आपणी भासा म आप’रो सुवागत

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सोमवार, 7 नवंबर 2011

बंगला साहित्य में राजस्थान - प्रो. शिवकुमार

चारण कवि रंगलाल की कविता पर आधारित
बंगाला साहित्य ‘राजस्थान के इतिहास’ से पटा पड़ा है। आज हम इसी संदर्भ में बंगला साहित्य के कुछ पन्नों को पलटते है।
रानी पद्मिनी के रूप-सौन्दर्य की प्रशंसा सुनकर उसे प्राप्त करने के लिए सम्राट अलाउद्दीन चित्तौड़ पर आक्रमण करता है। युद्ध में असफलता होने के पश्चात वह राजा भीम सिंह के पास एक प्रस्ताव भेजता है- ‘‘कि यदि एक बार उसे रानी पद्मिनी का दर्शन हो जाय तो वह दिल्ली लौट जायेगा।’’
बंगला साहित्य में इस घटना का वर्णन देखें -

एई रूप कत दिन होइलो समर।
दिवा विभावरी रणे नाहि अवसर।।
तथापिउ यवनेर ना होइलो जय।
अभेद्य दुर्गम दुर्ग, कार साध्य लय?

एकबार देखा चाई से रूप ताहार।।
आसार आशाय फल लाभ होले बांचि।
इहार अधिक मिछे मने मने आंचि।।
नाहि चाहि रत्नभार, चित्तौरे देश।

देखिबो से मोहिनीरे, एई धार्य शेष।।
एतो भावि पत्र लिखि दूत पाठाइलो।
संधिर पताका शुभ्र, शून्ये उडाइलो।।

(संदर्भ: रंगलाल रचनावली, पद्मिनी उपाख्यान पृ.147)

सम्राट अलाउद्दीन चित्तौड़ पर जय नहीं होने के बाद जब इस तरह का अपमान जनक सन्धि प्रस्ताव पा कर राजा राणा भीम सिहं क्रूद हो उठता है परन्तु तब तक वह युद्ध के कारण काफी कमजोर हो चुका था। तब रानी पद्मिनी ने सूझाव दिया कि आप उसे दर्पण छाया देखने का प्रस्ताव दे कर कुल को नष्ट होने से वचाव करें। अगर वह सिर्फ मेरी छाया देख कर दिल्ली लौट जाता है तो इससे हमारे वीरों की प्राण रक्षा हो सकेगी।

दुर्जन दलन, सुजन पालन,
एई तो राजार नीति।

निरखि आभाय, शत्रु यदि जाय,
सब दिक रक्षा पाय।
तबे हे आमारे, देखाउ ताहारे,
निरुपाये सदुपाये।।
साक्षत् आभाय, यदि देखे राय
होबे तबे कुले कालि।
देखुक अर्पाणे, छाया दरशने
वंशेते ना रबे गालि।।

(संदर्भ: रंगलाल रचनावली, पद्मिनी उपाख्यान पृ.149)
पद्मिनी महारानी ने राजा को जनता के प्रति अपना धर्म याद दिला कर संन्धि प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने को कहा। इस बीच में बंगाला कवि देश की जनता को याद दिलाता है कि अंग्रेजों से भी हमें हार नहीं माननी चाहिए। धीरे धीरे कवि रानी के जौहर की तरफ बढ़ता चला जाता है।
अंत मे कवि हुंकार भर उठता है-

ओई शनु ! ओई शुनो !
भेरहर आवाज हे, भेरीर आवाज।
साज साज साज बोले, साज साज साज हे,
साज साज साज।।
चलो चलो चलो सबे, समर-समाज हे,
समर समाज।
राखोहो पैतृक धर्म, क्षत्रियेर काज हे,
क्षत्रियेर काज।
आमादेर मातृभूमि राजपूतानानार हे
राजपूतानार।

जौहर की कथा का गुनगान करते हुए कवि देशवसियों को हुंकार भरता है कि- कि वे भी उठो जगो और अंग्रेजों से लोहा लेने की कसम खा लो।

भारतेर भाग्य जोर, दुःख विभावरी भेर
घूम-घोर थाकिवे कि आर?
इंगराजेर कृपाबले, मानस उदयाचले
ज्ञानभनु प्रभाय प्रचार।।

(संदर्भ: रंगलाल रचनावली, पद्मिनी उपाख्यान पृ.172)

रविवार, 6 नवंबर 2011

व्यंग्य: लोकतंत्र’रा स्तम्भ

बेईमान व्यक्ति के हाथ में कलम हो या तलवार उसकी बेईमानी छुपती नहीं है। इन दिनों देश में पत्रकारिता में भी बेईमानी झलकने लगी है। देश के कई पत्रों के संपादक करोड़ों में बिकने लगे। ईनाम की रकम इतनी मंहगी हो चुकि है कि एक लाख का ईनाम लेने के लिए हर शख्स अपना ईमान बेचने में लगा है। कल तक देश में नेता लोग व्यापारियों को जी भर के गालियां देते रहे। पत्रकार भी जम कर उनको लताड़ते थे। जनता उसके मजे ले-ले पेट भरती रही। आज देश में इन नेताओं की जब बारी आई तो पत्रकारों की एक जमात बगलें झांकती नजर आती है। इस संदर्भ में व्यंग्य को देखें -

एक पत्रकार दूसरे पत्रकार से
मित्र- सोहनजी थारी तलवार निचे पड़गी !
ना’रे आ तो म्हारी कलम है !
मित्र- नेता’रे गलै तो आई रोजना फिरै !
अब कठै काल ही म्हारे बॉस ने ‘वो’ खरिद लियो !
मित्र- अब तू कै लिखसी ?
आ अब उलटी चालसी
मित्र- कियां?
अब देश’री जनता को सर कलम करसी।
मित्र- पर या तो गद्दारी होसी?
मेरो पेट कुण भरसी तू कि या जनता?
मित्र- पर फैर भी आपां देश का चौथा लोकतंत्र’रा स्तम्भ हां।
जद तीनों पाया लड़खड़ायरा है तो चौथे खड़ो रह भी कै कर लेसी?


व्यंग्यकार: शंभु चौधरी, कोलकाता

तुलसी जी का ब्याह-

तुलसाँजी औड़ै कुंवारा हो राम!


आसाढ़ सुदी ग्यारस णै देव सोज्यावै ईं लिए उनणै ‘‘देव सयाणी ग्यारस’’ कह्यो जावै तथा कातक सुदी ग्यारस णै ‘‘देव उठणी या जागरणी ग्यारस’’ कह्यो जावै। ईं बीच में आपणा घरां में कोई बड़ो शुभ काम कोणी कियो जावै। अर देव उठणी ग्यारस णै सैं सूँ पैला तुलसाँजी रो ब्याव कियो जाय। ई अवसर पर आपणै घरां में लुगाईयां एक लोक गीत भी गाया करै जिको बोहत ही लोकप्रिय गीत है।

तुलसाँजी रो ब्याव के अवसर पर गावै जावै वालो लोकगीत -

सांतू सहेल्यां ळ-मिल चाळी,
तो सांतू ईं इक उणियारै हो राम!
भरने गई जळ जमना रो पाणी,
सांतु री सांतु यूँ उठ बोळी-
तुलसाँजी औड़ै कुवांरा हो राम!
साथनियां रो ओ ताणो
तुलसाँजी’रे कालजे खुभगो अर वै....



(सात सहेलियां एक साथ जमना तट पर पानी भरने जाती है। और सातूं सहेलियां आपस में मिलकर तुलसाँ नाम की लड़की को ताना मारने लगी। ‘‘अरै या तो अभी भी कुंवारी है’’ बस यह बात तुलसाँजी को चुभ जाती है।)

रोवत ठिणकत आई बाई तुलसॉ
तो बाबोजी गोद विठाई हो राम!
कै बाई तन्नै भाउजी मारी?
तो कै मायड़ दुतकारी हो राम!



(इस तरह उसके दादाजी तुलसाँ को अपने गोद में बैठाकर उसका लाड़-प्यार करते हुए पुचकारते हुए एक-एक का नाम ले-ले कर उससे पुछते हैं कि तुमको किसने छेड़ा, तब तुलसाँ बोलती है।)


ना बाबोजी कोई म्हानै मारी
नो कोई दुतकारी हे राम!
म्हारी सहेल्यां यूं मैणै बोली-
‘‘तुलसाँजी औड़ै कुवांरा हो राम!’’


(इस तरह तुलसाँ रो-रो कर अपना दुखड़ा दादाजी को बताती है। तब दादाजी उसको भ्रह्माजी, चांद, सूरज के साथ विवाह की बात कहते है। तो तुलसाँ जबाब में कहती है कि ना-ना आपणै घरै जो सालगराम जी है वही मुझे पसंद है आप उसी से मेरा ब्याह रचा दो।)


बाबोजी -
तो कै विरमाजी परणावां हो राम!
के बाई चांदो वर हे राम!
तो कै सूरज परबाबां हो राम!
तुलसाँजी -
म्हारै तो बाबोजी सालगराम बर हेरो
वे म्हारै मन भाया हो राम
वो री म्हारी जोड़ी हो राम!


(इस प्रकार जब तुलसीजी नै अपनी इच्छा बता दी तो पिताजी उके ब्याह की तैयारी करने में जूट गये।)


आळा-गीळा बांस कटाया, तो तोरण-थांम रुपाया हो राम!
पाटा सूतां ताणियां खिंचाई, मांडेळा मांड़ा छबाया हो राम!
लाडू-पेड़ा सरस जलेबी, तुलसा री जान जिमाई रो राम!
पीली हळ्दी पीला ही चावल, तुलसा रो गांठ जुडायो हो राम!
पान-सुपारी रोक रुप्यो तुलसा री गांठ जुड़ायी हो राम!


(इस प्रकार जब सभी तैयारी हो जाती है और बाई तुलसाँ का हाथ पीळा कर ब्याह की सभी रश्में विधि पूर्वक पूरी की जाती है बाई तुलसाँ की बिदाई कर दी जाती है।)


पैळो फेरो लियो बाई तुलसॉ,
तुलसाँ बाबोजी णै प्यारा हो राम!
दूजो फेरो लियो बाई तुलसॉ,
तुलसाँ दादीजी रा दुलारा हो राम!
तीजो फेरो लियो बाई तुलसॉ,
तुलसाँ भाऊजी णै प्यारा हो राम!
चौथे फेरो लियो बाई तुलसॉ,
तुलसाँ मायड़ री लाडल हो राम!
तुलसाँ हुई रै पराई हो राम!



राजस्थानी शब्दों का हिन्दी मायने-
ताणो - ताना, खुभगो - चुभना, भाउजी - भाभीजी, मायड़ - मां ने, बाबोजी - पिताजी या दादाजी, सालगराम - शालीग्राम, काला पत्थर जिसे कृष्ण भगवान का स्परूप माना गया है। , तोरण-थांम रुपाया - विवाह के अवसर पर बांस का एक खंभा घर क आंगन में गाड़ना, ताणियां - पीले रंग से रंगा हुए चौकोर कपड़े को उस बांस से बांध देना जो आंगन में लगाया गया है, मांडेळा मांड़ा छबाया - धर के अंदर और बाहर तंबू लगवाना।

शनिवार, 5 नवंबर 2011

भुपेन हजारिका कोणी रया

भुपेन हजारिका
(8 सितंबर, 1926 - ५ नवम्बर २०११)
आपां सैं मिल’र उणाणै आपणी श्रद्धांजलि अर्पित करां हां।
Bhupen Hazarika
मानीज्ता भुपेन हाजारिका रो काल शनिवार 5 नवंबर 2011 णै मुंमबई में आपको सवरगवास होग्यो। आपको जन्म 8 सितंबर 1926 को हो। 86 वरीसीय हाजारिका जी को जनम असम रे सादिया गांव में होयो थे। आप दस बरस री उमर से ही गीत लिखण अर गाणणा लाग्या था। ‘‘दिल हूम-हूम करे’’ और ‘‘ओ गंगा बहती हो क्यूं’’गीत सूं आपणै देशभर में आपरो बड़ो नाम होग्यो। आपको एक गीत ‘‘ओ गंगा बहती हो क्यूं’’ रो राजस्थानी अनुवाद असम का राजू खेमका ने कियो है जिको आपां उणणै आपणी श्रद्धांजलि स्वरूप अठै प्रस्तुत करां हैं। आपको राजस्थान से काभी ळगाव भी रयो है। मानीज्ता गजानन वर्मा आपका नजदिक का मितरां में हा। आपकी गीत के प्रति लगण देख असम का युग पुरुष स्व.ज्योति परसाद अगरवाल जी, आपणै मंच पर गाणै री प्ररेणा दी थी। तब सूं आप असम के गीत संगीत पर राज करतां आया ।


ओ गंगा बहती हो क्यूं?
© - डॉ.भूपेन हजारिका -




[मूल असमिया भाषा से हिन्दी में रूपान्तर]
विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार
निःशब्द सदा, ओ गंगा तुम
ओ गंगा बहती हो क्यों ?
नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुआ
निर्लज्य भाव से बहती हो क्यों ?
अनपढ़ जन खाध्य विहीन,
नेत्र विहीन देख मौन हो क्यों ?
इतिहास की पुकार, करें हँकार
ओ गंगा की धार, निर्वल जन को सकल संग्रामी
समग्रगामी बनाती नहीं हो क्यों ?
व्यक्ति रहे व्यक्ति केन्द्रित, सकल समाज व्यक्तित्व रहित
निष्प्राण समाज नहीं तोड़ती हो क्यों ?
स्त्रोतस्विनी तुम न रही, तुम निश्चय चेतना नहीं
प्राणों से प्रेरणा बनती न क्यों ?



