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सोमवार, 29 जून 2009

राजनीति में मारवाड़ी समाज का योगदान

- प्रो. रामपाल अग्रवाल ‘नूतन’ -


Rampal Agarwal'Nutan'परिचयः प्रो.रामपाल अग्रवाल ‘नूतन’ का जन्म बनेड़ा (मेवाड़) राजस्थान में 23 जनवरी 1932 को हुआ। प्रारम्भिक पढ़ाई बनेड़ा में हुई। मैट्रिक राजस्थान से बी0ए0 पंजाब युनिवर्सिट से एम.ए, एल.एल.बी. व साहित्य रत्न अहमदाबाद से किया। विशारद कलकत्ता से किया। कुछ दिन गुजरात कालेज अहमदाबाद एवं सेन्ट जेवियर्स स्कूल अहमदाबाद में पढ़ाया। प्रारम्भ से सार्वजनिक सेवा में रूचि रही। गोरक्षा आन्दोलन से सक्रिय रूप से जुड़े तथा इसी सन्दर्भ में 1954 में दिल्ली में गिरफ्तार हुए तथा 1955-56 में कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी जेल में एवं 1971 में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बन्द हुए। 1963 में कलकत्ता से पटना एक सभा में गये। बैठक भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद जी के सानिध्य में हुई। राजेन्द्र बाबू ने नूतन जी के गोसम्वर्धन सम्बन्धी ज्ञान से प्रभावित होकर बिहार में रह जाने का आह्वान किया और 1964 से आप पटना वासी हो गये। 1987 से 1989 तक आप बिहार प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन के अध्यक्ष रहे। 2001 से 2002 में आप भारत सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय गोवंश आयोग के सलाहकार रहे। सम्प्रति आप अ.भा.गोशाला फेडरेशन तथा बिहार सरकार द्वारा गठित पशु संरक्षण एवं गोशाला विकास समिति के अध्यक्ष हैं। पताः 16 श्रीकुँज अपार्टमेन्ट, बुद्धा कॉलोनी पटना-1, दूरभाष: 09334116334 - सम्पादक



मारवाड़ राजस्थान में है और ‘राज’ शब्द जुड़ा है राजस्थान में तो मारवाड़ी राजनीति से भिन्न अथवा दूर कैसे हो सकता है? राजस्थान का पुराना नाम राजपूताना, तो यहाँ भी बात राज की ही हो रही है। इसका अर्थ यह हुआ है कि प्रारम्भिक काल से ही इस प्रदेश का प्रत्येक व्यक्ति राजनीति से न्यूनाधिक परिचित व सम्बन्धित रहा है।
मारवाड़ी लोग राजस्थान से बाहर गये तो राजनीतिक चेतनता की अपनी इस विशेषता का परित्याग नहीं किया। मुगल बादशाह अकबर के प्रमुख सेनापति राजा मानसिंह जब दिल्ली से कूच कर पूर्वी भारत में मुगल साम्राज्य के विस्तार के क्रम में आये तो अपने साथ अनेक मारवाड़ी प्रशासनिक, व्यापारिक एवं युद्ध कौशल वीरों को लेकर आये। इनमें से कई मारवाड़ी पुनः लौट कर नहीं गये। यहीं रह गये। इस तरह यह कहा जा सकता है कि लगभग सोलहवीं सदी के आस-पास की अवधी में अच्छी संख्या में लोगों का मारवाड़ के क्षेत्रों से चलकर पूर्वी भारत में बिहार, बंगाल, उड़ीसा और आसाम आना प्रारम्भ हुआ जो निरन्तर बढ़ते चले गये। इसी तरह आक्रमण के समय मराठवाड़ा, विदर्भ तथा अन्य प्रदेशों में मारवाड़ी लोग गये। राज्य में कई तरह के दायित्व होते हैं। राजाओं के रूप में, भिन्न-भिन्न भांति की व्यवस्थाओं का दायित्व। सभी दायित्वों को निभा कर राजनीति में मारवाड़ी समाज का योगदान हुआ।
