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शनिवार, 27 जून 2009

राजस्थानी लोकगीतों में जीवन मूल्य - डॉ. शान्ति जैन,पटना


लोकगीत आज भी करोड़ों हृदयों को मुखरित करते हैं। लोककंठ से निकले लोकगीत में लोकजीवन की इच्छाएँ, कामनाएँ प्रतिबिम्बित होती हैं। मानव जीवन से जुड़ी प्रत्येक भावना, प्रेम, घृणा, राग-विराग का स्पष्ट चित्रण लोकगीतों में मिलता है। इन गीतों में पीड़ा है, लालित्य है, आनन्द है, इसलिए थे सजीव, प्राणवान, मधुर और नैसर्गिक हैं।
भारत के विभिन्न प्रदेशों में लोकगीत अलग-अलग बोलियों में गाए जाते हैं किन्तु उनकी आत्मा एक होती है। मानव हृदय की झंकार और करूणा इनमें समान रूप से रेखांकित होती हैं। इसी क्रम में राजस्थान के लोकगीतों का रसपान अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। ‘म्हारो रंगीलो राजस्थान’ कहकर जहाँ राजस्थान के सांस्कृतिक वैभव को उजागर किया गया है, वहीं ‘केसरिया बालम आवो नीं पधारो म्हारा देस’ कहकर राजस्थान के आतिथ्य को सराहा गया है।
अन्य प्रान्तों की भाँति राजस्थान के लोकगीत भी जनजीवन के अत्यन्त निकट रहे हैं। यहाँ के लोकगीत बड़े गंभीर, सारगर्भित और जीवन-मूल्यों से जुड़े होते हैं। राजस्थान के सामान्य लोकगीतों में वहाँ की स्त्रियों के हृदय की झंकार और करूणाँ है। इन गीतों में आनन्द के अवसर पर उन्होंने उल्लास के गीत गाये हैं, तो दुःख में आँसू भरे क्रन्दनगीतों से दिशाओं को भी व्याकुल किया है। ससुराल में कष्ट झेलते हुए पीहर की याद में अपनी व्यथा को उन्होंने गीतों में ढाला है, तो गीतों में ही अपनी ममता को भी पिरोया है। अपनी बेटी को विदा करते वक्त रूँधे कंठ से गाकर उन्होंने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है तो वधू का स्वागत भी उल्लास के गीतों से किया है। देवताओं के चरणों में नतमस्तक हो लोकगीतों के माध्यम से उन्होंने मन्नतें माँगी हैं, उनका आशीर्वाद माँगा है, तो पुत्र के प्रति अपना वात्सल्य और बड़ों के प्रति सम्मान भी गीतों में प्रकट किया है।
राजस्थान की श्रमशील नारियों ने खेतों में काम करते समय पसीने की बूंदों से गीतों को आर्द्र किया है, तो चक्की के स्वर को लोकगीतों से रागमय भी बनाया है। लोक-व्यवहार और सामाजिक-बन्धनों में बंधी स्त्रियों को अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए यदि ये लोकगीत न मिले होते तो उनके हृदय का घाव कैसे फूटता?
‘‘रित आयां बोला नहीं, तो हिवड़ो फाटऽ भरांह’’ लोकगीतों के माध्यम से अपने हृदय की सुषुप्त भावनाओं को व्यक्त कर के ही उनका संतुलन बना रहता है। ये नारियाँ समाज की आत्मा और गृहस्थी की धुरी हैं, और इन्हीं से सुरक्षित है देश और प्रान्तों की संस्कृति और संस्कार।
राजस्थान के लोकगीतों में देवी-देवताओं के गीतों का
प्राधान्य रहा है। मांगलिक अनुष्ठान एवं पूजा के अवसर पर देवी-देवता के विभिन्न रूपों की भिन्न-भिन्न प्रकार से आराधना की जाती है। नवरात्रि के दिनों में प्रतिपदा से लेकर विजयादशमी तक देवी पूजा चलती है। इन दिनों में कालिका माता, अम्बा माता आदि नौ देवियों का स्तुतिगान किया जाता है। तुलसी, सूर्यपत्नी राणक देवी, चन्द्रपत्नी रोहिणी, ब्रह्माणी, गौरी आदि देवियों को लोकगीत गाकर प्रसन्न किया जाता है और उन्हें पत्र- पुष्प चढ़ाया जाता है। विवाह के अवसर पर रणथम्भौर के विनायक जी का स्मरण कर कार्य आरंभ किया जाता है। वर्षाऋतु में इन्द्रदेव को प्रसन्न किया जाता है तो कामनाविशेष की पूर्ति के लिए भोलेशंकर को रिझाया जाता है।
दक्षिणी राजस्थान के विशिष्ट भाग में गूजर जाति देवजी को अवतार मानकर पूजती है। स्थान-स्थान पर देवजी के देवरे बने हुए हैं। शनिवार को खीर बनाकर देवजी को भोग लगाया जाता है। देवजी महाराणा हम्मीर के समकालीन थे जिन्होंने कई
आध्यात्मिक चमत्कार किये थे। राजस्थान में अनूठे कार्य करने वाले व्यक्ति की महानता को भी लोकगीतों में पिरोया गया है। गोगानवमी पर घोड़े पर सवार गोगाजी की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजी जाती है। बाबूजी और रामदेवजी के गीत भी घर-घर में गाये जाते हैं।
राजस्थान की भूमि वीरप्रसूता रही है। यहाँ की धूल वीरोचित भावनाओं से ओत-प्रोत है। राजस्थान के गाँव-गाँव में झूँझारों के और सतियों के स्मारक और चबूतरे मिलते हैं। देश के लिये जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी, उन वीरबाँकुरे झूँझारों की पूजा आज भी राजस्थान में की जाती है। नवविवाहित दम्पत्ति झूँझार जी के स्थान पर प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेते हैं। मुंडन संस्कार होने पर झूँझारजी के समक्ष पुत्र के बलशाली होने की कामना की जाती है। पूजा के गीतों में झूँझारजी के वीर वेश का वर्णन किया जाता है -


झूझार जी बागो तो सेवे राज ने केसरिया
सोवनड़ी छै तरवार
झूझार जी बाग पकड़ घोड़े चढ़िया


‘शूरा ओ रण में झूझिया’ इस लोकगीत में राजस्थान की आत्मा का प्रतिबिम्ब है। मरूस्थल के रेतीले मैदान में भाले और बर्छी से घमासान युद्ध करने वाले वीर का चित्र एक लोकगीत में है -


शूरा भाला राल्या जी बालुरेत में
शूरा बरछियाँ री बाजी धमरोल
शूरा गौड़ी वाली जी झीणी रेत में
शूरा नम नम पाई तरवार।


राजस्थान की हवा में वह मनोबल है, जिसके बलबूते पर सतियों ने हँसते-हँसते अपनी आन रखने के लिए अग्निस्नान का जौहर दिखाया। इन सतियों को राजस्थान की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक गरिमा का प्रतीक माना गया है। इनकी पूजा को प्रेम का आदर्श समझा गया है। एक लोकगीत में सती होने को प्रस्तुत किसी स्त्री से किया गया प्रश्न और उसका उत्तर देखें -
दूध सीलावत दाझिया, बायां, कूंकर डोबोली आग? (दूध ठंढ़ा करते समय गिर जाने से जल उठती हो, तुम अग्नि में कैसे प्रवेश करोगी?) ज्यूं जल डोयो माछली, ज्यूंबायां! ज्यूं ई डोबुंली आज (बहनों, जैसे जल में मछली तैरती है, उसी प्रकार मैं भी अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी।)
राजस्थान में गणगौर का त्योहार वसन्तोत्सव के रूप में ही मनाया जाता है। बालिकाएँ होली के दूसरे दिन से गौराँ और ईसर की मिट्टी की मूर्ति बनाकर पूजती हैं। यह पूजा चैत्र शुक्ल तृतीया तक चलती रहती है। गणगौर की सवारी राजसी ठाठ से निकलती है। नाथद्वारे की गणगौर राजस्थान में विख्यात है। गणगौर पूजा केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक त्योहार भी है। सवेरे लड़कियाँ वर की कामना हेतु पूजा करती हुई गीत गाती हैं, और संध्या समय महिलाएँ प्रेम के गीत गाती हुई घूमर नृत्य करती हैं।
ईसर को महादेव और गौराँ को पार्वती का स्वरूप माना गया है। एक लोकगीत में कृष्ण, हनुमान, ब्रह्मा, आदित्य, चन्द्र आदि सभी देवताओं के नाम उनकी महिमा सहित एक-एक करके वर के रूप में गौरी के आगे प्रस्तुत किये जाते हैं, गौरी सभी देवताओं में कोई-न-कोई त्रुटि निकालकर मना कर देती हैं, किन्तु भोलेशंकर का प्रस्ताव वे प्रसन्नता से स्वीकार करती हैं-


केवो तो गौरा दै थारै कृष्ण वर ने वरां
ओ देवी सवा मण मोती, वर रै पड़कै चढ़ै।
ना ओ बाप जी, कृष्ण वर नाहीं वरां,
एक तो कृष्ण जी, दूजो सांवलो।
केवो तो गौरा दै थारै ईसर वर ने वरां
ओ देवी सवा मण रोली, वर रै पड़ चढ़ै,
हाँ ओ बापजी, ईसर वर ने भला ई वरां
सवा मण रोली सैंया नैं बांटस्या।


राजस्थान के लोकगीतों में प्रेम भावनाओं का भी बाहुल्य है। इन भावों को व्यक्त करने के लिए लोकगीत नारियों के लिये बड़े सहायक सिद्ध हुए हैं। इन गीतों में संयोग का प्रकाश भी है और वियोग का अंधकार भी। विरह व्याकुल हृदय से निकले गीतों में भी अपना रंग है, सुवास है, कोमलता है और प्राण है। पीड़ा के साथ उनमें आशा की किरण भी है। पति चाकरी करने जा रहा है। यातायात के साधन न होने के कारण वह लम्बे समय तक शायद न लौट पाये, इस आशंका से पत्नी का मन पीपल के पत्ते-सा काँप रहा है। इसलिए वह चाहती है कि पति किसी समीप के स्थान में चाकरी करे और संध्या समय घर आ जाया करे-


नेड़ी तो नेड़ी करजो पिया चाकारी जी
सांझ पड़ियां घर आय जा गोरी रा बालमा।


परदेसी प्रिय का पत्र आने पर किसी स्त्री की सहेलियाँ, ननद या जिठानियाँ ‘ओलुं’ गाकर एक प्रकार का उत्सव मनाती है। ‘ओलुं’ गीत में विरहन की मर्मभेदी वेदना मुखरित होती है -


थारी ओलुं घणी आवै म्हारा राज
जी नींद नहीं आवै म्हारा राज
म्हानैं धान नहीं भावे जी राज।


सैकड़ों कोस से यात्रा करता हुआ प्रिय पाहुना जब घर लौटता है तो उसके स्वागत के लिये स्त्री कितने जतन करती है-
घोड़ला नैं जी ठाण बंधावुं
हां ओ मेवाड़ा जी, हसती झुकाऊँ माणक चौक में।
हर गृहिणी की इच्छा अपना एक सुन्दर धर बसाने की होती है। ऐसा घर जो प्रेम से भरा हो जिसमें वात्सल्य की धारा बहती हो और जिसपर उसका स्वामित्व हो। चूने के स्थान पर केशर और कुमकुम से बने हुए महल में दाम्पत्य जीवन बिताने की कल्पना कितनी अनूठी है-


कुंकुं तो केसर साहिबा घरऽ घलाय दो जी
घर घलाय दो जी धण नैं सखरो मालियो।
उस भवन के कंचन जड़े आँगन में उसके पति ऐसे लगेंगे जैसे किरणों में सूर्य -
इण तो आंगण सायना आव फिरोला जी
जांणै कईं किरणा में सूरज उगियो।


और अपने पति के पास प्रेम भरी मुस्कान बिखेरती गृहिणी बादल में बिजली की तरह लगेगी-


इण तो आंगण साहिबा, मैं ही फिरांला जी
जांणै कांई आभा में चमकी बीजली जी


इन लोकगीतों में प्रेमभावना बड़ी कुशलता से चित्रित है। दाम्पत्य जीवन की वास्तविकता, कलह, गृहस्थी के द्वन्द्व आदि सभी यथार्थ रूप में दर्शाये गये हैं। चूँकि लोकगीतों में लोकजीवन का सही प्रतिबिम्ब मिलता है, इसलिए दैनंदिन जीवन के स्वर भी इनमें मिलते हैं। खेतों में काम करते समय, चक्की चलाते समय, पनघट से पानी लाते समय श्रम परिहार के लिये बड़े मोहक गीत गाये जाते हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य के अभाव में मरूभूमि में लोग लोकगीत गाकर ही अपना ताप मिटाते हैं। जन्म-विवाह से लेकर मृत्यु पर्यन्त के संस्कार गीत, ऋतुगीत और श्रम गीतों में निहित हैं जीवन के सार्थक मूल्य।
राजस्थान में सदियों तक सामन्तवादी शासन रहा है, अतः राजमहल में गाये जाने वाले लोकगीतों में राजस्थान के वैभवाविलास और संस्कृति का चित्रण होता है, किन्तु साधारण जन समाज में गाये जाने वाले गीतों में कल्पना की उड़ान नहीं, जीवन का यथार्थ पाया जाता है। इन गीतों में रस और भावों का वैविध्य है, अपनी संस्कृति और संस्कार का सौरभ है और है मानवीय मूल्यों का संरक्षण।end

मारवाड़ी समाज और मारवाड़ी सम्मेलन

नन्दलाल रूँगटा,
अध्यक्ष, अखिल भरतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन

Nandlal Rungta, Chaibasa



सम्मेलन अपने 75वें वर्ष की तरफ अग्रसर हो रहा है। सम्मेलन की नींव रखने के पीछे समाज को एक सूत्र से जोड़ना रहा, जिसकी जरूरत हमें कल भी थी और आज भी जस की तस बनी हुई है। हाँ ! उस समय समाज की जो जरूरतें थी, उसमें काफी परिवर्तन आया है। जहाँ एक तरफ समाज रूढ़िवादी परम्पराओं से अलग हटकर सोचने लगा वहीं समाज में दिखावा, आडम्बर ने अपनी जगह बना ली है। समाज ने शिक्षा में प्रगति की है तो उद्योग के क्षेत्र में क्रमशः पिछड़ता जा रहा है। परम्परागत कारोबार से नई पीढ़ी नाता तोड़ती जा रही है। पूर्वजों द्वारा स्थापित समाजसेवा की कई संस्थाओं में नई ऊर्जा को या तो नजरअंदाज किया जाता रहा है या वर्तमान संदर्भ में संस्था रूचिकर न होने से नई ऊर्जा ऐसी संस्थाओं से नहीं जुड़ पाती है। धीरे-धीरे क्लब संस्कृति, समाज की संस्कृति बनती जा रही है। इन सबके रहते हुए भी समाज को एक संगठन की जरूरत महसूस होती रहती है। समय-असमय समाज को कई प्रान्तों में सामाजिक/राजनैतिक संकटों का सामना करना पड़ता है। स्थानीय प्रशासन या राजनैतिक दल ऐसे समय में समाज को साथ देती दिखाई नहीं देती। इसके मूल में हमारे समाज का असंगठित होना एक मात्र कारण है। जहाँ थोड़ा बहुत संगठन है वहाँ किसी तरह से समाज अपनी सुरक्षा कर पाती हैं परन्तु इस सुरक्षा के बदले समाज को भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
सम्मेलन के 74 साल के इतिहास का आंकलन करने से हमें चौंकाने वाले तथ्य सामने मिलते हैं, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि सम्मेलन वह सब कर रहा है जो हम सोच भी नहीं सकते। सम्मेलन ने समाज को न सिर्फ सुरक्षा प्रदान की, एक समय जब समाज को उसके वोट से वंचित किया जा रहा था तो सम्मेलन के वैनेर के तल्ले ही हमें अपने हक की लड़ाई लड़नी पड़ी थी। यह सही है कि सम्मेलन एक ऐसी संस्था है, जिसमें अन्य संस्थाओं की तरह मनोरंजन के कार्यक्रम नहीं लिये जाते, न ही किसी क्लब की तरह इस संस्था में कोई ‘खाने-पीने’ की किटी पार्टी का आयोजन ही किया जाता है। शायद कई बार कुछ लोग इस संस्था पर ये आरोप मंड़ते नजर आते हैं कि सम्मेलन सिर्फ ‘‘आये का स्वागत - गये की विदाई’’ आयोजन करने की संस्था बन कर रह गई है। जो कि बिलकुल गलत है। जबकि वास्तविकता यह है कि सम्मेलन ही एक मात्र ऐसी संस्था है जो देश भर में मारवाड़ी समाज का प्रतिनिधित्व कर पाने में सक्षम है।
सम्मेलन की आज 12 प्रान्तों में शाखायें हैं, इसके निर्णय से मारवाड़ी समाज बहुत हदतक प्रभावित होता रहा है। असम के गांव से लेकर बिहार, बंगाल, झारखण्ड, उत्तर-प्रदेश, छत्तिसगढ़, उत्कल, मध्यप्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तामीलनाडू प्रान्तों में सम्मेलन के कार्यकर्ता कार्य कर रहें हैं। समाज के सैकड़ों लोगों ने अपने जीवन के कीमती क्षण समाज को संगठीत करने में लगा दिये। हम चाहते हैं कि इस पूँजी को और मजबूत आधार प्रदान किया जाय। समाज को सम्मेलन के उद्देश्यों से भली भाँती परिचित कराया जाय कि अन्य संगठनों से सम्मेलन भिन्न कैसे और सम्मेलन द्वारा लिये गये निर्णय समाज के लिये कितने कारगार हैं।