[मूल असमिया भाषा से राजस्थानी में रूपान्तर]
लांबी है अथाग, प्रजा दोन्यू पार
करे त्राय-त्राय, अणबोली सदा ओ गंगा तू
ओ गंगा बैवे है क्यूं ?
नेकपाणो नष्ट हुयो, मिनख पणो भ्रष्ट हुयो,
निरलज्जा बण बैवे है क्यूं
अणभणिया आखरहीन, अणगिण जन रोटी स्यूं त्रीण
नैत्रहीन लख चुप है क्यूं
इतिहास की पुकार, करें हुंकार-
हे गंगा की धार निवले मानव ने जुद्ध वणी,
सब ठौरजयी वणावै नहीं है क्यूं ?
मिनक रहवै मिनखांचारी, सगळा समाज निभ्हे स्वैच्छाचारी
प्राणहीन समाज नै तोड़े नहीं हैं क्यूं ?
सुरसरी तू ना रै वै, तू निश्चय चेतना हीन
प्राणों में प्रेरणा बणै नहीं है क्यूं ?
ओ गंगा बैवे है क्यूं

Translated In Rajsthani by : Raju Khemka, Assam

परिचय: श्री चम्पालाल मोहता ‘अनोखा’


अय जरा आवाज कम करो! - शंभु चौधरी



15 अक्टूबर 2011 शनिवार, कोलकाता।
कहीं ईंट-पत्थर तौड़ने की आवाज आती हो तो हमें समझ लेना चाहिए कि कोई निर्माण कार्य चल रहा है जो हमारे सपने को साकार करने में लगा होगा। हमारी मजबूरी यह है कि हम उन्हें मजदूर समझ बैठे। जिस कड़वाहट भरी आवाज से हमारी नींद में खलल पैदा हो जाती है और अनायास ही हम उन पर चिल्ला पड़ते हैं -
‘‘अय जरा आवाज कम करो!’’
शायद हम यह समझने में भूल कर देते हैं कि यही ठक-ठक की आवाज हमारे भविष्य का निर्माण कर रही है। इस भागदौड़ भरे जीवन के बीच कल में कोलकाता शहर की एक छोटी सी गली से गुजरता हुआ मारवाड़ी समाज के सुपरिचित कवि, शायर एवं गीतकार श्री चम्पालाल मोहता ‘अनोखा’
जी के घर जा पँहुचा। दोपहर के लगभग तीन बज चुके थे आपके निवास स्थल 49/2ए, बीडन रो, कोलकाता-700006 में उनसे एक संक्षिप्त मुलाकात हुई। इस दौरान आपसे जो बातें हुई इसे आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।
श्री चम्पालाल जी का परिचय आपकी ही इन पंक्तियों के साथ शुरू करना चाहूँगा-
Champa Lal Mohata 'Anokha'
जीवन देने वाले मुझको जीने के अधिकार तो देते
झोली भर कर दर्द दिए हैं, मुट्ठी भर कर प्यार तो देते
होने को वीरान हमारी बगिया तो ये हो जाएगी
वीराने से पहले लेकिन थोड़ी बहुत बहार तो देते। -‘‘अनोखा कवि से’’


मारवाड़ी समाज के विख्यात गीतकार श्री चम्पालाल मोहता ‘अनोखा’ (77 वर्ष) मूल रूप से कोलकाता के बड़ाबाजार अंचल के राजस्थानी गणगौर गीतों के रूप में जाने जाते रहें हैं। राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी बीकानेर में सन् 1934-35 में श्री चंपा लाल मोहता स्व. मानक लाल मोहता एवं श्रीमती इमारती देवी मोहता के पुत्र रूप में जन्में। जन्म के ठीक 19 दिन पहले ही आपके पिताश्री का स्वर्गवास हो गया। 9 वर्ष के होते होते ममतामई माँ भी चल बसी। बड़े भाई मोहनलाल एवं भाभी रतनी देवी ने माता-पिता की भूमिका निभाई प्राथमिक शिक्षा बीकानेर में ही हुई। सन् 1942 के आस-पास द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आपका कोलकाता आना हुआ परन्तु उस समय भगदड़ के चलते वापिस बीकानेर लौट गए। इसी दौरान माँ की मृत्यु हुई सन् 1945-46 में वापिस कोलकाता आये और तब से यहीं के होकर रह गए सन् 1946 में श्री महेश्वरी विद्यालय में प्रवेश लिया भाई साहब जितना कमाते थे उसमें स्कूल की फीस देना संभव नहीं था। चम्पालाल जी पढ़ना चाहते थे विद्यालय व्यवस्थापकों से फीस माफ करवा कर, किसी तरह दसवीं कक्षा तक आपने अपनी पढाई पूरी की।
विद्यार्थी जीवन में ही उनकी रचनाएँ महेश्वरी विद्यालय की पत्रिका ‘भारती’ में प्रकाशित होने लगी विद्यालय के उप प्रधानाध्यापक श्री वी.एन.टी. ने चम्पालाल जी की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें ‘अनोखा’ कहा तो उसे ही उन्होंने अपने उपनाम के रूप में अपना लिया।


सन् 1952-54 के मध्य कवि सम्मेलनों-मुशायरों में शिरकत करते हुए, एक उभरते हुए सितारे के रूप में स्थापित हुआ युवा शायर चम्पालाल मोहता ‘अनोखा’ हिन्दुस्तान के तमाम बड़े और मशहूर कवियों, शायरों के साथ ‘अनोखा’ ने अपने अनोखे रंग-ढंग में काव्य-पाठ किया। उस समय कोलकाता और आस-पास के अंचलों में प्रायः सभी कवि सम्मेलनों में उनकी उपस्थिति दर्ज होती मूनलाईट थियेटर के लिए भी ‘अनोखा’ गीत लिखते रहे कोलकाता बाल परिषद के प्रकाशन नई-किरण, खिलते कमल में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हुई।
अनिरुद्ध कर्मशील के संपादन में, साप्ताहिक विश्वमित्र में सर्वप्रथम रचनाएँ प्रकाशित हुई लगातार सिलसिला चला देश भर में कई पत्र पत्रिकाओं ने ‘अनोखा’ को प्रकाशीत किया सन् 1955 में पुरूलिया निवासी ‘कशी’ से विवाह के बाद, नौकरी के सिलसिले में वे राऊरकेला चले गए 18 मार्च सन 1957 को एक हृदय विदारक अगलगी की घटना ने जीवन साथी छीन लिया उस घटना में ‘अनोखा’ भी इतने गंभीर रूप से जख्मी हुए की छः महीने अस्पताल में रहे। संकटमय जीवन यापन करते हुए आपने अपना दूसरा विवाह श्रीमती पुतली देवी जो आगरा शहर की, से अन्तर्जातीय-अंतरवर्णीय विवाह कर पुनः अपना संसार बसा लिया। आपको तीन बेटे क्रमशः रवीन्द्र (52), मनोज (49) एवं विनोद (41) हुए। वर्तमान में आप सबसे छोटे बेटे श्री विनोद मोहता के साथ रह रहे है।
दुविधाओं के एक दौर से जीवन गुज़र रहा है
बसे-बसाए घर का तिनका-तिनका बिखर रहा है
पग-पग पसरी है। पीड़ायें, पल-पल है चिन्तायें
सच तो ये है-अब साँसे लेना भी अखर रहा है। -‘‘अनोखा कवि से’’


उनके भाई साहब को अब यह चिंता सताने लगी कि कहीं यह लड़का भटक न जाए रोजी रोटी के जुगाड में कोलकाता आये साहसी युवक कविताई के चक्कर में भूखों न मरे इसलिए एक उपन्यास, ‘मधुशाला’ के प्रत्युत्तर में 125 छंदों में रचित ‘रणशाला’ सहित ढेरों गीत-गजलों की पांडुलिपियाँ तथा पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं का रजिस्टर भाई साहब ने चार-आने किलो के भाव कबाड़ी को दे दिया अस्पताल से लौटे ‘अनोखा’ पर यह भीषण वज्रपात साबित हुआ वह विद्रोही हो गये।
मारवाड़ी समाज की दशा पर आपने अपने दर्द का इजहार कुछ इस प्रकार बयान किया - ‘‘इस आकाश को हिस्सों में मत बांटों। कोई अग्रवाल, माहेश्वरी, ओसवाल, जैन क्यों नहीं सभी अपने को मारवाड़ी कहते अब समय आ गया है कि इन जातियता के भेद को हमें समाप्त कर देना चाहिए’’.... बोलते-बोलते कुछ सोचने लगे फिर बोले दुष्यन्त कुमार जी एक गज़ल समाज के लिए आपको सुनाता हूँ -
‘‘तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नहीं।
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं।।’’


आपने समाज में साहित्य के प्रति आई उदासीनता पर अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि एक समय था जब स्व. भंवरमल सिंघी, सीताराम सेक्सरिया, राम निवास ढंढारिया, रमणलाल बिन्नाणी, भागीरथजी कानोड़िया, राम निवास जाजू, बुधमल श्यामसुखा ने इस दिशा में बहुत ही सराहनीय प्रयास किये थे उनको बहुत हद तक सफलता भी मिली परन्तु धन की चकाचौंध में हम सब कुछ खोते जा रहे हैं मनी ओरियेन्टेट समाज होता जा रहा है अब। अच्छी बात है परन्तु सिर्फ पैसा...पैसा...पैसा... इससे समाज की छवि खराब भी होती जा रही है...थोड़ा रुके... बड़ाबाजार पुस्तकालय, कुमारसभा पुस्तकालय के कार्यक्रमों में समाज के लोगों की कमी इस स्थिति का जीता जागता उदाहरण हमारे सामने है। श्री प्रमोद शाह का नाम लेते हुए आगे कहने लगे गोपाल कलवानी, केशव भट्ठड़, संजय बिन्नाणी अभी भी समाज में इस अलख को जगाये हुए परन्तु इनको समाज का सहयोग नहीं के बराबर है।’’
‘अनोखा’ के नाम से जाने व पहचाने जाने वाले कवि इन दिनों गले के केंसर से ग्रसित है। डाक्टरों ने उनको कम बोलने की सलाह दी है। मुझे पास पाकर वे कहाँ रूकते पास में उनकी पत्नी श्रीमती पुतली देवी मोहता जी ने उनके स्वभाव के बारे में मुझे कुछ बताने लगी, इलाज में कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ा था पर उनको यह सब कहाँ सुनना पसंद बीच में ही टोक दिए ....शंभुजी आएं हैं चाय तो पिलाओ! भाभीजी उठकर किंचन चाय बनाने चली गई। तब तलक श्री संजय विन्नानी जी भी आ गए थे और हमारी बातों का नया दौर शुरू हो गया।


आपने अपनी पहली रचना माहेश्वरी विद्यालय के तुलसी जयन्ती के कार्यक्रम में सन् 1950 में सुनाई थी उसके बाद तो आपको जो उत्साह मिला तब से आजतक आप लगातार लिखतें और कुछ नये सृजन में लगे रहते है। आप कोलकाता में मूनलाइट थियेटर के लिए भी कई राजस्थानी गीत लिखे थे।
सन् 1961-62 में आपकी लिखी एक राजस्थानी गीत-
‘‘चम-चम चमकै चाँद, चाँदनी रस बरसावै रे।
थारे बिना ओ बालम म्हारे जी घबरावै रै’’


शे’र, गज़ल, रुबाई, कत्आत, होली गीत, गणगौर गीतों आदि में प्रायः सभी जगह आपने कई जगह राजस्थानी शब्दों का मिश्रण इनकी रचनाओं की पहचान बन चुकी है। अनोखा जी का सिर्फ नाम ही नहीं इनकी पहचान भी ‘अनोखा’ है। एक गज़ल को देखें -
‘‘आने को सब आये लेकिन वो नहीं आये
मुद्दत से दिल जिनकी बाट उडीक रहा है।’’


यहाँ ‘‘बाट उडीक’’ राजस्थानी शब्द है जिसका अर्थ है बैचेनी से किसी का इंतजार करना। आपकी इस अलग पहचान ने प्रायः सभी कवि मंचों पर आपकी एक विशिष्ठ पहचान हो जाती थी। श्री गजानन वर्मा, विश्वनाथ शर्मा ‘‘विमलेश जी’’, डाॅ॰ शम्भुनाथ सिंह, भारत भूषण, गोपाल सिंह ‘‘नेपाली’’, जानकी वल्लभजी शास्त्री, नागार्जुन, अनवर मिर्जापुरी, सोज सिकन्दरपुरी, हकीम झुनझुनवी, वसीम बरेलवी, कैफ़ी आजमी, अली सरदार जाफ़री कई महान हस्तियों के साथ आपने कवि सम्मेलनों, मुशायरों, महफिलों की शान बढ़ाई है। डा॰ कृष्ण बिहारी मिश्र जी लिखते है। ‘‘ शेरो-शायरी की महफिल से जुड़े ‘अनोखा’ जी’ मेरे मन इतने करीब कैसे पहुँच गये? सोचता हूँ तो उनका प्रेम-पागल रूप मेरी आँखों के सामने खड़ा हो जाता है।’’ श्री मृत्युंजय उपाध्याय जी एक जगह आपके संस्मरण का जिक्र करते हुए लिखा कि ‘‘ आपकी एक कविता बम्बई से प्रकाशित ‘गौरी’ को छपने भेजी जो सधन्यवाद वापस लौट आयी थीं पुनः आपने इसी कविता को ‘चम्पा मोहता’ के नाम से भेज दी संपादक ने किसी लड़की का नाम समझा और अगले ही अंक में कोभर पृष्ठ के अंदर वाले पृश्ठ पर छाप दी, इस संपादकीय आईने ने संपादक की कलाई तो खोलकर रख ही दी, संपादक महोदय को इसके लिए जब उन्हें यह पता चला कि उन्होंने इसी रचना को पहले अस्वीकृत कर दिया था माफी भी मांगनी पड़ी’’


आप अपने बारे में लगातार कुछ न कुछ सुनाते जा रहे थे चाय आ चुकी थी हम तीनों चाय पीने लगे तभी आपने सुनाना शुरू किया-
‘‘कोई बुलंदियों में तो कोई अभाव में
हर शख़्स जी रहा है यहाँ पर तनाव में
कल तक जो उठाते थे ज़माने पे उंगलियाँ
वो आज कठघरे में हैं अपने बचाव में।’’


प्रकाशन: कोलकाता शहर की एक जानी पहचानी संस्था ‘अकृत’ ने इनकी बिखरी हुई प्रायः सभी रचनाओं (वर्ष 2010 तक की) को एकत्रित कर एक काव्य ग्रंथ ‘‘अनोख कवि’’ के रूप में प्रकाशित किया है जिसका मूल्य: रु0 500 मात्र, जिसका संपादन श्री केशव भट्ठड़ एवं श्री संजय बिन्नाणी ने किया है।
प्रकाशक: अकृत, 4, तनसुख लेन, कोलकाता- 700007.