मारवाड़ में रहने वालों को अनेक विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करने का अभ्यास होता है। श्रम उनका स्वभाव। ईमानदारी, विनम्रता एवं समरसता उनके संस्कार। इन विशेषताओं का उन्हें सर्वत्र लाभ मिला। जहाँ भी जिस प्रदेश में गये, वहाँ की भाषा सीखली, वहाँ के लोगों में घुलमिल गये। उदारता, औरों की भलाई, जैसे मारवाड़ियों के गुणों के कारण ही इस समाज ने पैसा भी कमाया और सर्वत्र चिकित्सालय, शिक्षालय, कुँए, बावड़ी, प्याऊ, अनाथालय, गौशालाओं का अम्बार लगा दिया जो इस समाज की देश भर में अपनी अलग पहचान बनाती है।
राजस्थान से जो लोग अन्य प्रदेशों में गये, उन्हें मारवाड़ी कहा जाने लगा। यद्यपि मारवाड़ राजस्थान का एक क्षेत्र है। पूरा राजस्थान मारवाड़ नहीं है। जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर का विस्तृत हिस्सा बालू के
अधिक्य वाला है। मरु प्रदेश अथवा बालू या फिर रेत की अधिकता वाला क्षेत्र इसमें रहने वाले मारवाड़ी स्वभावतः मारवाड़ी कहाये।
ऐसे मारवाड़ से आने वाले लोग मारवाड़ी समाज की पहचान व्यापारी के रूप में बनी। उपरोक्त वर्णित विशेषता लिये हुए थे। बाद में उदयपुर (मेवाड़) हो या जयपुर स्टेट या हाड़ोती क्षेत्र या राजस्थान के किसी भी हिस्से से आये लोग मारवाड़ी ही कहलाये।
क्षत्रित्व की पृष्ठभूमि: यद्यपि राजस्थान से आने वाले लोग प्रायः व्यापारी थे, लेकिन इनके पूर्वज क्षत्रिय राजा थे। जैसे मारवाड़ी समाज में अग्रवालों की संख्या सर्वाधिक रही थी जो महाराज अग्रसेन की सन्तान हैं। अग्रसेन एक क्षत्रिय राजा थे, जो किवदन्तियों के अनुसार लगभग 5 हजार वर्ष पूर्व महारानी लक्ष्मी के आदेश पर वैश्य बने। इनके रीतिरिवाजों में आज भी राजाओं के प्रतीकों का उपयोग होता है। इसी तरह एक बड़ा वर्ग माहेश्वरी समाज है। जैन समाज, खण्डेलवाल आदि क्षत्रिय थे जो बाद में वैश्य बने। तब से लेकर इस अवधि में जो लोग देश के कोने-कोने से आये वे अग्रवाल, माहेश्वरी, खण्डेलवाल आदि कहलाये। इस तरह कहना चाहिये कि यह व्यापारी समाज राजघरानों की पष्ठभूमि से आया है। इसलिये राजनीति इनके लिये नयी नहीं है। इनके खून में है।
मुगल काल हो या इसके पूर्व का, यह स्पष्ट उल्लेख प्रायः मिलता है कि राजाओं के दीवान व खाजांची तथा अन्य व्यवस्थायें वैश्य समाज करता था। इसलिये राजाओं के रूप में इनकी संख्या कम होती चली गयी, लेकिन राज्य को स्थिर कर व्यवस्था का प्रमुख स्तम्भ इन्हीं लोगों के हाथ में रहा। राजनीति के क्षेत्र में यह सबसे बड़ा योगदान है।
हम इस आलेख में राजनीति के क्षेत्र में मारवाड़ी समाज के योगदान की बात कर रहे हैं, उसे अंग्रेजी काल की अवधि के योगदान की बात भारत की स्वतत्रंता के लिये किये गये संघर्ष में रही राजनैतिक हिस्सेदारी का विवरण प्रस्तुत करना है।
यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि मारवाड़ी शब्द का अर्थ केवल वैश्य समाज से नहीं है। मारवाड़ी ब्राह्मण हो या अन्य किसी जाति का, जैसे अंगरेज का काम करने वाला या नाई का काम करने वाला व्यक्ति, या किसी पेशे से जुड़ा हुआ हो, वह मारवाड़ी ही कहाया। मारवाड़ी शब्द एक संस्कार विशेष से जुड़ गया। संस्कृति का प्रतीक बन गया। शाकाहार, सात्विकता, सादगी व समरसता तथा समन्वय की क्षमता वाला क्षमाशील व्यापारी। ईमानदारी, उदारवृत्ति आदि इसकी प्रारम्भिक पहचान बनी। ये गुण राजनीतिक कुशलता के लक्षण माने जाते थे।
