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शनिवार, 28 जून 2008

बाबू माणिकलाल डांगी

बाबू माणिकलाल डांगी राजस्थानी नाटकों के लेखन एवं प्रदर्शन में स्व. भरत व्यास, जमुनादास पचेरिया, बाबू माणिकलाल डांगी, कन्हैयालाल पंवार और नवल माथुर अगुवा रहे। कलकत्ता के ‘मूनलाइट थियेटर’ में राजस्थानी के अनेक नाटक मंचित हुए जिनकी आलम में बड़ी धूम रही।स्वतंत्रता संग्राम के परिप्रेक्ष्य में बाबू माणिकलाल डांगी के ‘जागो बहुत सोये’ नाटक का गहरा रंग रहा जो कलकत्ता में 1936 में खेला गया था और उन्हीं के 1940 में मंचस्थ ‘हिटलर’ नाटक ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। ब्रिटिश शासन द्वारा उनके ‘दुर्गादास राठौड़’ एवं ‘जय हिन्द’ नाटक पर रोक लगा दी गई थी, किन्तु वे इससे निराश नहीं हुए और उन्होंने चित्रकला की टेम्परा टेक्नीक की तरह रंगमंच के चित्रफलक पर ‘राजस्थनी साहस एवं वीरता’ के बिम्ब पूरी तरह बिम्बित किए। बाद में 1946 में ‘जय हिन्द’ नाटक को स्व. रफी अहमद किदवई ने पढ़ा और खेलने की अनुमति प्रदान की।स्वतन्त्रता के बाद बाबू माणिकलाल डांगी कलकत्ता से जोधपुर लौटे और उन्होंने वहाँ ‘दुर्गादास राठौड़’, ‘हैदराबाद’, ‘कश्मीर’, ‘जय हिन्द’, ‘आपका सेवक’, ‘घर की लाज’, एवं ‘धरती के सपूत’ हिन्दी और ‘राज आपणो’, ‘करसाँ रो कालजो’, ‘मेजर शैतानसिंह’ तथा ‘एक पंथ दो काज’ राजस्थानी नाटकों के प्रदर्शन किए। देश लौटकर उन्होंने ‘माणिक थियेटर’ की स्थापना की। राजस्थान सरकार ने भी नाट्य विधा के महत्व को समझा और फिर सर्वत्र नाटक खेले जाते रहे।उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतेन्दु हरिशचन्द्र, जयशंकर प्रसाद, नारायण प्रसाद बेताब, राधेश्याम कथावाचक और आगा है जैसे नाटककारों ने नाटकों में प्राचीन गरिमा और गौरव को प्रदर्शित किया। उनके नाटकों के विषय थे राष्ट्रीय चेतना और नवजागरण।नाटक ‘दुर्गादास राठौड’ का सात रुपये का टिकट तब डेढ़ सौ रुपये में बिकता था। बाद में कुछ मुस्लिम नेताओं के आग्रह पर बंगाल सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया हालांकि बड़ी संख्या में मुसलमान भी यह नाटक देखने आते थे।राजस्थानी भाषा का प्रथम नाटक भरत व्यास लिखित ‘रामू चनणा’ था जो 1941 में अल्फ्रेड थिएटर (दीपक) कलकत्ता में खेला गया। बाद में कन्हैयालाल पंवार के राजस्थानी भाषा में लिखे नाटकों का दौर चला। ‘ढोला मरवण’ नाटक अनेक बार खेला गया जिसमें वे स्वयं ‘ढोला’ की भूमिका अभिनीत किया करते थे। इसी श्रंखला में ‘चून्दड़ी’, ‘कुंवारो सासरो’, ‘बीनणी जोरा मरदी आई’ जैसे नाटक भी खेले गए। बंगाली एवं पंजाबी कलाकारों से राजस्थानी भाषा का शुद्ध उच्चारण करवाने का श्रेय उन्हीं को प्राप्त था। राजस्थानी नाटकों के मंचन पंडित ‘इन्द्र’ भरत व्यास, जमुनादास पचैरिया, माणिकलाल डांगी और कन्हैयालाल पवार ने निरन्तर किए।कलकत्ता के 30, ताराचन्द दत्त स्ट्रीट के ‘मूनलाइट थिएटर’ में राजस्थानी नाटकों का एक अनूठा क्रम था तो बम्बई के ‘मारवाड़ी थिएटर’ में अपना रूप।स्वाधीनता प्राप्ति के बाद के परिवर्तित परिवेश में राजस्थान में ‘संगीत-नाटक अकादमी’ जोधपुर में स्थापित की गई, जयपुर में ‘रवीन्द्र मंच’ बना। जनसम्पर्क विभाग और बाद में सहकारी विभाग में सहकार मंच अस्तित्व में आया। नाट्य लेखन को निरन्तरता प्रदान किए जाने के उद्देश्य से नाटक प्रतियोगिताएँ रखी जाने लगीं। मण्डल, परिषद और कला निकेतन आदि नामों से अनेक संस्थाएँ बनीं। राजस्थान में एमेच्योर संस्थाओं का जाल-सा बिछ गया तो हिन्दी-राजस्थानी के नाटकों के दर्शक बने रहे। रंगमंच के रास्ते से चल कर भारतीय सिनेमा के मुकाम तक पहुँचने वाले पहले राजस्थानी लोक कलाकार थे। उन्होंने नाटकों के साथ ‘सखी लुटेरा’, ‘नकली डाॅक्टर’, ‘शकुन्तला’, ‘लैला मजनूं’, ‘शीरी फराहाद’ आदि हिन्दी फिल्मों में भी अभिनय किया।जोधपुर में वि.सं. 1958 माह सुदी एकम को जन्मे सालगराम डांगी के सुपुत्र बाबू माणिकलाल डांगी के पितामह लक्ष्मीणदासजी ने राजस्थान में सर्वप्रथम ‘मारवाड़ नाटक कम्पनी’ की स्थापना की थी। उनका नाटक ‘द्रौपदी स्वयंवर’ जब पहले दिन खेल गया, उसी दिन बाबू माणिकलाल का जन्म हुआ था। साधारण शिक्षा के बावजूद वे छोटी उम्र में ही अपने चाचा फूलचन्द डांगी के साथ बाहर निकल गए और उन्होंने अमृतसर-लूणमण्डी की रामलीला देखी, बड़े प्रभावित हुए।बाबू माणिकलाल डांगी के ‘जागो बहुत सोये’ नाटक को 1942 में अंग्रेजों ने अमृतसर में और ‘हिटलर’ नाटक को सर सिकन्दर हयात की मिनिस्ट्री ने लाहौर में बंद करवा दिया था, फिर भी उन्होंने हैदराबाद, सिंध, शिकारपुर, कोटा, लरना और करांची शहरों में बड़े हौसले के साथ नाटक खेले।स्वतंत्रता के बाद भी बाबूजी ने ‘दुर्गादास’ और ‘जागो बहुत सोये’ नाटक खेले, जिन्हें चोटी के नेताओं की सराहना मिली। उन्होंने 1945 में दिल्ली में लाल किले के सामने ‘भारत की पुकार’ एवं ‘जय हिन्द’ नाटक खेले थे और 1946 में भी उनके ‘जय हिन्द’ नाटक को ‘डान’ पत्र की शिकायत पर अंग्रेजी हुकूमत ने बंद करवा दिया था।कलकत्ता में उन्हें दिल का दौरा पड़ा। वे लघु भ्राता गणपतलाल डांगी के साथ जयपुर लौटे और 13 नवम्बर, 1964 को उनका स्वर्गवास हो गया।
संदर्भः राजस्थान का पारसी रंगमंच, डॉ तारादत्त निर्विरोध
[script code: Babu Manik Lala Dangi]

डॉ.प्रतिभा अग्रवाल

चित्र में 'गोदान' की धनिया के रूप में प्रतिभा अग्रवाल
संगीत नाटक एकेडमी एवार्ड 2005 से पुरस्कृत प्रतिभा अग्रवाल एक ऐसी ही प्रतिभा संपन्न महिला है जिसने अपने नाम को सार्थक किया है।
प्रतिभा अग्रवाल का जन्म 1930 में बनारस में एक ऐसे घराने में हुआ जिसने हिंदी भाषा और हिंदी नाटक को सशक्त बनाने में विशेष भूमिका निभाई। 13 वर्ष की छोटी उम्र में आपने अपने दादाजी द्वारा प्रदर्शित ‘महाराणा प्रताप नाटक’ में अहम् भूमिका निभाई। आपकी शिक्षा बनारस-कलकत्ता एवं शांति निकेतन में हुई। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निर्देशनों में आयोजित ‘शतरंज के खिलाड़ी’ कथा पर आयोजित नृत्य नाटक में अपनी भूमिका से श्रीमती अग्रवाल ने अपनी विशेष छाप छोड़ी।
प्रतिभा अग्रवाल 1940 के उत्तरार्द्ध से 1950 के प्रारंभ तक हिंदी रंगमंच की एक बड़ी नायिका के रूप में उभरी इस समय काल में ‘तरुण संघ और बाद में अनामिका’ के ध्वज तले अपनी प्रतिभा को नई ख्याति प्रदान की।
आपने 1950 से 1970 तक कलकत्ता की प्रसिद्ध शिक्षा संस्थान शिक्षायतन में शिक्षिका का अहम् दायित्व निभाया। 1950 उत्तरार्द्ध से 1990 तक हिंदी रंगमंच की निर्देशिका एवं नायिका के साथ-साथ श्रीमती प्रतिभा अग्रवाल ने साहित्य की विशेष सेवा की। बंगला भाषा से हिंदी में महत्वपूर्ण रचनाओं के अनुवाद, समीक्षा, जीवनी आदि उनके योगदान की मिसाल रखती है। दूब सैन के नाटक ‘‘जनता का शत्रु’’ का हिंदी अनुवाद आपने 1959 में किया।
अपने समकालीन भारतीय नाटक लेखकों की कई कृतियों पर आयोजित श्री श्यामनंद जालान, श्री शिव कुमार जोशी, श्री विमल लाठ आदि विशिष्ट निर्देशिकों के निर्देशन में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई और बेहद ख्याति प्राप्त की।
1981 में ‘नाट्य शोध संस्थान’ की कलकत्ता में स्थापना करना इनकी जीवन की बड़ी उपलब्धि रही है।
संपर्कः EE-8, Phase: II, Bidhan Nagar, Kolkata-700091, India. Phone:+91-33-23595159/23217667
Email: netnatyashodh@rediffmail.com
http://natyashodh.org/

विमल लाठ

जन्म 4 अगस्त सन् 1942, मंडावा (राजस्थान)। शिक्षा: एम.कॉम. एल-एल.बी.। विमल लाठ का कार्यक्षेत्र कोलकाता में अनामिका के साथ काम करते हुए नाना धरातलों पर विकसित हुआ। उनके अभिनय जीवन का प्रारंभ सन् 1959 में हेनरिक इब्सन के नाटक ‘जनता का शत्रु’ में छोटी-सी भूमिका में काम करने से हुआ। अब तक वे करीब 50 नाटकों में अभिनय कर चुके हैं जिनमें उल्लेखनीय हैं रवीन्द्र नाथ ठाकुर का ‘शेष रक्षा’ (1963, निर्देशन: प्रतिभा अग्रवाल), ज्ञानदेव अग्निहोत्री का ‘शुतुरमुर्ग’ (1967), बादल सरकार का एवं इंद्रजीत (1968) तथा पगला घोड़ा (1971), मोहन राकेश का ‘आधे-अधूरे’ (1970)। इन सभी के निर्देशक श्यामानन्द जालान थे। शुतुरमुर्ग में उनकी विरोधीलाल बनाम सुबोधीलाल की भूमिका को बराबर स्मरण किया जाता है। इनके अतिरिक्त बादल सरकार के ही बल्लभपुर की रूपकथा में भूपति राय की मुख्य भूमिका में भी अभिनय किया। प्रथम दौर का अंतिम नाटक था विजय तेंडुलकर का पंछी ऐसे आते हैं, निर्देशक श्यामानन्द जालान (1971)। इसमें उन्होंने अरुण सरनाइक की मुख्य भूमिका निभाई।
श्री विमल लाठजी को उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी का ‘बी एम शाह पुरस्कार’ और मध्य प्रदेश का ‘राष्ट्रीय कालिदास’ से सम्मानित किया गया ।
सन् 1974 में अनामिका द्वारा आयोजित नाट्योत्सव में जयशंकर प्रसाद के चंद्रगुप्त की प्रस्तुति एक चुनौती थी। पूरे परिश्रम के बावजूद प्रस्तुति को सीमित सफलता मिली। केवल महोत्सव में एक प्रदर्शन होकर रह गया। इस प्रस्तुति के बाद निर्देशन में अंतराल रहा, सन् 1978 में शरद जोशी का एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ को प्रस्तुत किया। यह प्रस्तुति भी चुनौती थी।
आगामी वर्षों में विमल लाठ ने दया प्रकाश सिन्हा के ‘कथा एक कंस की’ (1979), शंकर शेष के ‘एक और द्रोणाचार्य’(1981), उत्पल दत्त के ‘टीन की तलवार’ (1981, अनु. प्रतिभा अग्रवाल) सोफोक्लीज के ऐंटिगनी (1982, अनु. भवानी प्रसाद मिश्र), भीष्म साहनी के ‘माधवी’ (1986), जयवंत दलवी के ‘हरी अप, हरि’ (अनु. रोहिणी महाजन-प्रतिभा अग्रवाल) आदि नाटकों का निर्देशन किया और करीब-करीब सभी में अभिनय भी किया। इनके अतिरिक्त अनामिका द्वारा प्रस्तुत अन्य नाटकों में भी अभिनय किया जिनमें उल्लेखनीय हैं ‘गोदान’ (1976), ‘आधे-अधूरे’ (1980), ‘नये हाथ’ (1980, पुनः मंचन), ‘रेशमी रूमाल’ (1988), ‘इस पार उस पार’ तथा ‘साँझ ढले’ (1985) आदि। संपर्कः 9433507962
[script code: Bimal Lath]