चम्पालाल मोहता की कुछ रचनाएं -
राजस्थानी गीत
चम-चम चमकै चाँद, चाँदनी रस बरसावै रे।
थारै बिना ओ बालम म्हारो जी घबरावै रे।।
खिली म्हारी जोबन री फुलवारी
पिया मैं सुध-बुध भूला सारी
रहे नहीं मन अब मेरो इस में
जवानी नाच रही नस-नस में
सारी-सारी रात सजनवा नींद न आवै रै! थारै बिना.....


जुल्फ लहरावै काळी-काळी
आँख म्हारी हिरणी सी मतवाली
गाल म्हारा गोरा, होठ गुलाबी
कमर पतली लचके ज्यूँ डाली
घड़ी-घड़ी म्हारी छाती स्यूँ आँचल उड़ जावै रे! थारै बिना.....


पिया घर जल्दी वापस आणा
नहीं पल भर भी देर लगाणा
लग्या सै म्हारै लै’र जमाणा
कठै लुट जावै ना म्हारा खजाणा
पाड़ोसी को छोरो म्हाँसू आँ लड़ावै रे! थारै बिना.....
(मूनलाइट थियेटर के लिए सन् 1961-62 में रचित)


अपना मुकद्दर है तू.....


अंधेरों में बन रोशनी की किरन
हक जो ना मिले, कर शिकवे ना गिले
राहें नई, खुद ही बना
अपना मुकद्दर है तू


तेरी हिम्मत के सदके, तेरी मेहनत के सदके
तेरी फितरत के सदके, तेरी गैरत के सदके


परेशानियों से तू झुकना नहीं
घबरा के ख़तरों से रुकना नहीं
आसाँ हो जाएगी मुश्किल तेरी
कदमों को चुमेगी मंजिल तेरी
उठ हर बुलन्दी को छू - अपना मुकद्दर है तू.....


दिलों से दिलों की कड़ी जोड़ तू
आँधी-ओ-तूफाँ का रूख मोड़ तू
ज़मीं है तेरी आस्माँ है तेरा
सारा का सारा जहाँ है तेरा
सितारों से कर गुफ्तगू - अपना मुकद्दर है तू.....


हिम्मत के लिख तू फसाने नये
उल्फ़त के गा तू तराने नये
दिन भी तेरे हों रातें तेरी
सब की जुबाँ पे हो बातें तेरी
हर दिल का बन तू सुकूँ - अपना मुकद्दर है तू.....


ख़्वाबों को अपने हक़ीक़त बना
बेहतर से बेहतर जहाँ तू बना
अंधेरों में बन रोशनी की किरन
ज़माना भी देखे जऱा तेरा फ़न
नया इक सफ़र कर शुरू - अपना मुकद्दर है तू.....



शे’र


कांटों की हो चुभन या अंगार का दहकना
मिल-जुल के आओ बाँटे, हम दर्द अपना-अपना
जीने का हक जहाँ में सबको मिले बराबर
उजड़े न कोई बगिया, टूटे न कोई सपना। -‘‘अनोखा कवि से’’


तूँ ढूँढ़ता फिरे है जिस दर-ब-दर अय दोस्त
तुझको ख़बर नहीं वो तेरे आस-पास है
हमको ये तेरी व़ज्म का अंदाज ‘‘अनोखा’’
भाया न एक पल, न कभी आया रास है। -‘‘अनोखा कवि से’’


दुविधाओं के एक दौर से जीवन गुज़र रहा है
बसे-बसाए घर का तिनका-तिनका बिखर रहा है
पग-पग पसरी है। पीड़ायें, पल-पल है चिन्तायें
सच तो ये है-अब साँसे लेना भी अखर रहा है। -‘‘अनोखा कवि से’’


गृहलक्ष्मी आओ स्वागत है-


गृहलक्ष्मी आओ स्वागत है-
महका-महका सा आज हमारा आँगन है।
गृहलक्ष्मी आओ, स्वागत है अभिनन्दन है।।


बाबुल के घर छोड़ पिया के घर आई।
डोली में खुशियाँ ही खुशियाँ भरकर लाई
सुख सबको पहुँचाने की अनुपम अभिलाषा
सजनी के नैनों में है साजन की भाषा
पग-पग पर बिखरा कुंकुम्, केसर, चंदन है।
गृहलक्ष्मी आओ स्वागत है....


मन से मन का यह सुखद सुहाना मधुर मिलन
धरती से मानो आज मिला हो नील गगन,
कल तक जो अनजाने थे आज हुए अपने
साकार हो गए जीवन के सुन्दर सपने
जग में सबसे पावन परिणय का बंधन है।
गृहलक्ष्मी आओ स्वागत है....


उर में चिंतन की, सागर सी गहराई हो
मासूम विचारों में नभ की ऊँचाई हो
कर्तव्य-परायणता ही मानस का दर्पण
श्रद्धा में अन्तर्निहित ही मथुरा-वृन्दावन है।
गृहलक्ष्मी आओ स्वागत है....


गजल


सन्नाटे का शोर हवा में चीख रहा है
तनहाई में भीड़ का मंज़र दीख रहा है।
रंजो-अलभ से अब तो अपना है याराना
रफ़्ता रफ़्ता ग़म सहना दिल सीख रहा है।
नहीं कोई गुंजाइस अब कहने सुनने की
उसका कहना इक पत्थर की लीक रहा है।
अच्छे बुरे दिनों की चर्चा है बेमानी
मेरे लिए हर लम्हा इक तौफ़ीक़ रहा है।
उसका दिल अच्छा, उसकी बातें भी अच्छी
साफ बयानी में बस थोड़ा तीख रहा है।
वो बदनाम गली-कूचे का रहनेवाला
दोज़ख़ में रहकर भी बिलकुल ठीक रहा है।
दूर भले ही रहा नज़र से मेरी लेकिन
वो मेरे दिल के हरदम नज़दीक रहा है।
उन दोनों का साथ था जैसे चोली दामन
एक काफ़िया था तो एक रदीफ़ रहा है।
मार दिया बेमौत उसे अपने लोगों ने
जो उनके सुख दुःख में सदा शरीक रहा है।
गिरगिट जैसा रंग बदलता उसका चेहरा
कभी रक़ीबों सा है कभी रफ़ीक़ रहा है।
आने को सब आये लेकिन वो नहीं आये
मुद्दत से दिल जिनकी बाट उडीक रहा है।
खुद ही मुज़रिम, खुद फ़रियादी, खुद ही हाकिम
खुद ही अपने जुर्म का वो तस्दीक़ रहा है।
धुंध-धुंए से परे एक झुरमुट के पीछे
दूर खड़ा वो अलग ‘‘अनोखा’’ दीख रहा है।

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

राजस्थानी वर्णमाला- शम्भु चौधरी

श्री राजेन्द्र बारा रे’नुसार राजस्थानी भासा री वर्णमाला में 49 वर्ण ध्वनियां है जिणा मांय 11 स्वर अर 38 व्यंजन होवो है। जबकि श्री केसरी कान्त शर्मा‘केसरी’ जी राजस्थानी वर्णमाला कुल 47 वर्ण ध्वनियां ही माने है। अपरो लिखनो है कि 13 स्वर अर 34 व्यंजन ही होवो है।
श्री केसरी जी तीन श,ष,स ण एक ‘स’ ही माने है कारण भी स्पष्ट है कि राजस्थानी भासा में ‘श’ अर ‘ष’ रो प्रयाग कानी होया करै।
यदि श्री राजेन्द्र जी बारा ण ही सही माना तो 38 व्यंजना में 2 व्यंजन कम कियां भी 36 व्यंजन रह जाय है। सो अबार भी 2व्यंजना को फर्क साफ कोनी होयै।
क वर्ग - क ख ग घ ङ
च वर्ग - च छ ज झ ञ
ट वर्ग - ट ठ ड ढ ण
त वर्ग - त थ द ध न
प वर्ग - प फ ब भ म
य वर्ग - य र ल व स ह ग्य ड़ ळ - 34 व्यंजन ही होया।

जबकि श्री राजेन्द्र जी’रो माननो ईं प्रकार है।
राजस्थानी भासा री वर्णमाला में 49 वर्ण ध्वनियां है जिणा मांय 11 स्वर अर 38 व्यंजन है।
व्यंजन:
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण
त थ द ध न
प फ ब भ म
य र ल व व्
श ष स ह
ळ ड़
(.) अनुसाव अर (ः) विसर्ग - 38
श्री राजेन्द्र जी’रे अनुसार स्वर: अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ ऋ - 11 स्वर एवं

श्री केसरी जी’रे अनुसार स्वर: अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ आ औ अं अः ऋ - 13 स्वर
अठै जो फरक सामने आयो है वो है -
(.) अनुसाव अर (ः) विसर्ग को है श्री राजेन्द्रजी ईं दोणु ण व्यंजन माना है जबकि श्री केसरी जी ईंणै स्वर माना है।

श्री केसरी जी’री पोथी ‘ सहज राजस्थानी व्याकरण माथै आप अर स्पष्ट करां है कि राजस्थानी प्रयोग में

1.‘ऋ’ की जगह ‘रि’ को प्रयोग सही होसी।
2.‘ढ’ कै नीचै नुक्ता नहीं लगानो चाइज्यै।
3.‘श’ अर ‘ष’ की जगह ‘स’ को ही प्रयोग सही होसी।
4.मूर्धन्य ‘ल’ की जगह ‘ल’/ जठै जोर पड़ता हो बठै ‘ळ’ को प्रयोग होनो चाईज्ये।
5.‘न’ की जगह ‘ण’ रो प्रयोग विशेष ध्वनि माथै कियो जानो चाईज्यै।


श्र, श, ष, ऋ, क्ष, त्र, ज्ञ शब्दां रे संबंध में कुछ स्पष्टीकरण री जरूरत होनी चाईज्यै।

जबकि श्र, श, ष, ऋ, क्ष, त्र, ज्ञ देवनागरी में होते हुए भी राजस्थानी भासा में ईं व्यंजना रो प्रयोग णै कई राजस्थानी रा विद्वान सही कोनी माने। जबकि उणारी पोथी सूं आपने कई उदाहरण देने रो प्रय्रास कर रह्यों हूँ।
क्ष - भिक्षु - भिक्सु
श - दर्शन, कोशिश - दरसन, कोसिस
नोटः इन दिनों कई लेखकों ने धड़ल्ले से ‘श’ और ‘ष’ का प्रयोग शुरू कर दिया है। नीचे देखें -
संदर्भ - पाळ-पोष, नशैड़ी, नशैबाज, वर्ष, प्रदूषण, कृष्ण ‘बिणजारो’ पेज 170, 171, 85 अंक 2008, संदर्भ - ‘‘नैणसी’’ अङ्क जुलाई 2010 पेज 8, 9 में ‘ष’ व ‘श’ का प्रयोग सरलता के साथ किया गया है। देखें ‘‘नैणसी’’ पृष्ठ - 8 ‘‘ अनेक परीक्षावाँ रा प्रश्न-पत्र चुणता। शोध-विद्यार्थिया रा ग्रन्थ जाँचता, उणरी मौखिक परीक्षा लेता।’’
इस वाक्य में ‘क्ष’, ‘त्र’, ‘श’ का प्रयोग साफ दिखता है।
ऋ - संस्कृति - संस्क्रति
नोट- इन दिनों दोनों ही तरह से प्रयोग को स्वीकार कर लिया गया है। देखें ‘बिनजारो’ पेज 128 अंक 2008
ज्ञ - ज्ञान - ग्यान
नोटः स्वयं श्री केसरीकांत जी ने खुद’री हाइकू कविता म ज्ञान/ विज्ञान शब्दा रो प्रयोग कियो है।
त्र - कूं-कूं पत्री - कूं-कूं पतरी, निमंत्रण - निमंतरण
नोटः इन दिनों ‘त्र’ कां प्रयोग भी सामान्य रूप से होने लगा है देखें - बिणजारो पेज 50 अंक - 2008 अर्थत निमंत्रण और पत्री जैसे शब्दों का प्रयोग देवनागरी की तरह ही राजस्थानी में भी जस का तस ही होने लगा है।

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां-६ - शंभु चौधरी

विवेचनाः
आधुनिक राजस्थानी भाषा में हिन्दी के प्रायः रोजाना इस्तेमाल में आने वाले बहुत सारे शब्द समाहित हो चुके हैं जिसे समझने में कोई विशेष परेशानी नहीं होती है। नीचे के चन्द शब्दों की तरफ विशेष तौर पर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ। जैसे - भ्रस्टाचार(भ्रष्टाचार), मुगती(मुक्ति), हाल (समाचार), सै’योग (सहयोग), संस्क्रति (संस्कृति), मैनत (मेहनत), वैवस्था (व्यवस्था), विसवास (विश्वास), टेसण(स्टेशन), म्हैं(हम), म्हारी (हमारी), हुयग्यौ(हो गये), सुण’र(सुनकर)।
जबकि राजस्थानी भाषा शब्दों के विशाल भंडार में ऐसे भी शब्द हैं जो हिन्दी सहित अन्य सभी भारतीय भाषाओं से अलग हटकर अपना स्वरूप बनाये हुए है। जैसे -
ओळ्यूं, हिवड़ा, सगळा, कोनी, घणौ, पाछा, कुचां, थारा, घणीं, सुहाली, गफ्फी, बटको, अंवेर, अंगेज’र, ओळखाण आदि-आदि।