सम्मेलन का कार्य समाज हित में व्यापक है इसे और व्यापक बनाने के लिये सम्मेलन को न सिर्फ प्रान्तीय स्तर पर, बल्कि सम्मेलन की शाखाओं हर गाँव तथा शहर में इस संगठन को ओर अधिक संगठीत करने पर भी हमें और अधिक ध्यान देने की जरूरत है। हमारी चेष्टा रहनी चाहिये कि समाज के प्रत्येक मारवाड़ी परिवार से कम से कम एक सदस्य सम्मेलन का साधारण, आजीवन या संरक्षक सदस्य जरूर से बने। यह बात सभी जानते हैं कि किसी भी जातिगत संस्थाओं का विकल्प संभव है, परन्तु मारवाड़ी सम्मेलन का विकल्प खोजना समाज को कमजोर करना है। आईये समाज के इस संगठन को हर स्तर पर और अधिक मजबूत करने में अपना योगदान देवें।

चुनाव संबंधित कुछ सावधानियाँ-


1. सम्मेलन के राष्ट्रीय, प्रान्तीय, जिला और शाखा स्तर के किसी भी पदाधिकारी को, किसी भी व्यक्ति या किसी भी दल के प्रति, पक्ष या विपक्ष में कोई भी अधिसूचना या वक्तव्य जारी करने का कोई अधिकार नहीं होगा।


2. ‘‘मारवाड़ी-मारवाड़ी को ही वोट दें’’ इस तरह के नारे का कोई भी मारवाड़ी उम्मीदवार या अभ्यर्थी प्रयोग नहीं करेगा। हमें समस्त भारतीय परिप्रेक्ष्य में या किसी राजनीति दल के सदस्य हों तो उस दल के मेनिफेस्टो को ध्यान में रखते हुए, स्थानीय समरसता के साथ स्थानीय, प्रान्तीय या राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर ही स्थानीय समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ही चुनाव लड़ना चाहिये। किसी भी राजनैतिक दल को सहयोग देते समय यह सुनिश्चित कर लेवें कि वो समाज को मान देतें हैं कि नहीं या सिर्फ समाज के धन को प्राप्त करने के लिये टिकट दे रहें हैं। राज्यसभा/लोकसभा/विधानसभा की टिकट खरीदकर न तो राज्यसभा में जायें न ही लोकसभा/विधानसभा के लिये अपनी उम्मीदवारी पेश करें। राजनीति में सक्रिय योगदान देना चाहतें तो स्थानीय समरसता को ध्यान में जरूर रखें।


3. किसी ऐसे क्षेत्र जहाँ मारवाड़ी समाज की संख्या अधिक है उस चुनाव क्षेत्र का दावा करते समय कोई भी पदाधिकारी अपने पद से त्यागपत्र देकर ही इस तरह का दावा किसी राजनैतिक पार्टी के पास भेजें। सम्मेलन के किसी भी स्तर के सहयोग पत्र या पद का प्रयोग किसी भी तरह नहीं किया जाना चाहिये।


4. किसी भी मारवाड़ी उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष में कोई भी अधिसूचना सम्मेलन के नाम से जारी नहीं की जायेगी।


5. मतदान के दिन या पहले किसी भी तरह के विवादस्पद मुद्दे को लेकर सम्मेलन की तरफ से कोई वक्तव्य जारी करने का अधिकार सिर्फ केन्द्रीय समिति को ही होगा। आवश्यकता पड़ने पर प्रान्तीय पदाधिकारी फोन पर भी केन्द्रीय पदाधिकारियों से राय या विचार करने के बाद ही अपना विचार मीडिया को जारी कर सकेगें।


आईये ! हम देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी और अपने दायित्व को पूरा करने के लिये कृतसंकल्प होकर देश के संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह करें और मतदान प्रक्रिया में अपनी सहभागिता निभायें।

म्हारो लक्ष्य राष्ट्र’री प्रगति

नन्दलाल रूँगटा,
अध्यक्ष, अखिल भरतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन

Nandlal Rungta, Chaibasa

आगामी लोकसभा चुनाव का बिगुल बज गया है, पिछले दिनों सम्मेलन के द्वारा देश के विभिन्न प्रन्तों में ‘‘राजनैतिक चेतना शिविरों’’ का आयोजन किया गया था। हमारी यह योजना भी थी कि दिल्ली में एक राष्ट्रीय स्तर के शिविर का भी आयोजन हो सके। चुकिं कई प्रान्तों के चुनाव को देखते हुए एवं उसी समय सम्मेलन के साधारण अधिवेशन के चलते ऐसा संभव नहीं हो सका। इन शिविरों के माध्यम से हमने यह प्रयास किया था कि समाज के लोग न सिर्फ चुनावी प्रक्रिया में सक्रिय हिस्सेदारी लेंवें, साथ ही चुनाव कार्यलयों में जाकर मतदाता सूची में अपने नाम की जाँच जरूर से करवां लें- कि उनके नाम को किसी ने हटा तो नहीं दिया? या फिर जिन्होंने अभी तक नाम न दर्ज करवायें हों तो मतदाता सूची में अपने और अपने परिवार का नाम जरूर से दर्ज करवायें, साथ ही अपने आस-पास रहने वाले समाज बन्धुओं को भी इस बात के लिये प्रेरित कि वे अपने नाम को मतदाता सूची में जरूर से दर्ज करा लेवें। हमें यह सूचना मिली है कि इस बार समाज ने इस बात के महत्व को समझा है और इस दिशा में पहल की है। जिन लोंगो ने अभी तक यह कार्य न किया हो वैसे समाज बंधुवों कि संख्या को धीरे-धीरे कम करने की आवश्यकता है।
हम लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं देश और
संविधान के प्रति भी हमारा यह दायित्व बनता है कि चुनाव की प्रक्रिया में भागीदारी कर देश की गणतांत्रिक व्यवस्था को मजबुत कर हमें बिना किसी जाति-पात के अच्छे उम्मीदवार या आप देश के किसी राजनैतिक पार्टी से तालूक रखतें हों तो उस दल के उम्मीदवार को अपना मूल्यवान मत देने जरूर जायें। राजनैतिक पार्टियों से समरसता और सहयोग भी बनायें ताकी हमारी एवं हमारे समाज की आशाओं एवं आकांक्षाओं के सम्बन्धी सार्थक वार्तालाप संभव हो सके।
आसन्न संसदीय चुनाव का देश में राजनैतिक स्थिरता एवं आर्थिक विकास की दृश्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। विश्व अर्थव्यवस्था एक संकटकालीन स्थिति से गुजर रही है। भारत इससे अछूता नहीं है आर्थिक मन्दी के चलते रोजगार कम हो रहे है एवं वित्तिय व्यवस्था चरमरा रही है। इन गम्भीर आर्थिक चुनौतियों का मुकाबला करने के लिये आने वाले समय में साहसपूर्ण राजनैतिक एवं आर्थिक कदम उठाने की आवश्यकता पड़ेगी। इस संदर्भ में स्थायी एवं मजबूत सरकार का महत्व और भी बढ़ जाता है। वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में एकदलीय बहुमत सरकार की कोई संभावना नहीं है। मिली-जुली सरकार का कोई विकल्प नहीं दिखता है। त्रिशंकु संसद गम्भीर राजनैतिक परिस्थिति प्रस्तुत कर सकती है। राजनैतिक दलों एवं नेताओं के साथ-साथ मतदाताओं को बड़ी सुझबुझ एवं परिपक्व का परिचय देना है। बढ़ते आतंकवाद एवं कठिन आर्थिक संकट की वर्तमान स्थिति में एक मजबूत केन्द्रीय सरकार समय की मांग है। हम सभी को इसमें अपनी भूमिका निभानी है।
हमारा समाज कई पीढ़ियों से देश के विभिन्न हिस्सों में रम-बस गया है। जो जिस प्रान्त में बसा, उस प्रान्त की भाषा- साहित्य-संस्कृति को न सिर्फ अपनाया साळा ही उसके विकास में महत्वपुर्ण योगदान भी दिया है। असम के श्री ज्योतिप्रसाद अगरवाला एवम् इनका परिवार इस बात का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करतें हैं। सम्मेलन की नींव रखने वालों ने भी यह नारा- ‘‘म्हारो लक्ष्य राष्ट्र’री प्रगति’’ रखा है। हम राष्ट्र की एकता और अखण्डता के साथ-साथ प्रान्तीय समरसता में विश्वास करते हैं। हम चाहतें हैं कि जिस प्रान्त में हम रहतें हैं उस प्रान्त की स्थानीय भाषा को भी हम अपनाये। उस प्रान्त के लोगों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर समाज सेवा के कार्य किये जायें। समाज ने विभिन्न प्रान्तों में समाज सेवा के जो भी कार्य किये हैं उनके आँकड़े एकत्र करने की योजना भी हमें लेनी होगी। इस कार्य के लिये हमें सभी प्रान्तों का विशेष सहयोग यदि मिला तो जल्द ही हम इस तरह के कुछ संकलन प्रकाशित कर पायेगें। end.

रविवार, 29 मार्च 2009

बिहार: श्री कमल नोपानी बने नये अध्यक्ष


बिहार प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन का दो दिवसीय 26वां प्रादेशिक अधिवेशन

‘जागृति-2009’ 21-22 मार्च को
श्री कृष्ण स्मारक भवन, पटना में सम्पन्न
बिहार का दो दिवसीय अधिवेशन सम्पन्न
श्री कमल नोपानी बने नये अध्यक्ष
पारिवारिक मूल्यों में आ रही गिरावट रोकना ज़रूरी: रुँगटा



बिहार प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन का दो दिवसीय 26वां प्रादेशिक अधिवेशन ‘जागृति-2009’ 21-22 मार्च को महाराणा प्रताप भवन एवं श्री कृष्ण स्मारक भवन, पटना में सम्पन्न हुआ। सम्मेलन की पटना शाखा द्वारा आयोजित इस दो दिवसीय अधिवेशन के प्रथम दिन प्रादेशिक सभा, महिला सत्र, युवा सत्र एवं विषय निर्वाचिनी की बैठक हुई। बैठकों व सत्रों में दहेज, दिखावा व प्रदर्शन, भ्रूण हत्या आदि विषयों पर गहन चिंतन हुआ और इन सामाजिक बुराइयों को रोकने हेतु प्रयास करने पर जोर दिया।
कार्यक्रम के दूसरे दिन अ.भा.अग्रवाल सम्मेलन के राष्ट्रीय
अध्यक्ष श्री प्रदीप मित्तल ने झण्डोत्तोलन किया। गुरुकुल के बच्चों द्वारा शंख ध्वनि तथा वैदिक मंत्रों के साथ समारोह की शुरूआत हुई। श्रीमती सुनीता जोश ने गणेश वन्दना, श्रीमती दयारानी अग्रवाल तथा पूनम मोर ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। मंचस्थ अतिथियों को माल्यार्पण व पगड़ी पहनाने के बाद स्वागताध्यक्ष श्री दशरथ कुमार गुप्ता ने स्वागत वक्तव्य रखा। अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नन्दलाल रुँगटा ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया।
प्रान्तीय मंत्री श्री विनोद तोदी ने अपने प्रतिवेदन में कहा कि सम्मेलन एक महान संस्था है। अगर समर्पित लोग आगे जाकर निष्ठा के साथ कार्य करें तभी हमें लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। हमारी नीतियों तथा कार्यक्रमों को समाज के लोगों तक पहुंचाने के लिए जमीनी स्तर के लोगों को सम्मेलन से जोड़ा जाय। पटना नगर शाखा के अध्यक्ष श्री निर्मल झुनझुनवाला ने सभी के प्रति आभार प्रकट किया। बिहार प्रदेश के अध्यक्ष श्री नथमल टिबड़ेवाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि सम्मेलन के कार्यक्षेत्र को और व्यापक बनाने हेतु चिंतन की आवश्यकता है।
Kamal Nopaniइसके पश्चात् बिहार प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री कमल नोपानी को निवर्तमान अध्यक्ष श्री नथमल टिबडे़वाल ने भारी करतल ध्वनि के बीच माल्यार्पण, दुपट्टा एवं पगड़ी पहनाकर कार्यभार सौंपा।
नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री कमल नोपानी ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में कहा कि हममें राजनैतिक इच्छा शक्ति का अभाव है। सत्ता में हमारी भागीदारी नहीं है। हमें राजनीति में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। हम सभी को अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज करवाना चाहिए। बिहार में 156 शाखाएं हैं उनको शक्तिशाली बनाना होगा। उन्होंने आशा व्यक्त की कि बिहार बदल रहा है और समाज भी बदलेगा। श्री नोपानी ने नई कार्यकारिणी के नामों की भी घोषणा की जिसमें श्री राजेश सिकरिया को महामंत्री मनोनीत किया।
Sri Nandlal Rungat and Sri kamal Nopani
विशिष्ट अतिथि बिहार के पूर्व वित्तमंत्री श्री शंकर प्रसाद टेकड़ीवाल ने कहा कि मारवाड़ी समाज ही देश को दिशा दे सकता है। श्री रामपाल अग्रवाल नूतन ने कहा-हम काफी सेवा कार्य करते हैं, सबके साथ घुल मिल जाते हैं। बावजूद इसके हमारी पहचान सकारात्मक नहीं हुई है।
मारवाड़ी युवा मंच की प्रान्तीय अध्यक्ष श्रीमती सरिता बजाज ने कहा कि मारवाड़ी युवा मंच के पदाधिकारी भी स्वयं को कार्यकर्ता समझते हैं। इस मौके पर श्री गणेश खेतड़ीवाल के प्रधान सम्पादकत्व में प्रकाशित ‘कुछ अपनी कुछ पराई’ नामक स्मारिका का विमोचन श्री रुँगटा ने किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री प्रदीप मित्तल ने अपने जोशपूर्ण वक्तव्य में कहा कि मारवाड़ी समाज देश की प्रत्येक राष्ट्रीय विपत्ति में सबसे पहले आगे आता है। लेकिन अब सिर्फ सेवा से हमारा गुजारा संभव नहीं है। हमारा वर्चस्व सत्ता में होना जरूरी है। संगठन को मजबूत करना होगा। ‘लंच-मंच हमारा और राज तुम्हारा’ अब नहीं चलेगा। हमें राजनीति में आने वाले प्रत्येक मारवाड़ी का तन-मन-धन से सहयोग करना चाहिए।
अंत में सम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा उद्घाटनकर्ता श्री नन्दलाल रुँगटा ने अपने सधे हुए वक्तव्य में संगठन शक्ति, शिक्षा, चिकित्सा, समाज सुधार, समाज सेवा, भ्रूण हत्या आदि विषयों पर प्रकाश डाला एवं राजनैतिक चेतना पर कहा कि हमें लोगों को मतदान करने हेतु प्रेरित करना होगा। संगठन को मजबूत करने के लिए प्रत्येक मारवाड़ी परिवार के कम से कम एक व्यक्ति को सक्रिय रूप में सम्मेलन से जुड़ना होगा। सम्मेलन जैसी सामाजिक संस्थाओं को दान पर निर्भर न रहकर आत्मनिर्भर बनना होगा। आज हमारे पारिवारिक मूल्यों एवं संबंधों में निरंतर गिरावट आ रही है, इसे रोकने हेतु प्रयास करना होगा। इसके अलावा राजस्थानी भाषा को बढ़ावा देने हेतु मारवाड़ी में बात करने पर उन्होंने जोर दिया। श्री रुँगटा ने कहा कि इस दिशा में पहल करते हुए हम साधारण बोलचाल की भाषा की एक शब्दावली पुस्तक निकालने का प्रयास कर रहे हैं। इस मौके पर प्रादेशिक सम्मेलन द्वारा विशिष्ट शाखाओं के प्रतिनिधियों, पदाधिकारियों एवं अतिथियों को मोमेंट एवं शॉल देकर सम्मानित किया गया। मंच पर अ.भा.मारवाड़ी सम्मेलन के उपाध्यक्ष श्री बद्रीप्रसाद भीमसरिया, राष्ट्रीय महामंत्री श्री रामअवतार पोद्दार, संयुक्त राष्ट्रीय महामंत्री श्री ओमप्रकाश पोद्दार व श्री संजय हरलालका, श्री कैलाश प्रसाद झुनझुनवाला, श्री नारायण प्रसाद अग्रवाल, बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला, गोवर्धन नोपानी, डाॅ. आर.के.मोदी, विश्वनाथ झुनझुनवाला, आर.के.मोदी, मोतीलाल खेतान, विमल जैन, पुष्करलाल अग्रवाल, श्री रमेश केजरीवाल, श्री जगदीश प्रसाद मोहनका, श्री बादल चंद अग्रवाल, श्री विजय कुमार किशोरपुरिया, श्री अशोक तुलस्यान, श्री ओम प्रकाश खेमका आदि भी उपस्थित थे। कार्यक्रम का सफल संचालन श्री महेश जालान ने किया। धन्यवाद ज्ञापन के साथ इस सत्र का समापन हुआ। भोजन के पश्चात् प्रतिनिधि सत्र शुरू हुआ जिसमें बिहार प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन के नये
पदाधिकारियों ने स्थान ग्रहण किया। सत्र में विषय निर्वाचिनी द्वारा स्वीकृत कई प्रस्तावों पर विस्तृत चर्चा हुई एवं कई प्रस्ताव पारित किये गये। सायं रंगारंग राजस्थानी सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ अधिवेशन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