उमा झुनझुवाला

जन्म: 20 अगस्त 1968 को कलकत्ता शहर में हुआ है, शिक्षा: एम. ए, बी.एड.। आप 19 सालों से नट्य जगत से जुड़ी हुई हैं। अब तक आप 30 से भी अधिक नाटकों में काम कर चुकी है।
जब आधार नहीं रहते हैं में आपकी ‘कोरयोग्राफी’ भी काफी सफल रही। आप बाल रंगमंच के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। आपने बच्चों के लिए कई नाटक निर्देशित किए हैं जैसे- सद्गति (प्रेमचंद), ब्लैक संडे (जहीर अनवर), सीमा रेखा (उपेन्द्र नाथ अश्क), बुरे बुरे ख्वाब (स्वयं) - पर्यावरण पर, हमारे हिस्से की धुप कहाँ हैं (स्वयं) - कन्या भ्रूण हत्या पर, दलदल (लाभ शंकर ठाकुर), देवी रानी (बंकिम चन्द्र के उपन्यास पर आधारित), शैतान का खेल (स्वयं) - शराब से होने वाली हानि पर, जब आधार नहीं रहते हैं (मोती लाल क्यमू), जाने कहाँ मंजिल मिल जाए (स्वयं) - सांप्रदायिक संप्रति, पहले आप (इफ्तेखार अहमद), आग अब भी जल रही है (स्वयं) - ड्रग के सेवन से होने वाली हानि। आपने कई अनुवाद कार्य भी किए हैं। जिनमें ‘आबनुसी ख्याल’ मूल कवि-एन रशीद खान उर्दू से हिन्दी रूपान्तरण, ‘यादों के बुझे हुए सवेरे’ - मूल लेखक - इस्माइल चुनारा उर्दू से हिन्दी रूपान्तरण, ‘यतीमखाना’ आपको 1997 में राष्ट्रीय स्तर पर नाट्य जगत में इनकी सेवा के लिए महिला सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है।
इस संस्था का जन्म सन् 1994 में नाट्य जगत के समाज मे सामाजिक चेतना जगाने को उद्देश्य मानकर इस विद्या का चयन किया गया। जिस के माध्यम से बाल कलाकारों को प्रोत्साहन देकर उनके कला क्षेत्र के विकास में योगदान देना है, जिसका नेतृत्व पूर्ण रूपेण उमा झुनझुनवालाजी ही करती हैं। यह पश्चिम बंगाल की एक मात्र नाट्य संस्था है जो दार्जीलिंग के नेपाली लोक पिछले छः सालों से नाट्यों का मंचन करती आ रही है।
‘LittleThespain’: द्वारा कथा-कोलाज-1 और कथा कोलाज-2 (2007 में) ‘?’ प्रश्नचिन्ह (हिन्दी, 2007 में), मंटों की कहानी पर आधारित नाट्य मंटों ने कहा (उर्दू 2006) यादों के बूझे हुए सवेरे (उर्दू 2005) हयवदन (नेपाली 2004 में), शुतुरमुर्ग (हिन्दी 2004 में), काँच के खिलौने (हिन्दी 2002 में) लाहौर (हिन्दी 1999) सुलगते चिनार (उर्दू 1996) महाकाल (हिन्दी 1995) और जब आधार नहीं रहते हैं (हिन्दी 1997) और भी कई नाटकों मे आपकी संस्था ने महत्व पूर्ण पार्ट अदा किया है जिसमें बड़े भाई साहब (हिन्दी उर्दू 2006) रक्सी को श्रृष्टीकर्ता (नेपाली 2003) नमक की गुड़ीया (उर्दू 2001) तमसीली मुशायेरा (उर्दू 1998) सतगति (हिन्दी उर्दू 1994) और आग अब भी जल रही है (हिन्दी 1994) प्रमुख हैं। आपकी संस्था द्वारा कई स्ट्रीट नाटकों का भी मंचन किया गया- जिनमें ब्लैक संडे, किस्सा कुर्सी का, अटलबाबू-पटलबाबू, हाहाकार, खेल-खेल में आदि प्रमुख हैं। मोबाइलः 9331028531
[Script code: Uma Jhunjhunwala]

गोपाल कलवानी


श्री गोपाल कलवानी जैसा मूर्धन्य कलाकार हमारे समाज में विद्यमान है यह हमारे लिए गर्व की बात है। बीकानेर जैसे छोटे से शहर में 11 अगस्त 1949 को जन्म लेकर कलकत्ता एवं मुंबई जैसे महानगर की ग्लैमर से जगमगाती दुनिया में अपना स्थान बनाने का इनका सफर मुश्किल नहीं तो इतना आसान भी नहीं था। दूरदर्शन, रेडियो एवं फिल्म अभिनेता, नाटकों के निर्देशक, नाट्यकार, गीतकार, कवि, लेखक एवं कई संगीत संस्थानों से जुड़ा यह व्यक्तित्व आज भी अपनी ही मस्ती में और नई ऊँचाइयों की ओर निरंतर अग्रसर है ।
सन् 1971 से शुरू हुए इस सफर के दौरान करीबन 25 नाटकों में अभिनय, 15 नाटकों का निर्देशन, 18 दूरदर्शन
धारावाहिकों में अभिनय, एफ. एम. रेडियो में बतौर एनाउन्सर अपनी सेवाएँ प्रदान करते हुए अनेक गीतों एवं कविताओं व गजलों की रचना का इनका सुनहरा सफर आज भी अनवरत जारी है। आकाशवाणी कलकत्ता के साथ करीब तीस वर्षों से जुड़े रहने का सौभाग्य भी इन्हें प्राप्त है। दूरदर्शन में कई धारावाहिकों जैसे-हिन्दी में गणदेवता, चरित्रहीन, साहब, बीबी और गुलाम तथा बंगला में पाँचतारा, प्रतिबिम्ब में इन्होंने अपनी अभिनय क्षमता को बड़े ही सशक्त रूप में प्रस्तुत किया ।
टी. वी. धारावाहिकों के अलावा आपने कई फिल्मों में भी अपने कुशल अभिनय की छाप छोड़ी है। सत्यजित राय की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ मृणाल सेन की तेलगु फिल्म ‘ओकाओरी कथा’ गौतम घोष की ‘यात्रा’ इत्यादि फिल्मों में अभिनय करते हुए संजीव कुमार, सईद जाफरी, राहुल बोस, रीमी सेन, नाना पाटेकर सरीखे चोटी के कलाकारों के सानिध्य से आपकी अभिनय क्षमता को नए आयाम मिले ।
अभिनय के क्षेत्र में अपने जौहर दिखलाने के बाद इनका झुकाव नाट्य निर्देशन की ओर हुआ और ‘अनामिका’ के लिए निर्देशित नाटक ‘मिसआलूवालिया’ दर्शकों के बीच काफी चर्चित रहा। इसके अलावा गुस्ताखी माफ, जुकाम जारी है, देश-प्रदेश, रीति-रिवाज एवं बड़ी बुआजी सरीखे कई नाटकों का सफल निर्देशन कर एक कुशल निर्देशन के रूप में प्रतिष्ठित हुए ।
हाल ही में इनके दो राजस्थानी नाट्य रूपांतरण ‘जंजाल’ एवं ‘फूटरी बीनणी’ भी प्रकाशित हुए हैं जिनका प्रकाशन मारवाड़ी युवा मंच, उत्तर मध्य कलकत्ता शाखा द्वारा किया गया। बंगला भाषा से अनूदित नाटक ‘दुर्गेश नंदन’ का राजस्थानी नाट्य रूपांतरण अभी अप्रकाशित है। आप अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच के राष्ट्रीय, प्रांतीय व शाखा स्तर पर कई पदों पर रह चुके हैं ।

वरिष्ठ रंगकर्मी गोपाल कलवानी के निर्देशन में नवनिर्मित नाट्य संस्था ‘अकृत’ ने अपनी पहली नाट्य प्रस्तुति मशहूर कथाकार विजय दान देथा की चर्चित कृति ‘अमिट लालसा’ के हिंदी नाट्य-रूपान्तर ‘मायाजाल’ का मंचन ज्ञानमंच में प्रस्तुत किया। कोलकाता के नाट्य प्रेमी गोपाल कलवानी से भली-भांति परिचित हैं क्योंकि वे नाटकों, टीवी सीरियलों और फिल्मों में उनकी अभिनय प्रतिभा का जायजा ले चुके हैं। एक अर्से बाद नाटकों की दुनिया में यह उनका पुनः प्रवेश है।
राजस्थानी पृष्ठभूमि पर आधारित इस नाटक ‘मायाजाल’ को राजस्थान की लोकधुनों पर आधारित स्वरचित गीतों से सजा कर निर्देशक गोपाल कलवानी ने प्रस्तुति को एक खूबसूरत लोकशैली का रूप दिया और बीच-बीच में समूह-नृत्यों के समावेश से प्रस्तुति को रोचक बना दिया ।
अकृतः एक नव-निर्मित नाट्य-संस्था है जिसका मूल उद्देश्य है कोलकाता में हिन्दी नाट्य-मंच पर व्याप्त शून्य में से गुजरते हुए उसे इकाइयों, दहाइयों एवं ईश्वर चाहे तो अनगिनत संख्याओं में परिवर्तित करना ।
हिंदी नाट्य-मंच जिसका स्वर्णिम अतीत आसमान की ऊँचाइयाँ पाने के बाद बादलों के पीछे ओझल होता प्रतीत हो रहा था, बादलों के साये में से उसके अलौकिक आलोक का उद्दीपन आपको नजर आये, उसे उसका वर्तमान मिल जाए । ‘अकृत’ नाटक के साथ-साथ कला एवं संस्कृति के हर क्षेत्र में कार्य करने को प्रस्तुत है। गीत-संगीत नृत्य, चित्रकला व साहित्य सभी लौह कड़ियों से एक ऐसी मजबूत श्रंृखला बने जिसे चाहकर भी कोई तोड़ न पाये-अकृत के कार्य कलापों में यही भावना परिलक्षित होगी । इसके प्रमाण स्वरूप ‘अकृत’ की पहली प्रस्तुति ‘मायाजाल’ है। विजयदान की राजस्थानी कहानी ‘अमित लालसा’ पर आधारित यह संगीतमय नाटक दर्शकों को खूब पंसद आया। निर्देशक गोपाल कलवानी ने स्वरचित गीतों और लोक नृत्यों के माध्यम से इसे लोक नाटक का रूप दे दिया है ।
सम्पर्क: 9830606890