यह सर्वविदित है कि मारवाड़ी में अद्भुत सहनशीलता होती है, और अंग्रेजों के समय इसी गुण के कारण ये व्यापार व उद्योग के शीर्ष पर पहुँच गये। व्यापार का सीधा सम्बन्ध प्रशासन से होता है। इसलिये राज्य जिसका भी होगा व्यापारी हो या उद्योगपति, उसे ‘राजा’ से मिल कर चलना पड़ेगा। व्यापार ही क्यों यदि राजा अत्याचारी, शासक, दबंग होगा तो हर नागरिक को झुक कर चलना पड़ेगा। कौन नहीं जानता कि सात समन्दर पार से आये अंग्रेजों ने जो दमन चक्र चलाया, उसके सभी वर्ग शिकार हुए लेकिन जब अन्याय व जुल्मों-सितम के विरुद्ध विद्रोह की टीस ने अंगड़ाई ली तो देश का कोई कोना बाकी नहीं रहा। बाल, लाल, पाल की त्रिवेणी अवतरित हुई। बाल अर्थात् बाल गंगाधर तिलक, लाल अर्थात लाला लाजपत राय और पाल अर्थात विपिनचन्द्र पाल। इनमें लाला लाजपत राय अग्रवाल समाज में उत्पन्न हुए। फिर शेष मारवाड़ी समाज कैसे पीछे रहता। अंग्रेजों ने पूरे भारत में लगभग डेढ़ सौ वर्षों तक राज किया। सन् 1857 में खुला विद्रोह हुआ तो विद्रोह बढ़ता ही चला गया। बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, महात्मा गान्धी, लाला लाजपत राय, वीर सावरकर, भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस जैसे राष्ट्र भक्तों ने एवं उनके साथ जिन महत्त्वपूर्ण लोगों ने स्वतन्त्रता संघर्ष यात्रा का पथ पकड़ा, ऐसे शूरवीरों की शंृखला में मारवाड़ी समाज के सैंकड़ों प्रमुख लोगों ने अपने जीवन की आहुति दी, कई विख्यात हैं। अनेकों के नाम मालूम नहीं हंै और अधिकांश अंधेरे की ओट में शहीद बन कर गुमनाम हो गये।
मारवाड़ी एसोसियेशन: 1885 में कांग्रेस का जन्म हुआ जिसका राष्ट्रीय स्वरूप बना। देश भर में अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त हो रहा था उसकी अन्तर्राष्ट्रीय पहचान बनी। अंग्रेजों ने राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली एकता को तोड़ने का प्रयास किया और इसी क्रम में बंगाल में मारवाड़ी समाज का, जो विशेष रूप से उद्योग एवं व्यापार में अपना प्रभुत्व बढ़ाता जा रहा था, के साथ राजनैतिक भेदभाव किया जाने लगा। इसीके विरुद्ध 1898 में मारवाड़ी एसोसियेशन नामक संगठन बना जो मारवाड़ी समाज के हितों का प्रहरी बना। इसने राजनैतिक लड़ाई लड़ी। आगे जाकर यह संस्था अपना अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख पायी। यह तो नहीं कहा जा सकता कि इस संस्था के कई लोगों का अंग्रेजों के साथ ताल-मेल बन गया, लेकिन यह स्वरूप सामने आया कि इस संस्था से जुड़े कुछ लोगों का ध्यान अंग्रेजों से उपाधियाँ लेने में अधिक रहा। जैसे राय साहब, राय बहादुर, सर आदि। बदनाम होने पर यह संस्था समाप्त हो गयी। पुनः मारवाड़ी समाज को बंगाल में दोयम श्रेणी का नागरिक बनाये जाने का खतरा उत्पन्न हुआ तो इसका जोरदार विरोध हुआ। प्रतिक्रियास्वरूप 1935 में रामदेव जी चोखानी की अध्यक्षता में अ.