छत्तीसगढ़ में वैश्य समाज - रमेश कुमार जैन


भारतीय गणतंत्र के 26 वें राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ का उदय 1 नवम्बर 2000 को हुआ। इसके पूर्व यह क्षेत्र मध्यप्रदेश का हिस्सा था। 1 नवंबर 1956 को मध्य प्रदेश के निर्माण के रूप में यह मध्य प्रांत एवं बरार का अंग था। प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ का उत्तरी भाग (रायपुर, बिलासपुर क्षेत्र) दक्षिण कौशल के नाम विख्यात था, जबकि दक्षिणी भारत (बस्तर क्षेत्र) दंडकारण्य, महाकांत्तार, चक्रकोट के नाम से जाना जाता था।
भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था व अतंर्गत ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र चार वर्ण आते थे। धर्म के कर्ता-धर्ता होने के कारण ब्राम्हणों से संबंधित तथा राजकीय प्रमुख होने के कारण क्षत्रियों से संबंधित विवरण बहुतायद से मिलते हैं, किन्तु वैश्य समाज का उल्लेख यदा-कदा ही मिलता है, छत्तीसगढ़ के प्राचीन अभिलेखों में वैश्य समाज से संबंधित दो नाम बड़े महत्व के साथ मिलते हैं। प्रथम जाजल्लदेव के रतनपुर शिलालेख कलचुरी संवत् 866 (ई. 1114) में श्रेष्ठी यश का उल्लेख हुआ है, जिससे ज्ञात होता है कि रत्नदेव (प्रथम) के समय श्रेष्ठी यश रतनपुर का नगर प्रमुख था। इसी प्रकार पृथ्वी देव द्वितीय के समय के कोटगढ़ शिलालेख से ज्ञात होता है, कि रत्नदेव द्वितीय की माता लाच्छल्लादेवी वल्लभराव नाम वैश्य को अपने दत्तक पुत्र जैसा मानती थी। यह रत्नदेव द्वितीय का सामन्त था, इस अभिलेख में वल्लभराज द्वारा निर्मित हटकेश्वर निर्मित हटकेश्वर पुरी का उल्लेख है तथा इसके द्वारा एक सरोवर बनाने की जानकारी मिलती है।
छत्तीसगढ़ में वर्तमान में बड़ी संस्था में अग्रवाल जाति के लोग निवास करते है। इन्हें छत्तीसगढ़ अग्रवाल के नाम जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार जहांगीर के शासनकाल में छत्तीसगढ़ में कल्याण साय नामक एक राजा हुए। कल्याण साय के दिल्ली जहांगीर के दरबार में जाने का विवरण इतिहास में मिलता है। कहा जाता है, कि दिल्ली से लौटते समय राज व्यवस्था को ठीक से संचालित करने के लिये कल्याण साय अपने साथ 5 घर ब्राम्हण, क्षत्रिय 5 घर कायस्थ और 5 घर अग्रवालों को लेकर आये थे। इन्ही अग्रवालों को कालान्तर में छत्तीसगढ़ अग्रवाल के नाम से संबोधित किया जाने लगा, कुछ लोग मंडला से अग्रवालों के आने की कथा बताते है और कुछ कहना है कि औरंगजेब के शासनकाल में धर्मपरिवर्तन से बचने के लिये छत्तीसगढ़ आ गये। छत्तीसगढ़ी अग्रवालों को यंहा दाऊ भी कहा जाता है, जो प्रतिष्ठा का सूचक है। परंपरा के रूप में छत्तीसगढ़ अग्रवालों के गोत्र सिंहल सिंघल, गोयल, गर्ग, नागल, वसिल, मुद्गल आदि मिलते है।
छत्तीसगढ़ अग्रवालों ने दान आदि क विशेष उल्लेखनीय कार्य किये है। जैतूसाव क द्वारा पुरानी बस्ती में मंदिर का निर्माण कराया गया था बाद में जहां मंहत लक्ष्मी नारायण दास हुये थे। जो एम. एल. ए. राज्य सभा सदस्य और कांग्रेसाध्यक्ष भी रहे। तरेंगा के दाऊ कल्याण सिंह के नाम पर है, इसके अतिरिक्त दाऊ कल्याण सिंह ने अपने पिता के कहने पर टी. बी. अस्पताल बनवाया था, इन्हें रायबहदुर और दीवान बहादुर की उपाधियां भी अंग्रेज सरकार ने दी थी ।
जहां तक वर्तमान में छत्तीसगढ़ के वैश्य समाज का प्रथम लगभग 19 वी शताब्दी में आवागमन के विकास के साथ बड़ी संख्या में यहां वैश्यों का आगमन हुआ। जिसमें मुख्यरूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बुंदेलखंड गुजरात के वैश्य उल्लेखनीय है। इनका आगमन लगभग 150-200 वर्शों का है।
छत्तीसगढ़ में वैश्य समाज अलग-अलग क्षेत्रीय समुदायों में अपनी-अपनी विरासत के अनुसार जीवन निर्वाह कर रहा है। इनकी कोई एक साथ समग्र पहचान नही है।
छत्तीसगढ़ के सामाजिक राजनीतिक एवं धार्मिक जीवन में वैश्यों का विशेश महत्व रहा है, आवश्यकता इस बात की है कि इसे सिलसिलेवार एकत्रित समग्ररूप से प्रकाश में लाया जावे।
छत्तीसगढ़ के वैश्यों की अन्य शाखा में तेली (साहू), जायसवाल की जानकारी भी यहां मिलती है। छत्तीसगढ़ की प्रतिद्ध धार्मिक नगरी राजिम का संबंध राजीव अथवा तेलिन से है। यहां का प्रसिद्ध राजीव लोचन मंदिर का संबध उनसे स्थापित किया जाता है, छ.ग. में तेलीय वैश्य बड़ी संख्या में है। इसी प्रकार जायसवाल समाज से संबंधित किवदंतियां एवं लोक कथाये भी यहां पर प्रचलित है।


संपर्क:
दिगंबर जैन मंदिर के पास, मालवीय रोड, रायपुर
फोन नं.: 09893184467

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

आपणी भाषा आपणी बात


अखबार में कोई एक कॉलम कैसे शुरू होता है और कैसे हिट होता है इसे दैनिक भास्कर के श्रीगंगानगर एडिशन में नियमित प्रकाशित हो रहे `आपणी भाषा आपणी बात´ स्तंभ की अंतरकथा जानकर ही अंदाज लगाया जा सकता है। यह स्तंभ मेरी अब तक की पत्रकारिता का यादगार प्रसंग तो है ही और इससे यह भी समझा जा सकता है कि हिंदी पत्रकारिता के सबसे बड़े दैनिक भास्कर पत्र समूह ने अपने संपादकों, स्टाफ को काम करने, नए प्रयोग की भरपूर आजादी भी दे रखी है। अपनी भाषा के प्रति क्या दर्द और क्या सम्मान होता है यह उज्जैन (मध्यप्रदेश) से उदयपुर (राजस्थान) स्थानांतरण के बाद ही समझ आया। जैसे गांधीजी ने आजादी के लिए अकेले संघर्ष शुरू किया और लोग जुड़ते गए। कुछ वैसा ही राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के आंदोलन को राजेंद्र बारहठ, शिवदान सिंह जोलावास, घनश्यामसिंह भिंडर आदि से थोड़ा बहुत समझ पाया। इसे एक दिल से जुड़े मुद्दे के रूप में उदयपुर में `मायड़ भाषा´ स्तंभ से शुरू किया और राजस्थान की भाषा संस्कृति की रक्षा के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने को आतुर लोगों ने मान लिया कि संवैधानिक दर्जा दिलाना अब भास्कर का मुद्दा हो गया है। अप्रैल 08 में उदयपुर से श्रीगंगानगर स्थानांतरण पर इस मुद्दे को उठाने की छटपटाहट तो थी, लेकिन पहली प्राथमिकता थी दोनों शहरों का मिजाज समझना। एक शाम मोबाइल पर हरिमोहन सारस्वतजी ने संपर्क किया। वो मेरे लिए नए थे, लेकिन उन्होंने जिस तरह बारहठ जी और बाकी परिचितों के नाम के साथ बातचीत शुरू की तो मुझे लग गया कि मैं यहां नया हो सकता हूं लेकिन मेरी पहचान कई लोगों को करा दी गई है। सारस्वतजी से संपर्क बना रहा, आग्रह करते रहे कि सूरतगढ़ आएं। ब्यूरो कार्यालय की बैठक आदि के संदर्भ में जाना हुआ भी, लेकिन उनसे मुलाकात का वक्त नहीं निकाल पाया। एक शाम तो राजस्थानी मनुहार में हरिमोहन जी ने आदेश सुना ही दिया- सुगनचंद सारस्वत स्मृति में दिए जाने वाले वार्षिक साहित्यिक पुरस्कार समारोह में राजस्थानी भाषा के युवा कवि-परलीका के विनोद स्वामी को सम्मानित करने आना ही है। इंकार कर नहीं सकता था। फिर भी कह दिया अच्छा आप गाड़ी भिजवा देना फिर देखेंगे। कार्यक्रम से एक दिन पहले फिर मैसेज आ गया श्रीगंगानगर से ही राजकीय महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. अन्नाराम शर्मा और युवा साहित्यकार कृष्ण कुमार आशु (राजस्थान पत्रिका) आपको साथ लेकर आएंगे। अब तो न जाने के सारे बहानों के रास्ते बंद हो चुके थे। कार्यक्रम राजस्थानी भाषा के सम्मान से जुड़ा था। सोचा मालवी में बोलूंगा लेकिन ठीक से बोलना आता नहीं और गलत तरीके से राजस्थानी बोलना मतलब बाकी लोगों का दिल दुखाना और खुद की हंसी उड़ाना। राजस्थानी भाषा मान्यता आंदोलन के प्रदेश महामंत्री राजेंद्र बारहठ ही अंधेरे में आशा की किरण बने। फोन पर उन्हें मैंने अपने प्रस्तावित वक्तव्य की भावना बताई। उन्होंने राजस्थानी में अनुवाद किया और फोन पर ही मैंने भाषण नोट किया। राजस्थानी भाषा के इस भाषण को पढ़ने के अभ्यास के वक्त लगा कि सोनिया गांधी के हिंदी भाषण की खिल्ली उड़ाकर हम लोग कितनी मूर्खता करते हैं। सूरतगढ़ तक के रास्ते में अन्नाराम जी और आशु चिंतन चर्चा करते रहे। यह भी मुद्दा उठा कि समारोह में राजस्थानी में ही बोलना चाहिए। मेरी जेब में राजस्थानी में लिखा भाषण रखा था, लेकिन इन दोनों भाषाई धुरंधरों के सामने यह कहने की हिम्मत नहीं हुई कि मैं भी राजस्थानी भाषा में बोलूंगा। कार्यक्रम शुरू हुआ तो जिला प्रमुख पृथ्वीराज मील भी राजस्थानी में जितना मीठा बोले उतना ही मनमोहक उनका पारंपरिक पहनावा भी था। मेरी बारी आई, भाषण लिखा हुआ था, लेकिन हाथ-पैर कांप रहे थे। शुरुआत से पहले विनोद स्वामी से पूछ लिया था। उन्होंने बताया मासी को यहां भी मासी ही बोलते हैं। मैंने मंच से जब कहा कि मालवी और राजस्थानी दोनों बहनें हैं। इस तरह मैं अपनी मासी के घर आया हूं, राजस्थानी में भाषण पढूंगा तो उपस्थितजनों ने तालियों के साथ स्वागत किया और मेरी हिम्मत खुल गई। इस मंच से अच्छा और कोई मौका कब मिलता। मैंने राजस्थानी भाषा में स्तंभ शुरू करने की घोषणा कर दी। समारोह समापन के बाद हम सब चाय-नाश्ते के लिए बढ़ रहे थे। उसी वक्त सूरतगढ़ भास्कर के तत्कालीन ब्यूरो चीफ सुशांत पारीक को सलाह दी कि इस पूरे कार्यक्रम की राजस्थानी भाषा में ही रिपोर्ट तैयार करें। वहीं विनोद स्वामी, रामस्वरूप किसान, सत्यनारायण सोनी से स्तंभ के स्वरूप को लेकर चर्चा हुई। सोनी जी के पुत्र अजय कुमार सोनी को श्रेय जाता है राजस्थानी भाषा को नेट पर जन-जन से जोड़ने का। इस समारोह की रिपोर्ट राजस्थानी भाषा में प्रकाशित होने का फीडबेक अच्छा ही मिलेगा, यह विश्वास मुझे इसलिए भी था कि अखबारों में क्षेत्रीय भाषा में हेडिंग देने के प्रयोग तो होते ही रहते हैं। किसी कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट क्षेत्रीय भाषा में प्रकाशित करने का संभवत: यह पहला अनूठा प्रयोग जो था। खूब फोन आए। बस स्तंभ के लिए सिलसिला शुरू हो गया। किसी भी काम की सफलता तय ही है बशर्ते उस काम से सत्यनारायण सोनी, विनोद स्वामी जैसे निस्वार्थ सेवाभावी जुड़े हों। इन दोनों को अपने नाम से ज्यादा चिंता यह रहती है कि मायड़ भाषा का मान कैसे बढ़े। हमने रोज फोन पर ही चर्चा कर योजना बनाई। मेरा सुझाव था कि इस कॉलम में हम भाषा की जानकारी इतने सहज तरीके से दें कि आज की पब्लिक स्कूल वाली पीढ़ी भी आसानी से जुड़ सके और भविष्य में प्राथमिक-माध्यमिक स्तर की पढ़ाई के लिए राजस्थानी भाषा की पुस्तक भी तैयार हो जाए। कॉलम को भारी-भरकम साहित्यिक भाषा वाला बनाने पर खतरा था कि सामान्यजन रुचि नहीं दिखाएंगे। इस स्तंभ का उद्देश्य यही है कि जिन्हें राजस्थानी नहीं आती वो इस मनुहार वाली भाषा की मिठास को समझें और जिन्हें आते हुए भी बोलने में झिझक महसूस होती है उनकी झिझक टूटे। `भास्कर´ ने इस स्तंभ के लिए स्थान जरूर मुहैया कराया है, लेकिन सामग्री जुटाना, राजस्थानी भाषा में तैयार करना, कॉलम के लिए विशेष अवसर पर प्रमुख कवियों-साहित्यकारों से लिखवाना यह सारा दायित्व इन दोनों ने ले रखा है। जैसे शोले सलीम-जावेद के कारण सफाई हुई तो `भास्कर´ में `आपणी भाषा आपणी बात´ स्तंभ परलीका निवासी सोनी-स्वामी की जोड़ी से ही हिट हो रहा है।


श्री कीर्ति राणा, संपादक - दैनिक भास्कर ( श्रीगंगानगर संस्करण) मो:09829990299
kriti_r@raj.bhaskarnet.com

रविवार, 11 जनवरी 2009

समाजवाद के प्रणेता अग्र शिरोमणि महाराजा अग्रसेन

सुरेश कुमार बसंल (लेघांवाला)