श्यामानन्द जालान

13 जनवरी 1934 को जन्मे श्री जालान का लालन पालन एवं शिक्षा-दीक्षा मुख्यतः कलकत्ता एवं मुजफ्फरपुर में ही हुई हैं। बचपन से राजनैतिक वातावरण में पले श्री जालान के पिता स्वर्गीय श्री ईश्वरदास जी जालान पश्चिम बंगाल विधान सभा के प्रथम अध्यक्ष थे। वकालत का पेशा निभाते हुए रंगमंच के प्रति अपने दायित्व और प्रतिबद्धता को पूरी निष्ठा से निभाने वाले इस रंगकर्मी को ‘नए हाथ’ नाटक के लिए 1957 में सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए एवं 1973 में जीवन की जीवन की संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत कर सम्मानित किया जा चुका है।
श्री जालान को भारतीय रंगमंच का एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। बचपन से नाटक से जुड़े श्री जालान एक प्रगतिशील रंगकर्मी, सशक्त अभिनेता एवं सफल निर्देशक हैं। इनकी शुरुआत हिन्दी नाटकों से हुई मगर बाद में बंगला में ‘तुगलक’ के निर्देशन एवं अँग्रेजी में ‘आधे-अधूरे’ के अभिनय के लिए भरपूर सराहना प्राप्त की।
बंगला फिल्म ‘चोख’ के लिए विशिष्ट सहायक अभिनेता का पुरस्कार बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एशोसियेशन द्वारा दिया गया। ‘तरुण संघ’ ‘अनामिका’ एवं ‘पदातिक’ जैसी नाट्य संस्थाओं के संस्थापक निर्देशक श्री जालान भारतीय सांस्कृतिक संघ परिषद - भारत महोत्सव और भारतीय नाटक संघ में कई देशों की यात्रा कर चुके हैं तथा मास्को, बर्लिन, फ्रेकफर्ट, हवाना और कनाडा में आयोजित कई नाट्य-गोष्ठियों में भारतीय रंगमंच का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। आपने टी0बी0 सीरियल ‘कृष्णकांत का वसीयतनामा’ का निर्देशन किया एवं टी0बी0 फिल्म ‘सखाराम बाइंडर’ का निर्देशन भी आपने ही किया है।
सर्वप्रथम आपने हरि कृष्ण प्रेमी द्वारा लिखित ‘मेवाड़ पतन’ नामक नाटक में एक चपला युवती का अभिनय किया था। जिसका निर्देशन किया था। ललित कुमार सिंह नटवर ने, उसके बाद स्काटिश चर्च काॅलेज में ललित कुमार जी के ही निर्देशन में उपेन्द्रनाथ का ‘अधिकार के रक्षक’ नाटक में अभिनय किया । 1949 से तरुण संघ के अंतर्गत नाटक करने लगे।
आपने तरुण राय से आधुनिक नाट्य विद्या और पश्चिमी नाट्य शैली का परिचय प्राप्त किया। उनके लिखे एक बाल नाटक ‘रूप कथा’ का ‘एक थी राजकुमारी’ के नाम से हिन्दी में अनुवाद और निर्देशन किया, इन्होंने ही बतौर निर्देशक यह इनका पहला नाटक था।

सन् 1955 में भँवरमल सिंघी, सुशीला सिंघी, प्रतिभा अग्रवाल के साथ मिलकर ‘अनामिका’ की स्थापना की।
सन् 1971 तक का काल जब श्यामानन्द जी ‘अनामिका’ से अलग हुए, ‘अनामिका’ और श्यामानन्द दोनों के जीवनकाल में इस काल के पूर्व तक कई महत्वपूर्ण प्रस्तुतियाँ सामने आई। जिन्होंने ‘अनामिका’ और श्यामानन्द जालान को गौरवपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित किया। उनमें विशेष उल्लेखनीय है। ‘छपते-छपते’, ‘लहरों के राजहंस’, ‘शुतुरमुर्ग’ तथा ‘इन्द्रजीत’ इन चारों के निर्देशक श्यामानन्द जालान थे। श्यामानन्दजी की एक और प्रस्तुति ‘विजय तेन्दुलकर’ के इस नाटक को उन्होंने सर्वथा भिन्न शैली में प्रस्तुत किया।
‘अनामिका’ में श्यामानन्द की यह अंतिम प्रस्तुति थी। इसके बाद कुछ व्यक्तिगत कारणों से आप ‘अनामिका’ से अलग हो गए। सन् 1972 में उन्होंने ‘पदातिक’ नाम से एक अलग संस्था को जन्म दिया। जिसके तत्वाधान में शुरूआती वर्ष में ‘गिधाड़े’, ‘सखाराम बाईपुर’, ‘हजार चैरासी की माँ तथा शकुंतला’ नाटकों का संचय किया गया। ‘पदातिक’ बन जाने के बाद कलकत्ते के हिन्दी रंगमंच में नए दौर की शुरुआत हुई। आज कोलकात्ता जैसे शहर में ‘पदातिक’ एक शिक्षण संस्थान के रूप में काफी चर्चित हो गई है। जिसका एक मात्र श्रेय श्री श्यामानन्द जी जालान को ही जाता है।

श्यामानन्द जालान ( 'पदातिक' ) की प्रस्तुति

1949- नया समाज, 1950- विवाह का दिन, 1951- समस्या, 1952- अलग अलग रास्ता, 1953- एक थी राजकुमारी, 1954- कोणार्क, 1955- चंद्रगुप्त, 1956- हम हिन्दुस्तानी है, 1956- संगमरमर पर एक रात, 1956- सत्य किरण, 1957- नदी प्यासी थी, 1957- पाटलीपुत्र के खंडहर में, 1957- नये हाथ, 1958- अंजो दीदी, 1958- नवज्योती के नयी हिरोइन, 1958- नीली झील, 1959- जनता का शत्रु, 1959- कामायनी (डांस ड्रामा), 1960- आशाढ़ का एक दिन, 1961- घर और बाहर, 1963- शेष रक्षा, 1963- छपते छपते, 1964- मादा कैक्टस, 1966- लहरों के राजहंस, 1967- शुतुरमुर्ग, 1968- मन माने की बात, 1968- एवम् इंद्रजीत, 1970- आधे अधूरे, 1971- पगला घोड़ा, 1972- पंछी ऐसे आते हैं, 1972- तुगलक (बांग्ला),1973- सखाराम बाइंडर, 1977- गुड वुमन आफ सेटजुआन, 1978- हजार चैरासी की माँ, 1980- कौवा चला हंस की चाल, 1980- शकुंतलम्, 1981- पंक्षी ऐसे आते हैं, 1982- उद्वास्त धर्मशाला, 1982- बीबियों का मदरसा, 1983- आधे अधूरे, 1985- मुखिया मनोहरलाल, 1987- कन्यादान, 1987- क्षुदितो पाशाण, 1988- राजा लियर, 1989- बीबियों का मदरसा, 1991- सखाराम बाइंडर, 1992- आधार यात्रा, 1995- रामकथा रामकहानी, 1998- कौवा चला हंस की चाल, 2000- खामोश अदालत जारी है, 2006- माधवी, 2008- लहरों के राजहंस।
नोट: निर्देषक और अभिनेता के रूप में इन नाटकों में
श्री श्यामानन्द जालान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
संदर्भः ‘मंचिका’ विकासोत्सव विशेषांक मारवाड़ी युवा मंच और 'पदातिक' संपर्क: 9830059978
[script code: Shyamanand Jalan]

बुधवार, 18 जून 2008

राजस्थानी साहित्यकार परिचय - 2


श्री जय कुमार 'रूसवा' का जन्म 10 अगस्त 1957 को रतनगढ़ ( रजस्थान) में हुआ। सन् 1971 से आप कोलकात्ता में स्थायी निवास। आपने कविता, छन्द, दोहे, मुक्तक, गीत, गजल क्षणिकाएं, कहानी, लघुकथा आदि कई विधाओं में रचनाधर्मिता का पालन करने का साथ-साथ हास्य-व्यंग्य कवि के रूप में भारतवर्ष में ख्याति प्राप्त की है।
भारत भर के अनेकों पत्र-पत्रिकाओं में 1980 से अबतक हजार से भी अधिक पृथक-पृथक विधाओं की रचनाएं प्रकाशित।
तीन दर्जन से भी अधिक काव्य-संकलनों में आपकी रचनाऎं समाहित। देश के विभिन्न शहरों में मंच का संचालन।
आकाशवाणी व दूरदर्शन से समय-समय पर रचनाओं का वाचन-अनुवाचन।
उपलब्धियां:
साहित्य सृजन सम्मन-97
काव्य वैभव श्री सम्मान - 99
सांस्कृतिक साहित्य खनन श्रृंखला--सावनेर-द्वारा।
हिन्दी विद्यारत्न भारती सम्मान -98-99
आपकी दो पुस्तक 'हंगामा', 'टुकड़े-टुकड़े सोच' प्रकाशित हो चुकी है।
संपर्क:
66-पाथुरियाघाट स्ट्रीट, कोलकात्ता-700006. मोबाईल : 0-9433272705
http://jaikumarruswa.blogspot.com/

रविवार, 15 जून 2008

साहित्यकार परिचय - 1

राजस्थानी/हरियाणवीं और प्रवासी राजस्थानी/हरियाणवीं ( मारवाड़ी) साहित्यकार परिचय के क्रम में 'समाज विकास' की तरफ से हम यहाँ श्री दीनदयाल शर्मा जी का परिचय दें रहें हैं । इन्होंने बाल-साहित्य पर काफी कार्य किया है। इनके पुत्र दुष्यंत ने इनका परिचय http://deendayalsharma.blogspot.com/ पर प्रकाशित किया है।
- शम्भु चौधरी

दीनदयाल शर्मा
जन्म: 15 जुलाई 1956
जन्म स्थान: गांव- जसाना, तहसील- नोहर, जिला- हनुमानगढ़ (राज.)शिक्षा: एम. कॉम. (व्यावसायिक प्रशासन, 1981), पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा (राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर 1985) लेखन: हिन्दी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में 1975 से सतत सृजन।मूल विधा: बाल साहित्यअन्य: व्यंग्य, हास्य व्यंग्य, कथा, कविता, नाटक, एकांकी, रूपक, सामयिक वार्ता आदि।विशेष: *हिन्दी व राजस्थानी में दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। *महामहिम राष्ट्रपति डॉ. कलाम द्वारा अंग्रेजी में अनुदित बाल नाट्य कृति द ड्रीम्स का 17 नवम्बर 2005 को लोकार्पण। * आकाशवाणी से हास्य व्यंग्य, कहानी, कविता, रूपक, नाटक आदि प्रसारित। * दूरदर्शन से साक्षात्कार एवं कविताएं प्रसारित। * काव्य गोष्ठियों एवं कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ। * संस्थापक/अध्यक्ष: राजस्थान बाल कल्याण परिषद्, हनुमानगढ़, राज. *संस्थापक/अध्यक्ष: राजस्थान साहित्य परिषद, हनुमानगढ़, राज. * साहित्य सम्पादक (मानद): टाबर टोल़ी पाक्षिक (बच्चों का हिन्दी अखबार) * सम्पादक (मानद): कानिया मानिया कुर्र (बच्चों का राजस्थानी अखबार) *डॉ. प्रभाकर माचवे: सौ दृष्टिकोण में एक आलेख संकलित। * शिक्षा विभाग राजस्थान के शिक्षक दिवस प्रकाशनों में रचनाएं प्रकाशित। * स्कूल एवं कॉलेज की अनेक स्मारिकाओं का सम्पादन। * जिला साक्षरता समिति हनुमानगढ़ की ओर से प्रकाशित मासिक मुख पत्र आखर भटनेर का सम्पादन। * जिला साक्षरता समिति हनुमानगढ़ की ओर से नवसाक्षर पाठ्य पुस्तक आखर मेड़ी पोथियों का सम्पादन। प्रकाशित कृतियां: (हिन्दी में) * चिंटू-पिंटू की सूझ (बाल कहानियां चार संस्करण) * चमत्कारी चूर्ण (बाल कहानियां)* पापा झूठ नहीं बोलते (बाल कहानियां) * कर दो बस्ता हल्का (बाल काव्य) * सूरज एक सितारा है (बाल काव्य) * सपने (बाल एकांकी) * बड़ों के बचपन की कहानियां (महापुरुषों की प्रेरणाप्रद घटनाएं) * प्यारी-प्यारी पहेलियां (बाल पहेलियां) * फैसला (बाल नाटक) * फैसला बदल गया (नवसाक्षर साहित्य) * मैं उल्लू हूं (हास्य व्यंग्य दो संस्करण 1987,1993) * सारी खुदाई एक तरफ (हास्य व्यंग्य संग्रह)
पता- सैक्टर-10, मकान नं. 22, आरएचबी कॉलोनी, डी रोड, हनुमानगढ़ जं., पिन कोड- 335512, राजस्थान,
भारत। मोबाइल - 094145 14666


शुक्रवार, 6 जून 2008

Kanhaiyalal Sethiya ki Panch Kabitayen

Kanhaiyalal Sethiya ki char kabitayen

जागो, जीवन के अभिमानी !
जागो, जीवन के अभिमानी !
लील रहा मधु-ऋतु को पतझर,
मरण आ रहा आज चरण धर,
कुचल रहा कलि-कुसुम,
कर रहा अपनी ही मनमानी !
जागो, जीवन के अभिमानी !