राजस्थानी - हिन्दी

बीं रो सै’योग करण री हामळ(हामी) भरी।
उसको सहयोग करने की स्वीकृति दी।


अण्णा हजारे रै सागै आखो देस पगां होयग्यो।
अण्णा हजारे के साथ पूरा देश एक हो गया।


हर हिन्दुस्तानी अण्णा हजारे बणग्यो।
हर हिन्दुस्तानी अण्णा हजारे बन गया।


आज आखो देस भ्रस्टाचार सूं मुगती चायै।
आज पूरा देश भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहता है।


ओळ्यूं आवै, ओळ्यूं आवै।
हाल सुणां जद जलम भोम रो,
हिवड़ा में खुशियां नीं मावै।
हिन्दी में
तेरी याद आती है, तेरी याद आती है।
जन्म भूमि का समाचार जैसे ही सुनता हूँ,
मेरा में दिल खुशियों से झूम उठता है।


राजस्थानी - हिन्दी
सै’योग - सहयोग
हामळ, हामी - स्वीकारना
आखो - पूरा
पगां - एक होना
भ्रस्टाचार - भ्रष्टाचार
मुगती - मुक्ति
ओळ्यूं - याद
आवै - आना
सुणां - सुनना
जलम - जन्म
भोम - भूमि
हिवड़ा - दिल, घड़कन
नीं मावै - झूमना, नाचना

बुधवार, 26 अक्टूबर 2011

चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां-५ - शंभु चौधरी


लक्ष्मीनारायण रंगा’र दोहा
लक्ष्मीनारायण रंगा के दोहे

1.
संस्क्रति में घुळर्यों, किसौ कोढियो अंस
घर-घर रावण जनमिया, गांव-गांव में कंस।
हिन्दी में -
संस्कृति में घुल रहा, कैसा कोढ़िया अंस
घर-घर में रावण जन्म लिया, गांव-गांव में कंस।
2.
सदनां मांही चल रया, खुरसी, जूता जंग
जनता पर भी चढरयो, ओ संसदिया रंग।
हिन्दी में -
सदन के अंदर चल रहा, कुर्सी, जूता की लड़ाई
जनता पर भी चढ़ गया, यही संसद का रंग।


रामजीलाल घेड़ेला ‘भारती’ की कविता -
1.
भारत रै लोकतंत्र में
सगळा मौज मनावै।
जिणनै मिलै मौको
लूट-लूट’र खावै ।।


हिन्दी में -
भारतीय लोकतंत्र में
सभी मौज मनाते।
जिनको अवसर मिला
वही लूट-लूट के खाते।।


2.
इण लाकेतंत्र मांय
केइयां रा सूरज छिपै नीं।
रात दिन करै मैनत
उण रा चुल्हा जगै नीं।।


हिन्दी में -
इस लोकतंत्र में
कितनों का सूरज डूबता ही नहीं।
रात दिन मेहनत करे
उनके घर चुल्हा जले नहीं।।


दौलतराम टोडासरा की कविता -
1. दान
मुनीम जी रो
के लागै पल्लैऊं
दे देवै दान
सेठजी रै गल्लैऊं।


2. कीं
बीं में कोनी कीं
जको कैवै कीं
करै कीं?


हिन्दी में -
1. दान

मुनीम जी का
क्या जाता पल्ले से
दे देतें हैं दान
सेठजी के गल्ले से


2. कुछ
उनमें कुछ नहीं
कहता है कुछ
करता है कुछ?


राजस्थानी - हिन्दी
संस्क्रति - संस्कृति
सगळा - सभी
मैनत - मेहनत
केइयां - कितनों
के लागै - क्या जाता
पल्लैऊं - पल्ले से
गल्लैऊं - गल्ले से
बीं में - उनमें
कोनी - नहीं
कीं - कुछ

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां-४ - शंभु चौधरी

राघव अर निधि रौ रिजल्ट निकळ्यौ।
राघव और निधि का रिजल्ट निकल गया।


निधि फस्ट डिविजन पास होगी।
निधि प्रथम श्रेणी से पास हो गई


राघव थर्ड डिविजन होयौ।
राघव तीसरी श्रेणी से पास हुआ।


राघव फूट-फूट कै रोबो लाग्यौ।
राघव फूट-फूट कर रोने लगा।


यादां घणी है, बातां घणी है।
यादें बहुत सी है, बातें भी बहुत है।


म्हैं भावां रै अर यादां रै समन्दर मांय हिबोला खावता।
हम विचारों और यादों के समन्दर में डूबकी लगते हुए।


अखबार छोटो हुवै चायै मोटो।
अखबार छोटा हो या बड़ा।


बाबूजी आपरै टाबरिये सागै मेळो देखण गया।
पिता जी अपने बच्चों के साथ मेला देखने गये।


सारा टाबर सबड़ड़-सबड़ड़ खीर सूंतण लागग्या।
सभी बच्चे खीर को गटकने लगे।


रुपिया री वैवस्था कोनी व्हेइ सकी।
रुपया की व्यवस्था नहीं हो सकी।


ब्याज माथै रुपियां री वैवस्था करावौ।
ब्याज दे दूंगा पर रुपया की व्यवस्था करवा दो।


अगाला दिन बुला’र रुपिया दे’र मदद कीदी।
अगले दिन बुलाकर रुपया देकर मदद किया।


पापाजी घरै कोनी। औ मोबाइल घरै ई रैवे है।
पापा जी घर पर नहीं हैं। यह मोबाइल घर पर ही रहता है।


घणौ जरूरी काम है।
बहुत जरूरी काम था।


वां रो विसवास कोनी राख सक्यौ।
उनका विश्वास नहीं रख सके।


राजस्थानी - हिन्दी
सबड़ड़-सबड़ड़ - चाट-चाट कर खाना
वैवस्था - व्यवस्था
बुला’र - बुलाकर
दे’र - देकर
कोनी - नहीं
घणौ - बहुत
विसवास - विश्वास

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां -३ - शंभु चौधरी

पाठ - 3
रेल मुगलसराय टेसण पर रूकी। - रेलगाड़ी मुगलसराय स्टेशन पर रूकी।
पारवती खड़की सूं झांकी। - पार्वती खिड़की से झांकने लगी।
घणी भीड़ छी। - बहुत भीड़ थी।
टाबर भूखा छा। - बच्चा भूखा था।
दूध लेबा टेसण पे उतरी। - दूध लेने स्टेशन पर उतरी।
बै दिन तो बे ही दिन हा। - वे दिन तो कुछ ओर दिन थे।
गंगासागर सूं पाछा हावड़ा आवतां म्हानै खासी रात पड़गी। - गांगासागर से लौटते वक्त हमें बहुत रात हो गई।
कोलकाता रै बाजार में हर तरै रौ सामान मिलै। - कोलकाता के बाजार में हर तरह का सामान मिलता है।
इंया पल्लौ झाड़ियां काम कोनी चालै। - इस तरह पल्ला झाड़ने से काम नहीं चलेगा।



यहाँ एक जगह ‘री’ एवं दूसरी जगह ’र का प्रयोग हुआ है।
यहां इसका प्रयोग इस प्रकार समझें -

म्हैं म्हारी अम्मी री बात सुण’र चुप हुयग्यौ।
हम हमारी अम्मा की बात सुन कर चुप हो गये।

यहाँ दो जगह ‘री’ का प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ अलग-अलग निकलता है
यहां इसका प्रयोग इस प्रकार समझें -

आठ-बरसां री उडीक पाछै केस री आखरी तारीख आई।
आठ वर्षों से इंतजार करने के बाद केस की आखिरी तारीख्र आई।


राजस्थानी - हिन्दी
टेसण - स्टेशन
खड़की - खिड़की
घणी - बहुत
छी - थी
लेबा - लेने
म्हैं - हम
म्हारी - हमारी
र, रा, री - क, का, की
बै - वे
बे ही - कुछ ओर
हा - थे
सूं - से
पाछा - वापस
आवतां - लोटना
म्हानै - हमें
खासी - बहुत
पड़गी - हो गई
रै - के
तरै - तरह
रौ - का
इंया - इस तरह से
पल्लौ - पल्ला, साड़ी का पल्ला
झाड़ियां - झाड़ना
कोनी - नहीं
चालै - चलेगा

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

राजस्थानी कहावतां-१


राजस्थानी कहावतां -


ऊपर थाली नीचै थाली मांय परोसी डेढ सुहाली।
बांटण आली तेरा जणीं, हांते थोड़ी हाले घणीं।।

दो थाली के बीच में खाने की बहुत सारी सुहाली (मैदे या आंटा से बना हुआ खाने का सामान जो छोटी रोटी नूमा होती है जिसे घी या तेल में तल कर बनाया जाता है) जिसे 13 औरतें खाने वाले को बांटती (भोजन परोसना) है परन्तु खाने वाला ललचाई आंखों से उनको देखते ही रह जाते हैं तब उनमें से एक जन कहता है कि 13 जनी सुहाली लेकर केवल हिल रही है पर देती नहीं है।

अर्थात केवल दिखावा है। आडम्बर अधिक है।


आंधे री गफ्फी बोळै रो बटको।
राम छुटावै तो छुटे, नहीं माथों ई पटको।।

आंघे और बहरे आदमी से पिंड छुड़ाना कठिन कार्य है।


आगम चौमासै लूंकड़ी, जै नहीं खोदे गेह।
तो निहचै ही जांणज्यों, नहीं बरसैलो मेह।।

वर्षाकाल के पूर्व लोमड़ी यदि अपनी ‘घुरी’ नहीं खोदे तो निश्चय जानिये कि इस बार वर्षा नहीं होने वाली है।


इस्या ही थे अर इस्या ही थारा सग्गा।
वां के सर टोपी नै, थाकै झग्गा।

संबंधी आपस में एक-दूसरे की इज्जत नहीं उझालते। इसी बात को गांव वाले व्यंग्य करते हुए कहतें हैं कि यदि आप उनकी उतारोगे तो वह भी अपकी इज्जत उतार देगें दोनों के पूरे वस्त्र नहीं है - ‘‘ एक के सर पर टोपी नहीं तो दूसरे ने अंगा नहीं पहना हुआ है।’’


आज म्हारी मंगणी, काल म्हारो ब्याव।
टूट गयी अंगड़ी, रह गया ब्याव।।

जल्दीबाजी में अति उत्साहित हो कर जो कार्य किया जाता है उसमें कोई न कोई बाधा आनी ही है।


कुचां बिना री कामणी, मूंछां बिना जवान।
ऐ तीनूं फीका लगै, बिना सुपारी पान।।

स्त्री के स्तनों का उभार न हो, मर्दों को मूंछें और पान में सूपारी न होने से उसकी सौंदर्यता नहीं रहती।


दियो-लियो आडो आवै।

दिया-लिया या अपना व्यवहार ही समय पर काम आता है।


धण जाय जिण रो ईमान जाए।

जिसका धन चला जाता है उसका ईमान भी चला जाता है।


धन-धन माता राबड़ी जाड़ हालै नै जाबड़ी।

धन आने के बाद आदमी का शरीर हिलना बन्द कर देता है। इसी बात को व्यंग्य करते हुए लिखा गया है कि राबड़ी खाते वक्त दांत और जबड़ा को को कष्ट नहीं करना पड़ता है।


ठाकर गया’र ठग रह्या, रह्या मुलक रा चोर।
बै ठुकराण्यां मर गई, नहीं जणती ठाकर ओर।।

ठाकुर चले गये ठग रह गये, अब देश में चोरों का वास है।
अब वैसी जननी मर चुकी, जो राजपुतों को जन्म देती थी।।
कहावत का तात्पर्य समाज की वर्तमान व्यवस्था पर व्यंग्य करना है। जिसमें देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करते हुए कहा जा सकता है कि अब देश के लिए कोई कार्य नहीं करता। सब के सब ठग हो चुके हैं जो देश को चारों तरफ को लूटने में लगे हैं।


टुकरा दे-दे बछड़ा पाळ्या,
सींग हुया जद मारण आया।

मां-बाप बच्चों को बहुत दुलार से पालते हैं परन्तु जब वह बच्चा बड़ा हो जाता है तो मां-बाप को सबसे पहले उसी बच्चे की लात खानी पड़ती है।


जावै तो बरजुं नहीं, रैवै तो आ ठोड़।
हंसां नै सरवर घणा, सरवर हंस करोड़।।

जाने वाले को रोकना नहीं चाहिए, वैसे ही ठहरने वाले को जगह देनी चाहिए। जिस प्रकार हंस को बहुत से सरोवर मिलते हैं वैसे ही सरोवर को भी करोड़ों हंस मिल जाते हैं। अर्थात किसी को भी घमण्ड नहीं करना चाहिए।


जात मनायां पगै पड़ै, कुजात मनायां सिर चढ़ै।

समझदार व्यक्ति को समझाने से वह अपनी गलती को स्वीकार कर लेता है जबकि मूर्ख व्यक्ति लड़ पड़ता है।


राजस्थानी शब्दों का हिन्दी अर्थ

आंधे री गफ्फी - अंधे से हाथ, आली - क्रिया स्त्री., आडो - समय पर, इस्या - ऐसे ही, कामणी - स्त्री, कुचां - स्तन, कुजात - मूर्ख या ना समझ, गेह - घर, घणीं, घणा - अधिक, बहुत, जाड़ - दांत, जाबड़ी - जबड़ा, जांणज्यों - जानिये, जणीं - स्त्री, जिण रो - जिसका, जात - समझदार, परोसी - बांटना, बोळै रो बटको - बहरे को समझाना, बरजुं - रोकना मेह - वर्षा, मांय - बीच में, मुलक - देश, डेढ - बहुत सारी, ठोड़ - जगह, तेरा - 13, थे - आप, थारा - आपका, थाकै - आपके, निहचै - निश्चय, लूंकड़ी - लोमड़ी, वां के - उनके, सुहाली - मैदे या आंटा से बना हुआ खाने का सामान जो छोटी रोटी नूमा होती है जिसे घी या तेल में तल कर बनाया जाता है। हांते -देना, हाले - हिलना।