महाराजा अग्रसेन अग्रवाल जाति के पितामह थे। वे समाजवाद के प्रर्वतक, युग पुरुष, रामराज्य के समर्थक एवं महादानी थे। महाराजा अग्रसेन उन महान विभूतियों में से थे जो "सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखायः" कृत्यों द्वारा युगों-युगों तक अमर रहेगें। महाराजा अग्रसेन केवल अग्रवालो के कुल प्रर्वतक ही नही थे अपितु महान लोकनायक, अर्थनायक, सच्चे पथ प्रदर्शक एवं विश्व बंन्धूत्व के प्रतीक थे। उनमें अलौकिक साहस, अविचल दृढ़ता गम्भीरता, अद्भुत सहनशिलता दुरदर्शिता, विस्तृत दृष्टिकोण गुण विद्यमान थे। इनका जन्म मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम की चौंतीसवी पीढ़ी में सूर्यवशीं क्षत्रिय कुल के महाराजा बल्लभसेन के घर में द्वापर के अन्तिमकाल और कलियुग के प्रारम्भ में आज से 5133 वर्ष पुर्व हुआ था।
युग पुरुष महाराजा अग्रसेन ने तत्कालीन एक तन्त्रीय शासन प्रणाली के प्रतिकार में एक नयी व्यवस्था को जन्म दिया, उन्होने पुनः वैदिक सनातन आर्य सस्कृंति की मूल मान्यताओं को लागु कर राज्य की पुनर्गठन में कृषी-व्यापार, उद्योग, गौपालन के विकाश के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा का बीड़ा उठाया। उन्होने अमीर-गरीब तथा उंच-नीच के भेदभाव को समाप्त कर सभी नागरिकों को समान अधिकार दिये। महाराजा अग्रसेन ने एक रुपया और एक ईंट के आदर्श द्वारा जहाँ एक और अपने राज्य को बेकारी बेरोजगारी-निर्धनता जैसे अभिशापों से मुक्त कर वहाँ सदाचार एवं भाईचारे की गहरी नींव रखी। महाराजा अग्रसेन इसलिए पूजनीय नहीं है कि वह अग्रवाल जाति के जनक थे वरन इसलिए पूजनीय है कि उन्होंने समय की मांग को देखते हुए तात्कालीन डांवाडोल परिस्थितियों में अहिंसा एवं समाजवाद के आधार पर एक सुदृढ़ गणतन्त्र की ठोस शुरुआत की जिस पर अग्रवालों के साथ-साथ पुरा राष्ट्र एवं विश्व गर्व करता है, समाजवाद, लोकतन्त्र एवं विश्व बन्धूत्व का इससे बढ़िया उदाहरण पुरी दुनिया के इतिहास में कहीं देखने सुनने को नही मिलेगा।
अग्रवाल समाज भारत की सभ्यता एवं संस्कृति का केन्द्र बिन्दू रहा है। विश्व में न जाने कितनी सभ्यताएं और सस्कृंतियां पनपी और काल के गाल में समा गई, किन्तु अग्रवाल समाज आज भी बड़े ही गर्व के साथ अपनी दान-धर्म परोपकार की परम्पराओं के साथ-साथ ईमानदारी और कर्मठता के कारण साहित्य, शिक्षा, धर्म, ज्ञान-विज्ञान, राजनिति, उद्योग कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जो इस समाज के योगदान से महिमान्वित न हुवा हो, सभी धर्मो को अपना समाज मानते हुए अपनी श्रद्धा और सम्मान के अलावा अपने ठोस योगदान के साथ हर समय तैयार रहता है। लाला लाजपतराय, जमनालाल बजाज, दानवीर भामाशाह, वैश्य शिरोमणि महात्मा गाँधी, भाई हनुमानजी प्रसाद पौद्दार, डॉ.रघुवीर, जयदयाल गोंइन्का, राममनोहर लोहिया, सर गंगाराम आदि विभूति इसी समाज की ही देन है। वर्तमान में फोर्ब्स पत्रिका न्यूयार्क अमेरिका ने संसार के सबसे धनी व्यक्तियों की सुची जारी की उसमें भी अग्रवाल समाज के श्री लक्ष्मीनिवास मित्तल को प्रथम स्थान मिला है। इसके अलावा इसी समाज के सुनील मित्तल (ऐयरटेल भारती समूह), नवीन जिन्दल , राहुल बजाज, सुभाष गोयल, नरोतम सेक्सरिया आदि भी इसी कड़ी में अपने-अपने उद्योग क्षेत्रों में राष्ट्र के नवनिर्माण में अपना योगदान देते हुए बुलन्दियो के झण्डे गाड़े हुए हैं। हमें हमारे समाज और हमारे पूर्वजो पर गर्व है।
अग्रवाल का अर्थ है आगे रहने वाला, सबका नेतृत्व करने वाला जो कि हमारे पूर्वजों ने किया, किन्तु वर्तमान में आधुनिकता और पाश्चात्य की चकाचौध, स्वार्थपरक नीति, व्यस्त जीवन प्रणाली में हम कुछ गुमराह से हो रहे हैं, सोच का दायरा अपने तक सिकुड़ कर सिमित रह गया है, सबको साथ लेकर चलने की सदासयता विलुप्त सी हो रही है। आवश्यकता से अधिक कमाए गए धन के घमण्डी धनाढ़य लोग अपने वैभव और समृद्धि का नगां नाच नाचते नजर आते है , शिक्षा के नाम पर सस्कारों का हनन हो रहा हैं, परम्पराएँ समाज से लुप्त होती जा रही हैं, समाज तो समाज परिवार सिकुड़ते जा रहे हैं, महाराजा अग्रसेन की मान्यताओं की धज्जीया उड़ाने में हम सभी में दौड़ लगी हुई है। अग्रवाल समाज का लक्ष्य क्या था और हम आज कहाँ जा रहे है? जरा चिन्तन करें।
आज महाराजा अग्रसेन कि जयंती हैं, अग्रवाल समाज पुरे देश में अपने-अपने स्थानीय स्तर पर अग्रसेन जयंती का आयोजन करता है, इन आयोजनो की भव्यता और विशालता से इन्कार नहीं किया जा सकता, पुरखों कि स्मृति को जीवन्त रखने हेतू जयंतीयों हमारे दायित्व के साथ-साथ एक माध्यम हैं। लेकिन प्रश्न है कि इन जयंतीयों से क्या हम महाराजा अग्रसेन के नियम और उद्देश्यों को पुरा करा पाते हैं, महाराजा अग्रसेन के जीवन उसके आदर्श उसके व्यक्तित्व एवं कृतित्व से समाज को कहाँ तक परिचित करा पाते है। मेरी सोच में आज हम महाराजा अग्रसेन के सिद्धान्तों से भटक रहे हैं। यदि हमें महाराजा अग्रसेन के अनुयायी कहलाना है तो, आइये ! हम महाराजा अग्रसेन जयंती पर एक बार पुनः सच्चे मन से उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लें, हम सब एक नयी सामाजिक क्रान्ति को जन्म देने कि तैयारी करें, समाज बन्धूवों में परस्पर घनिष्ठता एवं सहयोग कि भावना बढ़ाते हुए समाज में व्याप्त कुरीतियों व बुराइयों को दूर करने के लिए संगठित होकर कार्य करने और अपनी एकता का परिचय देकर हर समय प्रयत्नशिल रहें, हमारा अग्रवाल समाज नित नवल ज्योत्सना की सुधा से सरोवार हो। यदि हम अपने को अग्रसेन की सन्तान मानते हैं तो हमें भी अपने को प्रमाणित करना पड़ेगा, उनके जीवन चरित्र से प्रेरणा लेकर स्वयं के जीवन को अग्रमय बनाने का संकल्प लेना होगा, यही उस युग पुरुष को सच्ची श्रद्धाजंली होगी और जयंती कि सार्थकता होगी।

राजस्थानी भाषा में शपथ नहीं ली जा सकती


खुद की भाषा नहीँ बची तो भारतीय संस्कृति कैसे बचेगी?-
भास्कर न्यूज
Friday, January 02, 2009 10:39 [IST]
जयपुर. तेरहवीं विधानसभा के पहले सत्र के पहले ही दिन राजस्थानी भाषा का मुद्दा छाया रहा। कुछ सदस्यों ने राजस्थानी भाषा में शपथ लेने की अपनी भावनाओं से सदन को अवगत कराया। विधानसभा के अस्थायी अध्यक्ष को बार बार व्यवस्था देकर सदस्यों को यह बताना पड़ रहा था कि राजस्थानी भाषा आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है इस कारण इसमें शपथ नहीं ली जा सकती।
भाजपा के डॉ.गोपाल कृष्ण जोशी ने विधानसभा कार्य संचालन नियमों का हवाला भी दिया और कहा कि अध्याय दो में सदस्यों के शपथ लेने के बारे में तो लिखा हुआ है लेकिन किस भाषा में लिया जाए इसका उल्लेख नहीं है। अध्यक्षीय व्यवस्था के बाद उन्हें भी हिंदी में शपथ लेनी पड़ी। राजस्थानी में शपथ की मांग भाजपा के अजरुन लाल गर्ग, कसमा मेघवाल, कल्याणसिंह चौहान, बाबूसिंह राठौड़, राजकुमार रिणवा, शंकरसिंह रावत निर्दलीय नानालाल, कांग्रेस के प्रदीपकुमार सिंह, प्रमोदकुमार भाया ने की। राजस्थानी में शपथ लेने की मांग की। उल्लेखनीय है कि सदस्यों को राजस्थानी में शपथ लेने के लिए अखिल भारतीय राजस्थानी भासा मान्यता संघर्ष समिति की ओर से प्रेरित किया गया। समिति के प्रदेश अध्यक्ष (पाटवी) हरिमोहन सारस्वत और प्रदेश महामंत्री डॉ. राजेंद्र बारहठ ने न सिर्फ सभी सदस्यों को नववर्ष की शुभकामनाओं पत्र भेजा अपितु इसके साथ शपथ का राजस्थानी प्रारुप भी भेजा ताकि किसी सदस्य को दिक्कत नहीं आए। पत्र में कन्हैयालाल सेठिया और रामस्वरूप किसान के दोहों का भी उल्लेख किया गया जिसमें मातृ भाषा को अपनाने की प्रेरणा दी गई है।


नोट: सरम आवै जद म्हें खुद नै राजस्थानी कह्‌वु. म्हें फक्त नांव रौ राजस्थानी, सरकार गुमान दरसावै राजस्थान रै इतिहास माथै अर जय जय राजस्थान रा नारा देवै बोट लेवण खातर.कांई आपां राजस्थानी ऎड़ा परवाड़ीयोड़ा हौ, कै आपां आपणी भासा नीं वापर सकौ. अबार रा चुणावां मांय जित्योड़ा MLA जद Assembly मांय राजस्थानी भासा मांय सौगंध लेवण लागा तौ वांनै रोक्या ग्या.कांई राजस्थांन मांय राजस्थानी बोलणी, पाप समझीयौ जावै है.अबार नीं चेत्या तौ घणौ मोड़ौ हु जासी...... चेत मानखा चेत जमानौ चेतण रौ आयौ ..

रविवार, 21 दिसंबर 2008

राजनीति के खेल के नियम और मारवाड़ी -विनोद रिंगानिया

पिछले दिनों स्तंभकार मनजीत कृपलानी ने एक बड़ी ही महत्त्वपूर्ण बात की ओर इशारा किया। उन्होंने लिखा है कि भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का असर यह हुआ है कि ब्राह्मण धीरे-धीरे राजनीतिक सत्ता से अलग हटते गए हैं। भारत में हमेशा से हर क्षेत्र में अपना वर्चस्व बनाए रखने वाले ब्राह्मणों ने अब राजनीतिक सत्ता को छोड़कर उद्यम में अपने पैर जमाने शुरू कर दिए हैं। इसलिए आज हम यह ट्रेंड देख रहे हैं कि ब्राह्मण युवा (और अन्य तथाकथित ऊंची जातियों के) डिग्रियों से लैस होकर, खासकर इंजीनियरिंग की, उद्यमों में आ रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी में भारत को एक महाशक्ति बनाने के पीछे इस युवा वर्ग का बड़ा हाथ है।
इस विचारोत्तेजक लेख से इस बात की ओर भी ध्यान गया कि मारवाड़ी समाज के लोग तो संख्या के लिहाज से ब्राह्मणों से भी कम हैं। थोड़ी सी संख्या में राजस्थान और हरियाणा से निकले बनिये और ब्राह्मण आज सारे भारत में बिखरे हैं। लेकिन चुनाव क्षेत्रों के आधार पर बंटे देश में क्या वे कभी भी राजनीति में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करा पाएंगे? यह सवाल हम इसलिए उठा रहे हैं कि मारवाड़ी समाज के संगठनों में ( दो ही हैं - मारवाड़ी सम्मेलन और मारवाड़ी युवा मंच) अक्सर इस बात पर चिंता व्यक्त की जाती है कि राजनीति में मारवाड़ियों की उपस्थिति बिल्कुल नगणय है। इस चिंता का भी एक बिल्कुल ही अलग कारण है। मारवाड़ी इसलिए राजनीति में नहीं आना चाहते कि उन्हें आरक्षण चाहिए, या अपना कोई होमलैंड चाहिए, या सरकारी नौकरियों में उनके साथ कोई भेदभाव होता है (बहुत ही कम लोग सरकारी नौकरियों में हैं) या उद्यम लगाने के रास्ते में सरकारें रोड़े अटकाती हैं।
लेकिन उनलोगों ने देखा है कि पूरी प्रशासनिक मशीनरी कानून के अनुसार नहीं बल्कि राजनेताओं के इशारों पर चलती है। कहीं कोई गुंडागर्दी हो जाए तो पुलिस वाले साफ कहेंगे कि वे कार्रवाई नहीं कर सकते, अमुक विधायक या तमुक मंत्री का आदेश है। जिसे आप गुंडा कह रहे हैं वह अमुक मंत्री का "आदमी' है। पूर्वी भारत के राज्यों, बिहार, बंगाल, उड़ीसा और असम में अक्सर चंदा उगाही को लेकर लफड़ा होता रहता है। असम में उग्रवाद का दंश भी सबसे पहले मारवाड़ी समाज को ही झेलना पड़ा। कोई जिला उपायुक्त या एसपी पक्षपात करता है, तब मंत्री-विधायक की चिरौरी करनी पड़ती है कि "भैया इस डीसी को हटाइए'। हर समुदाय के लोगों को करनी पड़ती है, लेकिन मारवाड़ी को छोड़कर बाकी सबकी बात कमोबेश मान ली जाती है।
मारवाड़ियों ने दूसरी एक चीज अपने अनुभव से सीखी है कि उनकी नगण्य संख्या के कारण कोई भी राजनीतिक दल उनकी परवाह नहीं करता। उल्टे कई बार मारवाड़ियों के बारे में अंट-शंट बककर सभी दलों के राजनेता वोटरों को लुभाने की कोशिश करते हैं। (तरुण गोगोई ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा किया था) इसलिए मारवाड़ी संगठनों के नेताओं को यह पीड़ा होती है कि मारवाड़ी लोग वोटर लिस्ट में अपना नाम लिखाने को लेकर जागरूक नहीं रहते। उनका सोचना है कि वोटर लिस्ट में मारवाड़ियों की संख्या बढ़ जाने पर यह उपेक्षा कम हो जाएगी।
इन्हीं दोनों मुद्दों को कई बार राजनीति में प्रवेश करने के इच्छुक व्यक्ति बड़े जोर-शोर से उठाते हैं। अक्सर राजनीति में जाने की यह इच्छा व्यक्तिगत महत्त्वााकांक्षा से परिचालित होती है और इसमें समाजहित जैसी किसी बात का मुख्य स्थान नहीं होता। लेकिन मारवाड़ी समाज का एक आम आदमी सोचता है कि चलो अपना एक प्रतिनिधि सत्ता के गलियारों में घूमता रहेगा तो आड़े वक्त पर काम आएगा। यह सोचना सिर्फ सोचने के स्तर पर ही सीमित रहता है। बड़े परिदृश्य पर देखें तो न तो मारवाड़ी समाज ऐसे व्यक्तियों की कोई खास मदद कर पाता है, और न ही ऐसे व्यक्ति सत्ता के गलियारों में पहुंचकर अपने मूल समाज के लिए मददगार साबित हो पाते हैं। आखिर क्यों?
इसका कारण बताने के लिए कोई ईनाम नहीं है। क्योंकि हम जानते हैं कि चुनाव संख्या का खेल है। देश भर में छितरे मारवाड़ियों के पास संख्या बल नहीं है। इसके सदस्य किसी व्यक्ति विशेष के लिए जुलूस और जनसभा की तैयारियां भले कर दें, लेकिन जुलूस और जनसभा सफल तभी होते हैं जब उनमें आम जनता (पढ़ें गैर-मारवाड़ी) की भागीदारी होती है। एक मजेदार बात का अनुभव चुनावी राजनीति से जुड़ने वाले हर व्यक्ति को जल्दी ही हो जाता है। वह यह है कि चुनावी मैदान में कूदने वाला मारवाड़ी व्यक्ति जल्दी ही अपनी मारवाड़ी छवि से छुटकारा पाना चाहता है। कहीं वह अपनी उपाधि बदलकर यह काम करता है, कहीं वह मारवाड़ियों के घरों पर खुलेआम जाना बंद करके करता है, कहीं वह सार्वजनिक स्थल पर लोगों के सामने मारवाड़ी भाषा में बात करने से परहेज के द्वारा करता है, कहीं वह कहता है कि मैं तो इतने सालों से इस प्रदेश में रहता आया हूं - मैं मारवाड़ी हूं ही नहीं। इसमें उसका दोष नहीं है, जिस खेल में वह शामिल हुआ है उस खेल के नियमों के अनुसार चलना उसकी नियति है।
अब आते हैं इस बात पर कि जीतने के बाद ये नेता क्या करते हैं। हमने आज तक नहीं देखा कि कहीं किसी निर्वाचित मारवाड़ी जनप्रतिनिधि ने जीतने के बाद भी अपनी मारवाड़ी छवि को गर्व के साथ स्वीकार किया हो। क्योंकि वह तब भी खेल में शामिल रहता है। जीतने का यह मतलब नहीं कि वह खेल से बाहर हो गया। उसे आगे भी चुनाव लड़ना है। वह बंद कमरे में मारवाड़ियों के विरुद्ध पक्षपात करने के लिए डीसी-एसपी को भले फटकार दे, खुले मंच से आप कभी भी उसे मारवाड़ियों के पक्ष में कुछ बोलते नहीं सुन सकते।
आखिर ऐसा होना ही है। यहां हम इस संदर्भ में असम की पृष्ठभूमि से कुछ अनुभव बांटना चाहेंगे। असम में हम देखते हैं कि कुछ असमिया नेता अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ कुछ भी बोलने से कतराते हैं, ऐसा कोई भी काम करने से परहेज करते हैं जो बांग्लादेशी मूल के लोगों के हितों पर चोट पहुंचाने जैसा लगे। ऐसा इसलिए कि उनके चुनाव क्षेत्र में बांग्लादेशी मूल के लोगों की बहुतायत होती है। जब इतनी बड़ी आबादी वाले असमियाभाषी समुदाय को वे जनप्रतिनिधि नजरंदाज कर सकते हैं तो गिने-चुने मारवाड़ियों की क्या बिसात है। अब आपके सौ फीसदी लोग वोटर लिस्ट में नाम लिखाते हैं या अस्सी फीसदी इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।
जनप्रतिनिधि बना मारवाड़ी व्यक्ति मारवाड़ी समाज की कोई महत्त्वपूर्ण मदद नहीं कर सकता, साथ ही यह भी सत्य है कि मारवाड़ी समाज भी ऐसे राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा वाले व्यक्तियों की कोई मदद नहीं कर सकते। यह प्रवासियों के रूप में देश भर में बिखरे होने की अनिवार्य सजा है। एक हद तक हमारी स्थिति एंग्लो-इंडियन या पारसी समुदाय की तरह है,जो चुनावी राजनीति में अपने जौहर नहीं दिखला सकता। संविधान निर्माताओं ने एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए शुरुआत में ही दो नामांकित सीटों का प्रावधान कर दिया था।
कई बार इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया जाता है कि व्यापार और उद्यम के क्षेत्र में इतनी कामयाबी हासिल करने वाला मारवाड़ी समाज राजनीति में फिसड्डी क्यों है? ठीक है कि इसके बहुत ही कम लोग मैदान में उतरते हैं, लेकिन जो उतरते हैं वे भी अक्सर गिरते हुए पाए जाते हैं। उनकी योग्यता भारतीय जनप्रतिनिधियों की औसत योग्यता से कम नहीं होती, बल्कि काफी अधिक होती है। फिर भी वे हारते हैं। इसका सीधा सा कारण यह है कि इस खेल के नियम उनके विरुद्ध है। इसमें कोई कामयाबी पाता है तो वह अपवाद स्वरूप ही। या फिर अपवाद स्वरूप वैसे चुनाव क्षेत्रों में जहां मारवाड़ियों की घनी आबादी है(जैसे कोलकाता के कुछ चुनाव क्षेत्र)। बाकी जगह उसका हारना नियम है और जीतना अपवाद।
रास्ता किधर से है?
जाहिर है रास्ता गैर-चुनावी राजनीतिक सक्रियता की तरफ जाता है। यहां समझाने के लिए हम असम के छात्र संगठन आसू का उदाहरण रखना चाहेंगे। आसू ने कभी चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन असम में उसका दबदबा किसी भी राजनीतिक पार्टी से ज्यादा है। यह सच है कि मारवाड़ी संगठन आसू नहीं बन सकते, लेकिन यह सिर्फ संख्या के लिहाज से ही सही है। इज्जत और असर के लिहाज से वे यह ऊंचाई हासिल कर सकते हैं। एक हद तक हासिल की भी है, लेकिन यह अनायास हुआ है। इसी काम को सायास प्रयत्न के साथ करें तो और भी अच्छे नतीजे सामने आएंगे इसमें कोई शक नहीं है।
जरूरत देश के स्तर पर मारवाड़ी की छवि में बदलाव लाने वाले काम करने की है। एंबुलेंस सेवा के द्वारा मारवाड़ी युवा मंच ने इस काम में काफी सफलता हासिल की है। फिर भी यह सही है कि अपने-अपने क्षेत्र में शीर्ष पर पहुंचने वाले लोग अपने आपको मारवाड़ी कहने में सकुचाते हैं। यह छवि के कारण है। ऐसे लोगों के साथ विचारों का आदान-प्रदान करने की जरूरत है। उनमें से कई यह कहते पाए जाते हैं कि मैं भारतीय हूं। इससे किसी को क्या इनकार हो सकता है। लेकिन जब एक बंगाली या एक मराठी एक भारतीय होने के साथ-साथ अपनी बंगाली या मराठी पहचान से इनकार नहीं करता तो मारवाड़ी क्यों इनकार करते हैं। इसका कारण है उनकी हीनता ग्रंथि। मारवाड़ियों की राजनीतिक सक्रियता इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, न कि अपने आपको मारवाड़ी कहने से सकुचाने वाले एक दो व्यक्तियों को संसद या विधानसभाओं में पहुंचाने की दिशा में।
यहां हम कुछ बिंदु दे रहे हैं जो इस मामले में आगे बढ़ने के लिए एक निर्देशक का काम कर सकते हैं। आगे चर्चा के माध्यम से ऐसे बिंदुओं की संख्या बढ़ाई जा सकती है।
1. मारवाड़ी संगठनों को अपने-अपने राज्य में गैर-चुनावी युवा-छात्र-सांस्कृतिक संगठनों के साथ प्रगाढ़ संबंध बनाने चाहिए। इसे एक लक्ष्य के रूप में लेना चाहिए। उनके नेताओं को सेमिनारों, अधिवेशनों, सभाओं में बुलाने को प्राथमिकता देनी चाहिए।
2. राजनीतिक रूप से जागरूक सदस्यों की पहचान कर उन्हें अलग से संगठित करना चाहिए। उनका मंच, फोरम जैसा कुछ बनाया जाना चाहिए।
3. देश भर के प्रभावशाली मारवाड़ी उद्यमियों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों का नेटवर्क बनाने की दिशा में काम होना चाहिए। इसकी शरुआत उन्हें मंच के अधिवेशनों, सभाओं में बुलाने से हो सकती है, लेकिन वही इसका अंत नहीं होना चाहिए।
4. व्यस्त उद्यमियों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों के साथ नेटवर्क बनाने के लिए संवाद के नए माध्यमों (ई-मेल, ब्लाग, वेबसाइट) का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल होना चाहिए।
5. मारवाड़ी संगठनों (सम्मेलन, युवा मंच) में रिटायरमेंट का नियम खत्म करना चाहिए। परिपक्व हो चुके नेतृत्व को समाज सेवा, स्वयंसेवा जैसे ग्रासरूट के कामों के भार से मुक्त कर अखिल भारतीय नतीजे देने वाले कामों में लगाना चाहिए।
6. ऐसे मारवाड़ी व्यक्तियों की शिनाख्त की जानी चाहिए जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में (उद्यम, साहित्य, मीडिया, शिक्षा आदि) महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। उन्हें मारवाड़ी संगठन अपने ब्रांड एंबेसेडर के रूप में इस्तेमाल करे। उन्हें अपने संगठन से जोड़े, आगे बढ़ाए, मुख्यमंत्रियों-जनप्रतिनिधियों के साथ उन्हें मिलाएं और मारवाड़ी के रूप में उन्हें प्रोजेक्ट करे।
विनोद रिंगानिया