भा. मारवाड़ी सम्मेलन की स्थापना हुई। मारवाड़ी सम्मेलन ने अपने प्रारम्भिक काल से लेकर आज तक राजनैतिक चेतना और समाज सुधार के लिये अनेक संघर्ष किये। हम स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय में अ.भा.मारवाड़ी सम्मेलन के कार्यकत्र्ताओं द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध किये गये संघर्ष का मूल्यांकन किसी से कम नहीं मानते। उसीका प्रभाव बिहार के मारवाड़ी समाज पर पड़ा तथा राजनीति में समाज का अद्भुत योगदान रहा तथा 1940 में सशक्त बिहार प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन की स्थापना हुई।
जमनालाल बजाज: मैं यहाँ मारवाड़ी समाज के सबसे चर्चित नाम जमनालाल बजाज से प्रारम्भ करता हूँ। जमनालाल जी को शतप्रतिशत मारवाड़ी समाज के प्रतिनिधि के रूप में स्वतन्त्रता सेनानी कह सकते हैं। एक सीधे सादे, सज्जन प्रवृत्ति के चरम सीमा के ईमानदार, सम्पन्न, दानवीर मारवाड़ी व्यवसायी। अनेक गुणों से परिपूर्ण सन् 1915 से ही आप राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से प्रभावित हो उनके सम्पर्क में आये, और गांधीजी ने भी जमनालाल जी को भरपूर अपनत्व दिया, यहाँ तक कि गांधीजी के 5वें पुत्र के रूप में जमनालाल जी कहाये जाने लगे। बजाज जी ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाने में गांधी के सत्याग्रह का नेतृत्व किया। बहुत बड़े उद्योगपति, सुकोमल शरीर, परन्तु न केवल स्वयं, अपनी पत्नी जानकी देवी को खद्दर के कपड़े पहनाये। जमनालाल जी के इस त्याग का प्रभाव यह पड़ा कि मारवाड़ी समाज के नवयुवकों तथा महिलाओं ने स्वतंत्रता के इस आन्दोलन में अपने को जोड़ लिया। यदि किसी राष्ट्रीय नेता की गिरफ्तारी होती तो मारवाड़ी समाज की संख्या वाले बाजार पहले बन्द होते थे।
27 अगस्त 1930 में एक अंग्रेज अधिकारी ए.एच. गजनवी द्वारा तत्कालीन वायसराय के कार्यालय को एक निजी पत्र भेजा गया। उसमें उल्लेख किया कि यदि महात्मा गांधी के आन्दोलनों से मारवाड़ी समाज को अलग कर दिया जाय तथा बंगाल का आंदोलन केवल बंगाल वासियों के हाथ में छोड़ दिया जाय तो नब्बे प्रतिशत आंदोलन अपने आप ही समाप्त हो सकता है। गजनवी ने मारवाड़ी समाज के उन स्वतन्त्रता प्रेमियों की सूची भी भेजी जिन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध सहस्त्रों लोगों को जेल में डाल दिया, उनके घर का खर्च चलाने, आजादी के अवसर पर होने वाले व्यय का अधिकांश हिस्सा मारवाड़ी समाज के लोगों ने प्रदान किया। स्वयं भी जेल में गये। कई क्रान्तिकारी बने, कइयों को फांसी हुई।
गांधीजी ने जमनालाल जी की सहायता से दक्षिण में हिन्दी प्रचार के कार्य में सुविधा का अनुभव किया, अग्रवाल समाज को तथा मारवाड़ी समाज को संगठित कर उन्हें स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा। श्री कृष्ण जाजू ने अपने को स्वतंत्रता के लिये समर्पित कर दिया। मुम्बई के श्री मदनलाल जालान जैसे सैंकड़ों मारवाड़ी कार्यकत्र्ताओं ने जेल भर दिया। साइमन कमीशन के विरोध में लाला लाजपत राय की पीठ पर इतनी लाठियाँ पड़ी कि अन्त में इसी पीड़ा से उनकी मृत्यु हो गयी।
बंगाल स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख केन्द्र बना हुआ था। 1930 के नमक सत्याग्रह में देश भर में मारवाड़ी समाज ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।