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प्रकाशकः राजस्थानी साहित्य एवं संस्कृति जनहित प्रन्यास
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शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां- २ - शंभु चौधरी

पाठ - 2


राजस्थानी-
लोक साहित्य संसार रा सगळा देसां कै सगळै मानखै री सुभाविक चेतना, जीवन रा बिस्वास अर संस्कृति रौ साचै प्रतीक हुया करै। साहित्य दो भागां मै बांटीज्यो है। पैलो लोक साहित्य अर दूजी सिस्ट साहित्य। लोक साहित्य आतमा सूं जुड़ियोड़ी विद्या है। आ सिस्ट साहित्य सूं जूनी है। समाज री भांत-भंतीली जड़ां अर बिगसाव री डाळ्यां रौ चितराम लोक साहित्य मै मिलै जको आपां रै सिस्ट साहित्य मै मिलणी मुसकल। - उजास ग्रन्थ माला से


हिन्दी -
लोक साहित्य संसार के समस्त देशों के समस्त मानव जाति का स्वाभविक चेतना, जीवन का विश्वास और संस्कृति का सच्चा प्रतिनिधित्व करती है। साहित्य को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला लोक साहित्य एवं दूसरा आम साहित्य। लोक साहित्य आत्मा से जूड़ी हुई विद्या है। वहीं आम साहित्य का सृजन किया जाता है। समाज से जूड़ी कई प्रकार की जीवन शैली के विकास की शाखाओं का फैलाव जो लोक साहित्य में देखने को मिलता है वैसा आम साहित्य में देखना असंभव सा है। - उजास ग्रन्थ माला से


राजस्थानी - हिन्दी
सगळा, सगळै - समस्त
मानखै, मिनख - मानव
सुभाविक - स्वाभविक
बिस्वास - विश्वास
साचै - सच्चा
बांटीज्यो - बांटा जा सकता
पैलो - पहला
दूजी - दूसरा
सिस्ट - आम
आतमा - आत्मा
जुड़ियोड़ी - जूड़ी हुई
सूं जूनी - सृजन किया
भांत-भंतीली - कई प्रकार की
बिगसाव - विकास
डाळ्यां - शाखाओं
चितराम - फैलाव
मुसकल - असंभव सा, मुश्किल


राजस्थानी -
लोक साहित्य संसार रा सगळा देसां कै सगळै मानखै री सुभाविक चेतना, जीवन रा बिस्वास अर संस्कृति रौ साचै प्रतीक हुया करै।
हिन्दी -
लोक साहित्य संसार के समस्त देशों के समस्त मानव जाति का स्वाभविक चेतना, जीवन का विश्वास और संस्कृति का सच्चा प्रतिनिधित्व करती है।


राजस्थानी -
साहित्य दो भागां मै बांटीज्यो है। पैलो लोक साहित्य अर दूजी सिस्ट साहित्य।
हिन्दी -
साहित्य को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला लोक साहित्य एवं दूसरा आम साहित्य।


राजस्थानी -
लोक साहित्य आतमा सूं जुड़ियोड़ी विद्या है। आ सिस्ट साहित्य सूं जूनी है।
हिन्दी -
लोक साहित्य आत्मा से जूड़ी हुई विद्या है। वहीं आम साहित्य का सृजन किया जाता है।


राजस्थानी -
समाज री भांत-भंतीली जड़ां अर बिगसाव री डाळ्यां रौ चितराम लोक साहित्य मै मिलै जको आपां रै सिस्ट साहित्य मै मिलणी मुसकल।
हिन्दी -
समाज से जूड़ी कई प्रकार की जीवन शैली के विकास की शाखाओं का फैलाव जो लोक साहित्य में देखने को मिलता है वैसा आम साहित्य में देखना असंभव सा है।

चाळो राजस्थानी बांचणो सीखां- १ - शंभु चौधरी

पाठ - 1


राजस्थानी-
किणी भी समाज रै जातीय-चरित्र री खरी-खरी ओळखाण उणरै लोक-साहित्य सूं हुय सकै। उण समाज रा मोल अर मानतावां कांई है? उणरी नैतिक अवधारणावां कांई है? वो समाज कुणसा जीवनदर्शां नैं अंगेज’र चालै है। उणरै जीवण री रीत-भांत कांई है? बो कुण-सी जातीय स्मृतियां नैं अंवेर राखणो चावै है, आद-आद मोकळी बातां री जाणकारी उण समाज रै लोक-साहित्य सूं हुय सकै है। जो समाज जितरो परम्परा-समृद्ध, सांस्कृतिक दीठ सूं जितरो सजग अर जीवन-रस सूं जितरो लबालब है उणरो लोक-साहित्य भी उतरो ही सांवठो, रस अर रंग भीनो हुया करै है। - उजास ग्रन्थ माळा से
हिन्दी-
चलैं राजस्थानी पढ़ना सीखतें हैं।
किसी भी समाज के जातिय-चरित्र की सच्चाई की जानकारी उस समाज के लोक-साहित्य से हो सकती है। उस समाज की हैसियत और मान्यता क्या है? उनकी नैतिक अवधारणा कैसी है? वह समाज किनके जीवन-दर्शनों का अनुशरण करता है। उनके जीवन की रीत-भेष-भूषा कैसी है? वह कौन सी जातीय स्मृतियों को बचाकर रखना चाहता है, आदि-आदि बहुत सी बातों की जानकारी उनके समाज के लोक-साहित्य से हो सकती है। जो समाज जितना परम्परा-समृद्ध सांस्कृतिक विचारधाराओं से जितना सजग और जीवन-रस से जितना लबालब है उनका लोक-साहित्य भी उतना ही समृद्ध, रस और रंग से भरा हुआ करता है। - उजास ग्रन्थ माळा से

राजस्थानी- हिन्दी
खरी-खरी - किसी बात को हूबहू बताना
ओळखाण - जानकारी होना
उण, उणरै, उणरी - उन, उनके, उनकी
मानतावां - मान्यता
कांई - क्या
कुणसा - कौन सा
कुण-सी - कौन सी
अंगेज’र - अनुशरण करना
चालै- चलना
रीत-भांत - रीत-रिवाज
अंवेर - बचाना, संभालना
राखणो - रखना
चावै - चाहना
आद-आद - आदि-आदि
मोकळी - बहुत सी
बातां - बातें
दीठ - रूप में
जितरो - जितना
सांवठो - समृद्ध, मजबूत पक्ष
भीनो - भींगा हुआ


राजस्थानी-
किणी भी समाज रै जातीय-चरित्र री खरी-खरी ओळखाण उणरै लोक-साहित्य सूं हुय सकै।
हिन्दी-
किसी भी समाज के जातीय चरित्र की सच्चाई की जानकारी उस समाज के लोक-साहित्य से हो सकता है।


राजस्थानी-
उण समाज रा मोल अर मानतावां कांई है? उणरी नैतिक अवधारणावां कांई है?
हिन्दी-
उस समाज की क्या हैसियत और मान्यता क्या है? उनकी नैतिक अवधारणा कैसी है?


राजस्थानी-
वो समाज कुणसा जीवनदर्शां नैं अंगेज’र चालै है।
हिन्दी-
वह समाज किनके जीवन दर्शन का अनुशरण करता है।


राजस्थानी-
उणरै जीवण री रीत-भांत कांई है?
हिन्दी-
उनके जीवन की रीत-भेष-भूषा कैसी है?


राजस्थानी-
बो कुण-सी जातीय स्मृतियां नैं अंवेर राखणो चावै है।
हिन्दी-
वह कौन सी जातीय स्मृतियों को बचाकर रखना चाहता है।


राजस्थानी-
आद-आद मोकळी बातां री जाणकारी उण समाज रै लोक-साहित्य सूं हुय सकै है।
हिन्दी-
आदि-आदि बहुत सी बातों की जानकारी उनके समाज के लोक-साहित्य से हो सकती है।


राजस्थानी-
जो समाज जितरो परम्परा-समृद्ध, सांस्कृतिक दीठ सूं जितरो सजग अर जीवन-रस सूं जितरो लबालब है।
हिन्दी-
जो समाज जितना परम्परा-समृद्ध सांसकृतिक विचारधाराओं से जितना सजग और जीवन-रस से जितना लबालब है।


राजस्थानी-
उणरो लोक साहित्य भी उतरो ही सांवठोए रस अर रंग भीनो हुया करै है।
हिन्दी-
उनका लोक साहित्य भी उतना ही समृद्ध, रस और रंग से भरा हुआ, हुआ करता है।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

कोलकाता में बने राजस्थान भवन –केशव भट्टड़

  • बंगाली समाज के साथ राजस्थानी मध्यमवर्ग का सांस्कृतिक संवाद जरुरी
  • मारवाड़ी संस्थाएं अपनी कला-संस्कृति का करे बंगाल में प्रदर्शन


    कोलकाता 23 अप्रेल कोलकाता राजस्थान संस्कृतिक विकास परिषद के तत्वावधान में शनिवार को राजस्थान सूचना केंद्र में “बंगाल के राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन में मध्यम वर्ग की भूमिका – विशेष सन्दर्भ: मारवाड़ी समाज” विषयक संगोष्ठी का आयोजन कथाकार-संपादक दुर्गा डागा की अध्यक्षता में किया गया अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में दुर्गा डागा ने कहा कि यह बहुत ही गंभीर विषय है मारवाड़ी मध्यमवर्ग प्रतिभा और उर्जा से भरा हुआ है उसके पास सपने हैं राजनीतिक और सांस्कृतिक जागरूकता के लिए सामाजिक संस्थाएं पहल करे कार्यक्रम के लिए समाज के लोगों को लेकर परामर्शमंडल बनाये और समाज में जागरूकता लाने का कार्य करे बंगाल के संस्कृतिकर्मियों से मेलजोल और संवाद हो सरकार के काम-काज पर सजगता से ध्यान रखें और संस्थाओं के माध्यम से अपनी आवाज़ उठायें मध्यम वर्ग के लड़के-लड़कियां राजनीति में रुचि लेकर आगे आये साहित्य पढ़ने से व्यक्तित्व का विकास होता है और जड़ों को समझने में आसानी सामजिक कार्यक्रमों में धर्म का विकल्प देने का प्रयास होना चाहिए मुख्य वक्ता पत्रकार विशम्भर नेवर ने कहा कि सारा मारवाड़ी समाज धार्मिक कार्यक्रमों में लगा है-राजनीति कौन करे? राजनीति में गठबंधन बंगाल से शुरू हुआ समाज में जो सांस्कृतिक रिसाव हो रहा है उसे रोकना जरुरी है वाम-सरकार का फायदा मारवाड़ियों ने उठाया अमुक राजनीतिक पार्टी अमुक को टिकट दे या तमुक को , इसका निर्णय वो राजनीतिक पार्टी ही करेगी मारवाड़ियों में सांगठनिक शक्ति होगी, तो पार्टियां उनके पीछे आएँगी पत्रकार राजीव हर्ष ने कहा कि मध्यमवर्ग समाज के आयाम निर्धारित करता है वैल्यू की स्थापना मध्यम वर्ग करता है महंगाई और अप-संस्कृति से यही वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होता है मध्यम वर्ग अपनी नैतिकता के दायरे में बंधा रहता है मध्यम वर्ग की रोज़गार परिस्थितियां उसे अन्य गतिविधयों में शामिल होने की अनुमति नहीं देती विज्ञान, कला संकाय आदि क्षेत्रों में हम कहाँ है? मारवाड़ी को डरपोक और पैसा कमाने वाले की संज्ञा दे दी गयी जागरण, भगवत कथा, धार्मिकता पर जितना ध्यान देते है उसमे से समय निकालकर अन्य चीजों पर भी ध्यान दे- राजस्थानी साहित्य-संस्कृति-कला की प्रदर्शनिया हो कथाकार विजय शर्मा ने कहा कि विश्लेषण न कर कार्य योजना बनाये बंगाली से बात करनी है तो उनके सिनेमा, साहित्य, संस्कृति में उसके समकक्ष खड़ा होना होगा हमारे कार्यों में पारदर्शिता होनी चाहिए मारवाड़ियों की तमाम खूबियां बयां करने वाली कहानियां खत्म हो रही है और हर्षद-हरिदास की कहानियां हावी हो रही है पत्रकार सीताराम अग्रवाल ने कहा कि मध्यम वर्ग समाज के उच्च और निम्न वर्ग के बीच सेतु का कार्य करता है मारवाड़ी मध्यम वर्ग अपनी ताक़त को पहचान ही नहीं पाया संगठन का ककहरा यहाँ के लोगो को मारवाड़ियों ने सिखाया, वे प्रदर्शन और दिखावे से बचे रहे सामाजिक संगठनो में कार्यकर्ताओं को सम्मान देना होगा, तभी एक शक्ति के रूप में यह वर्ग उभरेगा क़ानूनी सलाहकार ध्रुवकुमार जालन ने कहा कि हमने अपनी ताक़त नहीं पहचानी फिजूलखर्ची रोकनी होगी और उर्जा राजनीतिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में लगानी होगी डॉ.कडेल ने कहा कि मारवाड़ी लेखक-पत्रकारों ने मारवाड़ी समाज की समस्याओं पर लिखा ही नहीं नेतृत्व देने वाले खुद सामने आते है या समाज उन्हें ढूंढ निकलता है मारवाड़ी समाज का मध्यम वर्ग आत्मसम्मान विस्मृत कर चूका है तो इसकी क्या भूमिका रह जाति है सञ्चालन करते हुए केशव भट्टड़ ने कहा कि बंगाल में बंगाली मध्यमवर्ग जागरूक और संगठित है उनका नेतृत्व मध्यमवर्ग से आता है बुद्धदेव भट्टाचार्य हो, या ममता बनर्जी, ये सभी निम्न-मध्यवित्त वर्ग से आतें है, लेकिन मारवाड़ियों में इसका अभाव है पहले और वर्तमान में यह बड़ा अंतर आया है कोलकाता-राजस्थान की पृष्ठभूमि पर सत्यजित राय की फिल्म ‘सोनार किल्ला’ को उदाहरण रूप में रखते हुए उन्होंने कहा कि फ़िल्म में राय बताते हैं कि बंगाल के बंगाली और मारवाड़ी मध्यमवर्ग के बीच संवाद नहीं है, जो होना चाहिए कोलकाता में राजस्थान भवन की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि मीरा को सामने रखकर मारवाड़ी मध्यमवर्ग बंगाली मध्यमवर्ग के साथ सांस्कृतिक संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान करें राजस्थानियों ने बंग प्रदेश में अपनी नागरिक पहचान नहीं बनायीं वे राजनीति में सीधे हस्तक्षेप से बचते हैं पर्यटकों के रूप में बंगाली समुदाय राजस्थान को प्राथमिकता देता है, लेकिन राजस्थानियों से उसका परिचय सांस्कृतिक रूप से नहीं हुआ यह विडम्बना है अतिथियों और श्रोताओं का पुष्पों से स्वागत संयुक्त संयोजक गोपाल दास भैया ने और आभार संयुक्त संयोजक बुलाकी दास पुरोहित ने किया