साँसों में उस के है खर दव,
पद चापों में झंझा का रव,
आज रक्त के अश्रु रो रही-
निष्ठुर हृदय हिमानी !
जागो, जीवन के अभिमानी !

हुआ हँस से हीन मानसर,
वज्र गिर रहे हैं अलका पर,
भरो वक्रता आज भौंह में,
ओ करुणा के दानी !
जागो, जीवन के अभिमानी !
(आज हिमालय बोला से)
-- 2 --

देख आज मेवाड़ मही को
देख आज मेवाड़ मही को
आड़ावल की चोटी नीली,
उसकी बीती बात याद कर
आज हमारी आंखें गीली ।
जिसके पत्थर-पत्थर में थी
जय नादों को ध्वनि टकराई,
जहाँ कभी पनपा था जीवन
वहाँ मरण की छाया छाई,
अरे तुम्हारी गोदी में ही
भला पली क्या मीरां बाई?
क्या प्रताप था तेरा बेटा
तू ही उस की प्यारी माई?
स्वयं वही तू, बतलाती है
चारण की वह पोथी पीली,
गत गौरव की कथा याद कर
आज हमारी आंखें गीली ।
घाटी-घाटी फिरा भटकता
गहन विजन में डाले डेरे
उस प्रताप ने सब कुछ सहकर
गये तुम्हारे दिन थे फेरे,
पर तू ऐसी हीन हुई क्यों
कहाँ आज वे वैभव तेरे?
बदल गई है तू ही या तो
बदल गये मां साँझ-सबेरे?
आज हमारा शोणित ठंडा
आज हमारी नस-नस ढीली,
गत गौरव की कथा याद कर
आज हमारी आंखें गीली,
यहाँ जली जौहर की ज्वाला
नभ तक जिसकी लपटें फैली
जो कल तक था धर्म हमारा
आज हमारे लिये पहेली,
यहीं रूप की रानी पद्मा
अग्नि शिखा से पुलकित खेली
आज विश्व के इतिहासों में
अपने जैसी वही अकेली,
जहाँ रक्त की धार बही थी
आज वहाँ की धरती पीली,
गत गौरव की बात याद कर
आज हमारी आँखें गीली,
मूक खड़ा चितौड़ बिचारा
अन्तिम सांसें तोड़ रहा है,
गत गौरव का प्रेत शून्य में
टूटे सपने जोड़ रहा है ।
अपने घायल अरमानों को
अंगड़ाई ले मोड़ रहा है,
सांय-सांय कर उष्ण हवा मिस
उर की आहें छोड़ रहा है,
फिर भी तो मेवाड़ी सोया
पी ली उस ने सुरा नशीली,
गत गौरव की बात याद कर
आज हमारी आँखें गीली ।
(अग्नि-वीणा)
-- 3 --

पातल’र पीथल
अरै घास री रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो।
नान्हो सो अमर्यो चीख पड्यो राणा रो सोयो दुख जाग्यो।
हूं लड्यो घणो हूं सह्यो घणो
मेवाड़ी मान बचावण नै,
हूं पाछ नहीं राखी रण में
बैर्यां री खात खिडावण में,
जद याद करूँ हळदीघाटी नैणां में रगत उतर आवै,
सुख दुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा ज्यावै,
पण आज बिलखतो देखूं हूँ
जद राज कंवर नै रोटी नै,
तो क्षात्र-धरम नै भूलूं हूँ
भूलूं हिंदवाणी चोटी नै
मैं’लां में छप्पन भोग जका मनवार बिनां करता कोनी,
सोनै री थाल्यां नीलम रै बाजोट बिनां धरता कोनी,
अै हाय जका करता पगल्या
फूलां री कंवळी सेजां पर,
बै आज रुळै भूखा तिसिया
हिंदवाणै सूरज रा टाबर,
आ सोच हुई दो टूक तड़क राणा री भीम बजर छाती,
आंख्यां में आंसू भर बोल्या मैं लिखस्यूं अकबर नै पाती,
पण लिखूं कियां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां,
चितौड़ खड्यो है मगरां में विकराळ भूत सी लियां छियां,
मैं झुकूं कियां ? है आण मनैं
कुळ रा केसरिया बानां री,
मैं बुझूं कियां ? हूं सेस लपट
आजादी रै परवानां री,
पण फेर अमर री सुण बुसक्यां राणा रो हिवड़ो भर आयो,
मैं मानूं हूँ दिल्लीस तनैं समराट् सनेशो कैवायो।
राणा रो कागद बांच हुयो अकबर रो’ सपनूं सो सांचो,
पण नैण कर्यो बिसवास नहीं जद बांच नै फिर बांच्यो,
कै आज हिंमाळो पिघळ बह्यो
कै आज हुयो सूरज सीतळ,
कै आज सेस रो सिर डोल्यो
आ सोच हुयो समराट् विकळ,
बस दूत इसारो पा भाज्यो पीथळ नै तुरत बुलावण नै,
किरणां रो पीथळ आ पूग्यो ओ सांचो भरम मिटावण नै,
बीं वीर बांकुड़ै पीथळ नै
रजपूती गौरव भारी हो,
बो क्षात्र धरम रो नेमी हो
राणा रो प्रेम पुजारी हो,
बैर्यां रै मन रो कांटो हो बीकाणूँ पूत खरारो हो,
राठौड़ रणां में रातो हो बस सागी तेज दुधारो हो,
आ बात पातस्या जाणै हो
घावां पर लूण लगावण नै,
पीथळ नै तुरत बुलायो हो
राणा री हार बंचावण नै,
म्है बाँध लियो है पीथळ सुण पिंजरै में जंगळी शेर पकड़,
ओ देख हाथ रो कागद है तूं देखां फिरसी कियां अकड़ ?
मर डूब चळू भर पाणी में
बस झूठा गाल बजावै हो,
पण टूट गयो बीं राणा रो
तूं भाट बण्यो बिड़दावै हो,
मैं आज पातस्या धरती रो मेवाड़ी पाग पगां में है,
अब बता मनै किण रजवट रै रजपती खून रगां में है ?
जंद पीथळ कागद ले देखी
राणा री सागी सैनाणी,
नीचै स्यूं धरती खसक गई
आंख्यां में आयो भर पाणी,
पण फेर कही ततकाळ संभळ आ बात सफा ही झूठी है,
राणा री पाघ सदा ऊँची राणा री आण अटूटी है।
ल्यो हुकम हुवै तो लिख पूछूं
राणा नै कागद रै खातर,
लै पूछ भलांई पीथळ तूं
आ बात सही बोल्यो अकबर,
म्हे आज सुणी है नाहरियो
स्याळां रै सागै सोवै लो,
म्हे आज सुणी है सूरजड़ो
बादळ री ओटां खोवैलो;
म्हे आज सुणी है चातगड़ो
धरती रो पाणी पीवै लो,
म्हे आज सुणी है हाथीड़ो
कूकर री जूणां जीवै लो
म्हे आज सुणी है थकां खसम
अब रांड हुवैली रजपूती,
म्हे आज सुणी है म्यानां में
तरवार रवैली अब सूती,
तो म्हांरो हिवड़ो कांपै है मूंछ्यां री मोड़ मरोड़ गई,
पीथळ नै राणा लिख भेज्यो आ बात कठै तक गिणां सही ?
पीथळ रा आखर पढ़तां ही
राणा री आँख्यां लाल हुई,
धिक्कार मनै हूँ कायर हूँ
नाहर री एक दकाल हुई,
हूँ भूख मरूं हूँ प्यास मरूं
मेवाड़ धरा आजाद रवै
हूँ घोर उजाड़ां में भटकूं
पण मन में मां री याद रवै,
हूँ रजपूतण रो जायो हूं रजपूती करज चुकाऊंला,
ओ सीस पड़ै पण पाघ नही दिल्ली रो मान झुकाऊंला,
पीथळ के खिमता बादल री
जो रोकै सूर उगाळी नै,
सिंघां री हाथळ सह लेवै
बा कूख मिली कद स्याळी नै?
धरती रो पाणी पिवै इसी
चातग री चूंच बणी कोनी,
कूकर री जूणां जिवै इसी
हाथी री बात सुणी कोनी,
आं हाथां में तलवार थकां
कुण रांड़ कवै है रजपूती ?
म्यानां रै बदळै बैर्यां री
छात्याँ में रैवैली सूती,
मेवाड़ धधकतो अंगारो आंध्यां में चमचम चमकै लो,
कड़खै री उठती तानां पर पग पग पर खांडो खड़कैलो,
राखो थे मूंछ्याँ ऐंठ्योड़ी
लोही री नदी बहा द्यूंला,
हूँ अथक लडूंला अकबर स्यूँ
उजड्यो मेवाड़ बसा द्यूंला,
जद राणा रो संदेश गयो पीथळ री छाती दूणी ही,
हिंदवाणों सूरज चमकै हो अकबर री दुनियां सूनी ही।
(मींझर)
-- 4 --

धरती धोरां री !
धरती धोरां री !
आ तो सुरगां नै सरमावै,
ईं पर देव रमण नै आवै,
ईं रो जस नर नारी गावै,
धरती धोरां री !
सूरज कण कण नै चमकावै,
चन्दो इमरत रस बरसावै,
तारा निछरावल कर ज्यावै,
धरती धोरां री !
काळा बादलिया घहरावै,
बिरखा घूघरिया घमकावै,
बिजली डरती ओला खावै,
धरती धोरां री !
लुळ लुळ बाजरियो लैरावै,
मक्की झालो दे’र बुलावै,
कुदरत दोन्यूं हाथ लुटावै,
धरती धोरां री !
पंछी मधरा मधरा बोलै,
मिसरी मीठै सुर स्यूं घोलै,
झीणूं बायरियो पंपोळै,
धरती धोरां री !
नारा नागौरी हिद ताता,
मदुआ ऊंट अणूंता खाथा !
ईं रै घोड़ां री के बातां ?
धरती धोरां री !
ईं रा फल फुलड़ा मन भावण,
ईं रै धीणो आंगण आंगण,
बाजै सगळां स्यूं बड़ भागण,
धरती धोरां री !
ईं रो चित्तौड़ो गढ़ लूंठो,
ओ तो रण वीरां रो खूंटो,
ईं रे जोधाणूं नौ कूंटो,
धरती धोरां री !
आबू आभै रै परवाणै,
लूणी गंगाजी ही जाणै,
ऊभो जयसलमेर सिंवाणै,
धरती धोरां री !
ईं रो बीकाणूं गरबीलो,
ईं रो अलवर जबर हठीलो,
ईं रो अजयमेर भड़कीलो,
धरती धोरां री !
जैपर नगर्यां में पटराणी,
कोटा बूंटी कद अणजाणी ?
चम्बल कैवै आं री का’णी,
धरती धोरां री !
कोनी नांव भरतपुर छोटो,
घूम्यो सुरजमल रो घोटो,
खाई मात फिरंगी मोटो
धरती धोरां री !
ईं स्यूं नहीं माळवो न्यारो,
मोबी हरियाणो है प्यारो,
मिलतो तीन्यां रो उणियारो,
धरती धोरां री !
ईडर पालनपुर है ईं रा,
सागी जामण जाया बीरा,
अै तो टुकड़ा मरू रै जी रा,
धरती धोरां री !
सोरठ बंध्यो सोरठां लारै,
भेळप सिंध आप हंकारै,
मूमल बिसर्यो हेत चितारै,
धरती धोरां री !
ईं पर तनड़ो मनड़ो वारां,
ईं पर जीवण प्राण उवारां,
ईं री धजा उडै गिगनारां,
धरती धोरां री !
ईं नै मोत्यां थाल बधावां,
ईं री धूल लिलाड़ लगावां,
ईं रो मोटो भाग सरावां,
धरती धोरां री !
ईं रै सत री आण निभावां,
ईं रै पत नै नही लजावां,
ईं नै माथो भेंट चढ़ावां,
भायड़ कोड़ां री,
धरती धोरां री !
(मींझर)