बिहार में मारवाड़ी समाज की भूमिका: स्वतंत्रता संग्राम में रामकृष्ण डालमिया द्वारा दिये गये सहयोग से सब परिचित हैं। पूरे बिहार में चलने वाले कांग्रेस के अधिकांश व्यय का भार रामकृष्ण डालमिया ने उठाया। एक बार बिहार में कांग्रेस के खर्च को लेकर रामकृष्ण डालमिया और बिहार कांग्रेस के नेताओं में कोई विवाद हो गया तो जमनालाल बजाज ने समझौता करवाया। उस समय गांधी जी ने कहा ‘‘रामकृष्ण तुमने इलेक्सन का खर्चा देना स्वीकार करके मेरा बिहार का बोझ हल्का कर दिया।’’
उपरोक्त एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि बिहार के स्वतंत्रता आन्दोलन में मारवाड़ी समाज का कितना बड़ा योगदान रहा है।
वस्तुतः बंगाल द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन में जो मारवाड़ी समाज की भूमिका रहती थी उसका प्रभाव बिहार के मारवाड़ी समाज पर पड़ता था। मारवाड़ी समाज की एक अन्य महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। अनेक प्रकाशनों तथा समाचार पत्रों के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाने का और स्वतत्रंता के पश्चात् देश को आगे बढ़ाने का। बिहार और बंगाल के मिलेजुले प्रयत्न होते थे। बिहार के सत्यपाल धवले जैसे अनेक बिहारी कार्यकत्र्ताओं का पूरा व्यय कलकत्ते का मारवाड़ी समाज उठाता था जो बंगाल व बिहार में राजनीतिक चेतना की कड़ी बने हुए थे।
बात 1950 की है जब मैं राजस्थान से मैट्रिक कर आगे की पढ़ाई करने कोलकाता जाकर बसा। दो वर्ष के भीतर वहां के मारवाड़ी समाज के सम्पर्क में आ गया। उस समय लगभग 80 वर्षीय श्री ओंकारमल जी सराफ गांधीजी के आह्वान पर कई बार जेल हो आये थे। उनकी गिनती अग्रणी स्वतत्रंता सेनानियों में आती थी। चित्तरंजन एवेन्यू में उनका मकान था।
‘‘बंगाल के हिन्दी कवि’’ नाम से प्रकाशित की जाने वाली पुस्तक के सन्दर्भ में पटना एवं देवघर आने का मुझे कई बार अवसर पड़ा। उस समय श्री मोतीलाल जी केजरीवाल की गिनती बिहार के वरिष्ठ स्वतत्रंता सेनानियों में होती थी।
1930 के नमक सत्याग्रह में भाग लेने वाले कलकत्ता मारवाड़ी समाज के अग्रणी महानुभावों यथा सीताराम जी सेक्सरिया, बसन्त लाल मुरारका, राम कुमार भुवालका आदि के बारे में जानकारी हुई। बिहार के मुजफ्फरपुर में पैदा हुए ईश्वर दास जी जालान 1952 में प्रथम बंगाल विधान सभा के अध्यक्ष बने। उस समय बड़ाबाजार जोड़ा बागान, जोड़ासांकू की विधान सभाओं में मारवाड़ी समाज की जन संख्या कम नहीं थी। श्री आनन्दी लाल पोद्दार,बाद में दैवकी नन्दन पौद्दार, और सत्यनारायन बजाज भी इन्हीं क्षेत्रों से विजयी होकर बंगाल विधान सभा में पहुँचे। ईश्वर दास जी जालान के बाद रामकृष्ण सरावगी विधायक बने। श्री सरावगी अ.भा.मारवाड़ी समाज के अध्यक्ष भी रहे जिन्होंने रांची अधिवेशन में पदभार ग्रहण किया। वर्तमान में श्री दिनेश बजाज इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहें हैं।