परिवर्तन को रोकना असंभव

- प्रमोद्ध सराफ



परिचयः श्री प्रमोद्ध सराफ का जन्म 19 सितम्बर 1952, फतेहपुर (शेखावटी), पिता: श्री लक्ष्मी नारायण सराफ, पत्नी का नामः श्रीमती राजकुमारी सराफ, 1965 में छात्र नेता के बतौर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश। आपको अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच के संस्थापक राश्ट्रीय अध्यक्ष होने का गौरव प्राप्त है। मारवाड़ी दातत्व औषद्यालय गुवाहाटी के पूर्व मानद मंत्री एवम् कामरूप चैम्बर आफ कॉमर्स, आसाम, गुवाहाटी स्टॉक एक्सचैंज के आप पूर्व सभापति भी रह चुके हैं। आप सामाजिक विषयों के प्रतिष्ठित लेखक के रूप में जाने जाते हैं। आपके लेखों से युवावर्ग पर विषेश प्रभाव पड़ता है। कवि हृदय श्री प्रमोद्ध सराफ ने अनेकों कविताओं की रचना भी की है।
पताः सराफ बिल्डिंग, प्रथल तल, ए.टी.रोड, गुवाहाटी, असम, फोन: 0361-2541381।


परिचर्चा का विषय है: कल, आज और हम। यानी परिवर्तन का हमारे ऊपर प्रभाव। हम यानी हमारा देश, हमारा समाज, हमारा परिवार एवं हमारा व्यक्तित्व।
कल तक कोई न कोई राजनीतिज्ञ हमारे देश का प्रधानमंत्री होता था, परन्तु आज एक अर्थशास्त्री। केन्द्रीय मंत्रिमंडल में बुद्धिवादियों का प्रतिनिधित्त्व बढ़ रहा है परन्तु राज्य मंत्रीमंडल, इस संदर्भ में, अभी भी प्रतीक्षाकाल की स्थिति में है। विकास की राजनीति का प्रतिष्ठाकाल प्रारम्भ हो चुका है, अन्यथा शीला दीक्षित, शिवराज सिंह चौहान व डॉ. रमण सिंह विभिन्न राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि होते हुए भी आज एक साथ अपने-अपने राज्यों में सन्तासीन नहीं होते। यानी जनता ने राजनैतिक दलों की जगह विकास रथ के सारथियों का राजतिलक प्रारंभ कर दिया है। आपसी खीचतान व नकारात्मक प्रवृतियों की अग्नि में रोटी सेंकने की राजनीति नेस्तनाबूद हो रही है, अन्यथा राजस्थान में सत्ता परिवर्तन नहीं होता। केन्द्र व राज्यों में एकदलीय सरकारें इतिहास बन रही थी व बहुदलीय सरकारें एक यथार्थ। विकास की राजनीति व सर्वभागिता सिद्धान्त के बल पर पुनः एकदलीय सरकारें प्रान्तीय स्तर पर उभर रही हैं। राष्ट्रीय हितों व दलीय हितों के सामंजस्य के बल पर नए राजनैतिक समीकरण उभरने शुरू हो गए हैं, अन्यथा समाजवादी दल केन्द्रीय सरकार को अपना समर्थन दे, जीवनदान नहीं देता। निवर्तमान राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे.कलाम के कार्यकाल में उनके लेखों एवं संभाषणों की श्रृंखला का राष्ट्र के युवाओं एवं बुद्धिजीवियों पर व्यापक प्रभाव राष्ट्रपति पद की एक नई भूमिका चिन्हीत करता है। अनुकरणीय आदर्श व्यकिृत्त्व के अभाव में दिग्भ्रमित होती युवापीढ़ी को डॉ. कलाम ने वैचारिक चेतना प्रदान करते हुए दिग्दर्शक के रूप में ऐतिहासिक कार्य किया। यानी देश के राजनैतिक पटल पर शुभ संकेतों के दीयों का जगमगाहट।
कल तक पूंजीवाद समाजवाद एवं साम्यवाद बहस के विषय थे, परन्तु आज आतंकवाद का अर्न्तराष्ट्रीय स्वरूप। हर युवा एवं काल में आतंकवाद किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा है। कभी डाकुओं एवं लुटेरों का आतंकवाद वो कभी विभिन्न प्रकार के माफिया वर्ग का। कभी जमींदारों का तो कभी पूंजीवातियों का। कभी राजनेताओं का तो कभी श्रमिक नेताओं का। परन्तु वर्तमान का आतंकवाद भयानक महत्त्वकांक्षाओं का परिणाम है, असफल शासकों का उन्माद है एवं असहिष्णुताओं का वमन है। यह आतंकवाद घृणा की खाद एवं धार्मिक कट्टरता की सिंचाई के बल पर विकसित हो रहा है एवं फलफूल रहा है। आज आतंकवाद की अग्नि दावानल वन आहुतियां मांग रही है -उन प्राणियों की, जो साहसी हैं, कर्तव्यों के पुजारी हैं एवं राष्ट्रप्रेमी हैं। मुम्बई शहर में आतंकवाद के शिकार हुए समस्त अधिकारियों को शत् शत् प्रणाम। प्रभावित नागरिकों का स्मरण कर उनको अश्रु-श्रद्धांजलि। आज का अर्न्तराष्ट्रीय आतंकवाद गुरिल्ला युद्ध का रूप ले चुका है। इस आतंकवाद के खेतों एवं खलिहानों को तहस-नहस करने के सिवाए अन्य कोई विकल्प दिखाई नहीं देता एवं ऐसी सक्रियता में अगले विश्वयुद्ध का खतरा नजर आता है। अर्थात् इस आतंकवाद की समाप्ति हेतु अर्न्तराष्ट्रीय समुदाय तहेदिल से एक साथ नहीं है। यानी अर्न्तराष्ट्रीय पटल पर खतरे के लाल निशानों की मौजूदगी।
कल तक कोटा परमिटों का राज था, परन्तु आज भूमण्डलीकरण एवं उदारीकरण की नीतियां। महंगाई कल भी थी व आज भी है। सट्टाबाजारी का प्राबल्य स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् शनैः शनैः कम हुआ था। परन्तु उदारीकरण की नीतियों के अर्न्तगत, सट्टाबाजी ने वैधानिकता प्राप्त की है एवं साथ में संगठित स्वरूप भी। पिछले कुछ वर्षों में सट्टाजनित महंगाई के विभत्स रूप ने उपभोक्ताओं की योजनाओं को बारंबार विफल किया एवं लघु उद्योगों को अंततः बंदी के कगार पर पहुंचा दिया। उदारीकरण की नीतियों के परिणामस्वरूप रोजगार के अवसरों एवं पारिश्रमिकों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई परन्तु स्वरोजगार क्षेत्र विपरीत रूपेण प्रभावित हुआ। शापिंगमाल संस्कृति ने खुदरा व्यापारियों के समक्ष आस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। कल हरित क्रांति की चर्चाएं थी, आज सेंसेक्स एवं निफ्टी में उतार चढ़ाव की। वर्तमान में जनसाधारण की समाझ के बाहर है कि एक वर्ष में सेंसेक्स व निफ्टी में 60 प्रतिशत की गिरावट क्यों आई, जबकि देश के वित्तमंत्री प्रायः इस संदर्भ में सकारात्मक बयानबाजी, दूरदर्शन के चैनलों पर सतत् रूप से करते रहते थे एवं देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की मंदी से अप्रभावित बताते थे। सरकारी संरक्षणवाद कल तो था ही परन्तु आज उदारीकरण की नीतियों के युग में भी विद्यमान है। अमेरिका में उन दिवालिया फर्मों को सरकार बचाने में लगी है जिनके दिवालियापन का कारण प्रबंधन का लालच एवं गलत व्यापारिक नीतियां रही है। हमारे देश में पूंजीवादी बड़े प्रतिष्ठानों को ब्याज माफी का इतिहास समय समय पर बनता रहा है, परन्तु इस बार बड़े रूप में किसानों की कर्जमाफी ने संतुलन पैदा करने का प्रयास किया है। निष्कर्ष यही है कि सरकारी संरक्षणवाद कल भी था और आज भी है। स्वरूप में परिवर्तन अवश्य है। ग्रामीण एवं पहाड़ी क्षेत्रों के सही मायनों में विकास हेतु सरकारी नीतियों के सार्थक क्रियान्वयन हेतु सटीक माध्यम की प्राप्ति कल भी दूर थी और आज भी दूर ही है। यानी देश के आर्थिक मानचित्र पर शुभ-अशुभ दोनों संकेत मौजूद हैं। सट्टेबाजी का बढ़ता दायरा भयानक संकेत प्रतीत होता है, स्वरोजगार के अवसरों का कम होना भी भविष्य में खतरनाक सिद्ध हो सकता है। अविकसित क्षेत्रों के विकास की योजनाए सुकून प्रदान करती हैं।
परिवर्तन का प्रभाव हमारे मारवाड़ी समाज पर भी पूर्णरूपेण है। शिक्षा के प्रसार ने समाज बंधुओं की सोच में बड़ा परिवर्तन किया है। आज समाज का युवक स्नातक बनने के पश्चात् पुश्तैनी व्यापार की तरफ उन्मुख नहीं होना चाहता। बल्कि अपनी योग्यतानुसार किसी विषय में विशेष अध्ययन कर, योग्यता हासिल करना चाहता है एवं तदुपरान्त आय अर्जन हेतु क्षेत्र का चुनाव करता है। कल मारवाड़ी समाज में स्वरोजगार में संलग्न व्यक्तियों का सम्मान था। अतः नौकरी पेशा से परहेज किया जाता था। परन्तु आज समाज में नौकरी पेशा संलग्न व्यक्तियों की संख्या तीव्रगति से बढ़ रही है एवं इन्हें यथोचित सम्मान प्राप्त है। शिक्षा क्षेत्र में समाज की महिलायें सफलताओं के नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। रोजगार एवं स्वरोजगार क्षेत्रों में समाज की महिलायें बेहिचक आगे बढ़ रही हैं व उन्हें परिवार का समर्थन प्राप्त है। खुदरा व्यापार में लगे छोटे व्यापारियों पर अवश्य अस्तित्त्व का खतरा पैदा हुआ है। ऐसे समाजबंधुओं को नए सिरे से विचार कर व्यापार के स्वरूप में परिवर्तन लाना होगा।
समाज में संयुक्त परिवार प्रणाली शनैः शनैः लोप हो रही है। परिवारों में आपसी सौहाद्र्र भी घट रहा है। कारणों के विश्लेषण की आवश्यकता है। अर्न्तजातीय विवाहों का प्रचलन बढ़ रहा है। यह भी कहा जा सकता है कि प्रेम विवाहों का प्रचलन बढ़ रहा है। यह परिवर्तन का प्रभाव है। इसे रोकने की न तो आवश्यकता है एवं न ही इस परिवर्तन को रोकना संभव प्रतीत होता है। विवाहों व अन्य परिवारिक उत्सवों के अवसर पर प्रदर्शन एवं अनावश्यक या बूते के बाहर व्यय करना समाजबंधुओं का प्रभाव बनता जा रहा है, जो कि शुभ संकेत नहीं। समाजबंधु मारवाड़ी संस्कृति को इस संदर्भ में भूलते जा रहे हैं। उन्हें पुनः याद करना चाहिये किः


‘‘दो मिनट की रोभली, उम्र भर की शोभली।
दो मिनट की शोभली, उम्र भर की रोभली।’’


इस कहावत में मारवाड़ी समाज की उन्नति का मूलमंत्र दिया हुआ है। मोबाईल संस्कृति व इन्टरनेट की नई संस्कृति से मारवाड़ी समाज के युवा संभव लाभ लेने के बजाए हानि वाले पक्ष पर ज्यादा समय गंवा रहे हैं। समाज के युवाओं में स्वाध्याय प्रवृति का दिनोंदिन ह्रास हो रहा हैं। सामाजिक संगठनों का कर्तव्य है कि इस संदर्भ में चेतना अभियान चलायें। समाज का युवा सामाजिक संगठनों से भी दूर होता जा रहा है। इस संदर्भ में भी यथोचित कार्यक्रमों की अपेक्षा सामाजिक संगठनों से हैं।
मारवाड़ी संस्कृति एवं सभ्यता के विभिन्न पहलुओं की जानकारी समाज के युवाओं को नहीं है। सामाजिक रीति रिवाजों का निर्वाह भले ही समाज का युवा करता हो, परन्तु उद्देश्यों की जानकारी उसे नहीं है। मारवाड़ी संस्कृति के संरक्षण एवं समयानुकूल उचित परिवर्तनों के साथ उसके प्रचार प्रसार की आवश्यकता कल भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी।[end]