कुँआरी मुट्ठी !
युद्ध नहीं है नाश मात्र ही
युद्ध स्वयं निर्माता है,
लड़ा न जिस ने युद्ध राष्ट्र वह
कच्चा ही रह जाता है,
नहीं तिलक के योग्य शीश वह
जिस पर हुआ प्रहार नहीं,
रही कुँआरी मुट्ठी वह जो
पकड़ सकी तलवार नहीं,
हुए न शत-शत घाव देह पर
तो फिर कैसा साँगा है?
माँ का दूध लजाया उसने
केवल मिट्टी राँगा है,
राष्ट्र वही चमका है जिसने
रण का आतप झेला है,
लिये हाथ में शीश, समर में
जो मस्ती से खेला है,
उन के ही आदर्श बचे हैं
पूछ हुई विश्वासों की,
धरा दबी केतन छू आये
ऊँचाई आकाशों की,
ढालों भालों वाले घर ही
गौतम जनमा करते हैं,
दीन-हीन कायर क्लीवों में
कब अवतार उतरते हैं?
नहीं हार कर किन्तु विजय के
बाद अशोक बदलते हैं
निर्दयता के कड़े ठूँठ से
करुणा के फल फलते हैं,
बल पौरुष के बिना शान्ति का
नारा केवल सपना है,
शान्ति वही रख सकते जिनके
कफन साथ में अपना है,
उठो, न मूंदो कान आज तो
नग्न यथार्थ पुकार रहा,
अपने तीखे बाण टटोलो
बैरी धनु टंकार रहा।

(आज हिमालय बोला से)
Posted By Shambhu Choudhary

शुक्रवार, 30 मई 2008

Kanhaiyalal Sethia Visheshank

Dear Sir,
Please Visit the May 2008 Issue Of Samaj Vikas
" Kanhaiyalal Sethia Visheshank "
http://samajvikas.in
And All photos on:
http://samajvikas.blogspot.com/

Yours
Shambhu Choudhary
Co-editor
http://www.samajvikas.in/

गुरुवार, 29 मई 2008

समाज का आधार साहित्य एवं आत्मा साहित्यकार

किसीने सही कहा है कि किसी समाज विशेष को जानना है तो उसका साहित्य पढ़ना चाहिए । साहित्य से ही उस समाज का सही चित्रण हो जाता है। समाज में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान होता है। उसके विकास, उनमें बसे मनुष्यों चिंतन, उनकी सभ्यता पर साहित्य का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता हैं। वहीं साहित्यकारों को समाज का प्राण कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । समाज बिना साहित्यकारों के उस देह के समान हैं जिसमें सब कुछ हैं परन्तु प्राण नहीं । समाज की सोच, संस्कृति, विकास व कला को साहित्यकार ही अग्रणी हो मार्गदर्शन करते हैं । साहित्य चाहे किसी भाषा व मजहब का हो वह महान ही होता हैं और सदैव वंदनीय है । साथ ही समाज उनके अति महत्वपूर्ण योगदान का सदैव ऋणी ही रहता है । राजस्थानी पीपुल्स गजट के संपादक श्री तेजकरण हर्ष के इस प्रयास को हम एक कदम अरगे बढ़ाते हुए एवं इसी मानसिकता से ओतप्रोत हो हम यह अंक श्री कन्हैयालाल सेठिया को समर्पित कर रहे हैं। वैसे तो राजस्थान-हरियाणा में कला, संस्कृति और साहित्य की खान हैं यहाँ साहित्यकार रूपी मूर्तियों से पूर्ण रूपेण भरा समुद्र बसता है, परन्तु जैसे ही हम प्रवासी राजस्थानी-हरियाणवीं की तरफ नजर घुमाते हैं, हमें बड़ी निराशा हाथ लगती है। ऐसा नहीं कि प्रवासी राजस्थानी-हरियाणवीं जिन्हें हम ‘मारवाड़ी’ शब्द से जानते हैं। इनमें साहित्य, कला और संस्कृति के प्रति कोई लगाव नहीं है, जिन्हें है, उनकी समाज में कद्र नहीं । यह लिखने में मुझे दर्द महसूस होता है, कि इस प्रवासी समाज में कला-साहित्य के प्रति रुचि समाप्त सी हो गयी है। धन और सिर्फ धन कमाने में खोया हुआ यह समाज साथ ही साथ अपनी संस्कृति को भी खोते जा रहा है, संस्कृति के नाम पर आडम्बर, धर्म के नाम पर दिखावा, कला के नाम पर अश्लीलता, समाजसेवा के नाम पर व्यवसाय, साहित्य के नाम पर प्रचार को माध्यम बनाने की नाकाम कोशिशें जारी है।
परन्तु हम इनके इन प्रयासों को बदल देगें,
‘समाज विकास’ सही रूप में समाज की परम्परा को बचाये रखने में आपके साथ है। आयें हम सब मिलकर समाज की सोच को बदल डालें, समाज विकास के इन्टरनेट संस्करण में हम राजस्थान-हरियाणा से जुड़े वासी-प्रवासी साहित्यकारों का परिचय एकत्र करें । आप सभी से मेरा अनुरोध रहेगा कि आप इस यज्ञ में अपनी सहभागिता जरूर लेवें । योग्य राष्ट्रीय, प्रान्तीय, और स्थानिक साहित्यकारों, कलाकारों को उनकी योग्यतानुसार नेट पर प्रकाशित किया जायेगा ।
मुझे पूर्ण वि’वास हैं कि हमारा यह प्रयास आपको जरूर पसन्द आएगा ।
- शम्भु चौधरी, सह-संपादक

कन्हैयालाल सेठिया समग्र साहित्य

राजस्थान एवं हिन्दी के जनप्रिय कवि साहित्य मनीषी
राजस्थानी एवं हिन्दी के जनप्रिय कवि साहित्य मनीषी पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया जी के सम्पूर्ण साहित्य को ‘समाज विकास’ के पाठकों को रियायती मूल्य में उपलब्ध कराया जा रहा है, हमारी समाज के सभी वर्गों से अनुरोध है कि कम से कम एक पूरा सेट अपने लिए या किसी पुस्तकालय को अपनी तरफ से जरूर भेंट करें। - सम्पादक
1. कन्हैयालाल सेठिया समग्र (राजस्थानी) पृष्ठ 704 मूल्य 600/- 2. कन्हैयालाल सेठिया समग्र (हिन्दी -I) पृष्ठ 704 मूल्य 600/- 3. कन्हैयालाल सेठिया समग्र (हिन्दी -II) पृष्ठ 720 मूल्य 600/- 4. कन्हैयालाल सेठिया समग्र (अनुवाद खंड) पृष्ठ 784 मूल्य 700/- ( पूरा सेट एक साथ रियायती मूल्य 1500/- डाक खर्च 200/- अलग से । विदेषी मुद्रा $200 डाक खर्च सहित ) ( सम्पादकः जुगलकिषोर जैथलिया) अपना आदेश ड्राफ्ट के साथ निम्न पते पर भेजें:
अपना आदेश निम्न पते पर दें:-
राजस्थान परिषद, 2-बी, नन्दो मल्लिक लेन, कोलकात्ता - 700006
फोन नम्बर: 0-9830341747
[code: Hindi Book for Sale]

Kanhaiyalal Sethia / कन्हैयालाल सेठिया

Bhartiya Gyanpith Murtidevi Puraskar
श्री कन्हैयालाल सेठिया जी कि प्रकाशित पुस्तकों के उपलब्ध चित्र।



श्री कन्हैयालाल सेठिया जी को दिये गये पुरस्कार व सम्मान के कुछ उपलब्ध चित्र।
सभी चित्र - शम्भु चौधरी द्वारा




सोमवार, 19 मई 2008

Kanhaiyalal Sethia / कन्हैयालाल सेठिया


कन्हैयालाल सेठिया द्वारा लिखित "अग्निवाणी" की वह मूल प्रति जिस पर मुकदमा चला था।

1. वायें से लेखक शम्भु चौधरी श्री कन्हैयालाल सेठिय जी के साथ, 2. कोलकात्ता के साहित्य सेवी श्री सरदारमल कांकारिया, व लेखक शम्भु चौधरी 3. अपनी धर्मपत्नी के साथ श्री सेठिया जी।

गत् सप्ताह श्री क्न्हैयालाल सेठिया जी के यहाँ जब मैं उनसे मिलने गया, उस समय मुझे कुछ चित्र भी लेने का अवसर मिला। सभी चित्र श्री दीपज्योति चक्रवर्ती द्वारा लिया गया है। - शम्भु चौधरी


शनिवार, 17 मई 2008

Kanhaiyalal Sethia / कन्हैयालाल सेठिया:

कोलकात्ता 15.5.2008 : आज शाम पाँच बजे श्री कन्हैयालाल सेठिया जी के कोलकात्ता स्थित उनके निवास स्थल 6, आशुतोष मखर्जी रोड जाना था । ‘समाज विकास’ का अगला अंक श्री सेठिया जी पर देने का मन बना लिया था, सारी तैयारी चल रही थी, मैं ठीक समय पर उनके निवास स्थल पहुँच गया। उनके पुत्र श्री जयप्रकाश सेठिया जी से मुलाकत हुई। थोड़ी देर उनसे बातचीत होने के पश्चात वे, मुझे श्री सेठिया जी के विश्रामकक्ष में ले गये । विस्तर पर लेटे श्री सेठिया जी का शरीर काफी कमजोर हो चुका है, उम्र के साथ-साथ शरीर थक सा गया है, परन्तु बात करने से लगा कि श्री सेठिया जी में कोई थकान नहीं । उनके जेष्ठ पुत्र भाई जयप्रकाश जी बीच में बोलते हैं, - ‘‘ थे थक जाओसा....... कमती बोलो ! ’’ परन्तु श्री सेठिया जी कहाँ थकने वाले, कहीं कोई थकान उनको नहीं महसूस हो रही थी, बिल्कुल स्वस्थ दिख रहे थे । बहुत सी पुरानी बातें याद करने लगे। स्कूल-कॉलेज, आजादी की लड़ाई, अपनी पुस्तक ‘‘अग्निवीणा’’ पर किस प्रकार का देशद्रोह का मुकदमा चला । जयप्रकाश जी को बोले कि- वा किताब दिखा जो सरकार निलाम करी थी, मैंने तत्काल देवज्योति (फोटोग्रफर) से कहा कि उसकी फोटो ले लेवे । जयप्रकाश जी ने ‘‘अग्निवीणा’’ की वह मूल प्रति दिखाई जिस पर मुकदमा चला था । किताब के बहुत से हिस्से पर सरकारी दाग लगे हुऐ थे, जो इस बात का आज भी गवाह बन कर सामने खड़ा था । सेठिया जी सोते-सोते बताते हैं - ‘‘ हाँ! या वाई किताब है जीं पे मुकदमो चालो थो....देश आजाद होने...रे बाद सरकार वो मुकदमो वापस ले लियो ।’’ थोड़ा रुक कर फिर बताने लगे कि आपने करांची में भी जन अन्दोलन में भाग लिया था । स्वतंत्रा संग्राम में आपने जिस सक्रियता के साथ भाग लिया, उसकी सारी बातें बताने लगे, कहने लगे ‘‘भारत छोड़ो आन्दोलन’’ के समय आपने करांची में स्व.जयरामदास दौलतराम व डॉ.चैइथराम गिडवानी जो कि सिंध में कांग्रेस बड़े नेताओं में जाने जाते थे, उनके साथ करांची के खलीकुज्जमा हाल में हुई जनसभा में भाग लिया था, उस दिन सबने मिलकर स्व.जयरामदास दौलतराम व डॉ.चैइथराम गिडवानी के नेतृत्व में एक जुलूस निकाला था, जिसे वहाँ की गोरी सरकार ने कुचलने के लिये लाठियां बरसायी, घोड़े छोड़ दिये, हमलोगों को कोई चोट तो नहीं आयी, पर अंग्रेजी सरकार के व्यवहार से मन में गोरी सरकार के प्रति नफरत पैदा हो गई । आपका कवि हृदय काफी विचलित हो उठा, इससे पूर्व आप ‘‘अग्निवीणा’’ लिख चुके थे। बात का क्रम टूट गया, कारण इसी बीच शहर के जाने-माने समाजसेवी श्री सरदारमल कांकरियाजी आ गये। उनके आने से मानो श्री सेठिया जी के चेहरे पे रौनक दमकने लगी हो । वे आपस में बातें करने लगे। कोई शिथिलता नहीं, कोई विश्राम नहीं, बस मन की बात करते थकते ही नहीं, इस बीच जयप्रकाश जी से परिवार के बारे में बहुत सारी बातें जानने को मिली। श्री जयप्रकश जी, श्री सेठिया जी के बड़े पुत्र हैं, छोटे पुत्र का नाम श्री विनय प्रकाश सेठिया है और एक सुपुत्री सम्पतदेवी दूगड़ है । महाकवि श्री सेठिया जी का विवाह लाडणू के चोरडि़या परिवार में श्रीमती धापूदेवी सेठिया के साथ सन् 1939 में हुआ । आपके परिवार में दादाश्री स्वनामधन्य स्व.रूपचन्द सेठिया का तेरापंथी ओसवाल समाज में उनका बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान था। इनको श्रावक श्रेष्ठी के नाम से संबोधित किया जाता है। इनके सबसे छोटे सुपुत्र स्व.छगनमलजी सेठिया अपने स्व. पिताश्री की भांति अत्यन्त सरल-चरित्रनिष्ठ-धर्मानुरागी, दार्शनिक व्यक्तित्व के धनी थे । समाज सेवा में अग्रणी, आयुर्वेद का उनको विशेष ज्ञान था ।
श्री सेठिया जी का परिवार 100 वर्षों से ज्यादा समय से बंगाल में है । पहले इनका परिवार 199/1 हरीसन रोड में रहा करता था । सन् 1973 से सेठियाजी का परिवार भवानीपुर में 6, आशुतोष मुखर्जी रोड, कोलकात्ता-20 के प्रथम तल्ले में निवास कर रहा है। इनके पुत्र ( श्री सेठियाजी से पूछकर ) बताते हैं कि आप 11 वर्ष की आयु में सुजानगढ़ कस्बे से कलकत्ता में शिक्षा ग्रहन हेतु आ गये थे। उन्होंने जैन स्वेताम्बर तेरापंथी स्कूल एवं माहेश्वरी विद्यालय में प्रारम्भिक शिक्षा ली, बाद में रिपन कॉलेज एवं विद्यासागर कॉलेज में शिक्षा ली । 1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय शिक्षा अधूरी छोड़कर पुनः राजस्थान चले गये, वहाँ से आप करांची चले गये । इस बीच हमलोग उनके साहित्य का अवलोकन करने में लग गये। सेठिया जी और सदारमल जी आपस में मन की बातें करने में मसगूल थे, मानो दो दोस्त कई वर्षों बाद मिले हों । दोनों अपने मन की बात एक दूसरे से आदान-प्रदान करने में इतने व्यस्त हो गये कि, हमने उनके इस स्नेह को कैमरे में कैद करना ही उचित समझा। जयप्रकाश जी ने तब तक उनकी बहुत सारी सामग्री मेरे सामने रख दी, मैंने उन्हें कहा कि ये सब सामग्री तो राजस्थान की अमानत है, हमें चाहिये कि श्री सेठिया जी का एक संग्राहलय बनाकर इसे सुरक्षित कर दिया जाए, बोलने लगे - ‘म्हाणे कांइ आपत्ती’ मेरा समाज के सभी वर्गों से, सरकार से निवेदन है कि श्री सेठियाजी की समस्त सामग्री का एक संग्राहल बना दिया जाना चाहिये, ताकि हमारी आनेवाली पीढ़ी उसे देख सके, कि कौन था वह शख्स जिसने करोड़ों दिलों की धड़कनों में अपना राज जमा लिया था।