    केशव भट्टड़
    संयोजक, 9330919201
    कोलकाता-राजस्थान संस्कृतिक विकास परिषद
    10/1 सैयद सालेह लेन, कोलकाता-700073
    फैक्स: 033 22707978

  • शनिवार, 24 सितंबर 2011

    मारवाड़ी समाज के स्वतंत्रता सेनानी

    प्रस्तुति- शंभु चौधरी


    बिहार-

    स्व.राधूमल मोटानी (बेतिया), स्व. हीरालाल सराफ (दिघवारा), सन्तलाल जैन, स्व. बनारसी लाल झूनझूनवाला, स्व.हरनारायण जैन, शुभकरण चूड़ीवाला, हनुमान प्र.शर्मा (भागलपुर), स्व.प्रभूदयाल हिम्मतसिंहका, बिनायक प्र.हिम्मतसिंहका (दुमका एवं कोलकाता),स्व. मोतीलाल केजड़ीवाल, स्व. गौरीशंकर डालमिया, स्व. नथमल सिघानियां, स्व. रामेश्वरलाल सराफ (देवघर), स्व. हरीराम गुटगुटिया, द्वारका प्र. गुटगुटिया (मधुपुर), स्व.बनारसी लाल सराफ, रामजीवन हिम्मतसिंहका, नारायण प्र.अग्रवाल-जज (जमालपुर), रावतमल अग्रवाल (किशनगंज), रामेश्वर प्र.झूनझूनवाला (पटना सिटी), स्व.नागरमल मोदी (रांची)


    आसाम प्रान्त-
    स्व.रूपकंवर ज्योतिप्रसाद अगरवाला, स्व. गणेश प्रसाद फोगला, स्व. छगनलाल जैन(गुवाहाटी), नन्दराम जैन(गोलाघाट), पद्मसुख अग्रवाल(सोरुपचार), भगवती प्रसाद लड़िया(गोलाघाट)


    बंगाल प्रान्तः
    स्व.बसंतलाल मुरारका, स्व.सीताराम सेकसरिया, भालचन्द शर्मा, राधकृष्ण नेवटिया, श्रीमती इन्दुमती गोयनका, ज्ञानदेवी लाठ, जमुनादेवी नेवटिया, मेघराज सेवक, कर्नल डा.रामजी लाल काशलीवाल(आजाद हिन्द फौज), सभी कोलकाता से।


    उड़ीसा प्रान्त-
    ज्वाला प्रसाद सरावगी(बालासोर), स्व.लक्ष्मी नारायण सरावगी, भोलानाथ साह, सूरजमल साह(पुरी), प्रहलादराय लाठ, शिवचन्द्र अग्रवाल(संबलपुर)।


    महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश प्रान्त -

    स्व.जमनालाल बजाज, स्व.जानकी देवी बजाज, स्व.कृष्ण दास जाजू, श्री रामकृष्ण बजाज, दामोदर दास मुंदड़ा, प्रहलाद पोद्दार, नर्मादा देवी भैया (वर्धा), धनवती बाई रांका, छगनलाल भारुका, मगनलाल बागड़ी, सतीदास मुँदड़ा, पन्नालाल देवड़िया(नागपुर), बरार केशरी स्व.बृजलाल बियाणी, राधादेवी गोयनका(आकोला), मानिकलाल सोढ़ानी, सुमनचंद तापड़िया, रघुनाथ मल कोचर, सुदर्शन वकील(अमरावती), स्व.गोविंददास मालपाणी(जबलपुर), ओंकार दत्त(बलडाना), मंगलचंद सिंघवी(नरसिंहपुर), दालचंद जैन(बालाघाट), शहिद उदय चन्द, मन्नूलाल मोदी(मण्डल), मोहनलाल बाकलीवाला(दुर्ग), पं.बंशीधर, सुमन चन्द लुँडावत(सागर), मूलचंद बागड़ी(रायपुर), दीपचंद गोठी(बेतूल), रामकुमार अग्रवाल(यावतमाल)


    मुम्बई शहर -
    कुन्दनलाल फिरौदिया(अहमदनगर), स्व.रामकृष्ण धूत(हैदराबाद), मदनलाल जालान, श्रीनिवास बगड़का, इन्दरमल मोदी, रतनलाल जोशी, जमुनादास अडूकिया, मदनलाल पित्ती, रामकृष्ण जाजू, मुरलीधर आसावा(माहेश्वरी), मुरलीधर शारदा, शहीद बालकृष्ण शारदा(सोलापुर), लक्ष्मीचन्द आवड़, बंकालाल लाहौटी(नासिक), रमणीक लाल मोदी, पं.बेचरदास न्यायतीर्थ(अहमदाबाद), परमेश्वरी दास न्यायतीर्थ(सूरत)


    उत्तर प्रदेश -

    स्व.गजानन्द टिबड़वाल, रामकृष्ण प्रसाद कोट, ऋषिकेश सराफ, बंशीधर गुप्ता(गाजीपुर), स्व. महावीर प्रसाद पोद्दार, स्व.आनन्द शंकर पोद्दार, विट्ठलदास मोदी(गोरखपुर),विष्णुदत्त शर्मा(मिर्जापुर),चितरंजन कुमार(इलाहाबाद), रामचन्द्र मुसद्दी ‘आर्य’ , श्रीदेवी मुसद्दी, हीरालाल शर्मा, जयनारायण गायनका, हनुमान प्रसाद शर्मा, वैद्यराज कन्हैयालाल, आयुर्वेदाचार्य सुन्दारलाल जैन(कानपुर),स्व.चान्दमल जैन, अंगूरी देवी, नेमीचन्द जैन, बसन्त लाल, रतन लाल बंसल, मानिक चन्द जैन(आगरा), निर्मल कुमार जैन, श्याम लाल सत्यार्थी, सरबती देवी, धनपाल सिंह, रामस्वरूप भारतीय, पन्नालाल जैन(सरल), मास्टर मोती लाल(फिरोजाबाद), रामस्वयप जैन, नुणाधरलाल(मैनपुरी), झूमन लाल, श्रीमती लक्ष्मी देवी जैन,शहीद प्रकाश जैन(सहारनपुर), नेमीचन्द जैन, एडवोकेट, शीलावती देवी(बिजनौर), जगदीश प्रसाद नारायण, पं.शीलचन्द शास्त्री(बहराईच), हीरालाल शाह(नैनीताल), सुमीत प्रसाद, मामचन्द, सुख्रबीर सिंह घी वाले(मुजफ्फरपुरनगर), हकीम टीकम चन्द, प्रेमकुमारी ‘विशारद’, गंगा देवी(मुरादाबाद), नरेन्द्र कुमार जैन(देहरादून), मास्टर हरदयाल जैन(अलीगढ़), वैद्यभूषण मथूरा प्रसाद जैन, केशर बाई जैन, मोतीलाल ठेडेया, धन्ना लाल गुड़ा(झांसी)।


    दिल्ली- स्व.पार्वती देवी डिडवानियां, स्व. केदारनाथ गोयनका, अयोध्या प्रसाद गोयनका, मदनलाल सोढ़ाणी(दिल्ली)।


    पंजाब व अन्य प्रान्त -
    नेकीराम शम्बा, फोकचन्द्र शास्त्री(हिसार),मेलाराम वैश्य(भिवानी), पं.रामकृष्ण विशाल, हरदत्त सुगला, रामचन्द्र वैद्य, लाला श्याम लाल, श्रीमती चन्दन बाई(लाहौर), तनसुख राय जैन(रोहतक),कीर्ति प्रसाद, वकील(गुजराना वाला), लेखवती जैन(अम्बाला), रामपाल जैन, स्व. तुलाराम (गुड़गांव) ।


    राजस्थान- स्व. अर्जून लाल सेठी(जयपुर), पं. हरिभऊ उपाध्याय, जीतमल लूणियाँ एवं श्रीमती सरदार बाई लूणियाँ ( अजमेर)।


    साभार - स्वतंत्रता संग्राम व मारवाड़ी समाज , लेखक स्व हरिराम गुटगुटिया

    गुरुवार, 16 जून 2011

    मारवाड़ी युवा मंच एक अवलोकन - शम्भु चौधरी

    Shambhu Choudhary
    विगत 75 वर्षों से देश के विभिन्न प्रान्तों में सामाजिक रूप से संगठित मारवाड़ी समाज की अनेक संस्थाएँ अपने-अपने कार्यक्षेत्र में कार्य करते हुए समाज के युवकों को भी संगठित कर उनके मानसिक व शारीरिक विकास को केंद्रीत कर कई योजनाओं को साकार करते रहे हैं। जिनमें प्रमुखतः मुम्मबई मारवाड़ी सम्मेलन, मारवाड़ी युवा सम्मेलन-गुवाहाटी, मारवाड़ी युवक संघ- वाराणसी, रानीगंज एवम् मारवाड़ी व्यायामशाला- कोलकाता, मुजफ्फरपुर व भागलपुर इसके अलावा सैकड़ों जगह* मारवाड़ी समाज ने चिकित्सालय, पुस्तकालाऐं, विद्यालयों, धर्मशालाओं आदि का निर्माण भी किये गये। इन सबके वाबजूद समाज के कुछ चिन्तशील युवकों में एक कमी हमेशा खटकती रहती कि मारवाड़ी समाज के युवकों का एक राष्ट्रीय स्तर का एक संगठन होना चाहिये। इस दिशा में अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन लगातार प्रयासरत रही परन्तु अधिवेशनों में एक सत्र से आगे इनका प्रयास कभी भी सफल नहीं रहा। स्व. भंवारमल सिंघी व इनकी पत्नी स्व. श्रीमती सुशीला सिंघी के विचारों में इस बात की चिन्ता साफ झलकती दिखाई देती रहती कि देश में मारवाड़ी समाज का एक सुदृढ़ संगठन की नींव जल्द से जल्द रखी जानी चाहिये। इसी काल में श्री रतन शाह का नाम बड़ी तेजी के साथ उभर कर सामने आने लगा। देशभर में अयोजित मारवाड़ी सम्मेलन के अधिवेशनों में इनके भाषणों का विशेष प्रभाव समाज के युवकों में साफ प्रलक्षित होने लगा था। परन्तु सफल नेतृव का अभाव तब भी खटकता नजर आ रहा था।
    सन् 1977 में असम के गुवाहाटी शहर में समाज के कुछ युवकों ने मिलकर पूर्वोत्तर प्रदेशीय मारवाड़ी सम्मेलन - युवा मंच का गठन कर लिया गया। यहाँ हम एक बात को उल्लेख करना जरूरी समझता हूँ कि यदि हम मंच के स्थापना काल की बात करें तो स्थापनाकाल के युवकों का नाम मंच के किसी भी दस्तावेज में पढ़ने को नहीं मिला। 1985 में आयोजित मायुम के प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन में बतौर स्वागत मंत्री श्री अनिल जैना ने अधिवेशन के अवसर निकाले गये विशेषांक में जिनके नामों का उल्लेख किया वे इस प्रकार हैं ^^अधिवेशन के प्रचारार्थ श्री नन्द किशोर जालान[स्व.], अध्यक्ष-अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन द्वारा दिया गया समयदान एवं किया गया श्रमदान युवामंच के अधिकारियों के लिये अनुकरणीय आदर्श रहेगा। श्री डॉ गिरधारी लाल सराफ[स्व.], महामंत्री-पूर्वोत्तर प्रदेशीय मारवाड़ी सम्मेलन एवं श्री जयदेव खंडेलवाल [स्व.], अध्यक्ष-पूर्वोत्तर प्रदेशीय मारवाड़ी सम्मेलन का अधिवेशन के प्रचारार्थ अवदान न केवल सराहनीय रहा, बल्कि युवा साथियों के लिये प्रेरणा का स्त्रोत भी बना। इस संदर्भ में युवा साथी श्री हरि प्रसाद शर्मा, श्री विनोद मोर, श्री पवन सीकारीया, श्री मुरलीधर तोशनीवाल, श्री सरोज जैन, श्री कमल अगरवाल, श्री निरंजन धीरसरीया, श्री संजीव गोयल, श्री प्रमोद जैन, श्री प्रकाश पंसारी आदि का सहयोग न केवल उल्लेखनीय है बल्कि अधिवेशन की कल्पित सफलता का मूल कारण भी।**