वृद्धाश्रम धड़ल्ले से खुलते जा रहे हैं

मौजी रामजी जैन


परिचयः श्री मौजी रामजी जैन, पश्चिम उड़ीसा के सफलतम व्यवसायियों में आपकी गणना की जाती है। युवावस्था से सार्वजनीन गतिविधि में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते रहे हैं। उनदिनों वह अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए थे। सन् 1960 से 1970 के अंदर 2 बार कांटाबांजी नगर पालिका के चेयरमैन चुने गये। 1972 में पार्षद निर्वाचित हुए, किन्तु राजनीति में अर्थ की भूमिका देख चेयरमैन पद को अस्वीकार कर दिया। राजनीति में मूल्यबोध व नैतिकता के प्रति सदैव सजग रहे। इसके बाद समाज सेवा की ओर रूख किया। स्थानीय अग्रवाल सभा, गोशाला तथा जैन श्वे.ते. सभा के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। उड़ीसा प्रान्तीय मारवाड़ी सम्मेलन के अध्यक्ष, उड़ीसा प्रान्तीय जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के दो कार्यकाल के लिए अध्यक्ष तथा अखिल भारतीय मारवाड़ी सम्मेलन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर रहते हुए आपने समाज व धर्मसंघ की अहम् सेवा की है। अंचल के अनेक द्विपाक्षिक व सामाजिक समस्याओं को आपने न्यायालय से बाहर सुलझाकर परिवारों को व आपसी सम्बन्धों को टूटने से बचाया है। जैन जैनेतर सभी वर्ग का विश्वास आपको प्राप्त है। आप समयज्ञ है एवं जरूरत पड़ने पर सही सलाह देते हैं। कभी कभी सलाह कड़वा हो जाता है। लेकिन परिणाम सदैव हितकर रहे हैं। विगत वर्षों में धर्मपत्नी का वियोग एवं एकमात्र होनहार युवा पुत्र के अकाल निधन ने भी इनकी सामाजिक व संधीय सेवा भावना को बाधित नहीं किया। विगत दिनों आपके हृदय का सफल अस्त्रोपचार हुआ है। जीवन के आठवें दशक को छूने जा रहे इस व्यक्तित्व में जीवट की कोई कमी नहीं है। संयमित जीवन शैली, सादा खान पान एवं जिह्वा संयम आपकी विशेषता रही है। स्वाध्यायशील हैं तथा लेखन व पठन में विशेष रूचि रखते हैं। संर्पकः - पूर्व उपाध्यक्ष, अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन, कांटाबांजी, जिला - बलांगीर (उड़ीसा)


आज समग्र विश्व को विभिन्न समस्याओं ने जकड़ रखा है। एकतरफ क्रूर आतंकवाद द्वारा मानवता का अस्तित्व ही खतरे में है। दूसरी तरफ जाति, धर्म, भाषा एवं क्षेत्रियता के नाम पर हम भारतीय परस्पर लड़-झगड़ रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या वैश्विक आर्थिक संकट के रूप में उपस्थित है। महाशक्तिशाली अमेरिका भी आज बेबस दिखाई दे रहा है। सुदृढ़ जमीन के अभाव ने उनके चमक दमक वाले आवरण को हटाकर के वास्तविक रूप को उजागर कर दिया है। स्टाक मार्केट के धराशायी होने से सभी निवेशक सड़क पर आग गए हैं। कुछ प्रतिष्ठत बैंकों का दिवाला निकल चुका है।
ऐसे में दूसरी सभ्यता और संस्कृति जहां सौ, दो सौ वर्षों में धराशायी हो जाते है, वहीं जगदगुरू भारतीय संस्कृति विगत पांच हजार सालों से अनेक उत्थान, पतन देख कर भी जीवित है, यह हमारे लिए पर आश्वस्तिकारक है। इस संस्कृति को देश विदेश में रह रहे मारवाड़ियों ने सदैव संजीवनी प्रदान की है। अपने पारम्परिक व्यवसाय में संलग्न यह समाज जहाँ कहीं भी रहते हैं, उस मिट्टी की महक बन जाते हैं। देशहित उनका लक्ष्य होता है। आज इसके युवा वर्ग शिक्षा और सेवा के हर क्षेत्र में अग्रणी है। जनसाधारण की आवश्यकता और उपयोगिता को ध्यान में रखकर कुआँ, बावड़ी, मंदिर, धर्मशाला, विद्यालय और चिकित्सालय आदि का निर्माण करते हैं। प्रशासन के लिए न कभी बोझ बनें, न परेशानी का कारण। तभी तो भारतीय प्रोद्योगिकी प्रतिष्ठान, खड़गपुर के निदेशक डॉ. दामोदर आचार्य ने बड़े प्रमोद भाव के साथ कहा था कि देश के प्रोद्योगिकी और प्रबंधन संस्थानों को सुपर मारवाड़ी सृष्टि करने का लक्ष्य बनाना होगा। क्योंकि यह लोग जहां रहते हैं वहां के विकास में मुख्य भूमिका निभाते हैं। अर्थार्जन के साथ साथ निरंतर सेवा और सहयोग की भावना रहने से स्थानीय लोगों का विश्वास और सम्मान भी जीतते हैं।
किन्तु केवल उजले पक्ष देखने से एवं कृष्ण पक्ष की उपेक्षा करने से व्यक्ति और समाज का अहित ही होता है। आडम्बर, प्रदर्शन और अनावश्यक खर्च करने की प्रवृत्ति ने अन्य समाज में ईर्ष्या जागृत करने में कोई कसर नहीं रखी है। समय तीव्र गति से परिवर्तित हो रहा है। उसके अनुकूल स्वयं को नहीं ढाल पाने से हम पिछड़ जायेंगे। धनशाली लोगों के इस दिखावे का समाज के साधारण सदस्यों पर भी नकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाई दे रही हैं। अभाव से मारवाड़ी समाज का उतना नुकसान नहीं हुआ जितना अति भाव अर्थात अर्थ के दुरूपयोग से हो रहा है।
आज संयुक्त परिवार प्रथा भी अंतिम सांस ले रहा है। मैं, मेरी और मेरे के मध्य दादा, दादी, माँ, बाप कहीं दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। जबकी बुजुर्ग समाज के चक्षु सदृश होते हैं जो अपने लम्बे अनुभव से समाज को दिशा दर्शन देते हैं एवं युवा वर्ग समाज के पांव होते हैं। बड़ों के दिखाये रास्ते पर चलने का दायित्व इनका है। अतः बुजुर्गों के बिना समाज अंधा एवं युवाओं के बिना पंगु हो जाता है। स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु दोनों में समन्वय जरूरी है।
अन्य वर्गों में वृद्धाश्रम धड़ल्ले से खुलते जा रहे हैं। हमारा समाज इससे लगभग बचा हुआ है, यह संतोष का विषय है। वृद्धाश्रम समाज के माथे पर कलंक है। आज समाज में भ्रूण हत्या, विशेष कर भ्रूण हत्या ने तथा पतिपत्नी के बीच सम्बंध विच्छेद की घटनाओं ने मारवाड़ी समाज के ताने बाने को नष्ट कर दिया है। ऐसे में सबको जागरूक रहना होगा। समाज के नेतृत्व को अपने कर्मों के द्वारा आदर्श उपस्थापित करना होगा। तभी अपेक्षित लाभ मिलेगा। संसार आज संक्रमण काल से गुजर रहा है। आतंकवाद और आर्थिक संकट का सामना करना हमारी मजबूरी है। उसे हम कर भी लेंगे। पर सामाजिक विसंगतियों को हमें फलने फूलने नहीं देना है। तभी महान संत आचार्य श्री तुलसी का स्वप्न सार्थक होगा। "सुधरे व्यक्ति, समाज व्यक्ति से राष्ट्र स्वयं सुधरेगा।"

शिक्षा के क्षेत्र में मारवाड़ी समाज

- गोविन्द प्रसाद डालमिया, भूतपूर्व अध्यक्ष
झारखण्ड प्रान्तीय मारवाड़ी सम्मेलन

मारवाड़ी समाज समय के अनुसार अपने को ढालने की क्षमता दिखाता रहा है। उसने वकील,डॉक्टर, इंजीनियर एवं चाटर्ड एकाउन्टेंट बड़ी संख्या में दिए हैं। आई.ए.एस. अर्थशास्त्री आदि भी समाज के बहुत से लोग हैं। अब प्राइवेट संस्थाओं में एडमिनिस्ट्रेटर भी मारवाड़ी समाज के काफी व्यक्ति हैं। पर अभी भी मारवाड़ी समाज में लड़के-लड़कियों को शिक्षा दिलाने में समाज के द्वारा सहायता की आवश्यकता है।
जिस प्रकार मारवाड़ी समाज के लोग खाली हाथ बाहर गये एवं सब जगह अपना सिक्का जमाया, उसी प्रकार समाज के लड़के लड़कियां खाली हाथ, सिर्फ एक सर्टिफिकेट लेकर विदेश जा रहे हैं। आज मारवाड़ी समाज में शायद ही कोई परिवार होगा, जिसका कोई सम्बन्धी विदेश में नहीं हो। जो डॉक्टर, इंजीनियर आदि बन कर या पढ़ाई करने विदेश गए, उन्होंने काफी सम्पन्नता हासिल की। इसीलिए आज काफी संख्या में समाज के लड़के- लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त करने कोे विदेश भी जा रहे हैं उनमें से अधिकांश वहीं पर बस भी जा रहे हैं। इसे मैं शुभ लक्षण मानता हूँ। पर समाज के गरीब तबके के परिवारों के लड़के लड़कियों को शिक्षा दिलाने, खासकर उच्च शिक्षा दिलाने के लिए, आर्थिक मदद की आवश्यकता है। शिक्षा समिति यह काम कर रही है। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा समितियों को मजबूत किया जाय। शिक्षा समिति विद्यार्थी को जो आर्थिक सहायता देती है वह बहुत ही कम है। इसे मंहगी को ध्यान में रखते हुए बढ़ाया जाना चाहिए। अपने समाज के किसी भी लड़के लड़की को पढ़ाई में गरीबी के कारण रूकावट नहीं आनी चाहिये। साथ ही वह शिक्षित हो जाय, तो शिक्षा उसे गरीबी से छुटकारा अवश्य दिला दे।
यह भी आवश्यक है कि शहरों में मारवाड़ी लड़के लड़कियों के लिए विशेषकर लड़कियों के लिए छात्रावास बनाये जाएं। लड़के तो किसी सम्बन्धी के यहां, लॉज में या चार-पांच लड़के एक कमरा भाड़े पर लेकर भी गुजारा कर लेते हैं। पर लड़कियों को, परिवार वाले दूर शहर में अकेले रखना असुरक्षित समझते हैं। नतीजा यह होता है कि गांवों की प्रतिभावन लड़कियों की भी पढ़ाई छूट जाती है। छात्रावास भाड़े के मकान में भी शुरू किए जा सकते हैं। 80 प्रतिशत उपलब्ध स्थान में लड़कियां रहेंगी, इस हिसाब से खर्च जोड़कर छात्रावास शुल्क का निर्धारण किया जा सकता है। इससे हर महीने घाटा नहीं होगा। पर इसके लिए समाज और इन शहरों के लोगों को आगे आना होगा।
कैट के लिए एवं अन्य उच्च श्रेणी के प्रतिष्ठित कॉलेजों में भर्ती के लिए कोचिंग की आवश्यकता होती है। उसमें करीब 80 हजार रुपये प्रति विद्यार्थी खर्च हो जाता है। इस कोचिंग के लिए न तो बैंक से कर्ज मिल पाता है और न शिक्षा समिति से आर्थिक सहायता मिल पाता है। आजकल बैंकों से विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए कर्ज मिल जाता है। पर कर्ज मिलने में कुछ समय लगता है और कर्ज मिलने तक विद्यार्थियों को आर्थिक कष्ट होता है।
‘‘अन्य पिछड़ी जाति’’ का सर्टिफिकेट रहने से बच्चों के स्कूल एवं कॉलेज में नामांकन में एवं बाद मे नौकरी मिलने में सुविधा होती है। मारवाड़ी समाज के कुछ वर्ग जैसे नाई आदि को पिछड़ा वर्ग का प्रमाण पत्र पाने का हक हैं। पर उनके लिए भी कम से कम झारखण्ड में, या सर्टिफिकेट पाना बहुत मुश्किल एवं खर्चीला है। मुख्य दिक्कत वैश्य लड़के लड़कियांे को आती है। झारखण्ड में गैर मारवाड़ी वैश्य लड़के लड़कियों को, अग्रहरि, वर्णवाल आदि को पिछड़ी जाति का प्रमाण पत्र पाने का कानूनी हक है। पर अग्रवाल माहेश्वरी ओसवाल जैन आदि विद्यार्थी पिछड़े वर्ग का प्रमाण पत्र पाने के लिए पात्र नहीं समझे जाते हैं। यह कानून गलत है और इस कानून में सुधार होना चाहिए। मारवाड़ी सम्मेलन को इस कानून को सुधारे जाने में सक्रिय भाग लेना चाहिए।

आत्मलोचन करने का समय

सत्यनारायण बीजावत


परिचयः सत्यनारायण बीजावत, पता-256/40, कड़क्का चौक, अजमेर (राजस्थान), शिक्षा-बी.ए., एल.एल.बी., जन्म-3 नवम्बर 1932, जन्म स्थान-अजमेर (राजस्थान) पं0 रेलवे से सेवा निवृत्त सैक्शन इंजीनियर राजस्थानी व हिन्दी भाषा में साहित्य सृजन 1983 में राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत आकाशवाणी के जयपुर केन्द्र से समय समय पर राजस्थानी काव्य पाठ, प्रकाशन-आँधी के दीप (उपन्यास), लम्हा लम्हा जिन्दगी (गजल संग्रह), अन्तभारती साहित्य एवं काव्य परिषद तथा स्वयं सिद्ध संस्था से सम्बद्ध।


मारवाड़ी समाज के लिए यह आत्मलोचन करने का समय है कि कल हम कहाँ थे और आज कहाँ हैं, कोई भी समाज एक दिन में आकाश नहीं छू सकता, उन्नति और प्रगति कड़ी मेहनत स्पष्ट लक्ष्य और निरन्तर अभ्यास व अथक प्रयास से ही संभव है, अधिक पीछे दृष्टि दौड़ाने की आवश्यकता नहीं यदि स्वतंत्रता पूर्वकालिक दशा पर ही दृष्टिपात करें तो पता चल जाएगा कि हमारा समाज एक पिछड़ा हुआ अशिक्षित एवं रूढ़ियों में जकड़ा हुआ समाज था जिसके अधिकांश लोग निर्धन और अधिक हुआ तो श्रेणी प्राप्त लोग थे। जो कठिन परिश्रम और ईमानदारी से पहचाने जाते थे।
मारवाड़ी समाज के लोग कभी भी अपराधी प्रवृत्ति के नहीं रहे इसी लिए मारवाड़ी समाज के व्यक्ति सुख शांति से जीवन व्यतीत करते हुए निरन्तर उन्नति के लक्ष्य की ओर अग्रसर होते रहे हम यह तो नहीं कह सकते कि अन्य समाजों की तरह मारवाड़ी समाज ने उन्नति का लक्ष्य प्राप्त कर लिया लेकिन इतना अवश्य कह सकते हैं कि हमने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाते हुए शिक्षा और व्यापार में संतोष प्रद उन्नति अवश्य की हैं। अतः अन्य समाज के लोग मारवाड़ी समाज का उदाहरण देते हुए यह कह बैठते हैं कि इस पृथ्वी पर कोई भी ऐसा कोना नहीं है जहाँ मारवाड़ी नहीं पहुँचा हो।
यदि वास्तव में देखा जाए तो व्यापार किसी समाज विशेष की थाती नहीं है इसके लिए सम्पूर्ण जनता ही स्वतंत्र है जो चाहे जैसा, जहाँ और चाहे जब अपना व्यापार कर सकता है। ऐसा हमारे देश का संविधान कहता है लेकिन यह अनुभव किया जा सकता है कि वही व्यक्ति इस प्रतिद्वन्द्विता के युग में सफल होकर टिक सकता है। जो कठिन परिश्रम के साथ ईमानदारी से अपना कार्य सम्पन्न करें। ईमानदारी के अभाव में अल्प कालिक सफलता ही प्राप्त हो सकती है। इसी लिए बड़े बड़े उद्योग घराने मारवाड़ी समाज के व्यक्तियों के पास हैं जिन्हें विश्व जगत में उच्च स्थान प्राप्त हैं। चाहे बिड़ला घराना हो या फिर लक्ष्मी मित्तल अथवा बांगड़ परिवार जो सर्वजन हिताय सर्व जन सुखाय के लिए जन कल्याणार्थ रोजगार से लेकर चिकित्सा सहायतार्थ चिकित्सालय तथा शिक्षा के क्षेत्र में समान सेवा के रूप में विद्यालय व महाविद्यालय खोलकर समाज को आगे बढ़ाने का कार्य किया है।
अतः आज हम यानि मारवाड़ी समाज के लोग गर्व से यह कह सकते है कि हम कल जिस अशिक्षा के अंधकार में थे उससे बाहर निकल चुके हैं आज हमारे समाज के युवक ही नहीं बल्कि युवतियाँ भी शिक्षा के प्रकाश में खुल कर साँस ले रही हैं। शिक्षित समाज ही व्याप्त रूढ़ियों की जंजीरों से मुक्त हो सकते हैं एक वह भी समय था जब पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा, नारी अशिक्षा, मृत्यु भोज प्रथा, जुआ प्रथा इत्यादि बुराईयाँ समाज में व्याप्त थी। परन्तु समय समय पर सामाजिक संस्थाओं द्वारा एक एक कर उपरोक्त बुराईयों को दूर करने के प्रयास और उपाय किए जाते रहे हैं। जिनका सफल आज हमारे सामने ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानव सामाजिक समक्ष दृष्टव्य है। पर्दा प्रथा जो हमारे समाज में हवा पानी की तरह व्याप्त थी वह आज नहीं के बराबर है। इसी तरह दहेज प्रथा से भी मारवाड़ी समाज अभिशप्त था और हम आज भी छाती ठोक कर नहीं कह सकते कि इस बुराई से समाज मुक्त हो गया है लेकिन फिर भी इस बुराई से हमारा समाज डट कर मुकाबला कर रहा है। पढ़ी लिखी युवा पीढ़ी खुल कर इसके विरोध में खड़ी हो गई है और जगह जगह इस बुराई पर नियन्त्रण प्राप्त किया जा रहा है इस आशा के साथ कि शीघ्र ही समाज इस बुराई से मुक्त हो सकेगा। यह नारी शिक्षा का ही प्रभाव है कि दहेज लोभियों को सामने लाकर समाज में ऐसे दूल्हों की बरातें लौटाने के अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करने का नारी में साहस भर दिया। इसी प्रकार श्क्षिित युवकों ने मृत्यु भोज तथा जुआ आदि का विरोध कर समाज को अनचाहे कर्ज से बचाने का सत्कार्य किया है साथ ही हमारी सामाजिक संस्थाओं का भी इस जनजागरण के कार्य में प्रशंसनीय योगदान है। समाज विकास गत स्पष्ट वर्षोंं से मारवाड़ी समाज के मुखपत्र की भूमिका निभा रहा है साथ ही जन जागरण का शंख फूंक रहा है। देश विदेश में मारवाड़ी समाज को एक सूत्र में बांध कर समाज की वास्तविक दशा से सभी को अवगत करा रहा है। हम कल क्या थे, आज क्या है और कल कहाँ होंगे।