किसने ‘धरती धौरां री...’ एवं अमर लोक गीत ‘पातल और पीथल’ की रचना की थी!


कुछ देर बाद श्री सेठिया जी को बिस्तर से उठाकर बैठाया गया, तो उनका ध्यान मेरी तरफ मुखातिफ हुआ, मैंने उनको पुनः अपना परिचय बताने का प्रयास किया, कि शायद उनको याद आ जाय, याद दिलाने के लिये कहा - शम्भु! - मारवाड़ी देस का परदेस वालो - शम्भु....! बोलने लगे... ना... अब तने लोग मेरे नाम से जानगा- बोले... असम की पत्रिका म वो लेख तूं लिखो थो के?, मेरे बारे में...ओ वो शम्भु है....तूं.. अपना हाथ मेरे माथे पर रख के अपने पास बैठा लिये। बोलने लगे ... तेरो वो लेख बहुत चोखो थो। वो राजु खेमको तो पागल हो राखो है। मुझे ऐसा लग रहा था मानो सरस्वती बोल रही हो । शब्दों में वह स्नेह, इस पडाव पर भी इतनी बातें याद रखना, आश्चर्य सा लगता है। फिर अपनी बात बताने लगे- ‘आकाश गंगा’ तो सुबह 6 बजे लिखण लाग्यो... जो दिन का बारह बजे समाप्त कर दी। हम तो बस उनसे सुनते रहना चाहते थे, वाणी में सरस्वती का विराजना साक्षात् देखा जा सकता था। मुझे बार-बार एहसास हो रहा था कि यह एक मंदिर बन चुका है श्री सेठियाजी का घर । यह तो कोलकाता वासी समाज के लिये सुलभ सुयोग है, आपके साक्षात् दर्शन के, घर के ठीक सामने 100 गज की दूरी पर सामने वाले रास्ते में नेताजी सुभाष का वह घर है जिसमें नेताजी रहा करते थे, और ठीक दक्षिण में 300 गज की दूरी पर माँ काली का दरबार लगा हो, ऐसे स्थल में श्री सेठिया जी का वास करना महज एक संयोग भले ही हो, परन्तु इसे एक ऐतिहासिक घटना ही कहा जा सकता है। हमलोग आपस में ये बातें कर रहे थे, परन्तु श्री सेठियाजी इन बातों से बिलकुल अनजान बोलते हैं कि उनकी एक कविता ‘राजस्थान’ (हिन्दी में) जो कोलकाता में लिखी थी, यह कविता सर्वप्रथम ‘ओसवाल नवयुवक’ कलकत्ता में छपी थी, मानो मन में कितना गर्व था कि उनकी कविता ‘ओसवाल नवयुवक’ में छपी थी। एक पल मैं सोचने लगा मैं क्या सच में उसी कन्हैयालाल सेठिया के बगल में बैठा हूँ जिस पर हमारे समाज को ही नहीं, राजस्थान को ही नहीं, सारे हिन्दुस्थान को गर्व है।
मैंने सुना है, कि कवि का हृदय बहुत ही मार्मिक व सूक्ष्म होता है, कवि के भीतर प्रकाश से तेज जगमगता एक अलग संसार होता है, उसकी लेखनी ध्वनि से भी तेज रफ्तार से चलती है, उसके विचारों में इतने पड़ाव होते हैं कि सहज ही कोई उसे नाप नहीं सकता, श्री सेठियाजी को देख ये सभी बातें स्वतः प्रमाणित हो जाती है। सच है जब बंगलावासी रवीन्द्र संगीत सुनकर झूम उठते हैं, तो राजस्थानी श्री कन्हैयालाल सेठिया के गीतों पर थिरक उठता है, मयूर की तरह अपने पंख फैला के नाचने लगता है। शायद ही कोई ऐसा राजस्थानी आपको मिल जाये कि जिसने श्री सेठिया जी की कविता को गाया या सुना न हो । इनके काव्यों में सबसे बड़ी खास बात यह है कि जहाँ एक तरफ राजस्थान की परंपरा, संस्कृति, एतिहासिक विरासत, सामाजिक चित्रण का अनुपम भंडार है, तो वीररस, श्रृंगाररस का अनूठा संगम भी जो असाधारण काव्यों में ही देखने को मिलता है। बल्कि नहीं के बराबर ही कहा जा सकता है। हमारे देश में दरबारी काव्यों की रचना की लम्बी सूची पाई जा सकती है, परन्तु, बाबा नागार्जुन, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चैहान, निराला, हरिवंशराय बच्चन, भूपेन हजारिका जैसे गीतकार हमें कम ही देखने को मिलते हैं। श्री सेठिया जी के काव्यों में हमेशा नयापन देखने को मिलता है, जो बात अन्य किसी में भी नहीं पाई जाती, कहीं कोई बात तो जरूर है, जो उनके काव्यों में हमेशा नयापन बनाये रखने में सक्षम है। इनके गीतों में लय, मात्राओं का जितना पुट है, उतना ही इनके काव्यों में सिर्फ भावों का ही नहीं, आकांक्षाओं और कल्पनाओं की अभिनव अभिव्यक्ति के साथ-साथ समूची संस्कृति का प्रतिबिंब हमें देखने को मिलता है। लगता है कि राजस्थान का सिर गौरव से ऊँचा हो गया हो। इनके गीतों से हर राजस्थानी इठलाने लगता हैं। देश-विदेश के कई प्रसिद्ध संगीतकारों-गीतकारों ने, रवींद्र जैन से लेकर राजेन्द्र जैन तक, सभी ने इनके गीतों को अपने स्वरों में पिरोया है।


समाज विकास’ का यह अंक यह प्रयास करेगा कि हम समाज की इस अमानत को सुरक्षित रख पाएं । श्री कन्हैयालाल सेठिया न सिर्फ राजस्थान की धरोहर हैं बल्कि राष्ट्र की भी धरोहर हैं। समाज विकास के माध्यम से हम राजस्थान सरकार से यह निवेदन करना चाहेगें कि श्री सेठियाजी को इनके जीवनकाल तक न सिर्फ राजकीय सम्मान मिले, इनके समस्त प्रकाशित साहित्य, पाण्डुलिपियों व अन्य दस्तावेजों को सुरक्षित करने हेतु उचित प्रबन्ध भी करें। - शम्भु चौधरी

बुधवार, 7 मई 2008

तसलीमा नसरीन की कविताएं

बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन जब दिल्ली में किसी अज्ञात जगह पर बंदी थीं तब उस जीवन की यंत्रणा पर उन्होंने बांग्ला में साठ कविताएं लिखीं । हर कविता के अंत में तारीख और सेफ हाउस, दिल्ली अंकित है । ये कविताएं उन्होंने अपने मित्र व हिंदी के लेखक-पत्रकार डॉ. कृपाशंकर चौबे को भेजी थी । जिनमें से पांच कविताएं समाज विकास द्वारा जारी किया जा रहा हैं ।


जिस घर में रहने को मुझे बाध्य किया जा रहा है
इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ,
जिसमें एक बंद खिड़की है,
जिसे खोलना चाहूँ, तो मैं खोल नहीं सकती,
खिड़की मोटे पर्दे से ढँकी हुई है,
चाहूँ भी तो मैं उसे खिसका नहीं सकती।
इन दिनों मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ
चाहूँ भी तो खोल नहीं सकती, उस घर के दरवाजे़,
लाँघ नहीं सकती चौखट।
एक ऐसे कमरे में रहती हूँ मैं,
जिसमें किसी जीव के नाम पर, दक्षिणी दीवार पर,
चिपकी रहती हैं, दो अदद छिपकलियाँ।
मनुष्य या मनुष्यनुमा किसी प्राणी को
इस कमरे में नहीं है प्रवेशाधिकार।
हाँ, इन दिनों मैं एक ऐसे कमरे में रहती हूँ,
जहाँ मुझे साँस लेने में बेहद तकलीफ़ होती है।
चारों तरफ न कोई आहट, न सुनगुन
सिर्फ़ और सिर्फ़ सिर टकराने की आवाज़ें।
नहीं देखतीं, दुनिया के किसी मनुष्य की आँखें
गड़ी रहती हैं, सिर्फ दो छिपकलियों की आँखें।
आँखें फ़ाड़-फ़ाड़कर निहारती रहती हैं,
पता नहीं, वे दुखी होती हैं या नहीं
क्या वे भी रोती हैं मेरे साथ? जब मैं रोती हूँ?
मैं ऐसे एक कमरे में रहती हूँ, जहाँ रहना मैं एकदम नहीं चाहती।
मैं ऐसे एक कमरे में असहाय कैद हूँ।
हां, ऐसे ही एक कमरे में रहने को, मुझे विवश करता है लोकतंत्र
ऐसे एक कमरे में , ऐसे अँधेरे में
ऐसी एक अनिश्चयता, एक आशंका में
मुझे रहने को लाचार करता है लोकतंत्र
एक कमरे में तिल-तिल मेरी हत्या कर रही है- धर्मनिरपेक्षता।
एक कमरे में मुझे असहाय-निरुपाय किये दे रहा है- प्रिय भारतवर्ष।
भयंकर व्यस्त-समस्त मानस और मानसनुमा प्राणी,
पता नहीं, उस दिन भी, उन्हें पल-दो पल की फु़र्सत होगी या नहीं,
जिस दिन कोई जड़-वस्तु, कमरे से बाहर निकलेगी
जिस दिन सड़ा-गला एक लोथड़ा या हड्डी-पसली लाँघेगी दहलीज़।
आखिरकार, क्या मौत ही मुक्ति देगी?
मौत ही शायद देती है आज़ादी, चौखट लाँघने की
उस दिन भी मुझे टकटोरती रहेंगी, छिपकिली की दो जोड़ी आँखें
दिन भर
वे भी शायद होंगी दुखी। उस दिन।
गणतंत्र के झंडे में लपेटकर, प्रिय भारत की माटी में,
कोई मुझे दफन कर देगा। शायद कोई सरकारी मुलाजि़म।
खैर, वहाँ भी मुझे नसीब होगी, एक अल्प कोठरी।
उस कोठरी में लाँघने के लिए, कोई दहलीज नहीं होगी,
वहाँ भी मिलेगी मुझे एक अदद कोठरी,
लेकिन, जहाँ मुझे साँस लेने में कोई तकलीफ नहीं होगी।