    मारवाड़ी युवा मंच का सांगठनिक ढांचा त्रीस्तरीय प्रणाली है। जिसका संचालन अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच के संविधान में वर्णीत नियमों व मंच दर्शन के अन्र्तगत कार्य करता है। जिसमें 18 साल से 45 वर्ष के युवक व युवतियों को ही सदस्य बनाया जा सकता है। मंच के सक्रिय सदस्य 45 वर्ष की आयु तक रहा जा सकता है जबकि इसमें प्रवेश की आयु सीमा 40 तक ही है। सन् 1984 में पूर्वोत्तर प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन-युवा मंच के प्रान्तीय अध्यक्ष श्री सुरेश बेड़िया के सदप्रयासों के परिणाम स्वरूप 17 जनवरी, 1985 को अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन गुवाहाटी के प्रसिद्ध गौशाला के प्रगंण में हुआ जिसमें मंच संगठन के प्राण सूत्रधार समाज के असम के वरिष्ठ अधिवक्ता व चिन्तक श्री प्रमोद्ध सराफ ने संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष का पदभार ग्रहण किया। प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान असम के बहार जिन जगहों के दौरे किये गए वे निम्न प्रकार है।-
    1. 23 नवम्बर से 7 दिसम्बर, 84 तक उत्तर बंगाल व उत्तर-पूर्व बिहार जिनमें सर्वश्री नन्दकिशोर जालान [स्व.], प्रमोद्ध सराफ, हरिप्रसाद शर्मा, पवनकुमार सिकारिया व बिनोद कुमार मोर जिसमें श्री जालान जी कोलकाता से बाकी सभी असम से थे।
    2. 16 से 23 दिसम्बर, 84 उत्कल व दक्षिण बिहार जिनमें सर्वश्री गिरधारीलाल सराफ [स्व.], हरिप्रसाद शर्मा, मुरलीधर तोषनीवाल एवं सरोजकुमार शर्मा सभी असम से।
    3. 29 दिसम्बर 84 से 8 जनवरी 85 दक्षिण भारत, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटका, आन्ध्र प्रदेश व तामिलनाडु इस यात्रा में सर्वश्री नन्दकिशोर जालान[स्व.]- कोलकाता, निरंजन लाल धिरासारिया-असम, संजिव गोयल-असम, रामनिवास शर्मा [स्व.] व भगतराम गुप्ता- आन्ध्रा।
    क्रमवार विगत राष्ट्रीय अधिवेशन की तालिका निम्न प्रकार हैः-
    1. 18-20 जनवरी, 1985-88 गुवाहाटी -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री प्रमोद्ध सराफ,
    राष्ट्रीय महामंत्री श्री पवन सिकारिया
    2. 08-10 अप्रैल, 1988-91 दिल्ली -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री अरुण बजाज,
    राष्ट्रीय महामंत्री श्री निर्मल दोषी
    3. 23-25 फरवरी, 1991-94 सिल्लीगुड़ी -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री ओम प्रकाश अग्रवाल,
    राष्ट्रीय महामंत्री श्री संतोष कानोडिया
    4. 21-23 जनवरी, 1994-96 कोलकाता -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री पवन सिकरीया,
    राष्ट्रीय महामंत्री श्री राजकुमार गारोदिया[स्व.]
    5. 27-29 दिसम्बर, 1996-2000 धनबाद -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री प्रमोद शाह,
    राष्ट्रीय महामंत्री श्री महेश शाह
    6. 07-09, जनवरी, 2000-2002** जमशेदपुर -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री अनिल जैना,
    राष्ट्रीय महामंत्री श्री प्रमोद जैन
    7. 29-31 दिसम्बर, 2002-2006 कटक -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री बलराम सुल्तानिया,
    राष्ट्रीय महामंत्री श्री पुरुषोत्तम शर्मा
    8. 31दिसम्बर से 2जनवरी 2006-2008 रायपुर -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री अनिल जाजोदिया,
    राष्ट्रीय महामंत्री श्री मनमोहन लोहिया
    9. 25-28 दिसम्बर, 2008-2011 रांची -राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री जितेन्द्र गुप्ता,
    राष्ट्रीय महामंत्री श्री संजय अग्रवाल(डॉक्टर एक्यूप्रेशर चिकित्सा)
    आज मंच 600 से अधिक सक्रिय शाखाओं व 30 हजार से अधिक सदस्यों के माध्यम से देशभर में अपनी लोकप्रियता प्राप्त कर गत वर्ष ही अपना 25वां सालगिरह मना चुकी है। मंच के प्रमुख उद्देश्य में सबसे प्रथम में हमारी यह योजना रही कि समाज के युवकों को एक सूत्र में पीरो हम किस जनउपयोगी कार्यों में लगाना रहा है। एक समय इस प्रकार का दौर भी सामने आया कि समाज के युवक खुद को मारवाड़ी कहलाने में संकोच करने लगे थे। हम अपने आत्म सम्मान के प्रति काफी चिंतित रहने लगे। जगह-जगह मारवड़ी समाज अभद्र टिप्पणियों का शिकार होने लगा था। गुजराती शब्दकोश, फिल्मी धारावाहिक सीरियल, राजनेताओं के अपमान जनक बयान समाज के युवकों को झकझोर दिया।
    उस समय असम में छात्र आन्दोलन काफी जोरों पर था, असमगण परिषद के आन्दोलन से समाज के हजारों युवक जुड़ चुके थे। परन्तु समाज के युवकों को बार-बार एक बात खटकती रही कि समाज के युवक दिशाहीन होने से किस तरह रोका जा सके। जो युवक पढ़ लिख नौकरी करने लगते वे या तो खुद को समाज से अलग समझने लगते या समाज में पैसे की प्रतिष्ठा के आगे उनकी पहचान लुप्त नजर आती। कुछ तो समाज को असभ्य समाज तक कहने में संकोच नहीं करते। स्व. भंवरमल सिंघी जी ने अपनी डायरी में एक बार लिखा कि जब वे वाराणसी विश्वविद्यालय में पढ़ते थे तो बिहार या असम की तरफ से आने वाली ट्रेनों में मारवाड़ियों को देख उन्हें बड़ा सदमा होता कि यह समाज कितना अनपढ़ और रूढ़ीवादी परम्परा से ग्रस्त है। उनके दिमाग में मारवाड़ी समाज की छवि बहुत बिगड़ चुकी थी, सो उन्होंने खुद को राजस्थानी समझना ही बेहतर विकल्प समझा। पर पढ़ाई समाप्त कर उनको कार्य करने के लिए कोलकाता आना हुआ, कोलकाता आने पर उनको लगा कि समाज में सिर्फ पैसेवाले की पूछ होती है। इसी कार्यकाल में स्व. सीताराम सेक्सरिया, स्व.भागीरथ कानोडिया एवं सम्मेलन के श्री ईश्वरदास जालान से उनकी मुलाकात ने उनके विचारों को झकझौर दिया। समाज में बदलाव का दौर शुरू होने लगा। देश के हर कोने से आवाज आने लगी। एक अखबार में छपे लेख से वे इतने विचलित हुए कि उन्होंने जबाब में एक लेख लिखा- ‘‘मैं मारवाड़ी हूँ’’ इस लेख की सारे देश से प्रतिक्रिया आने लगी। हिन्दी साहित्यवर्ग सिंघी जी इस स्वरूप को देख चकित हो गये। प्रायः सम्मेलनों में उनका मुख्य विषय समाज सुधार जिसमें विधवा विवाह, प्रर्दा प्रथा एवं समाज की राजनीति में सक्रिय भागीदारी के साथ-साथ युवकों को सामने आकर समाज की बागडोर संभालने हेतु मारवाड़ी युवकों को ललकारना शुरू किया। समाज के पढ़े लिखे युवक व संपन्न घराना खुद को लायन्स-लियो मानने लगे। जबकि मारवाड़ी कहलाने में संकोच करते थे। एक तरफ समाज में सांस्कृतिक हमला हो रहा था तो दूसरी तरफ समाज का धन समाज के द्वारा जनसेवा में खर्च होने के वावजूद मारवाड़ियों को गाली सुननी पड़ती। इसी दौरान असम के युवा साथियों ने कसम ले ली कि किसी भी तरह समाज के युवकों को एक सूत्र में पिरोया जाय।
    मंच ने समाज और राष्ट्र की प्रमुख समस्याओं को ध्यान में रखते हुए मंच दर्शन का निर्माण श्री प्रमोद्ध सराफ के दिशा निर्देशन में किया गया। मंच दर्शन के निर्माण में जिन बिन्दूओं को समाहित किया गया उनमें प्रमुख हैं- युवकों का व्यक्तित्व निर्माण, दिशाहीन युवा शक्ति को सुसंगठित कर उनका मार्ग दर्शन करना, समाज व राष्ट्र के प्रति उनके उत्तरदायित्व का बोध व समग्रोन्नति हेतु उन्हें उत्साहित व प्ररित करना। इसके अलावा देश और समाज की उन्नति के लिये किसी भी रचनात्मक सहयोग, समाज द्वारा किये अथवा किये जाने वाले कार्यों की समीक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा का सुदृढ़ीकरण, समाज में स्वाभिमान एवं आत्मबल का निर्माण व संचार कर शैक्षणिक, शारीरिक, चारित्रिक, राजनैतिक के प्रति समाज के युवकों को निरन्तर जागरूक बनाये रखते हुए अपने परिवार व व्यवसाय के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी के साथ निर्वाहन करते हुए समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे दहेज, विवाह शादियों में फिजूलखर्ची व आडम्बर, शादी समारोह के अवसर पर बधू पक्ष पर अनैतिक दबाव, धार्मिक आडम्बर आदि का पुरजोर विरोध करना मंच का प्रमुख मानते हुए जनसेवा को प्राथमिकता देने का लक्ष्य रखते हुए ‘मंच दर्शन’ को निम्न पांच सूत्रों में पिरोया गया है। जो निम्न प्रकार है।-
    (1) मंच आधार : जनसेवा कार्य
    (2) मंच भाव : समाज सुधार
    (3) मंच शक्ति : व्यक्ति विकास
    (4) मंच चाह : सामाजिक सम्मान और आत्म-सुरक्षा
    (5) मंच लक्ष्य : राष्ट्रीय विकास एवं एकता

    आज मारवाड़ी युवा मंच अखिल भारतीय स्तर की एक क्रियाशील संस्था के रूप में पूरे भारत में अपनी पहचान बना चुकी है। जहाँ एक तरफ समाज में मंच के प्रति आस्था जगी है तो दूसरी तरफ समाज के युवकों में पिछले दो दशक में काफी परिर्वतन देखने को मिला है। आज समाज के युवक खुद को मारवाड़ी कहलाने में गार्व की अनुभूति करते हैं। लोगों ने मंच के सदस्यों में विश्वास व्यक्त किया है। इस विश्वास को कायम रखना मंच के प्रत्येक सदस्यों की जिम्मेदारी बनती है। इसके लिए जहाँ एक तरफ पुराने कार्यकर्ताओं का सम्मान वहीं नये युवकों की प्रतिभा का विकास हमें निरन्तर करते रहना होगा। आज हम नासिक शहर में दशम राष्ट्रीय अधिवेशन करने की योजना को मुर्त रूप देने जा रहें हैं अधिवेशन स्थल के उद्घाटन व समापन समारोह को छोड़ कर अधिक समय विभिन्न प्रान्तों से आये प्रतिनिधियों के विकास व संगठन को सुदृढ़ करने की योजनाओं पर हमें केन्द्रित रहना चाहिये। जय समाज! [end] Search: Marwari Yuva Manch, Shambhu Choudhary, Marwari, Marwari Samaj.


    * http://samajvikas.blogspot.com/2010/12/blog-post.html
    **07-09, जनवरी 2000-2002 जमशेदपुर - राष्ट्रीय अध्यक्षः श्री अनिल जैना,
    राष्ट्रीय महामंत्री श्री डॉ. प्रदीप जैन, गोहाटी (प्रथम डेढ़ वर्षों के लिए) श्री प्रमोद जैन, गोहाटी (बाद के डेढ़ वर्षों के लिए)

    बुधवार, 8 जून 2011

    विश्व मारवाड़ी सम्मलेन

    "अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच
    "युवा मंथन 2011"
    "दशम राष्ट्रीय अधिवेशन"
    "प्रथम विश्व मारवाड़ी सम्मलेन"
    अंतर्राष्ट्रीय व्यापार - उद्योग परिषद्
    आयोजक : महाराष्ट्र प्रादेशिक मारवाडी युवा मंच
    संयोजन : मारवाडी युवा मंच - शाखा नासिक सिटी
    दिनांक : 11 - 13 नवंबर 2011
    स्थान : छत्रपति शिवाजी महाराज नगरी, डोंगरे वसतिगृह, गंगापुर रोड, नासिक"
    FOR REGISTRATION PL LOG ON TO
    http://mymnashik.org/registration.php

    नन्दकिशोर जालान नहीं रहे



    कोलकाता महानगर में 1 सितम्बर 1924 में जन्में वरिष्ठ समाजसेवी श्री नन्दकिशोर जालान जी का आज 8 जून 2011 को दोपहर तीन बजे शहर के एक अस्पताल में हृदयाघात के कारण निधन हो गया। कल रात अचानक उनके सीने में दर्द होने के चलते उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आज शाम को 7.30 बजे नीमतल्ला घाट में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए जिनमें प्रमुख रूप से श्री रतन शाह, श्री विशम्भर नैवर, श्री सीताराम शर्मा, श्री शम्भु चौधरी, श्री प्रमोद शाह, श्री आत्माराम सोंथलिया, श्री संजय हरलालका, श्री रामअवतार पोद्दार, श्री रवि लड़िया, एवं श्री ओमप्रकाश पोद्दार आदि प्रमुख थे। इस घटना का समाचार फैलते ही शहर में शोक की लहर दौड़ गई। अखिल भरतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष श्री सीताराम शर्मा एवमं अखिल भारतीय मारवाड़ी युवामंच के संस्थापक अध्यक्ष श्री प्रमोद्ध सराफ इनके निधन को समाज की अपूरणीय क्षति बताया। श्री रतन शाह ने इस घटना पर अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि श्री जालान जी दो पीढ़ी के एक कड़ी के सामाजिक व्यक्तित्व थे। इनके निधन से समाज सुधार के क्षेत्र मे कार्य करने वाले कार्यकर्ता की पुरानी कड़ी समाप्त हो गई।