21वीं शताब्दी का विशलेषण कठिन

- नन्दकिशोर जालान


80 वर्ष पहले और आज के सोच में काफी परिवर्तन आया है। एक समय था जब स्वतंत्रता के प्रति हमारी आस्थाहीन होती जा रही थी, लेकिन गांधी युग ने पुनः जागृत कर दी। इसी प्रकार हर क्षेत्र में आस्था और लगन की जरूरत है। सामाजिक संस्थाओं को सच्चे रूप से निरूपण करने में सभी की पढ़ाई-लिखाई में इसकी भूमिका मुख्य है। इसके अभाव में मनुष्य अपंग है।
किसी संस्था की उन्नति के साथ उसके कुछ पदाधिकारी अपने को काफी गौरवान्वित मानने लगते हैं। कुछ ऐसे कार्यकर्ता हैं जिनको अपने काम धन्धे से फुरसत नहीं, सामाजिक कार्य क्षेत्र में क्या सहयोग करेंगे। कुछ कार्यकर्ता ऐसे होते हैं जो सामाजिक कार्य करने वाले लोगों के दोषों को उजागर करने में अपना नाम व यश समझते हैं। कुछ ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो पद को छोड़ना नहीं चाहते जिससे संस्था का कुछ हित नहीं होता।
आज के समय में सामाजिक कार्यकर्ता का अभाव नहीं है। सभी व्यक्ति किसी न किसी रूप में समाज के कार्य से जुड़े रहते हैं। आज के युवक युवतियाँ भी इस क्षेत्र में काफी कार्यशील हैं। युवा शक्ति काफी विलक्षण होती है। उसके सामने शैक्षणिक विधा के नये-नये तरीके पेश किये जा सके और उसके अन्दर अभिलाषा जगायी जा सके तो निश्चित रूप से युवा शक्ति देश और समाज को ऊँचे से उचे स्थान पर पहुंचा सकती है।
मनुष्य की उपलब्धि चाहे जिस क्षेत्र में हो यानी बुद्धि, विवेक, जन सेवा और निजी कार्यक्षेत्र वे सभी विधाएं वहीं तक वरणीय है जहाँ तक वे कार्यशील हैं।
पुरानी सभी चीजें या बातें हमारे लिए स्मरण दिलाती रहती हैं। हमारी संस्कृति व सभ्यता सभी हमारे जीवन की थाती हैं। ये सभी कल की बातें हैं। सामाजिक
सुधारों, राजनैतिक या सांस्कृतिक विकल्पों, का आदान-प्रदान मुख्य है। राजनैतिक दृष्टि से पृथकवाद का विकल्प ढूँढना एवं समाज के युवावृन्द में स्वस्थ राजनीति की कर्मभूमि में पूरी तरह से अकथ लालसा की सृष्टि करना आज के बिन्दु के आगे वरणीय हो सकती है। राजनैतिक दृष्टि से देश अपना एक विशिष्ट स्थान प्राप्त कर ले। तेजी से हो रहे परिवर्तनों के समुचित व गहन चिन्तन के अनुरूप समाज में बदलाव की स्वीकृति व गति हर संस्था के
अधिवेशनों की आज की महती आवश्यकता है।
राजनैतिक विकल्पों की हम बात करें तो आज के बिन्दु के ठहराव के आगे की ही बातें युवकों की बातें हो सकती है। अध्यापन के क्षेत्र में बढ़ते कदम इस कम्प्यूटर तथा इनफॉरमेशन टेकनोलोजी युग की बदलती स्थिति में विश्व के एक काने से दूसरे कोने तक संसर्ग, आर्थिक क्षेत्रों में उत्पादन एवं कार्य प्रणाली में हो रहे बदलाव आदि ऐसे बिन्दु हैं जिसके आज के ठहराव के आगे विस्तार ही विस्तार फैला हुआ है। अतीत और गौरव अपनी जगह है। उनकी ओर तेजी से कदम बढ़ाना अति आवश्यक है।
सामाजिक सुधारों के अन्तर्गत विधवा व परित्यकता के पुनर्विवाह के लिए मानस तैयार करना, विवाह शादियों में फिजुल खर्चा कम करना, बधु दहन जैसे कुकृत्य को दूर करना।
स्वधर्म शब्द पूर्व पद प्रधान है। सम्मेलन का अपना स्वधर्म है जो मारवाड़ी समाज द्वारा संचालित है। इसका स्वधर्म इसके उत्पत्ति काल से रहा है। इसका स्वधर्म सामाजिक सुधार वाणिज्य और उद्योग कहे गये हैं। इसका इतिहास साक्षी है कि इसने सदा से एकता की साधना अनेकता के माध्यम से की है। जीवन के हर क्षेत्र का अभिनन्दन किया है। इसी के आधार पर कहीं भी अपना स्थान कायम कर रखा है। स्वधर्म और भावात्मक एकता में आज एक अद्भुत तादात्म्य आ गया है। इसी के
आधार पर अगम्यता तक पहुंच पाने में समर्थ हुए हैं। इससे सम्मेलन को काफी बड़ी सफलता मिली है।
समाज के चिन्तक, क्रियाशील समाजसेवी द्वारा समाज व्यवस्था में समयानुकूल परिवर्तन करने के लिए विचार विमर्श होते रहना आवश्यक है। आज दुनिया का हर देश जितना वैज्ञानिक क्षेत्र में विकास कर सके, होड़ के साथ लगा है। इस आधार पर एक दूसरे से बैर स्वाभाविक है। इसी के आधार पर समाज में नाना प्रकार की विकृतियाँ भी पनपी और इसके साथ साथ इसके निराकरण के लिए समाज में महापुरुषों का आविर्भाव हुआ। इसी के साथ सुख, साधन, समानता व सम्पन्नता के चक्र को आगे बढ़ाया गया।
नास्त्रेदमस ने कहा था कि ‘‘सुखी और सम्पन्न समाज या समाज व्यवस्था बढ़ी है जिसमें आदमी दूसरे आदमी को स्नेह, सौजन्य सौहाद्र देता है। अन्यथा वह व्यवस्था दूषित होने लगती है। इस प्रकार मनुष्य का विशिष्ट व्यक्तित्व उभर कर सामाजिक व्यवस्था के परिवर्तन का क्रम चालू रखता है।’’
खलील जिब्रान ने कहा है ‘‘मैं आग हूँ। मेरी आग मेरे कूड़े करकट को जलाकर भस्म कर दे तो मैं अच्छा जीवन बिताऊ, यदि समाज में बिखरे कूड़े करकट में आग लगाकर उसे भस्म करने की शक्ति उभरे तो निश्चित रूप से वह अपने समाज के लिए और अधिक अच्छा जीवन का रास्ता प्रशस्त कर सकती है।’’
भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ स्त्री को आराध्य देवी के पद पर आसीन किया गया है। विभिन्न रूपों में उसकी पूजा अर्चना और मनन किया जाता है। उसके वरदान से मनुष्य पृथ्वी पर सुखी रहते हैं। सन्देह नहीं की हमारे समाज की नारियां आज हर क्षेत्र में ऊचाईयां माप रही हैं लेकिन बहुसंख्यक समाज अब भी प्रायः हर क्षेत्र में पिछड़ा है।
आवश्यकता है हमारी अस्मिता अक्षुण रहे हम इक्कीसवीं सदी के नागरिक है। आज के छात्र छात्राएं थोड़े अन्तराल के बाद पेश व समाज की युवा पीढ़ी में प्रवेश कर जायेंगे। युवा पीढ़ी हमारे समाज व देश की आधार शिला होती है। इन्हीं के कंधों पर देश की बागडोर रहती है। आज परिवेश तेजी से बदल रहा है। दुनिया सिमट कर छोटी हो गई है। आज हर जगह दूसरी जगह कुछ समय में जा आ सकते हैं।
अर्थ व्यवस्था में भी काफी परिवर्तन हो रहे हैं। संवेदनशीलता समाज का आभूषण है जिस पर हम सभी गर्व कर सकते हैं। आने वाले युवा युवतियों का विस्तृत दृष्टिकोण होना चाहिए जो अपनी संस्कृति की ज्ञान विज्ञान, शौर्य त्याग व सर्वोत्तम सामाजिक व्यवस्था के आधार पर फलती करने का मानस आज से ही तैयार करे और हमारी अस्मिता को कहीं आँच न आनें दें।
देश की स्वतंत्रता में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, लाला लाजपत राय ने कितनी लड़ाई लड़ी। उस समय के सामाजिक स्त्री पुरुषों का कितना सहयोग था। आने वाले समय में दुनिया के सिरमौर देशों में इसकी गिनती होनी आवश्यक है।
परिवर्तन की चलती चक्की के कारण आने वाले कल का चिन्तन नितान्त आवश्यक है पुरानी यादें पुरानी बातें अपनी संस्कृति और सभ्यता की एक महत्वपूर्ण थाती रही है। युवा दृष्टि और युवा शक्ति बड़ी विलक्षण होती है जो बौद्धिक वैज्ञानिक उन्नति में कुछ कर गुजरने की क्षमता रखती है। उसे मात्र दिग्दर्शन की जरूरत है। आज आर्थिक प्रभुता सर्वाधिक महत्व रखती है लेकिन सभी उसके शिखर पर नहीं चढ़ सकते हैं। देश का हर कोना अन्वेषण के पथ को सबल करने का आह्वान कर रहा है।
20वीं सदी के इतिहास का गांधीजी का स्वर्णिम युग इन अगणित क्रिया कलापों से भरा पड़ा है। उसने सारी कुरीतियों को समाज से बाहर फेकने के भरसक प्रयत्न किये और सफलता भी मिली।
विगत यानी 20वीं शताब्दी गांधी युग से प्रभावित रही है। 21वीं शताब्दीं किस युग की उत्पत्ति करती है आज इसका विशलेषण कठिन है, लेकिन कई विशिष्ट भविष्य वाणियाँ अपना रूपक दिखा जाती है। उदाहरणतः नास्त्रेदमस की नैपोलियन के उत्थान और पतन और उसी प्रकार हिटलर के उत्थान और पतन सम्बधी भविष्यवाणी अक्षरसः सत्य निकली। इनकी एक और भविष्यवाणी संसार के पश्चिमी भाग की प्रभुता शेष होकर संसार के पूर्वी भाग की प्रभुता हर क्षेत्र को अपने प्रभाव से आच्छादित करेगी। शायद आने वाले युग की सच्चाई की ओर इशारा कर रही है। ऐसी स्थिति में आने वाले वर्षों में भारत का प्रभाव काफी मात्रा में उभरेगा इसमें सन्देह नहीं दिखता। चूँकि आज देश हर विधा के अन्तराल से जुड़ा हुआ है इसलिए आने वाला समय समाज के लिए अत्यन्त संवेदनशील और महत्वपूर्ण होगा तथा समाज की युवा पीढ़ी का दायित्व सर्वाधिक बढ़ेगा। इस भविष्य के लिए सभी क्षेत्रों में समाज का अवदान बढ़े, सम्मेलन को इस ओर समाज का आह्वान करते रहना होगा।

वर्तमान प्रतिभाओं को ठीक ढंग से देखें

- स्व.भँवरमल सिंघी



अगर हम अपनी वर्तमान प्रतिभा को ठीक ढंग से देखें और समझें तो निश्चय ही हम शक्ति का अनुभव करेंगे। बहुत सारी गलतफहमियां हमारे समाज के बारे में दूर हो चुकी है और जो आज भी प्रचलित हैं, वे भी हमारी नहीं प्रतिमा को दिखाने समझाने से दूर हो जायंेगी। व्यवसायेत्तर क्षेत्रों में भी, जैसे शिक्षण-प्रशिक्षण, चिन्तन लेखन, कला और खेल कूद सरकारी नौकरियों और प्रतिरक्षा आदि के क्षेत्रों में अपने अवदान की विशेषता को हम लोगों के सामने रखें और पहुंचायें। हमारी सम्मान भावना केवल धन के प्रति ही न रहें, बल्कि अन्याय शक्तियों के विकास और संवर्धन के प्रति भी रहे। हम निरन्तर संगोष्ठियों का आयोजन कर रहे हैं जिनमें पारम्परिक विचार- विनिमय के द्वारा नये विचारों की जागृति हो, हमारी शक्ति का हमें सच्चा अहसास हो। इन संगोष्ठियों में हमने यह अनुभव किया है कि समाज में आज न विचार की कमी है और न शक्ति की। अगर कमी है तो इन दोनों के योग के कर्मशील बनने की।
इसी सन्दर्भ में हमारे सामने समस्या आती है कार्यकर्ताओं के निर्माण और प्रोत्साहन की। आज चाहे राजनीति के क्षेत्र में हो, चाहे सामाजिक क्षेत्र में कार्यकर्ताओं का अभाव दिखता है। जिस समाज के पास सार्वजनिक सेवा करने वाले कार्यकर्ता नहीं होते, वह उतना अग्रसर नहीं होता, जितना हो सकता है। सम्मेलन न केवल कार्यकर्ताओं का सम्मान करता है और उनको प्रोत्साहित करता है, बल्कि उनके शिक्षण प्रशिक्षण के लिये प्रयत्नशील रहता है। आज इस बात की बड़ी आवश्यकता है कि पुराने कार्यकर्ता नये कार्यकर्ताओं का निर्माण करें और उनको समाज में अग्रसर करें। आज कार्यकर्ताओं में जो नवचिन्तन होना चाहिये और सार्वजनिक कार्यों के तौर तरीकों का जो ज्ञान होना चाहिये, विश्लेषण करने की शक्ति होनी चाहिये, उसके लिये प्रेरणा और प्रोत्साहन की आवश्यकता है। जो समाज अपने कार्य कर्ताओं का आदर करना नहीं जानता, उसको प्रोत्साहित नहीं करता, सहायता और सहयोग नहीं देता, वह आज नहीं तो कल और कल नहीं तो परसों अपने को बहुत ही चिन्तनीय स्थिति में पायेगा।

हमारी सभ्यता पर प्रश्न चिन्ह

शम्भु चौधरी


परिचय: शम्भु चौधरी जन्म कटिहार (बिहार) 4 मार्च 1956, आपकी एक पुस्तक ‘‘मारवाड़ी देस का न परदेस का’’ प्रकाशित, कई सामाजिक आन्दोलनों को नेतृत्व प्रदान। मूल निवासी: फतेहपुर ‘शेखावाटी’। पिताः स्व.काशी प्रसाद चौधरी, पत्नी श्रीमती इन्दिरा चौधरी। सम्प्रतिः समाज विकास के सहयोगी सम्पादक। पताः एफ.डी.-453,साल्टलेक सिटी, सेक्टर-3 कोलकाता - 700106 फोनः 09831082737
हम प्रायः समाज सुधार की बातें आपस में करते रहते हैं। समाज का यह दावा भी रहा है कि समाज में विधवा विवाह को मान्यता देकर समाज की बहुत बड़ी समस्या का समाधान कर दिया। यह बात सही है कि जब हम किसी एक समस्या का समाधान खोज लेते हैं तो साथ ही हमारे सामने दो नई समस्यायें खड़ी हो जाती है।
एक समय पर्दा प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह जैसी कुरीतियों पर प्रहार चलाया, तो हमारे सामने दहेज नामक बीमारी सामने आकर खड़ी हो गयी। कई परिवारों में दहेज के चलते हो रही हत्या को कानून व समाज के सहयोग से हम आज भी सफलता नहीं प्राप्त कर सकें। इसका और विकृत रूप हमारे सामने आकर खड़ा हो गया। दहेज रूपी सुरक्षा कानून का गलत प्रयोग धड़ल्ले से होने लगा। समाज सेवी संस्थाओं के कई पदाधिकारियों को इसके गलत प्रयोग में लिप्त पाया गया। धीरे-धीरे कानून ने जब यह बात खुले तौर पर स्वीकार कर ली। की इस कानून का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है तो कुछ राहत मिली, नहीं तो समाज बुरी तरह से पीस सा गया था।
यह समस्या अभी समाप्त ही नहीं हो पाई थी कि तो हमारे सामने तलाक, बिखरते व टूटते परिवार की समस्या के साथ ही भ्रूण हत्या की समस्या ने विकराल रूप लेकर समाज के ताने बाने को तार-तार कर दिया। यह समस्या किसी एक समाज की न होकर समस्त भारतीय समाज की हो चुकी हैं।
हम देखते हैं कि किसी एक समस्या का जब तक हम समाधान खोजते है, विचार मंथन करते है; हमारे सामने नई और नई समस्या आ खड़ी होती है। बच्चों की उच्च शिक्षा से हमारा समाज जहाँ काफी प्रगती कर रहा है वहीं बड़े-बड़े बच्चों के शादी विवाह में उनके मेल मिलने असंभव से लगने लगे। फिर भी हमारा समाज एक अंहकार के वश में जी रहा है। आडम्बर करना अपना धर्म समझने लगा है। जब तक कोई एक नई बीमारी शुरू नहीं कर देता तब तक विवाह की रस्में पूरी नहीं होती। हर जगह बुराईयों को जन्म देने वाले ठेकेदार पनपते जा रहे हैं।
इस समस्याओं को हम सावधानी से पहल कर समाधान खोज सकते हैं। परन्तु ऐसा लगता है कि समाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों में इच्छा शक्ति का भारी अभाव हो चुका है। समाज का हर व्यक्ति सम्मान प्राप्त करने की दौड़ में समाज के सम्मान को ताख पर रखने को तैयार खड़ा है।
जिससे हमारे विचारों का समाज पर प्रभाव समाप्त होता जा रहा है। हम एक समस्या से कई नई समस्या पैदा करने में अपनी शान समझने लगे हैं। यह कितना घातक है यह तो भविष्य ही बतायेगा, पर हाँ हमारी सभ्यता पर प्रश्न चिन्ह तो खड़ा करता ही है ।