स्वामी करपात्री जी द्वारा देश में अनेक जगह राम राज्य परिषद की स्थापना की गई। परिषद की ओर से कलकत्ता के बड़े बाजार से बाबू लाल सराफ खड़े होते थे। बिहार में भी मारवाड़ी समाज के आर्थिक सहयोग से 1952 की प्रथम विधान सभा में उस समय राम राज्य परिषद के 5 सदस्य निर्वाचित हुए। बिहार में भागलपुर क्षेत्र मारवाड़ी समाज का गढ़ है। यहाँ से सम्भवतः दूसरी लोकसभा के लिये श्री बनारसी दास झुनझुनवाला चुन कर गये। इसी तरह लोक सभा में चुन कर गये बांका से श्री बेणी शंकर शर्मा। जब वाजपेयी जी का मंत्रीमण्डल बना उस अवधि में चतरा से श्री धीरेन्द्र अग्रवाल लोक सभा से चुन कर गये। कलकत्ता में प्रभू दयाल जी हिम्मतसिंहका का नाम स्वतंत्रता संग्राम में घनश्याम दास जी बिड़ला के साथ आता था। लेकिन कलकत्ता तथा दुमका से वे दोनों बार लोक सभा सीट पर हार गये। बिहार विधानसभा में मारवाड़ी समाज की उपस्थिति 4-5 सदस्यों की अवश्य हो जाती है जो कम है फिर भी महाराष्ट्र विधान सभा के बराबर या कुछ अधिक हो जाती है।
1951 से 1957 की अवधि में ही मैं राम राज्य परिषद से जुड़ा और मुझे 1956 में मुम्बई के चौपाटी पर हुए अधिवेशन में अखिल भारतीय राम राज्य परिषद का प्रचार मंत्री चुना गया। देश की राजनीतिक पार्टियों में केवल राम राज्य परिषद ही ऐसा राजनैतिक दल था जिसने गौहत्या बन्दी को अपने चुनाव घोषणा पत्र का प्रमुख सूत्र रखा। दिल्ली तथा कलकत्ता में राम राज्य परिषद के संस्थापक स्वामी करपात्री जी द्वारा चलाये गये गौरक्षा आन्दोलन में मैं 1954 में 15 नवम्बर को जवाहर लाल जी नेहरू की कोठी 3 मूर्ति भवन के समक्ष गिरफ्तार हुआ। सितम्बर 1956 में कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी जेल में बन्द हुआ, पुनः 1971 में दिल्ली की तिहाड़ जेल में डेढ़ माह तक बन्दी रहा। बिहार के श्री सीताराम जी खेमका मुंगेर के रहने वाले थे, उन्होंने देश भर में राम राज्य परिषद को फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। राम राज्य परिषद एवं गौरक्षार्थ अहिंसात्मक धर्म युद्ध समिति के राष्ट्रीय महामंत्री बने। इसी तरह कलकत्ता के 29 स्ट्रेन्ड रोड के भागीरथ जी मोहता 1952 में अ.भा. हिन्दु महा सभा के उपाध्यक्ष थे। जैसे घनश्याम दास जी बिड़ला कांग्रेस को आर्थिक मदद देने वालों में माने जाते रहे उसी तरह जुगल किशोर जी बिड़ला ने हिन्दु महासभा को आगे बढ़ाने में सर्वाधिकं सहयोग किया। जुगल किशोर जी बिड़ला ने न केवल अ.भा.हिन्दु महा सभा दिल्ली को संरक्षण दिया बल्कि पटना में सब्जी बाग में निर्मित बिड़ला मन्दिर में हिन्दु महा सभा के लिये स्थान प्रदान किया।
ऐसा नहीं है कि मारवाड़ी समाज केवल मध्यमार्गी अथवा दक्षिणपन्थी संस्थाओं से ही जुड़ा रहा। कलकत्ता में 1951 में मेरे बड़े भ्राता बंशी लाल अग्रवाल ने कई बार कम्यूनिस्ट आन्दोलन में सम्मिलित होकर जेल यात्रायें की। सरला माहेश्वरी कम्युनिष्ट पार्टी की ओर से सांसद रही।
मुझे याद है कि कलकत्ता के सम्पन्न मारवाड़ी समाज द्वारा बिहार के राजनैतिक कार्यकत्र्ताओं को जीवन निर्वाह के लिये अच्छी राशि दी जाती थी। सीतामढ़ी के श्री निरंजन खेमका 1940, 45 से हिन्दु महासभा के वरिष्ठ नेता थे। भाई हनुमान प्रसाद जी पोद्दार ने बम्बई और कलकत्ता में राजनीतिक चेतना संचारित करने का काम किया। 1942 में अनेक मारवाड़ी अग्रणियों की भांति वे भी जेल गये।