किसी कवि को क्या कभी, किसी ने किया था नजरबंद ?
वैसे कवि को लेकर उछाले गये हैं ईंट-कंकड़-पत्थर,
आगजनी भी हुई है,
लेकिन कवि को किसी ने गृहबंदी नहीं किया। किसी भी देश ने।
हिन्दुस्तान ने इस सभ्यता, इस इक्कीसवीं शती से
ग्रहण किया था कवि को,
हाँ अगले ही पल उसे वर्जित भी कर दिया
उसके बचपन जैसे धर्म ने, उसकी निष्ठुर राजनीति ने।
कवि ने कोई गुनाह नहीं किया,
फिर भी कवि है, आज गृह-बंदी।
कवि भूल गया है - आसमान कैसा होता है,
कह गये हैं, अब वे यहाँ फिर कभी कदम नहीं रखेंगे।
आज एक सौ पचास दिन हुए, कवि गृह बंदी है
गुजर गये एक सौ पचास दिन,
कवि का यह अहसास भी छोड़ गया था,
कि धरती पर रहता है, ऐसा कोई इंसान,
जिसके पास मौजूद है दिल,
ऐसा कौन है, जिससे कह वापस माँगे अपने दिन?
अँधेरा समेटे कवि सोच में डूबा है-
कवि को कम से कम तसल्ली तो दे इंसान
आज से पहले, जो लोग गृह-बंदी थे,
अधिकांश ही कवि थे,
मन ही मन, कुछ तो मिले उसे राहत,
नि:संगता से,
निपट अकेलेपन से
रीत रहे दिनों से।


नजरबंद
कभी, किसी दिन, अगर तुम्हें होना पड़े नज़रबंद,
अगर कोई पहना दे पाँवों में बेड़ियाँ,
मुझे याद करना।
जिस कमरे में तुम हो, अगर किसी दिन,
उस कमरे का दरवाज़ा, अन्दर से नहीं,
बाहर से बंद करके, कोई जा चुका हो,
मुझे याद करना।
पूरे मंजि़ले में कोई न हो, जो सुने तुम्हारी आवाज़,
जुबान ताला-बंद, होंठ कसकर सिले हुए
तुम बात करना चाहते हो, मगर कोई नहीं सुनता,
या सुनता है, मगर ध्यान नहीं देता,
मुझे याद करना।
मसलन तुम शिद्दत से चाहते हो, कोई खोल दे दरवाज़ा,
खोल दे तुम्हारी बेड़ियाँ,
मैंने भी चाहा था,
गुजर जायें महीने-दर-महीने, कोई रखे नहीं कदम इस राह,
दरवाज़ा खोलते ही जाने क्या हो-न हो,
इसी अंदेशे में अगर कोई खोले नहीं दरवाजा,
मुझे याद करना।
जब तुम्हें हो खूब-खूब तकलीफ़
याद करना, मुझे भी हुई थी तकलीफ,
बेहद डरे-सहमे, सतर्कता के साथ, नाप-तौलकर चलता हो जीवन,
एकदम से अचानक, हो सकता है नज़रबंद, कोई भी! तुम भी!
अब, तुम-मैं, सब एकाकार, अब नहीं कोई फ़र्क़ रत्ती भर भी!
मेरी तरह तुम भी! इंतज़ार करना तुम भी, इंसानों का!
हरहराकर घिर आता है अँधेरा, मगर नहीं आता कोई इंसान।


नो मेन्स लैंड
अपना देश ही अगर तुम्हें न दे देश,
तो दुनिया का कौन-सा देश है, जो तुम्हें देगा देश, बोलो।
घूम-फिरकर सभी देश काफी कुछ ऐसे ही होते हैं,
हुक्मरानों के चरित्र भी ऐसे ही।
तकलीफ देने पर आयें, तो ऐसे ही देते हैं तकलीफ।
इसी तरह उल्लास से चुभोएँगे सूइयाँ
तुम्हारी कलाई के सामने, पत्थर-चेहरा लिए बैठे,
मन ही मन नाच रहे होंगे।
नाम-धाम में भले हो फर्क
अँधेरे में भी पहचान लोगे उन्हें,
सुनकर चीत्कार, खुसफुस, चलने-फिरने की आहट,
तुम समझ जाओगे कौन हैं वे लोग।
हवा जिस तरह, उनके लिए, उधर ही दौड़ पड़ने का समय।
हवा भी तुम्हे बता देगी, कौन हैं वे लोग।
हुक्मरान आखिर तो होते हैं हुक्मरान।
चाहे तुम कितनी भी तसल्ली दो अपने को,
किसी शासक की जायदाद नहीं- देश।
देश होता है आम-जन का , जो देश को प्यार करते हैं,
देश होता है उनका।
चाहे तुम जितना भी किसी को समझाओ- यह देश तुम्हारा है,
इसे तुमने रचा-गढ़ा है, अपने अन्तस में,
अपनी मेहनत और सपनों की तूली में आँका है इसका मानचित्र।
अगर शासक ही तुम्हे दुरदुराकर खदेड़ दें, कहाँ जाओगे तुम?
कौन-सा देश खड़ा मिलेगा, खोले दरवाजा?
किसको देने को पनाह?
कौन-सा देश, किस मुँह से देगा तुम्हें-देश, बोलो।
अब तुम कोई नहीं हो,
शायद इंसान भी नहीं हो।
वैसे भी अब क्या है तुम्हारे पास खोने को?
अब दुनिया को खींच लाओ बाहर, कहो-
तुम्हें वहीं खड़े होने की जगह दे, वहीं दे शरण,
जहाँ खत्म होती है देश की सरहद,
जहाँ की माटी किसी की भी नहीं होती,
फिर भी जितनी-सी माटी मौजूद,
वह अवांछित माटी ही, उतनी-सी जमीन,
चलो, आज से तुम्हारी हो।


भारतवर्ष
भारतवर्ष सिर्फ भारतवर्ष नहीं है।
मेरे जन्म के पहले से ही,
भारतवर्ष मेरा इतिहास।
बगावत और विद्वेष की छुरी से द्विखंडित,
भयावह टूट-फूट अन्तस में सँजोये,
दमफूली साँसों की दौड़। अनिश्चित संभावनाओं की ओर, मेरा इतिहास
रक्ताक्त इतिहास। मौत का इतिहास।
इस भारतवर्ष ने मुझे दी है, भाषा,
समृद्ध किया है संस्कृति से,
शक्तिमान सपनों में।
इन दिनों यही भारतवर्ष अगर चाहे, तो छीन सकता है,
मेरे जीवन से, मेरा इतिहास।
मेरे सपनों का स्वदेश।
लेकिन नि:स्व कर देने की चाह पर,
भला मैं क्यों होने लगी नि:स्व?
भारतवर्ष ने जो जन्म दिया है महात्माओं को।
उन विराट आत्माओं के हाथ
आज, मेरे थके-हारे कन्धे पर,
इस असहाय, अनाथ और अवांछित कन्धे पर।
देश से भी ज्यादा विराट हैं ये हाथ,
देश-काल के पार ये हाथ,
दुनिया भर की निर्ममता से,
मुझे बड़ी ममता से सुरक्षा देते हैं-
मदनजित, महाश्वेता, मुचकुन्द-
इन दिनों मैं उन्हें ही पुकारती हूँ- देश।
आज उनका ही, हृदय-प्रदेश, मेरा सच्चा स्वदेश।
Posted By shambhu choudhary : - By Taslima Nasrin

शुक्रवार, 2 मई 2008

प्रो. कल्याणमल जी लोढ़ा

आज यहाँ हम एक ऐसे युगपुरुश के विषय में बात करेगें जिन्होंने न सिर्फ धर्मयुग तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में अनेक निबंध लिखे, बाद में वे पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी हुए। वग्मिता, इतस्ततः तथा काकपथ - ये तीन संग्रह तो प्रसिद्ध हैं। अन्य भी चर्चित हैं। जी हाँ! इनका नाम है - प्रो. कल्याणमल जी लोढ़ा। इनके निबंधों में वैविध्य है, साथ ही कलकत्ता पर लिखे गए इनके निबंध नई जानकारियों से भरे हुए हैं।लोढ़ाजी कलकत्ता और बंगभूमि के प्रेमी है। अतः जब वे उसके इतिहास या उसकी र्दुगति को दिखाते हैं नगर प्रदूषण वगैरह, तो उनमें एक कसक, एक दर्द उभरता है। जब ये कलकत्ता के गौरव का वर्णन करते हैं, महिमा बखानते हैं, हिन्दी के विकास और पत्रकारिता के अभ्युदय की चर्चा करते हैं, तो उन्हें गौरव सा अनुभव होता है। वास्तव में इनके लेखों में कोलकाता महानगर का चित्र तात्विक हो उठता हैं। बंगला साहित्य में भी कोलकाता का इतना सुन्दर वर्णन देखने को नहीं मिलता।
विद्यार्थी जीवनः अपने विद्यार्थी जीवन में प्रो. लोढ़ाजी एक प्रतिभाशाली छात्र रहे। यद्यपि उनके ज्येष्ठ और कनिष्ठ भ्राताओं ने अपने लिए वकालत व न्याय का क्षेत्र चुना और उन दोनों ने इन क्षेत्रों में अपूर्व सफलता और यश अर्जित किया, तथापि प्रो. लोढ़ा ने अपने लिये शिक्षा और साहित्य की सास्वत अराधना का जीवन चुना, कोलकाता के विश्वविद्यालय में उच्चतम पद प्राप्त किया एवं राजस्थान विश्वविद्यालय के भी कुलपति मनोनीत हुए। व्यवसाय के क्षेत्र में कोलकाता में प्रवासी राजस्थानियों का वर्चस्व तो सर्वविदित है, किन्तु शिक्षा साहित्य और शोध के क्षेत्र में प्रो. लोढ़ा ने स्वयं जो कीर्तिमान बनाया है वह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। प्रो. लोढ़ा अपने लेखों में संस्कृत, हिन्दी, प्राकृत, बंगला, अंग्रेजी सभी के विमर्शात्मक वाङ्मय से उद्वरण देकर अपने कथ्य को पुष्ट करते हैं। उनका कोई भी ग्रन्थ लें, वह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। वाक् को प्रथम पद बनाकर जिनका शीर्षक दिया गया है, ऐसे उनकेग्रन्थों की लम्बी श्रृंखला हैं- वाक्पथ, वाक्तत्व, वाग्विभव, वाग्दोह, वाक्सिद्धि- उन्हें देख लें। वाक् के उल्लेख से ग्रन्थों को अभिधान देकर उन्होंने अपनी पहचान को ही सार्थकता दी हैं। यह बात सभी जानते हैं कि वे स्फीत और प्रखर वग्मिता के, वाकशक्ति के, अभिव्यक्ति कौशल के, संप्रेषण रक्षता के धनी हैं। किन्तु समाज और संस्कृति के बड़े केनवस पर हिन्दी के आचार्य, विभागाध्यक्षा और कुलपति होने के साथ-साथ बल्कि उससे भी अधिक सुर्खियों में प्रो. लोढ़ा की छवि एक सुधी समीक्षक और पहचान एक साहित्य चिन्तक, और सहृदय सास्वत साधक के रूप में है। यह बात किसी भी प्रकार से अतिशयोक्ति नहीं लगती कि प्रो. लोढ़ा विश्वविद्यालीय हिन्दी जगत के गिने-चुने हुए प्रपितामह कोटि के वयोवृद्ध और वरि”ठ आचार्यों में अग्रगण्य हैं तथा साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में प्रतीक पुरुष के तुल्य बन चुके हैं। बंगाल में हिन्दी के पण्डित और भाषिक महत्व का सिक्का जमाना आसान नहीं। यह भूमि विद्वानों और बड़ी-बड़ी प्रतिभाओं की भूमि रही है। यह बात भी उल्लेखनीय है कि मारवाड़ी समाज ने इस भूमि पर मेहनत की, संघर्ष किया, परन्तु जो सम्मान इन्हें, बंगाल की धरती में मिलना चाहिए था वह आज तक नहीं मिला। इस शहर में समाज के जितने उद्योगपति हैं यदि उसके अनुपात में एक प्रतिशत भी इनका साहित्य के क्षेत्र में योगदान रहा होता, तो समय-समय पर इनको जो हीन भावना से ग्रसित होना पड़ता है वह शायद नहीं होता। समाज द्वारा जितना सेवाकार्य इस शहर में किया गया है उतना कार्य देश के किसी भी शहर में दिखाई नहीं पड़ता। इसी दौर में इस अंधकार भरे वातावरण के बीच एक आशा की किरण के रूप में प्रो. कल्याणमलजी लोढ़ा का पदार्पण एवं कोलकाता विश्वविद्यालय में इनकी सेवा ने आशा की एक ज्योत जला दी। आपका जन्म 28 सितम्बर 1921 को जोधपुर में हुआ। आपके पिता श्री चन्दमलजी लोढ़ा तत्कालीन जोधपुर राज्य में उच्च अधिकारी थे। इनकी माता का नाम सूरज कंवर था जो एक मध्यवित्त परिवार की गृहिणी महिला थी। आपका परिवार जैन धर्म का अनुयायी रहा है। साथ ही हिन्दू धार्मिक पर्व जैसे नवरात्री, जन्माष्टमी, शिवरात्री का भी पालन करतें हैं।