कह दो चिरागों से जलना होगा

श्रीमती इन्दिरा चौधरी, कोलकाता

वैश्वीकरण और भौतिकवाद की दौड़ में मानवीयता कहीं दूर छूटती जा रही है कल जो भाई चारा था विगत तीन चार दशक में एक दम जड़ हो गया है बहनत्व की भावना पनपी है अच्छा है किन्तु इससे जो खूनी रिश्ते फिके पड़े वो चिन्ताजनक है। हर रिश्ते में स्वार्थ का रंग चढ़ गया है समीकरण शारीरिक व आर्थिक लाभ तक सीमित हो गये वैसा जो भारतीय संस्कृति के एकदम विरूद्ध है। आज महिलाओं को जितनी सुविधा आजादी अधिकार प्राप्त है कल शायद नहीं थे परन्तु सदियों से संघर्षरत शोषित पीड़ित नारियाँ जो सुविधायें सत् पुरुषों ने नारियों को दिलवाई क्या वो बरकरार रहेंगी ऐसा नहीं लगता। संकीर्ण अनैतिक विचारों के कारण कुछ प्रतिशत लोग व संस्थायें इसका दुरूपयोग कर रही है हर एक जगह स्वेच्छाचार बढ़ रहा है। इसे तुरंत वैचारिक मंथन कर रोकना होगा। देखा देखी परिणाम जाने बिना बढ़ते तलाक इसका उदाहरण है। मनुष्य विचारवादी है इसी कारण श्रेष्ठतम जीव की श्रेणी में खड़ा है। कल बाजार मनुष्य के लिए था, किन्तु आज बाजार के लिये मनुष्य है ऐसा प्रतीत होता है। भारतीय समाज की संरचना में कल मानवीय मूल्यों की प्रधानता थी न कि भौतिकता की। हाँ! यह बात सही है कि भौतिकता कोई निषिद्ध अथवा नकारात्मक नहीं, लेकिन आज उसका चरम् विकास आसुरी आडम्बरयुक्त होता जा रहा है। जिसके परिणाम भी सामने दिखाई देने लगे है। पारिवारिक विघटन, घरेलू हिंसा, भारी असंतोष, आतंकवाद, सामाजिक असुरक्षा, अनैतिकता और भ्रष्ट राजनीति सर चढ़कर बोलने लगी है। येन-केन प्रकारेण धन का प्रर्दशन हमारी नियत बन गई है। हमारा चिंतन इसके नये-नये तर्क प्रस्तुत कर अपनी बातों को सही ठहराने की भरसक कोशिश की जा रही है। कल तक जो चिंतन दीर्घकालिक व सुधारात्मक था आज ठीक इसके विपरित हो चुका है। विखरते परिवारों को काउंसिलिंग की बात कही जाने लगी। ससुराल बदलने की जगह स्वभाव को बदलने की बातें समझाई जा रही है। परन्तु अभी भी सकारात्मक नहीं हो पाया है। शिक्षा, चिकित्सा सेवा केन्द्र जो कि समाज और राष्ट्र उत्थान के आधार है पूर्णतः व्यापारिक होते जा रहे हैं। कल हमारी शिक्षा और चिकित्सा का दृष्टिकोण बहुत व्यापक ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनं’’ था। जनकल्याणकारी संस्थाओं में आत्मप्रचार व व्यक्ति प्रधानता को महत्व दिया जाने लगा है जो बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। समय रहते हमें पुनः जागरण की तुरन्त आश्यकता है।


हवायें जोरमय है, सम्भलना होगा।
कह दो चिरागों से जलना होगा।।

शनिवार, 20 दिसंबर 2008

भंवरमल सिंघी समाज सेवा पुरस्कार

निष्काम कर्मयोगी
श्री पुष्करलाल केडिया को

श्री पुष्करलाल केडिया का परिचय:
सुपरिचित समाजसेवी श्री पुष्करलाल केडिया सेवा की प्रतिमूर्ति हैं। दो बार राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, सैकड़ों संस्थाओं द्वारा अभिनन्दित एवं भारतीय संस्कृति के वैज्ञानिक स्वरूप एवं राष्ट्र की नई पीढ़ी के चरित्र निर्माण हेतु दर्जनों से अधिक पुस्तकों के मूल चिन्तक एवं लेखक श्री पुष्करलाल केडिया का जन्म राजस्थान के गुढ़ा गौड़जी (जिला: झुंझुनूं) में 17 जुलाई 1928 को हुआ। कोलकाता आने पर 10 वर्ष की अल्पायु में ही विद्यालय में ‘कब’ के रूप में ‘स्काउट आन्दोलन’ से जुड़ गये और यहीं से शुरू हुई निष्काम सेवा की यह अविरल यात्रा। स्काउटिंग में विभिन्न पदों पर आसीन रहने के बाद सन् 1967 में भारत स्काउट्स एण्ड गाइड्स पश्चिम कोलकाता के डिस्ट्रीक्ट कमिश्नर एवं सन् 1985 में सहायक राज्य कमिश्नर (पं0 बंगाल) के पद पर पहुँचे। परहित चिंतन एवं मानव सेवा का पर्याय बन चुके श्री पुष्करलाल केडिया कोलकाता की कई शीर्षस्थ सेवा संस्थाओं से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।
अपना पूरा जीवन स्काउट के जरिए समाज को समर्पित कर देने वाले श्री पुष्करलाल केडिया ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता हैं। जिन्होंने प्रतिक्षण समाज सेवा की चाह को सर्वोपरि रखा।
श्री पुष्करलालजी केडिया के तपः पूत व्यक्तित्व में यही सत्य अपनी समूची प्रखरता के साथ विद्यमान है। पिछले 25 वर्षों से शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद जीवन की अष्टदशकीय सेवा यात्रा में भी उनकी क्रियाशीलता, ऊर्जा और चिन्तन पर आगे रहने की विलक्षण दृढ़ता पूर्ववत् देखकर नई पीढ़ी में चेतना का संचार होता है। उनके मानस की त्रिवेणी आज भी सद्प्रवृत्तियों और जीवन के उच्चतम आदर्शों की पवित्र धाराओं से गरिमामण्डित है।
जीवन्त प्रतीक आज कोलकाता के बड़ाबाजार अंचल में अमृत कलश के समान सुशोभित श्री विशुद्धानन्द हास्पिटल एण्ड रिसर्च इंस्टीच्यूट है। आप उसके कई दशकों से
प्रधान सचिव हैं। यह संस्थान आज महानगर के शीर्ष चिकित्सा संस्थानों में अपने आधुनिकतम उपकरणों एवं सुन्दर व्यवस्थाओं के कारण अपना गौरवमय स्थान सुरक्षित किए हुए है। बहुत ही कम व्यय पर सर्व साधारण को उत्कृष्ट सुविधाएं यहाँ प्राप्त है। श्री विशुद्धानन्द हास्पिटल उनकी अद्भुत कार्यक्षमता एवं अनुकरणीय टीम भावना का प्रतीक है यह मात्र एक चिकित्सा संस्थान ही नहीं अपितु विविध जनोपयोगी प्रकाशनों एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के कारण आकर्षण एवं प्रशंसा का केन्द्र बन गया है।
अपनी महिमामयी सेवाओं यथा नेत्र चिकित्सा शिविरों, उपयोगी प्रशिक्षणों आदि के कारण नागरिक स्वास्थ्य संघ का नाम सेवा संस्थानों के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित है। आप उसके संस्थापक मंत्री हैं। संघ की अनेक मंगलकारी योजनाएं उनके प्रबुद्ध मार्ग दर्शन में अविरल रूप में गतिशील हैं।
श्री केडिया जी के मार्गदर्शन में एवम् श्री केडिया जी द्वारा स्थापित ‘मनीषिका’ आज बालक-बालिकाओं एवं बुद्धिजीवियों के मध्य सम्पूर्ण राष्ट्र में अपना स्थान बना चुकी है। आप इस संस्था के संस्थापक अध्यक्ष हैं।
भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिकता प्रमाणित करने के लिए आपने अनेकों पुस्तकों का सृजन किया है। इन पुस्तकों का अंगे्रजी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। नई पीढ़ी में चरित्र निर्माण एवं उसके सम्यक विकास हेतु आप प्रदर्शनियों, दृश्य श्रव्य माध्यमों एवं सेमिनारों के द्वारा एक अपूर्व चेतना जाग्रत कर रहे हैं। इसके कई प्रकाशन राष्ट्रीय स्तरपर समादृत हो चुके हैं।
इन्होंने अपने चिन्तन को, अपनी पुस्तकों ‘‘हमारा विराट स्वरूप’’ एवं ‘‘हमारी महान शक्तियाँ’’ में व्यक्त किया है। यह सब लिखने का एकमात्र उद्देश्य यह है कि हम उनके कर्ममय जीवन से शिक्षा ग्रहण करें। यदि हमारा संकल्प दृढ़ है तो हर असम्भव भी सम्भव बन जाता है। कदम बढ़ाते ही सफलता पैर चूमने लगती है। आज उनका अभिमान रहित जीवन, उनकी सादगी, आडम्बरहीन आचरण, विनम्रता, मधुर व्यवहार परदुःख कातरता, परमार्थ साधना एवं लोक सेवा का अखण्ड व्रत अनुकरणीय है। वे वस्तुतः समाज एवं राष्ट्र की एक अमूल्य निधि है।
आपके चिन्तनपूर्ण लेखन पर विक्रमशिला विद्यापीठ ने पी.एच.डी. की मानद उपाधि प्रदान की। उत्कृष्ट सामाजिक सेवाओं के कारण जहाँ पं.बंगाल के महामहिम राज्यपाल श्री वीरेन जे.शाह ने सेवा सम्मान में प्रदान किया वहीं महानगर सहित देश के शीर्ष सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं ने आपको अभिनंदित कर स्वयं को धन्य बनाया।
यह सम्मान हम सब अपने अहम् को विगलित करने के लिए नहीं अपितु इसलिए कर रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां एक प्रकाशमान प्रेरणा प्राप्त कर सकें और लोकमंगल के विस्तीर्ण पथ पर निष्काम भाव से गतिशील हो सकें। हमें पूर्ण विश्वास है कि श्री केडिया जी ने लोक हित जिस दिवालोक का आह्वान करने के महत उद्देश्य से जो हीरक प्रदीप प्रज्ज्वलित किया है, उससे अनेक दीपक प्रज्ज्वलित होंगे।
आज दिनांक 20 दिसम्बर 2008 को नई दिल्ली में अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन आपको ‘‘भंवरमल सिंघी समाज सेवा पुरस्कार’’ से सम्मानित करते हुए काफी हर्ष महसूस करता है। हम ईश्वर से आपके शतायु होने की प्रार्थना भी करते हैं।


[script code: Puskarlal kedia]

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008

राजस्थानी भाषा साहित्य पुरस्कार 2008


अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन द्वारा अपने 21वें राष्ट्रीय अधिवेशन और 74वें स्थापना दिवस के अवसर पर तेरापंथ भवन अध्यात्म साधना केन्द्र, छत्तरपुर मेहरौली मार्ग, नई दिल्ली में कल सुबह यानी 20 दिसम्बर 2008 को दिन तीन बजे भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति श्री भैरोसिंह शेखावत के हाथों "राजस्थानी भाषा साहित्य पुरस्कार 2008" जनचेतना के विप्लवी यायावर रचना धर्मी श्री ओंकार श्री को से देने जा रही है।


श्री ओंकार श्री का परिचय
जन्म: 26 मार्च 1933, बीकानेर। पिता श्री बालमुकुन्दजी, आपकी विमाता के साथ कराची नगर में हरमन मोहता कंपनी के व्यवस्थापक व प्रवासी राजस्थानी व्यवसायिक घरानों के विवादों के प्रख्यात आरबीट्रेटर थे।
आप डूँगर कॉलेज, बीकानेर से कला स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण कर, अर्थाभाववश आगे पढ़ न सके। तत्पश्चात् आपने लोकमत बीकानेर के सहायक संपादक बतौर मात्र 70 रुपया माहवारी मान देय पर कार्य किया।
सन् 1966 से 1986 तक उदयपुर में स्थित राजस्थान साहित्य अकादमी के सेवा काल में सहायक सचिव का निदेशक व उपनिदेशक पद पर प्रोन्नत हो सन् 82 से 86 तक शासन स्थापित राजस्थानी भासा साहित्य संस्कृति अकादमी बीकानेर के शासन द्वारा नियुक्त संस्थापक सचिव।
अकादमी सेवा मुक्ति के बाद आपने माणक (राज0मा0) का व.संपादक, जोधपुर के सांध्य दैनिक तीसरा प्रहर का व.संपादक दायित्व संभालने के बाद नवमें दशक में बीकानेर संभागीय विकास परिषद का व राजस्थान गो.सेवा संघ का मानद सचिव पद भार वहन किया।


पत्र पत्रकारिता के क्षेत्र में:
संपादन पूर्व व.संपादक: लोकमत(सा0)बीकानेर, माणक (राजस्थानी) जोधपुर, तीसरा प्रहर सांध्य (दै0) जोधपुर, प्रतिदिन
सांध्य(दै0)उदयपुर, पोलिटिक्स(दै0)उदयपुर, प्रगति(सा0)उदयपुर। प्रकाश(सा0)उदयपुर, ओसवाल ज्योति(व0)जयपुर, जैन दर्पण(मा0)जयपुर, अर्थभारती (मा0)पारिकबन्धु (मा0)जयपुर, श्रमणोपासक (बीकानेर), जागती जोत बीकानेर, मधुमती (मा0) उदयपुर, सहकार पथ (मा0) जयपुर, लूर (शोध जनरल) जोधपुर। एक्सीलैंस (अंग्रेजी शिक्षा मा0) भोपाल। निर्मला (मा0) बैंगलोर।
प्रवर्तन: हिन्दी प्रत्रकारिता में निजात्मीय नगर-जन संवाद षैली स्तम्भ का ‘हैलो’ बीकानेर, लगभग 2000 लेखा लेख/कवितायें/ विविध विधाओं में 50 पत्रों में प्रकाशित।
ग्रंथ संपादनः विशाल ग्रंथो का यथा: राजस्थान संगीत: संगीतकार-जयपुर, तत्त्ववेत्ता अभिनन्दन ग्रंथ-जयुपर, आखरबेल, प्रणाम स्मृति ग्रंथ (दिल्ली), वंदन स्मृति ग्रंथ, उदयपुर, ऋषया यतन पुरा गंथ-उदयपुर, सर्व मंगल सर्वदा (बी.के.बिड़ला प्रोजेक्ट) कोलकाता।
प्रकाशित ग्रंथः एक पंख आकाश (हिन्दी मिनि कविता प्रवर्तन कृति-1971 उदयपुर, (2) समाज दर्शन (जैनाचार्य जवाहरलालजी महाराज) बीकानेर, विप्लवी संगीतकार (डॉ.जयचन्द्र षर्मा) बीकानेर, व्यासाय नमोनम्: (रम्मतकार पं. बच्छराज व्यास) बीकानेर, सहकारिता से ग्रामस्वराज्य, सहकारिता से लोकतंत्र, सहकारिता से पंचायत राज, जय सहयोग (हिन्दी गीत), मैं उपस्थित हूँ (हिन्दी काव्य)- प्रकाशनोन्मुख, श्री समुच्चय (समग्र संकलन-वर्गीकरण कार्य जारी)।
राजस्थानी जनकवि अवधारणा-राजस्थानी, मोरपंख (राज.गीत), राजस्थानी पत्रकारिता के उजले आयाम (प्रकाशनाधीन), आखरबेल (राज.काव्य संकलन), लिखी सो सही (आत्म कथा-सृजनाधीन), रंगरेख (राज.रेखाचित्र)-प्रकाशनोन्मुख।
सम्मान: डी. लिट (राज.) आर.डी.एफ. जालोर से, जीनियस एवार्ड (विश्व जौहर न्यूज ऐसो0) उदयपुर (पत्रकारिता चैतन्यपूर्ण लेखन हेतु), महाकवि पृथ्वीराज राठौड़ (राज. काव्य) सम्मान, राजस्थानी भाषा (शीर्ष प्रदेश स्तरीय) सम्मान जयपुर (राज्यपाल द्वारा), आ0 शिलीमुख हिन्दी सृजन- स्मृति एवार्ड (प्रथम) जयपुर, समताशेखर (जैन यूथ) जयपुर, प्रबोधक (सिद्धान्त शाखा) बीकानेर, सहकार गुरू (राज. शासन) सम्मान जयपुर, साहित्य श्री (जय साहित्य संसद) जयपुर, विशिष्ट साहित्यकार (रा.भा.सा.सं.अकादमी) सम्मान-बीकानेर, जन प्रचेता (बीकानेर संवाद मंच) सम्बोधन-बीकानेर।[end]


[script code: onkar shri]

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