मुझे स्वयं को राम राज्य परिषद, हिन्दु महासभा व जनसंघ के एकीकरण के सिलसिले में वाराणसी में 1955 में रामराज्य परिषद के दो सांसदों के साथ हिन्दु महासभा के प्रधान मन्त्री श्री बी. जी. देशपाण्डे तथा जनसंघ के वरिष्ठ नेता दीन दयाल जी उपाध्यक्ष के साथ मन्त्रणा का अवसर मिला।
बेतिया के श्री रामकुमार जी झुनझुनवाला पूरे बिहार में स्वतन्त्रता संग्राम के दीप की लौ जलाये हुए थे। वे बिहार प्रदेश मारवाड़ी सम्मेलन के अध्यक्ष भी थे। इतना ही नहीं 1917 में जब गांधी जी ने बिहार की धरती से नील खेती के विरुद्ध प्रथम किसान आन्दोलन चलाया, तब मोतिहारी, बेतिया, रक्सौल व आस-पास के सैंकड़ों मारवाड़ी नवयुवकों ने सत्याग्रह में भाग लिया। चाहे स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है आन्दोलन, चाहे अवज्ञा आन्दोलन, चाहे असहयोग आन्दोलन, चाहे नमक सत्याग्रह, चाहे विदेशी वस्त्र जलाओं आन्दोलन, चाहे भारत छोड़ो आन्दोलन-मारवाड़ी समाज विशेषकर बिहार का मारवाड़ी समाज सदैव आगे की पंक्ति में दिखायी पड़ता है। गांधी जी ने वर्ष 1917 में चम्पारण के किसान आन्दोलन के समय इस क्षेत्र में 3-4 गौशालाओं की स्थापना की। उनका भार मारवाड़ी समाज ने उठाया। बेतिया, मोतीहारी, चकिया में स्थापित गौशालायें इसका प्रमाण हैं।
गांधी जी द्वारा इन गौशालाओं में कहे गये वचन मारवाड़ी समाज को अपने कर्तव्य का स्मरण करा रहे हैं।
स्वतन्त्रता संग्राम में या बाद की राजनीति में मारवाड़ी समाज का बहुत बड़ा योगदान रहा है, तथापि यह कहना पड़ता है कि आज मारवाड़ी समाज यदि संगठित हो जाय तो बिहार की दो लोक सभा सीटों पर उसका क्लेम बनता है। यों राज्य सभा में भी मारवाड़ी समाज का योगदान रहता आया है, लेकिन राज्य सभा में जिन लोगों को प्राथमिकता मिलती है उनमें अर्थ की
प्रधानता रहती है। वर्तमान सरकार के केन्द्रीय कम्पनी मन्त्री श्री प्रेम चन्द गुप्ता बिहार से ही राज्य सभा के सदस्य हैं। यों मैं व्यक्तिगत रूप में जातीय आधार पर टिकट दिलाने के पक्ष में नहीं हूँ, लेकिन बिहार में टिकट प्राप्ति में जातियों की प्रधानता रहती है इस स्थिति को समाप्त होना चाहिये।
यह कहते हुए हर्ष होता है कि 1955 में बिहार विधान सभा में पहली बार अलग झारखण्ड राज्य की मांग करने वाले
विधान पार्षद श्री जयदेव जी मारवाड़ी ही थे। उनकी मूर्ति झारखण्ड में लगायी जानी चाहिये।

मारवाड़ी समाज एक सशक्त राजनीतिक मंच बने, जो ईमानदार, अनुभवी व ज्ञानी युवा लोगों को आगे बढ़ाने का काम करे। यों बिहार के मारवाड़ी समाज का प्रदेश व देश की राजनीति में जो योगदान है उसे उजागर करने के लिये स्वतन्त्र रूप से प्रयत्न करने की जरूरत है। इसी कड़ी में हम यह कह सकते हैं कि डॉ. राम मनोहर लोहिया जो मारवाड़ी समाज में पैदा हुए, देश के सबसे बड़े मौलिक चिन्तक हुए। डॉ. लोहिया ने सबसे पहले बिहार में सरकार बनवायी। ऐसे महापुरुषों को, केवल मारवाड़ी समाज तक सीमित रखा जाना इनके साथ न्याय नहीं होगा।