उच्च मध्यवित्त परिवार में आपका पालन-पोषण बड़े ही सम्मानपूर्वक हुआ। नैतिक मूल्यों में आस्था थी। परिवार में प्रातःकाल उठकर सभी को प्रणाम करना पड़ता, पूजा करनी पड़ती थी।आप जसवन्त कॉलेज के विद्यार्थी थे। आचार्य सोमनाथ गुप्त एवं अन्य अध्यापकों का उन्हें काफी स्नेह प्राप्त रहा। कॉलेज के समय से ही आपके आलेख प्रकाशित होने लगे।22 जुलाई 1945 को आप कलकत्ता आ गए। आप तीन भाई है। इनके बड़े भाई उच्च न्यायालय मे उच्च न्यायाधीश एवं विचारपति रह चुक हैं एवं इनके अनुज भी न्यायालय में न्यायपति रह चुके हैं। इनका परिवार राजकीय सेवा में रहते हुए इनका ध्यान शिक्षा जगत की ओर ही रहा।आप बताते हैं कि जोधपुर से मेरा बहुत लगाव हैं क्योंकि वह मेरी जन्मभूमि है। बंगाल मेरी कर्म भूमि है, प्रयाग मेरी मानसभूमि है तो जन्मभूमि, कर्मभूमि और मानस भूमि - यही इनके जीवन का त्रिकोण रहा। 1945 में आप कोलकाता स्थित सेठ आनन्दराम जयपुरिया कॉलेज में प्राध्यापक के रूप मे जुड़े, 1948 में आपको कलकत्ता विश्वविद्यालय में अल्पकालिक अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली। सन् 1953 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग को मान्यता मिली। एक प्रकार से धीरे-धीरे कोलकाता महानगर के प्रायः सभी कॉलेजों में हिन्दी विभाग की व्यवस्था कराने में आपका सक्रिय योगदान रहा।

कोलकाता महानगर सरस्वती का मंदिरःआप बताते हैं कि बंगाली समाज में अपनी भाषा के प्रति जो लगाव हैं, लगन है वह या वो महाराष्ट्र में है या दक्षिण में। आपको बंगाल में बंकिमचन्द्र, रवीन्द्र एवं शरदचन्द्र की रचनावलियां मिलेंगी। यहाँ के लोग आपस में इन रचनाओं पर विचारो का आदान-प्रदान करते कहीं भी देखे जा सकते हैं।वर्ष 2003 में आपको भारतीय ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी पुरस्कार-2003 से सम्मानित किया गया। श्री लोढ़ाजी को गुरुवर आचार्य लोढ़ा जी के नाम से सभी जानते हैं । कोलकाता महानगर में हिन्दी की जितनी सेवा आपने की वह आज एक शोध का विषय बन गया है। जिन लोगों ने आचार्य लोढ़ा के वक्तव्यों को सुना है, जिनको इनकी कक्षा में पढ़ने का सौभाग्य मिला है, वे सभी जानते हैं कि श्री लोढ़ाजी के जीवन में कविताओं का बहुत बड़ा स्थान रहा है।

पतझड़ के अभिशाप, तुम वसन्त के श्रृंगार हो ।


जीवन के सत्य और असत्य दोनों के प्रतिरूप ।


मैं तुम्हारी ही कहानी सुनना चाहता हूँ ।


पतझड़ की झकझोर आँधियों में क्या तुम्हारा हृदय निराश नहीं हुआ ।

एक के बाद एक अपनी लालसाओं को मिटते देख-क्या तुम हताश नहीं हुए

- शम्भु चौधरी


गुरुवार, 1 मई 2008

समाज विकास का अप्रैल-2008 का अंक

समाज विकास का अप्रैल-2008 का अंक
http://samajvikas.in/hindifile/april08.pdf
In this Issue
1] आपके पत्र
2] संपादकीय
3] समाज सुधार
4] वृद्धाश्रम संस्कृति
5]असली चेहरा - तसलीमा
6] युगपथ चरण
7] सदस्यता फार्म
सह-संपादक : शम्भु चौधरी

रविवार, 30 मार्च 2008

समाज विकास का मार्च अंक - 2008

Dear Friends,
Please finde below link :-

" Samaj Vikas March 2008 "

In this Issue
1] Holi ki uppadhi
2] Hullar Murradavadi ki do Kavita
3] chutki gulal ki
4] Mahadevi Verma vishes
5] Sri Kalyan Mull Lodha kaa prichay
6] Hind-Yugm

Co-Editor
shambhu choudhary [09831082737]

गुरुवार, 6 मार्च 2008

होली के रंग अनेक - शम्भु चौधरी

अब जब होली की बात हो और ब्रज का नाम ना आए, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। होली शुरु होते ही सबसे पहले तो ब्रज रंगों में डूब जाता है। सबसे ज्यादा मशहूर है बरसाना की लट्ठमार होली। बरसाना, भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय राधा का जन्मस्थान। उत्तरप्रदेश में मथुरा के पास बरसाना में होली की धूम, होली के कुछ दिनों पहले ही शुरु हो जाती है और हो भी क्यों ना, यहाँ राधा रानी जो पली बढी थी। दो सप्ताह तक चलने वाली इस होली का माहौल बहुत मस्ती भरा होता है। एक बात और यहाँ पर रंग और गुलाल जो प्रयोग किया जाता है वो प्राकृतिक होतें है। आजकल कुछ लोभी व्यापारी के चलते इसमें मिलावट भी देखने को मिलती है। इस होली को देखने के लिये देश विदेश से हजारो सैलानी बरसाना पहुँचते है।
नैनीताल की संस्कृति: नैनीताल में परम्परागत कुमाँऊनी संस्कृति बनी हुई है। क्योंकि नन्दा देवी मन्दिर की उपस्थिति से इसका धार्मिक महत्व है। यहाँ पर होली के गीत होली त्यौहार के अवसर पर गाये जाते हैं। होली के गीतों को मुख्य रुप से तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- खड़ी होली, बैठकी होली तथा महिला होली।
कई प्रदेशों में फगुआ भी कहा जाता है. फगुआ मतलब फागुन, होली। इस वेला में आम के पेड़ों में मंजर निकल आतें है। खेतों में गेहूँ की बालियाँ हवाओं के साथ अठखेलियाँ करने लगती है। सरसों के फूलों से लदे खेतों की छंटा ही कुछ निराली हो उठती है, आलू खेतों से निकल कर बाजारों में जाने लगते हैं। जिस तरह हम दिवाली के समय अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, यह वक्त किसानों के घरों में खुशियाली के साथ- साथ साफ- सफाई का समय भी होता है।
इस अवसर पर गाये जाने वाले लोकगीतों में देवी-देवताओं का जितना महत्व तो होता ही है, प्रकृति का भी काफी महत्वपूर्ण स्थान रहता है।
एक लोकगीत को देखें:
राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए..
राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए..
इन्द्रलोक से इन्द्र जी आए, घटा उठे घनघोर,
बूँद बरसत आए...
राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए..
राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए..
ब्रह्मलोक से ब्रह्मा आए,पोथियां लिए हाथ,
वेद बांचत आए...
राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए..
राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए..
शिवलोक से शिवजी आए , गौरा लिए साथ,
भांग घोटत आए..
राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए..
राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए..
वृन्दावन से कान्हा आए राधा लिए साथ.
राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए..
राजा दशरथ के द्वार देव सब जुट आए..
असम में इस समय ढोल की थाप और बांस की बांसुरी की आवाज से सारा का सारा असम गुंजायमान हो जाता है। जगह-जगह ढोल और बांसुरी की थाप व तान पर लोगों को डांस करते देखें जा सकतें हँ। असमी नववर्ष यानी बोहाग बिहू नामक इस त्यौहार का लोग हर साल बेसब्री से इंतजार करते हैं। हांलाकि बिहू असम का जातीय त्योहार है।
फिर भी इसकी तुलना बसन्तोत्सव से की जा सकती है। बिहू के लोकगीतों में प्रेम, ऋगांर, प्रकृति, सम्मान एवं आध्यात्मिक भावों से परिपूर्ण गीत-श्लोकों से असम की धरती मानों प्रकृति प्रदत भाव गीतों के रूप में स्वयं प्रस्फुटित हो गई हो।
राजस्थानी और प्रवासी राजस्थानी ( मारवाड़ी)
इस अवसर पर हिन्दू धार्मिक परम्परा के अनुसार होलिका दहन की परंपरा रही है, राजस्थानी और प्रवासी राजस्थानी ( मारवाड़ी) के घरों में दस दिनों पहले से ही इस होलिका दहन की तैयारी शुरू हो जाती है, घर-घर में बड्डकुल्ला ( गोबर के होला-होली,चान्द-सितारा, चकला-बेलन, पान-सुपारी, ढाल-तलवार आदि) बनाये जाते हैं, सुख जाने के बाद इनकी रोली, अबीर, गुलाल आदि रंगों से सजाया जाता है, होलिका दहन के दिन ठीक समय में सभी घरों में प्रायः एक ही वक्त पर पूरे परिवार के साथ पूजा की जाती है, बच्चे अपने माता-पिता, दादा-दादी , बड़ों से चरण छूकर आशिर्वाद ग्रहण करते हैं। घर के सभी लोग खाशकर नवनवेली दुल्हन एक सार्वजनिक स्थान पर जहाँ समाज की तरफ से होलिका दहन का स्थान तय किया जाता है, उस स्थान में जाकर इन पूजे गये बड़कुल्लें को जो कि कई मालाओं में पिरोये रहते हैं को प्रज्वलित होलिका स्तल में अग्नि के हवाले कर दिया जाता है। इस दिन हर राजस्थानी परिवारों में होली के पकवान भी बनाये जाते हैं, जो दूसरे दिन छारंडी तक चलते हैं। होली की बात हो तो बिहार- यू.पी. की कादो- कीचड़ और कपड़ा फाड़ होली की बात न हो तो होली की बात ही नहीं पूरी होती। परन्तु सबसे डर इस बात से लगता है जब भी होली आने का समय होता है तो ट्रेन से गुजरने वाले यात्रियों की तो शामत ही आ जाती है। बच्चे खेत और खलियानों से कादो के मोटे-मोटे ढेले बना-बना कर सामने से गुजरती ट्रेनों पर फेंकने लगते हैं हालांकि बच्चे इसे मनोरजन का माध्यम समझते हैं परन्तु कई बार इससे चोट भी लग जाती है। इसे हम होली कह लें या होली के नाम पर कुछ शरारत जो भी कह लें हमें इस समय सावधान होकर ही सफर करना पड़ता है। अरे भाई सिर्फ गांव के लोग ही इसके लिये दोषी नहीं अब देखिये कोलकाता शहर की ही बात लें यहाँ तो सभी पढ़े-लिखे लोग रहतें हैं। कोलकाता शहर के बड़ाबाजार का हाल कुछ इससे भी बुरा होता है। बड़े-बड़े भवन की छतों से पता नहीं कब आपके सर पर रंग भरा पानी का गुब्बारा आ टपकेगा , किसी को पता नहीं। भाई ये तो रंग खेलने का अलग- अलग अंदाज है। बस मजा आपको लेना है। नाराज हो तो होते रहें, मेरी बला से।- शम्भु चौधरी, एफ.डी.- 453, साल्ट लेक सिटी, कोलकाता-700106 (India)

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