत्सव में एक प्रदर्शन होकर रह गया। इस प्रस्तुति के बाद निर्देशन में अंतराल रहा, सन् 1978 में शरद जोशी का एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ को प्रस्तुत किया। यह प्रस्तुति भी चुनौती थी।
आगामी वर्षों में विमल लाठ ने दया प्रकाश सिन्हा के ‘कथा एक कंस की’ (1979), शंकर शेष के ‘एक और द्रोणाचार्य’(1981), उत्पल दत्त के ‘टीन की तलवार’ (1981, अनु. प्रतिभा अग्रवाल) सोफोक्लीज के ऐंटिगनी (1982, अनु. भवानी प्रसाद मिश्र), भीष्म साहनी के ‘माधवी’ (1986), जयवंत दलवी के ‘हरी अप, हरि’ (अनु. रोहिणी महाजन-प्रतिभा अग्रवाल) आदि नाटकों का निर्देशन किया और करीब-करीब सभी में अभिनय भी किया। इनके अतिरिक्त अनामिका द्वारा प्रस्तुत अन्य नाटकों में भी अभिनय किया जिनमें उल्लेखनीय हैं ‘गोदान’ (1976), ‘आधे-अधूरे’ (1980), ‘नये हाथ’ (1980, पुनः मंचन), ‘रेशमी रूमाल’ (1988), ‘इस पार उस पार’ तथा ‘साँझ ढले’ (1985) आदि। संपर्कः 9433507962
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