1952 में तत्कालीन कांग्रेसी नेता व मारवाड़ी समाज के गौरव हीरा लालजी सराफ; वर्तमान में बि.प्रा. मारवाड़ी सम्मेलन के वरिष्ठ अग्रणी श्री गोपी कृष्ण सराफ के पिता बिहार में कदाचित सर्वप्रथम बिहार चैम्बर ऑफ कॉमर्स की ओर से विजयी होकर विधान सभा के मारवाड़ी विधायक चुने गये। बिहार में जनसंघ को बढ़ाने में श्री शंकर लाल बाजोरिया जैसे अनेक सुदृढ़ कार्यकर्ताओं का महत्त्वपूर्ण योगदान था। भागलपुर के ही सन्त लाल जी ने स्वतन्त्रता संग्राम में अनेक लाठियाँ खायी। भागलपुर के सीताराम किशोरपुरिया 1967 में बिहार में मारवाड़ी विधायक बने 1977 में सुगौली के मोहन लाल मोदी, कटिहार से सीताराम चमड़िया अपनी कर्मठता के आधार पर विधायक बने। मारवाड़ी समाज में महिलायें भी पीछे नहीं रही। कांग्रेस की ओर से राजकुमारी हिम्मतसिंहका दुमका की विधायक बनी। धनबाद जिला से सत्य नारायण दूधानी बिहार
विधान सभा में कुछ अवधि तक विरोधी दल के नेता रहे। दरभंगा से श्री रमा वल्लभ जी जालान साम्यवादी दल की ओर से
विधायक बने। बि.प्रा. मारवाड़ी सम्मेलन के भूतपूर्व अध्यक्ष ताराचन्द दारूका विधान पार्षद रहे। साहबगंज (संथाल परगना) से भाजपा की ओर से रघुनाथ सुडानी जी ने दो बार विधान सभा में प्रतिनिधित्व किया।
बिहार में जिन लोगों ने राजनीतिक क्षेत्र में विधायक या विधान पार्षद से ऊपर उठ कर मन्त्री तक का दायित्व सम्भाला उनमें बरहरवा के स्व. नथमल जी डोकानिया कैबिनेट व वारसोई के सोहन लाल जी राज्य स्तर के मन्त्री बने। श्री शारडा जी भी केबिनेट मन्त्री रहे। श्री शंकर प्रसाद टेकरीवाल मारवाड़ी समाज के ऐसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं जिन्हें स्वयं को पार्टी की जितनी आवश्यकता हुई उससे कम जरूरत पार्टियों को उनकी नहीं रही। शंकर बाबू ने कई बार बिहार सरकार के वित्त, खनन तथा परिवहन जैसे महत्त्वपूर्ण विभाग सम्भालें तथा राज्य के विकास में अहम भूमिका निभायी।
वत्र्तमान में भाजपा की ओर से निर्वाचित दरभंगा के युवा
विधायक संजय सरावगी ने कुछ ही समय में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। कटिहार के विधान पार्षद मोहन लाल जी अग्रवाल एवं ठाकुरगंज के गोपाल अग्रवाल ओजस्वी विधायक हैं। अपने बलबूते पर स्वतन्त्र रूप से जीतने वाले प्रदीप जोशी मारवाड़ी विधायक हैं। और अन्त में हम नाम ले रहे हैं श्री सुशील कुमार मोदी जी का जो न केवल 4 बार से निरन्तर विधायक हैं बल्कि बिहार के उपमुख्य मंत्री हैं। बीच में आप सांसद भी बने। आपने यह उपलब्धि मारवाड़ी समाज में उत्पन्न होने से नहीं पायी, बल्कि बिहार के आम आदमी के संरक्षण व विकास के लिये अपने त्याग व सेवा के कारण पायी है। पर यह भी सत्य है कि मारवाड़ी समाज, संस्कारवश जो ईमानदार होता है कर्मठ होता है यथासम्भव निस्वार्थ होता है, भद्र मानुष होता है, इन गुणों ने मोदी जी को ऊँचा उठाने में बिहार के उपमुख्य मन्त्री पद तक पहुँचने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। आपको सत्ता के शीर्ष स्थान पर देखकर हमारा समाज ही नहीं बिहार के आम आदमी प्रसन्न हैं। इसलिये कि हम सभी इस प्रदेश के नागरिक हैं। इस प्रदेश की उन्नति में ही हम सबकी उन्नति है।

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