    सन् 1924 जन्में श्री नन्द किशोर जालान 26 वर्ष की आयु में आप अखिल भरतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के महामंत्री बने। उस कालखण्ड में बरार केसरी एवं मध्य प्रदेश के वित्तमंत्री श्री बृजलालजी बियानी सम्मेलन के अध्यक्ष थे। आपने समाज सुधार के कई कार्यक्रम आयोजित कराए जिनमें पर्दा प्रथा का बहिष्कार विधवा विवाह को स्वीकृति और दहेज विरोध आदि प्रमुख थे। आपने स्त्री शिक्षा पर जोर दिया और आग्रह किया कि समाज के लोगों को व्यापार के अतिरिक्त राजनीति में भी प्रवेश करना चाहिए। आपने समाज के लोगों पर होने वाले अत्याचारों का मुश्तैदी से सामना किया। 1974 में जब श्री भंवरमल सिंघी सम्मेलन के अध्यक्ष बने तो श्री नन्दकिशोरजी जालान को पुनः प्रधानमंत्री निर्वाचित किया गया। आप 1979 में सम्मेलन के उपसभापति निर्वाचित हुए और सन् 1982 में जमशेदपुर अधिवेशन में सभी प्रांतों के सदस्यों ने आपको सम्मेलन का अध्यक्ष निर्वाचित किया। आपके नेतृत्व में विवाह योग्य युवक युवतियों का परिचय सम्मेलन व सामूहिक विवाह आदि कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। आपकी चेष्टा से सम्मेलन की पत्रिका समाज विकास का पुनः प्रकाशन 1958 से आरम्भ हुआ। समाज विकास के सम्पादन में आपका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

    समाज गौरव श्री नन्दकिशोर जालान


    Nand Kishore Jalan
    अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच के नवम राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन समाज गौरव सम्मान का राष्ट्रीय अलंकरण व सम्मान अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष एवं युवा मंच के मार्गदर्शक नन्दकिशोर जालान को दिया गया । अधिवेशन में श्री जालान जी ने अपनी अस्वस्थ्यता के चलते जाने में असमर्थता व्यक्त की थी, इसलिये गत 22 जनवरी 2009 शाम 5.30 बजे अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच के निवर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अनिल के.जाजोदिया, अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नन्दलाल रूँगटा व निवर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सीताराम शर्मा, सम्मेलन के राष्ट्रीय महामंत्री श्री रामावतर पोद्दार, समाज विकास के कार्यकारी संपादक श्री शम्भु चौधरी, श्री कैलाशपति तोदी, श्री दीलीप गोयनका, श्री मुकेश खेतान, व श्रीमती अनुराधा खेतान ने कोलकाता स्थित उनके निवास पर जाकर उक्त सम्मान उन्हें भैंट किया गया था।


    1930 में स्थापित कलकत्ता चेम्बर ऑफ कामर्स के आप 1970 में अध्यक्ष निर्वाचित हुए एवं इन्हीं के सभापतित्व में 1980 में चेम्बर की 150वीं स्थापना तिथि मनाई गई थी। श्री विशुद्धानन्द सरस्वती मारवाड़ी अस्पताल के आप 1973 में मंत्री निर्वाचित हुए एवं पुनः 1987 में इन्हें यह भार दिया गया। सुप्रसिद्ध पोद्दार छात्र निवास जिसे 1935 में मारवाड़ी छात्र निवास के नाम से आरम्भ किया गया था से आपका गहरा संबंध रहा। 1978 में मंत्री 1992 से आप अध्यक्ष रहे। श्री नवलगढ़ विद्यालय के विकास एवं विस्तार में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
    सम्मेलन के प्रति पूर्णतया समर्पित एक निष्काम कर्मयोगी भावी पीढ़ी के प्रेरणा स्रोत सतत् संघर्षशील समाज के अग्रदूत के निधन से समाज को अपूरणीय क्षति हुई है।

    रविवार, 29 मई 2011

    राजस्थानी शब्द का प्रयोग - शम्भु चौधरी


    Rajputana Prant Before Independence of India
    धीरे-धीरे मारवाड़ी शब्द संकुचित और रूढ़ीगत दायरे की चपेट से बाहर आने लगा है। अब यह शब्द देश के विकास का सूचक बनता जा रहा है। एक समय था जब इतर समाज के साथ-साथ समाज के लोग भी इसे घृणा का पर्यावाची सा मानने लगे थे। समाज के जो युवक पढ़-लिख लेते थे वे अपने आपको न सिर्फ समाज से अलग मानते थे, वरण कई ऐसे भी थे जो अपने नाम के आगे जाति सूचक टाइटल को भी हटा दिया करते थे ताकी उनको सरकारी नौकरी करने में सहुलियत हो। इसके प्रायः दो करण थे- पहला समाज में सरकारी नौकरी करना अच्छा नहीं माना जाता था। दूसरा नौकरी करने वाले बच्चे की शादी समाज के भीतर करना एक टेढ़ी खीर के बराबर थी। आज भी समाज में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जिसमें हम रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर श्री विमल जालान का नाम उदाहरण के तौर पर रखा जा सकता है। जबकी इनके पिता स्व. ईश्वरदास जालान जाति सूचक शब्द ‘मारवाड़ी’ में पूरी आस्था रखते थे एवं जाति सूचक ‘मारवाड़ी’ शब्द से शुरू की गई संस्था ‘‘मारवाड़ी सम्मेलन’’ के जन्मदाता के रूप में आपका नाम लिखा जाता है। कई बार हरियाणा के मारवाड़ी राजस्थानी शब्द को लेकर विचलित हो जाते हैं। कई सभाओं में इस बात का विवाद अनजाने में ही शुरु हो जाता है कि सभा में या संविधान में सिर्फ राजस्थानी भाषा और संस्कृति पर ही चर्चा क्यों होती है इस तरह क अनसुलझे प्रश्न सामने आते रहते है। जिसका समाधान भी खोजा जाता है, चुकिं उपयुक्त उत्तर के अभाव में विवाद को टालने के लिए सिर्फ ‘मारवाड़ी’ शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है।
    जहाँ तक मेरा मानना है कि ‘मारवाड़ी’ - शब्द न कोई जाति, न धर्म और न ही किसी विषेश प्रान्त का ही द्योतक है जैसे- पंजाबी, बंगाली, गुजराती आदि कहने से अहसास होता है। राजस्थान व राजस्थानी सीमावर्ती इलाके जिसमें हरियाणा व पंजाब के कुछ हिस्से जो कालांतर भौगोलिक रेखाओं में परिवर्तन के चलते इन प्रान्तों में राजपुताना रियासतों का विलय कर दिया गया को, के प्रवासी लोगों को भारत के अन्य प्रान्तों या विदेशों में भी ‘मारवाड़ी’ शब्द से जाना व पहचाना जाता है। जबकि इन सबकी संस्कृति और भाषा राजस्थानी ही है। ( मुसलमानों को छोड़कर )।
    यहाँ पंजाब और हरियाणा क्षेत्र के राजस्थानी जो एक समय राजपुताना के क्षेत्र में ही आते थे, अब भूगौलिक परिवर्तन व पंजाब और हरियाणा प्रान्तों के रूप में जाने व पहचाने जाने के चलते इस क्षेत्र का मारवाड़ी समाज अपने आपको पंजाबी या हरियाणवी ही मानने लगे हैं, जबकि इनकी बोलचाल-भाषा, पहनावे, रीति-रिवाज, राजस्थानी भाषा संस्कृति से मिलते ही नहीं राजस्थानी संस्कृति ही है। इसीलिए प्रवासी मारवाड़ी समाज के लिये आमतौर पर राजस्थानी शब्द का ही प्रयोग किया जाता है भले ही वे हरियाणा या पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र से ही क्यों न आतें हो। पिछले दिनों यह प्रश्न उठा कि मारवाड़ी से तात्पर्य जब राजस्थानी भाषा और संस्कृति से ही लगाया जाता है तो हरियाणा की क्या कोई अपनी संस्कृति नहीं है? यह प्रश्न आज की युवा पीढ़ी का उठाना वाजिब सा लगता है जब हरियाणा एक समय पंजाब के अन्तर्गत आता था तो यह बात पंजाब के साथ भी उठती थी की हरियाणा की अपनी अलग संस्कृति है इसे पंजाब से अलग कर दिया जाय और हुआ भी और केन्द्र ने यह स्वीकार किया कि हरियाणा को एक अलग राज्य का दर्जा देना ही उचित रहेगा। परन्तु इस राज्य के अलग दर्जे को प्राप्त कर लेने से जो क्षेत्र राजस्थानी रियासतों के अधिन आते थे उनकी भाषा, संस्कृति, पहनावे, खान-पान, रीति-रिवाज हो या पर्व-त्यौहार सभी में समानता पाई जाती है जो थोड़ा बहुत अन्तर पाया जाता है वह सिर्फ आंचलिक बोली का ही है। ( देखें दिये गये एक चित्र के तीर निशान को जिसमें हिसार, भिवानी, रोहतक, गुड़गावं, लेहारू, महेन्द्रगढ़, पटियाला और दिल्ली का भी छोटा सा भाग राजपुताने क्षेत्र में दिखाया हुआ है। जो इन दिनों हरियाणा राज्य में आते हैं। ) इसलिए राजस्थानी शब्द की व्यापकाता पर हमें सोचने की जरुरत है न कि प्रान्तीयता के नजरिये से होकर हमें अपने अन्दर संकुचित विचार पैदा करने की।

    गुरुवार, 26 मई 2011

    लोकतंत्र की भाषा - शम्भु चौधरी


    Shambhu Choudharyमारवाड़ी समाज का एक बड़ा घड़ा राजनैतिक विचारधारा को सिर्फ व्यापारी नजरिये से देखने का प्रयास करता रहा है जिसका परिणाम यह हुआ कि एक समय समाज का नेतृत्व करने वाले तपस्वी राजनीति व्यक्तित्व यतः डाॅ.राममनोहर लोहिया, स्व. बृजलाल बियाणी, जमनालाल बजाज, सेठ गोविन्ददास मालपाणी, विजयसिंह नाहर, स्व. श्रीमती इन्दुमती गोयनका, स्व.ईश्वरदास जालान, सीताराम सेक्सरिया, प्रभूदयाल हिम्मतसिंहका की राजनीति जमीन को दरकिनार कर पीछे दरवाजे की राजनीति को समाज ने अपना लिया। ऐसे लोग राज्यसभा के सदस्य बनाये जाने लगे, जिसका समाज से काई सरोकार नहीं रहा। किसी ने खुद के धनबल पर तो किसी ने उद्योग घराने के सहयोग से समाज की छवि को राज्यसभा में नीलाम करते रहे। समाज इस तमाशे को तमाशबीन बन देखता रहा। जिसका परिणाम यह हुआ कि समाज के आम राजनैतिक कार्यकर्ताओं का मनोबल धीरे-धीरे कमजोर होता गया। इसमें से कुछ अपनी स्थिती को बनाये रखने के लिए राजनैतिक दलों के खजांची बन गये, अर्थात समाज से धन उगाहने का कार्य करने लगे। मारवाड़ी समाज को इस सब से काई सरोकार नहीं रहा, चुनाव के समय कुछ नेताओं से दोस्ती बनाना एवं जब वे मंत्री बन जाय तो कुछ लागों को इसका लाभ कैसे मिले इस कार्य के संपादन में खुद की प्रतिष्ठा समझना तो दूसरी तरफ समाज अपने मतदान को महत्वहीन समझने लगा। मतदान के दिन को अवकाश का दिन मानकर ताश या अन्य किसी मनोरंजन को माध्यम अपना कर समय गुजार देते। कुछ तो राजनीति के पण्डित बन जाते, तो कुछ अपनी पंहुच का बखान करने से नहीं चुकते।


    एक समय बंगाल के विधानसभा में मारवाड़ी समाज के प्रतिनिधि का होना आवश्यक माना जाता था, आज 2011 के विधानसभा में समाज की उपस्थिती शून्य हो चुकी है। इस राजनीतिक शून्यता व हमारी राजनीतिक प्रतिवद्धता को राजनैतिक दलों ने न सिर्फ इसका मूल्यांकन नेगेटिभ रखा बल्की साथ ही साथ बन्द कमरे में समाज को दया का पात्र भी समझा। जहाँ एक तरफ इतर समाज के किसी भी संकट पर ये दल जो सजगता दिखाते हैं वहीं समाज के साथ होने वाली घटनाओं का राजनैतिक लाभ लेने में भी नहीं चुकते। कुल मिलाकर मारवाड़ी समाज दया का पात्र बन चुका है। हमारा आत्मसम्मान चन्द राजनैतिज्ञों के लिए दया का पात्र बन चुका है। समाज में सामाजिक व राजनैतिक कार्यकर्ताओं का इस दिशा में लगातार यह
    प्रयास रहते हुए भी, कि किस तरह से समाज की इस उदासीनता को बदला जा सके, साकारत्मक पहल के कोई संकेत दूर-दूर तक हमें नहीं दिखाई दे रहा, जिसका परिणाम यह हुआ कि राजनीति में समाज का प्रतिनिधित्व सिमटा जा रहा है।


    जब हम अपने खुद के राजनैतिक मूल्यांकन पर सोचते हैं तो हमें बड़ी निराशा हाथ लगती है, भला कोई भी राजनैतिक दल आपकी सुरक्षा क्यों और किसलिए करेगा? समाज के किसी कार्यकर्ता को जब उसके खुद के प्रयास से किसी राजनैतिक दल की टिकट मिलती है तो हम उसके चुनाव प्रचार में सहयोगी होने की बात तो दूर, हम अपना वोट तक देने नहीं जाते। जिससे समाज के राजनैतिक कार्यकर्ताओं का मनोबल काफी कमजोर हुआ है। हमें आज यह बात समझनी होगी कि राजनीति हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। लोकतंत्र में बोलने की भाषा सिर्फ और सिर्फ आपका मतदान है। जो समाज एकजुट होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करेगा, उसी समाज की बात विधानसभा या संसद तक सुनी जायेगी, धन के बल पर की जाने वाली राजनीति भले ही किसी वर्ग विशेष को लाभ पंहुचाती हो परन्तु इससे समाज का कतई भला न तो हुआ है न होगा। जो समाज अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करेगा उसे लोकतंत्र की भाषा में गूंगा समाज समझा जायेगा।

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